विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 585, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अष्टाशीतितमोऽध्यायः ५६३
और इन्द्रभवनकी भी सुन्दरी अप्सराओंको वहाँ बुला मँगाया ॥ ३९ ॥
ताः प्रोवाचाप्रमेयात्मा सान्त्वयित्वा जगत्प्रभुः।
उत्थापयित्वा प्रणताः कृताञ्जलिपुटास्तथा ॥ ४० ॥
अप्रमेयस्वरूप जगदीश्वर श्रीकृष्णने हाथ जोड़कर चरणोंमें पड़ी हुई उन अप्सराओंको उठाया और सान्त्वना देकर कहा—॥ ४० ॥
क्रीडायुवतयो भैमानां प्रविशध्वमशङ्किताः।
मत्प्रियार्थं वरारोहा रमयध्वं च यादवान् ॥ ४१ ॥
'सुन्दरियो ! तुम निःशङ्क होकर भीमवंशी यादवकुमारोंकी क्रीडायुवतियोंमें प्रविष्ट हो जाओ और मेरा प्रिय करनेके लिये इन यादवोंको सुख पहुँचाओ ॥ ४१ ॥
दर्शयध्वं गुणान् सर्वान् नृत्यगीतै रहःसु च।
तथाभिनययोगेषु वाद्येषु विविधेषु च ॥ ४२ ॥
'नाच, गान, एकान्त-परिचर्या, अभिनय-योग तथा नाना प्रकारके बाजे बजानेकी कलामें तुमलोगोंके पास जितने गुण हों, उन सबको दिखाओ ॥ ४२ ॥
एवं कृते विधास्यामि श्रेयो वो मनसेप्सितम्।
मच्छरीरसमा होते सर्वे निरवशेषतः ॥ ४३ ॥
'ऐसा करनेपर मैं तुम्हें मनोवाञ्छित कल्याण प्रदान करूँगा; क्योंकि ये सब-के-सब यादव मेरे शरीरके ही समान हैं' ॥ ४३ ॥
शिरसाज्ञां तु ताः सर्वाः प्रतिगृह्य हरेस्तदा।
क्रीडायुवतयो विविशुर्भेमानामप्सरोवराः ॥ ४४ ॥
उस समय श्रीहरिकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके वे सब श्रेष्ठ अप्सराएँ यादवकुमारोंकी क्रीडा-युवतियोंमें सम्मिलित हो गयीं ॥ ४४ ॥
ताभिः प्रविष्टमात्राभिर्द्योतितः स महार्णवः।
सौदामिनीभिर्नभसि घनवृन्दमिवानघ ॥ ४५ ॥
निष्पाप नरेश ! उनके प्रवेश करते ही वह महासागर दिव्य प्रभासे उद्दीप्त हो उठा। ठीक उसी तरह, जैसे आकाशमें मेघोंका समुदाय बिजलियोंके चमकनेसे प्रकाशित हो उठता है ॥ ४५ ॥
ता जले स्थलवत् स्थित्वा जगुश्चाप्यथ वादयन्।
चक्रुश्चाभिनयं सम्यक्स्वर्गावास इवाङ्गनाः ॥ ४६ ॥
वे दिव्य अङ्गनाएँ जलमें भी स्थलकी ही भाँति खड़ी हो स्वर्गलोककी ही भाँति गीत गाने, बाजे बजाने तथा सुन्दर अभिनय करने लगीं ॥ ४६ ॥
गन्धैर्माल्यैश्च ता दिव्यैर्वस्त्रैश्चायतलोचनाः।
हेलाभिर्हास्यभावैश्च जह्रर्भैममनांसि ताः ॥ ४७ ॥
वे विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरियाँ दिव्य गन्ध, माल्य तथा वस्त्रोंसे सुशोभित हो अपनी विविध लीलाओं तथा हास्ययुक्त हाव-भावोंसे यादवकुमारोंके चित्त चुराने लगीं ॥ ४७ ॥
कटाक्षैरङ्गितैर्हास्यैः केलिरोषैः प्रसादितैः।
मनोऽनुकूलैर्भेमानां समाजह्रुर्मनांसि ताः ॥ ४८ ॥
कटाक्षों, संकेतों, हास्यों, क्रीडाजनित रोषों तथा प्रसन्नता-सूचक मनोऽनुकूल भावोंके द्वारा वे भीमवंशियोंके मन मोहने लगीं ॥ ४८ ॥
उत्क्षिप्योत्क्षिप्य चाकाशं वातस्कन्धान् बहूंश्च तान्।
मदिरावशगा भैमा मानयन्ति वराप्सराः ॥ ४९ ॥
वे अप्सराएँ उन यादवकुमारोंको ऊपर-ऊपर आकाशमें प्रवह आदि वायुके मार्गोंमें ले जाकर उनके साथ विहार करती थीं, अतः वे मदमत्त हुए भीमवंशीकुमार उन सुन्दरी अप्सराओंका बड़ा सम्मान करते थे ॥ ४९ ॥
कृष्णोऽपि तेषां प्रीत्यर्थं विजह्रे वियति प्रभुः।
सर्वैः षोडशभिः सार्द्धं स्त्रीसहस्रैर्मुदान्वितः ॥ ५० ॥
भगवान् श्रीकृष्ण भी उन यादवोंकी प्रसन्नताके लिये आकाशमें स्थित हो अपनी सोलह हजार स्त्रियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक विहार करते थे ॥ ५० ॥
प्रभावज्ञास्तु ते वीराः कृष्णस्यामिततेजसः।
न जग्मुर्विस्मयं भैमा गाम्भीर्यं परमास्थिताः ॥ ५१ ॥
वे वीर यादव अमित तेजस्वी श्रीकृष्णका प्रभाव जानते थे; अतः आकाशमें क्रीडा करनेके कारण उन्हे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वे उस दशामें भी अत्यन्त गम्भीर बने रहे ॥ ५१ ॥
केचिद् रैवतकं गत्वा पुनरायान्ति भारत।
गृहानन्ये वनान्यन्ये काङ्क्षितान्यरिमर्दन ॥ ५२ ॥
शत्रुमर्दन ! भरतनन्दन ! कुछ यादव रैवतक पर्वतपर जाकर फिर लौट आते थे। दूसरे घरोंमें जाकर आ जाते तथा अन्य लोग अभिलषित वनोंमें घूम फिरकर लौटते थे ॥ ५२ ॥
अपेयः पेयसलिलः सागरश्चाभवत् तदा।
आज्ञया लोकनाथस्य विष्णोरतुलतेजसः ॥ ५३ ॥