भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 586, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 586

५६४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे उस समय अतुल-तेजस्वी लोकनाथ भगवान् विष्णु वैदूर्यतोरणैश्चित्राश्चित्राभिर्मणिभक्तिभिः । ( श्रीकृष्ण ) की आशासे अपेय समुद्रका जल भी पीनेयोग्य मसारगल्वर्कमयैश्चित्रभक्तिशतैरपि ॥ ६० ॥ हो गया था ॥ ५३ ॥ उनमें वैदूर्यमणिके तोरण लगे थे, जिनसे उन महलोंकी अधावन् स्थलवच्चापि जले जलजलोचनाः । विचित्र शोभा होती थी। वे विचित्र मणिमय शय्याओंसे गृह्य हस्ते तथा नार्यो युक्तामज्जंस्तथापि च ॥ ५४ ॥ सुसज्जित थे। मरकत, चन्द्रकान्त और सूर्यकान्तमणिमय वे कमलनयनी नारियाँ जब इच्छा होती, तब जलमें भी विचित्र रागोंसे वे रंजित थे तथा नाना प्रकारके सैकड़ों आस्तरण स्थलकी भाँति दौड़ती थीं और जब चाहतीं परस्पर हाथ ( बिस्तर ) उनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६० ॥ पकड़कर एक साथ ही गोता लगा लेती थीं ॥ ५४ ॥ आक्रीडगरुडच्छन्दाश्चित्राः कनक्रीतिभिः । भक्ष्यभोज्यानि पेयानि चोष्यं लेह्यं तथैव च । क्रौञ्चच्छन्दाः शुकच्छन्दा गजच्छन्दास्तथापरे ॥ ६१ ॥ बहुप्रकारं मनसा ध्याते तेषां भवत्युत ॥ ५५ ॥ खेलके लिये बनाये गये गरुड़के समान भी उन भवनोंकी यादवोंके मनसे चिन्तन करते ही उनके लिये नाना आकृति थी। वे विचित्र भवन सुवर्णकी धाराओंसे शोभा प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य पदार्थ प्रस्तुत पाते थे। कोई क्रौञ्चके समान, कोई तोतेके तुल्य और कितने हो जाते थे ॥ ५५ ॥ ही भवन हाथियोंकी-सी आकृति धारण करते थे ॥ ६१ ॥ अम्लानमाल्यधारिण्यस्ताः स्त्रियस्ताननिन्दितान् । कर्णधारैर्गृहीतास्ता नावः कार्तस्वरोज्ज्वलाः । रहःसु रमयांचक्रुः स्वर्गे देवरतानुगाः ॥ ५६ ॥ सलिलं शोभयामासुः सागरस्य महोर्मिमत् ॥ ६२ ॥ जो कभी कुम्हलाती नहीं थी, ऐसी माला धारण करने- सुवर्णसे प्रकाशित होनेवाली वे नौकाएँ कर्णधारोंके वाली वे दिव्य अप्सराएँ स्वर्गमें देवताओंके साथ की गयी नियन्त्रणमें रहकर उत्ताल तरंगोंसे युक्त सागरकी जलराशिको रतिक्रीडाका अनुसरण करती हुई उन श्रेष्ठ यादवकुमारोंको सुशोभित कर रही थीं ॥ ६२ ॥ एकान्तमें रमणका अवसर देती थीं ॥ ५६ ॥ समुच्छ्रितः सितैः पोतैर्यानपात्रैस्तथैव च । नौभिर्गृहप्रकाराभिश्चिक्रीडुरपराजिताः । नौभिश्च झिल्लिकाभिश्च शुशुभे वरुणालयः ॥ ६३ ॥ स्नातास्तुलितमुदिताः सायाह्नेऽन्धकवृष्णयः ॥ ५७ ॥ सफेद जलपोतों, यात्रोपयोगी बड़ी-बड़ी नावों, वेगवती किसीसे पराजित न होनेवाले अन्धक और वृष्णिवंशके नौकाओं और महल आदिसे युक्त विशाल जहाजोंसे उस वीर सायंकालमें स्नानके पश्चात् अनुलेपन धारण करके वरुणालय ( समुद्र ) की बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ६३ ॥ आनन्दमग्न हो गृहाकार बनी हुई नौकाओं द्वारा क्रीडा पुराण्याकाशगानीव गन्धर्वाणामितस्ततः । करने लगे ॥ ५७ ॥ बभ्रमुः सागरजले भैमयानानि सर्वतः ॥ ६४ ॥ आयताश्चतुरस्राश्च वृत्ताश्च स्वस्तिकास्तथा । यादवोंके वे जलयान समुद्रके जलमें सब ओर चक्कर लगा प्रासादा नौषु कौरव्य विहिता विश्वकर्मणा ॥ ५८ ॥ रहे थे। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो गन्धर्वोंके नगर आकाशमें कुरुनन्दन ! विश्वकर्माने नौकाओंमें अनेक प्रकारके विचर रहे हों ॥ ६४ ॥ महल बनाये थे, जिनमेंसे कुछ लंबे थे और कुछ चौकोर । नन्दनच्छन्दयुक्तेषु यानपात्रेषु भारत । कुछ गोलाकार थे और कुछ स्वस्तिकाकार ॥ ५८ ॥ नन्दनप्रतिमं सर्वं विहितं विश्वकर्मणा ॥ ६५ ॥ कैलासमन्दरच्छन्दा मेरुच्छन्दास्तथैव च । —भारत ! नन्दनवनकी आकृति और समृद्धियोंसे युक्त तथा नानावयश्छन्दास्तेऽप्यीहामृगरूपिणः ॥ ५९ ॥ यानपात्रोंमें विश्वकर्माने सब कुछ नन्दन-जैसा ही बना वे महल कैलास, मन्दराचल और मेरुपर्वतकी भाँति दिया था ॥ ६५ ॥ इच्छानुसार रूप धारण कर लेते थे। कई नाना प्रकारके उद्यानानि सभावृक्षा दीर्घिकाः स्यन्दनानि च । पक्षियों और ईहामृगों ( भेड़ियों ) के समान रूप धारण निवेशितानि शिल्पानि तादृशान्येव सर्वथा ॥ ६६ ॥ करनेवाले थे ॥ ५९ ॥ उद्यान, सभा, वृक्ष, झील और झरने ( या फौवारे )

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