भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 587

विष्णुपर्व ] अष्टाशीतितमोऽध्यायः [ ५६५


आदि शिल्प सर्वथा वैसे ही उनमें समाविष्ट किये गये थे ॥ ६६ ॥

स्वर्गच्छन्देषु चान्येषु समासात् स्वर्गसंनिभाः ।
नारायणाज्ञया वीर विहिता विश्वकर्मणा ॥ ६७ ॥
वीर ! स्वर्ग-जैसे बने हुए दूसरे जलयानोंमें विश्वकर्माने भगवान् नारायणकी आज्ञासे स्वर्गकी-सी सारी वस्तुएँ संक्षेपसे रच दी थीं ॥ ६७ ॥

वनेषु रुरुवुर्हृद्यं मधुरं चैव पक्षिणः ।
मनोहरतरं चैव भैमानामतितेजसाम् ॥ ६८ ॥
वहाँके वनोंमें पक्षी हृदयको प्रिय लगनेवाली मधुर बोली बोलते थे । उनकी वह बोली उन अत्यन्त तेजस्वी यादवोंको बहुत ही मनोहर प्रतीत होती थी ॥ ६८ ॥

देवलोकोद्भवाः श्वेता विलेपुः कोकिलास्तदा ।
मधुराणि विचित्राणि यदूनां काङ्क्षितानि च ॥ ६९ ॥
देवलोकमें उत्पन्न हुए सफेद कोकिल उस समय यादव-वीरोंकी इच्छाके अनुसार विचित्र एवं मधुर आलाप छेड़ रहे थे ॥ ६९ ॥

चन्द्रांशुसमरूपेषु हर्म्यपृष्ठेषु बर्हिणः ।
ननृतुर्मधुरारावाः शिखण्डिगणसंवृताः ॥ ७० ॥
चन्द्रमाकी किरणोंके समान रूपवाली श्वेत अट्टालिकाओंपर मीठी बोली बोलनेवाले मोर दूसरे मोरोंसे घिरकर नृत्य करते थे ॥ ७० ॥

पताका यानपात्राणां सर्वाः पक्षिगणायुताः ।
भ्रमरैरुपगीताश्च स्रग्दामासक्तवासिभिः ॥ ७१ ॥
विशाल जलयानोंपर लगी हुई सारी पताकाओंपर पक्षियोंके समुदाय बैठे थे । उनमें जो पुष्पमालाओंकी लड़ियाँ बँधी थीं, उनपर आसक्त होकर रहनेवाले भ्रमर वहाँ गुञ्जारव फैला रहे थे ॥ ७१ ॥

नारायणाज्ञया वृक्षाः पुष्पाणि मुमुचुर्भृशम् ।
ऋतवश्चारुरूपाणि विहायसि गतास्तथा ॥ ७२ ॥
नारायण ( श्रीकृष्ण ) की आज्ञासे वृक्ष तथा ऋतुएँ आकाशमें स्थित हो मनोहर रूपवाले पुष्पोंकी अधिक वर्षा करने लगीं ॥ ७२ ॥

ववौ मनोहो वातो रतिखेदहरः सुखः ।
रजोभिः सर्वपुष्पाणां पृक्तश्चन्दनशैत्यभृत् ॥ ७३ ॥
रतिजनित खेद अथवा श्रमको हर लेनेवाली मनोहर एवं सुखदायिनी हवा चलने लगी, जो सब प्रकारके फूलोंके परागसे संयुक्त तथा चन्दनकी शीतलताको धारण करनेवाली थी ॥ ७३ ॥

शीतोष्णमिच्छतां तत्र बभूव वसुधापते ।
वासुदेवप्रसादेन भैमानां क्रीडतां तदा ॥ ७४ ॥
पृथ्वीपते ! क्रीड़ामें तत्पर होकर सर्दी-गर्मीकी इच्छा रखनेवाले यादवोंको उस समय वहाँ भगवान् वासुदेवकी कृपासे वह सब उनकी रुचिके अनुकूल प्राप्त होती थी ॥ ७४ ॥

न क्षुत्पिपासा न ग्लानिर्न चिन्ता शोक एव च ।
आविवेश तदा भैमान् प्रभावाच्चक्रपाणिनः ॥ ७५ ॥
भगवान् चक्रपाणिके प्रभावसे उस समय उन भीम-वंशियोंके भीतर न तो भूख-प्यास, न ग्लानि, न चिन्ता और न शोकका ही प्रवेश होता था ॥ ७५ ॥

अप्रशान्तमहातूर्या गीतनृत्योपशोभिताः ।
बभूवुः सागरक्रीडा भैमानामतितेजसाम् ॥ ७६ ॥
अत्यन्त तेजस्वी यादवोंकी समुद्रके जलमें होनेवाली वे क्रीड़ाएँ निरन्तर चल रही थीं । उनमें बड़े-बड़े वाद्योंकी ध्वनि शान्त नहीं होती थी तथा गीत और नृत्य उनकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ७६ ॥

बहुयोजनविस्तीर्णं समुद्रं सलिलाशयम् ।
रुद्धा चिक्रीडुरिन्द्राभा भैमाः कृष्णाभिरक्षिताः ॥ ७७ ॥
श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यादव अनेक योजन विस्तृत समुद्रके जलाशयको रोककर क्रीड़ा कर रहे थे ॥ ७७ ॥

परिच्छदस्यानुरूपं यानपात्रं महात्मनः ।
नारायणस्य देवस्य विहितं विश्वकर्मणा ॥ ७८ ॥
विश्वकर्माने महात्मा भगवान् नारायणदेवके लिये उनके विशाल परिवार ( सोलह हजार रानियोंके समुदाय ) के अनुरूप ही जहाज बना रक्खा था ॥ ७८ ॥

रत्नानि यानि त्रैलोक्ये विशिष्टानि विशाम्पते ।
कृष्णस्य तानि सर्वाणि यानपात्रेऽतितेजसः ॥ ७९ ॥
प्रजानाथ ! तीनों लोकोंमें जो विशिष्ट रत्न थे, वे सभी अत्यन्त तेजस्वी श्रीकृष्णके उस यानपात्रमें लगे थे ॥ ७९ ॥

पृथक्पृथङ्किवासाश्च स्त्रीणां कृष्णस्य भारत ।
मणिवैदूर्यचित्रास्ताः कार्तस्वरविभूषिताः ॥ ८० ॥
भारत ! श्रीकृष्णकी स्त्रियोंके लिये उसमें पृथक्-पृथक्