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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

विष्णुपर्व ] सप्ताशीतितमोऽध्यायः [ ५५७


स्त्रीरत्नमणिरत्नानि यानि चान्यानि चाप्यथ ।
काङ्क्षितानि फलन्ति स्म ते द्रुमा हरवल्लभाः ॥ ५६ ॥

'वे सभी वृक्ष भगवान् शङ्करके प्रिय हैं और स्त्रीरत्न, मणिरत्न तथा अन्य जो-जो अभिलषित पदार्थ हैं, उन सबको वे फलरूपसे प्रस्तुत करते हैं ॥ ५६ ॥

न तत्र सूर्यः सोमोऽथ तपत्यतुलविक्रम ।
स्वयंप्रभं तरुवनं तद् भो दुःखविवर्जितम् ॥ ५७ ॥

'अतुल पराक्रमी दैत्य ! वहाँ मन्दारवनमें न तो सूर्य तपते हैं और न चन्द्रमा ही प्रकाश करते हैं । मन्दार-वृक्षोंसे भरा हुआ वह वन स्वयं अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होता है । वहाँ दुःख-शोकका प्रवेश नहीं है ॥ ५७ ॥

तत्र गन्धान् स्रवन्त्यन्ये नीराण्यन्ये महाद्रुमाः ।
वासांसि विविधान्यन्ये सुगन्धीनि महाबल ॥ ५८ ॥

'महाबली अन्धक ! वहाँ कुछ वृक्ष ऐसे हैं, जो उत्तम सुगन्ध उत्पन्न करते हैं, दूसरे विशाल वृक्ष जल प्रकट करते हैं तथा अन्य वृक्ष नाना प्रकारके सुगन्धित वस्त्र प्रदान करते हैं ॥ ५८ ॥

भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यं तथैव च ।
तरुभ्यः स्रवते तेभ्यो विविधं मनसेप्सितम् ॥ ५९ ॥

'इतना ही नहीं, उन वृक्षोंसे भाँति-भाँतिके मनोवाञ्छित भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं ॥

पिपासा वा क्षुभुक्षा वा ग्लानिर्निद्रापि वानघ ।
न मन्दारवने वीर भवतीत्युपधार्यताम् ॥ ६० ॥

'निष्पाप वीर ! तुम यह समझ लो कि उस मन्दारवनमें भूख-प्यास, ग्लानि अथवा चिन्ता भी नहीं फटकने पाती है ६०

न ते वर्णयितुं शक्या गुणा वर्षशतैरपि ।
गुणा ये तत्र वर्द्धन्ते स्वर्गाद् बहुगुणोत्तराः ॥ ६१ ॥
अतीव हि जयेल्लोकान् समहेन्द्रान् न संशयः ।
एकाहमपि यस्तत्र वसेच्च दितिजोत्तम ॥ ६२ ॥

'वहाँ स्वर्गसे कई गुने उत्तम जो गुण दिनोंदिन बढ़ते हैं, उनका सैकड़ों वर्षोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता । दैत्यप्रवर ! जो वहाँ एक दिन भी निवास कर लेगा, वह महेन्द्रसहित सम्पूर्ण लोकोंपर अतिशय विजय प्राप्त कर लेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ६१-६२ ॥

स्वर्गस्यापि हि तत् स्वर्गं सुखानाम्पि तत् सुखम् ।
बभूव जगतः सर्वमिति मे धीयते मनः ॥ ६३ ॥

'वह स्वर्गका भी स्वर्ग और समस्त सुखोंका भी सुख है। मेरे मनका तो ऐसा विश्वास है कि वही सम्पूर्ण जगत्का सर्वस्व-सार है' ॥ ६३ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अन्धकवधे षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अन्धकवधविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥


सप्ताशीतितमोऽध्यायः

मन्दराचलपर गये हुए अन्धकासुरका महादेवजीद्वारा वध

वैशम्पायन उवाच

अन्धको नारदवचः श्रुत्वा तत्त्वेन भारत ।
मन्दरं पर्वत गन्तुं मनो दध्रे महासुरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत ! नारदजीकी बातको ठीकसे सुनकर महान् असुर अन्धकने मन्दराचलपर जानेका विचार किया ॥ १ ॥

सोऽसुरान् सुमहातेजाः समानीय महाबलः ।
जगाम मन्दरं क्रुद्धो महादेवालयं तदा ॥ २ ॥
वह महातेजस्वी, महाबली दैत्य बहुत से असुरोंको एकत्र करके कुपित हो उस समय महादेवजीके निवासस्थान मन्दरपर्वतपर गया ॥ २ ॥

तं महाभ्रप्रतिच्छन्नं महौषधिसमाकुलम् ।
नानासिद्धसमाकीर्णं महर्षिगणसेवितम् ॥ ३ ॥
वह पर्वत बड़े-बड़े मेघोंसे आच्छादित, महौषधियोंसे सम्पन्न, नाना प्रकारके सिद्धोंसे भरा हुआ और महर्षियोंके समुदायसे सेवित था ॥ ३ ॥

चन्दनागुरुवृक्षाढ्यं सरलद्रुमसंकुलम् ।
किन्नरोद्गीतरम्यं च बहुनागकुलाकुलम् ॥ ४ ॥
वहाँ सब ओर चन्दन और अगुरुके वृक्ष शोभा पाते थे । सरल (चीड़) के वृक्ष सर्वत्र फैले हुए थे । किन्नरोंके उच्चस्वरसे गाये जानेवाले मधुर गीतोंमें उसकी रमणीयता बढ़ गयी थी । वह बहुत-से नागकुलो (हाथियों अथवा सर्पों) से व्याप्त था ॥ ४ ॥

वातोद्धूतैर्वनैः फुल्लैर्नृत्यन्तमिव च क्वचित् ।
प्रसूतैर्धातुभिश्चित्रैर्विलेपितमिव च क्वचित् ॥ ५ ॥
कहीं वायुके वेगसे कम्पित हुए प्रफुल्ल काननोंद्वारा वह नृत्य करता-सा जान पड़ता था । कहीं पिघलकर बहे हुए विचित्र धातुओंके कारण वह चन्दन आदिसे चर्चित हुआ-सा प्रतीत होता था ॥ ५ ॥

पक्षिखनैः सुमधुरैर्नदन्तमिव च क्वचित् ।
हंसैः शुचिपदैः कीर्णे सम्पतद्भिरितस्ततः ॥ ६ ॥
कहीं पक्षियोंके अत्यन्त मधुर शब्दोंसे वह पर्वत गरजता

५५८श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

या कोलाहल करता-सा जान पड़ता था। पवित्र स्थानोंपर बैठनेवाले हंस वहाँ इधर-उधर उड़ते-फिरते थे; जिनसे सारा पर्वत व्याप्त प्रतीत होता था॥ ६॥

महाबलैश्च महिषैश्चरद्भिर्दैत्यनाशनैः।
चन्द्रांशुविमलैः सिंहैर्भूषितं हेमसंचयम्॥ ७॥

वहाँ दैत्योंका विनाश करनेमें समर्थ महाबली भैंसे विचरण करते थे। चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल कान्तिवाले सिंह उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते थे। वह समस्त शैल सुवर्णकी राशिरूप था॥ ७॥

मृगराजसमाकीर्णं मृगवृन्दनिषेवितम्।
स मन्दरं गिरिं प्राह रूपिणं बलदर्पितः॥ ८॥

वहाँ बहुत-से मृगराज (सिंह) सब ओर बिखरे हुए थे। झुंड-के-झुंड मृग उस पर्वतका सेवन करते थे। वह मन्दरपर्वत देवतारूपमें मूर्तिमान् होकर अन्धकासुरके सामने प्रकट हुआ। उसे देखकर बलके घमंडमें भरे हुए अन्धकासुरने कहा—॥ ८॥

वेत्सि त्वं हि यथावध्यो वरदानादहं पितुः।
मम चैव वशे सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ९॥
प्रतियोद्धुं न मां कश्चिदिच्छत्यपि गिरे भयात्।
पारिजातवनं चास्ति तव सानौ महागिरे।
सर्वकामप्रदैः पुष्पैर्भूषितं रत्नमुत्तमम्॥ १०॥

'महागिरे! यह तो तुम जानते ही होगे कि मैं किस प्रकार अपने पिताके वरदानसे सबके लिये अवध्य हूँ। चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी इस समय मेरे वशमें है। कोई भी भयके कारण मुझसे युद्ध करना नहीं चाहता। मुझे पता लगा है कि तुम्हारे शिखरपर सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले पुष्पोंसे विभूषित एक पारिजात वन है, जो यहाँका उत्तम रत्न है॥ ९-१०॥

तदाचक्ष्वोपभोक्ष्यामि तद् वनं तव सानुजम्।
किं करिष्यसि क्रुद्धस्त्वं मनो हि त्वरते मम॥ ११॥
त्रातारं नानु पश्यामि मया खल्वर्दितस्य ते।
इत्युक्तो मन्दरस्तेन तत्रैवान्तरधीयत॥ १२॥

'वह कहाँ है, उसे बताओ! मैं तुम्हारे शिखरपर उत्पन्न हुए उस वनका उपभोग करूँगा। मेरा मन उसमें जानेके लिये उतावला हो उठा है। तुम कुपित होकर मेरा क्या कर लोगे? मुझे ऐसा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता, जो मेरे द्वारा पीड़ित होनेपर तुम्हारी निश्चित रूपसे रक्षा कर सके।' उसके ऐसा कहनेपर मन्दराचलका वह अधिष्ठाता देव वहीं अन्तर्धान हो गया॥ ११-१२॥

ततोऽन्धकोऽतिरुषितो वरदानेन दर्पितः।
मुमोच नादं सुमहदिदं वचनमब्रवीत्॥ १३॥
मया वै त्वं याच्यमानो यस्मान्न बहु मन्यसे।
अहं चूर्णीकरोमि त्वां बलं पर्वत पश्य मे॥ १४॥

तब वरदानसे घमंडमें भरा हुआ अन्धक अत्यन्त रुष्ट हो बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगा और इस प्रकार बोला— 'अरे पर्वत! मेरे याचना करनेपर भी जो तू मुझे अधिक सम्मान नहीं दे रहा है, इससे कुपित होकर मैं तुझे अभी चूर्ण किये देता हूँ। देख ले मेरा बल'॥ १३-१४॥

एवमुक्त्वा गिरेः शृङ्गमुत्पाट्य बहुयोजनम्।
निष्पिपेप गिरेस्तस्य शृङ्गेष्वन्यत्र वीर्यवान्॥ १५॥
सह तैरासुरैः सर्वैर्वरदानेन दर्पितः।

ऐसा कहकर वरदानसे दर्पमें भरे हुए उस पराक्रमी दैत्यने उन सब असुरोंके साथ मन्दराचलके एक शिखरको, जो अनेक योजन विस्तृत था, उखाड़ लिया और उसे उसी पर्वतके दूसरे शिखरोंपर पटककर पीस डाला॥ १५ १/२॥

तं प्रच्छन्ननदीजालं मन्यमानं महागिरिम्॥ १६॥
विदित्वा भगवान् रुद्रश्चकारानुग्रहं गिरेः।

उस महान् पर्वतने अपनी नदियोंके समुदायको भी छिपा लिया। उसकी परिस्थितिको समझकर भगवान् रुद्रने उस पर्वतपर अनुग्रह किया॥ १६ १/२॥

सविशेषतरं वीर मत्तद्विपमृगायुतम्॥ १७॥
नदीजालैर्बहुतरैराचितं चित्रकाननम्।
नभश्च्युतैः पुरा यद्वत् तद्वदेव विराजते॥ १८॥

वीर! भगवान्‌के अनुग्रहसे पारिजात आदि विशेषतर वनोंसे युक्त, मतवाले हाथियों और मृगोंसे सम्पन्न तथा आकाशसे गिरे हुए बहुसंख्यक नदीसमूहोंसे व्याप्त वह विचित्र काननोंवाला पर्वत जैसा पहले था, उसी रूपमें प्रकाशित होने लगा॥ १७-१८॥

अथ देवप्रभावेण शृङ्गाण्युत्पादितानि तु।
क्षिप्तानि चासुरानेव घ्नन्ति घोराणि भारत॥ १९॥

भरतनन्दन! उन महादेवजीके प्रभावसे असुरोंद्वारा उखाड़कर फेंके गये उसके घोर शिखर उन असुरोंको ही मार डालते थे॥

क्षिप्त्वा ये प्रपलायन्ते शृङ्गाणि तु महासुराः।
शृङ्गैस्तैस्तैः स्म वध्यन्ति पर्वतस्य जनाधिप॥ २०॥

जनेश्वर! जो महान् असुर मन्दराचलके शिखरोंको फेंककर भागते थे, वे उन्हीं शिखरोंद्वारा मारे जाते थे॥ २०॥

ये स्वस्थास्त्वसुरास्तत्र तिष्ठन्ति गिरिसानुषु।
शृङ्गैस्ते न स्म वध्यन्ते मन्दरस्य महागिरेः॥ २१॥

जो असुर वहाँ पर्वत-शिखरोंपर स्वस्थ-भावसे खड़े थे, वे महागिरि मन्दरके उन शिखरोंद्वारा नहीं मारे जाते थे॥ २१॥

ततोऽन्धकस्तदा दृष्ट्वा सेनां तां मर्दितां तथा।
कुपितः सुमहानादं नर्दित्वैवं तदाब्रवीत्॥ २२॥

[ विष्णुपर्व ] सप्ताशीतितमोऽध्यायः ५५९


तब अन्धकने अपनी उस सेनाको कुचली गयी देख उस समय रोषपूर्वक महान् सिंहनाद करके इस प्रकार कहा—॥२२॥ आह्वये तं वनं यस्य युद्धार्थमुपतिष्ठतु। किं त्वयाचल युद्धेन हताः स च्छद्मना रणे॥ २३॥ 'अचल ! तेरे साथ युद्ध करनेसे क्या लाभ ? तूने रणभूमिमें दैत्योंको छलसे मारा है। अब मैं उस पुरुषको ललकारता हूँ, जिसका यह वन है। वह युद्धके लिये मेरे सामने उपस्थित हो' ॥ २३ ॥

एवमुक्ते त्वन्धकेन वृषभेण महेश्वरः। सम्प्राप्तः शूलमुद्यम्य देवोऽन्धकजिघांसया ॥ २४॥ अन्धकासुरके ऐसा कहनेपर उसे मार डालनेकी इच्छासे भगवान् महेश्वरदेव त्रिशूल उठाये अपने वृषभके द्वारा वहाँ आ पहुँचे ॥ २४ ॥

प्रमथानां गणैर्धीमान् वृतो वै बहुलोचनः। तथा भूतगणैश्चैव धीमान् भूतगणेश्वरः ॥ २५ ॥ भूतगणोंके स्वामी बुद्धिमान् भगवान् त्रिलोचन प्रमथगणों तथा भूतसमूहोंसे घिरे हुए थे ॥ २५ ॥

प्रचकम्पे ततः कृत्स्नं त्रैलोक्यं रुषिते हरे। सिन्धवश्च प्रतिस्रोतमूहुः प्रज्वलितोदकाः ॥ २६ ॥ भगवान् शङ्करके रुष्ट होनेपर सारी त्रिलोकी काँप उठी। नदियाँ अपने प्रवाहके विपरीत उद्गमस्थानकी ओर बहने लगीं । उनका जल खौल उठा ॥ २६ ॥

जग्मुर्दिशोऽग्निदाहाश्च सर्वे ते हरतेजसा। युयुधुश्च ग्रहाः सर्वे विपरीता जनाधिप ॥ २७॥ जनेश्वर ! महादेवजीके तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंमें अग्निदाह फैल गये और समस्त ग्रह विपरीत होकर परस्पर जूझने लगे।२७।

चेलुश्च गिरयस्तत्र काले कुरुकुलोद्वह। प्रववर्षार्थ पर्जन्यः सधूमाङ्गारवृष्टयः ॥ २८ ॥ कुरुकुलधुरंधर वीर ! उस समय सारे पर्वत हिलने लगे और उनके ऊपर मेघ धूमयुक्त अङ्गारोंकी वर्षा करनेलगे।२८।

उष्णाभाश्चन्द्रमाश्चासीत् सूर्यः शीतप्रभस्तथा । न ब्रह्म विविदुस्तत्र मुनयो ब्रह्मवादिनः ॥ २९ ॥ चन्द्रमाकी शीतल किरणें गरम हो गयीं। सूर्यकी प्रभा ठंडी पड़ गयी। ब्रह्मवादी मुनियोंका सारा ब्रह्मज्ञान भूल गया ॥ २९ ॥

वडवाः सुपुवुर्गाश्च गावोऽश्वानपि चानघ। पेतुर्रुक्षाश्च मेदिन्यामछिन्ना भस्मसात्कृताः ॥ ३० ॥ निष्पाप नरेश्वर ! घोड़ियोंके पेटसे गायके बछड़े पैदा होने लगे और गौएँ घोड़ोंको जन्म देने लगीं । पृथ्वीपर बिना काटे ही बहुत-से वृक्ष भस्म होकर गिर पड़े ॥ ३० ॥

बाधन्ते वृषभा गाश्च गावश्चारुरुहुर्वृषान् । राक्षसा यातुधानाश्च पिशाचाश्चापि सर्वशः ॥ ३१ ॥ साँड़ गौओंको सताने लगे। गौएँ भी साँड़ोंपर चढ़ जाती थीं । राक्षस, यातुधान और पिशाच—ये सब-के-सब ( प्राणियोंको कष्ट देने लगे ) ॥ ३१ ॥

विपरीतं जगद् दृष्ट्वा महादेवस्तथागतम्। मुमोच भगवान्छूलं प्रदीप्ताग्निसमप्रभम् ॥ ३२ ॥ संसारकी इस प्रकार विपरीत अवस्था देख भगवान् शङ्करने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी अपना त्रिशूल छोड़ा॥

तत् पपात हरोत्सृष्टमन्धकोरसि दुर्द्धरम्। भस्मसाच्चाकरोद् रौद्रमन्धकं साधुकण्टकम् ॥ ३३ ॥ भगवान् शङ्करका छोड़ा हुआ वह दुःसह अस्त्र अन्धकासुरकी छातीपर गिरा। उसने साधुओंके लिये कण्टकरूप भयंकर अन्धकासुरको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ३३ ॥

ततो देवगणाः सर्वे मुनयश्च तपोधनाः। शंकरं तुष्टुवुश्चैव जगच्छत्रौ निबर्हिते ॥ ३४ ॥ तदनन्तर समस्त देवगण और तपोधन मुनि जगत्के शत्रु अन्धकासुरके मारे जानेपर भगवान् शङ्करकी स्तुति करने लगे ॥ ३४ ॥

देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात ह । त्रैलोक्यं निर्वृतं चासीन्नरेन्द्र विगतज्वरम् ॥ ३५ ॥ नरेन्द्र ! देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं । आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और तीनों लोकोंके प्राणियोंने निश्चिन्त होकर संतोषकी साँस ली ॥ ३५ ॥

प्रजगुर्देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः । जेपुश्च ब्राह्मणा वेदान्निजपुश्च क्रतुभिस्तदा ॥ ३६ ॥ उस समय देवगन्धर्व गाने और अप्सराएँ नाचने लगीं। ब्राह्मणलोग वेदोंका जप, स्वाध्याय तथा यज्ञोंका अनुष्ठान करने लगे ॥ ३६ ॥

ग्रहाः प्रकृतिमापेदुरूहर्नद्यो यथा पुरा। न जज्वल जले वह्निराशाः सर्वाः प्रसेदिरे ॥ ३७ ॥ ग्रह स्वाभाविक स्थितिमे आ गये। नदियाँ पहलेके समान बहने लगीं । जलमें आगका जलना बंद हो गया और सारी दिशाएँ प्रसन्न हो गयीं ॥ ३७॥

मन्दरः पर्वतश्रेष्ठः पुनरेव रराज ह। श्रिया परमया जुष्टः सर्वतेजःसमुच्छ्रयात् ॥ ३८ ॥ पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल अपने सम्पूर्ण तेजकी वृद्धि होनेके कारण परम शोभासे सम्पन्न हो पुनः पूर्ववत् प्रकाशित होने लगा ॥ ३८ ॥

रेमे सोमश्च भगवान् पारिजातवने हरः।

५६०श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

सुप्रचारान् सुरान् कृत्वा शक्रादीन् धर्मतः प्रभुः ॥ ३९ ॥
सबके प्रभु उमासहित भगवान् शङ्कर इन्द्र आदि देवताओंको धर्मतः सर्वत्र घूमने-फिरने योग्य बनाकर पारिजात-वनमें विहार करने लगे ॥ ३९ ॥ .

इति श्रीमद्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अन्धकवधे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अन्धकवधविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥


अष्टाशीतितमोऽध्यायः

पिण्डारकतीर्थके अन्तर्गत समुद्रमें श्रीकृष्ण तथा अन्य यादवोंका जलविहार

जनमेजय उवाच
श्रुतेऽन्धकवधः श्राव्यः श्रुतोऽयं खलु भो मया।
शान्तिस्त्रयाणां लोकानां कृता देवेन धीमता ॥ १ ॥
**जनमेजय बोले—**मुने ! अन्धकवधका प्रसंग अवश्य सुनने योग्य है। मैंने उसे अच्छी तरह सुना है। अन्धकासुर-का वध करके बुद्धिमान् महादेवजीने तीनों लोकोंमें शान्ति फैला दी ॥ १ ॥

निकुम्भस्य हतं देहं द्वितीयं चक्रपाणिना ।
यदर्थं च यथा चैव तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ २ ॥
अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्णने निकुम्भके दूसरे शरीरका किस लिये और किस प्रकार वध किया था। आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच
श्रद्दधानस्य राजेन्द्र वक्तव्यं भवतोऽनघ।
चरितं लोकनाथस्य हरेरमिततेजसः ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**निष्पाप राजेन्द्र ! तुम श्रद्धालु हो; इसलिये तुमसे अमित तेजस्वी जगन्नाथ श्रीहरिके चरित्रका वर्णन करना उचित है ॥ ३ ॥

द्वारवत्यां निवस्तो विष्णोरतुलतेजसः ।
समुद्रयात्रा सम्प्राप्ता तीर्थे पिण्डारके नृप ॥ ४ ॥
नरेश्वर ! एक समयकी बात है, द्वारकामें रहते समय अतुल तेजस्वी श्रीकृष्णको पिण्डारकतीर्थमें समुद्रयात्राका अवसर प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥

उग्रसेनो नरपतिर्वसुदेवश्च भारत ।
निक्षिप्तौ नगराध्यक्षौ शेषाः सर्वे विनिर्गताः ॥ ५ ॥
भरतनन्दन ! राजा उग्रसेन तथा वसुदेव—इन दोनोंको नगरका अध्यक्ष बनाकर द्वारकापुरीमें ही छोड़ दिया गया। शेष सब लोग यात्राके लिये निकले ॥ ५ ॥

पृथग्बलः पृथग्धीमाँल्लोकनाथो जनार्दनः ।
गोष्ठ्यः पृथक्कुमाराणां नृदेवामिततेजसाम् ॥ ६ ॥
नरदेव ! बलरामजी अपने परिवारके साथ अलग थे, सम्पूर्ण जगत्के स्वामी बुद्धिमान् भगवान् जनार्दनका दल अलग था तथा अमित तेजस्वी कुमारोंकी मण्डलियाँ भी अलग-अलग थीं ॥ ६ ॥

गणिकानां सहस्राणि निःसृतानि नराधिप ।
कुमारैः सह वार्ष्णेयै रूपवद्भिः स्वलंकृतैः ॥ ७ ॥
नरेश्वर ! वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत तथा रूप-सौन्दर्यसे सम्पन्न वृष्णिवंशी कुमारोंके साथ सहस्रों गणिकाएँ भी यात्रा-के लिये निकलीं ॥ ७ ॥

दैत्याधिवासं निर्जित्य यदुभिर्दृढविक्रमैः ।
वेश्या निवेशिता वीर द्वारवत्यां सहस्रशः ॥ ८ ॥
वीर ! सुदृढ़ पराक्रमी यादव वीरोंने दैत्योंके निवास-स्थान समुद्रको जीतकर वहाँ द्वारकापुरीमें सहस्रों वेश्याओंको बसा दिया था ॥ ८ ॥

सामान्यास्ताः कुमाराणां क्रीडानार्यो महात्मनाम् ।
इच्छाभोग्या गुणैरेव राजन्या वेषयोषितः ॥ ९ ॥
विविध वेश धारण करनेवाली वे युवतियाँ महामनस्वी यादवकुमारोंके लिये सामान्य क्रीड़ानारियाँ थीं। वे अपने गुणोंद्वारा सभी कुमारोंकी इच्छाके अनुसार उनके उपभोगमें आनेवाली थीं। राजकुमारोंकी उपभोग्या होनेके कारण वे राजन्या कहलाती थीं ॥ ९ ॥

स्थितिरेषा हि भैमानां कृता कृष्णेन धीमता ।
स्त्रीनिमित्तं भवेद् वैरं मा यदूनामिति प्रभो ॥ १० ॥
प्रभो ! बुद्धिमान् श्रीकृष्णने भीमवंशी यादवोंके लिये ऐसी व्यवस्था कर दी थी, जिससे यादवोंमें स्त्रीके कारण परस्पर वैर न हो ॥ १० ॥

रेवत्या चैकया सार्धं बलो रेमेऽनुकूलया ।
चक्रवाकानुरागेण यदुश्रेष्ठः प्रतापवान् ॥ ११ ॥
प्रतापी यदुश्रेष्ठ बलरामजी सदा अपने अनुकूल रहने-वाली एकमात्र रेवती देवीके साथ चकवा-चकवीके समान परस्पर अनुरागपूर्वक रमण करते थे ॥ ११ ॥

कादम्बरीपानकलो भूषितो वनमालया।
चिक्रीड सागरजले रेवत्या सहितो बलः ॥ १२ ॥
वे कादम्बरी (मधु) का पान करके मस्त रहते थे। वनमालासे विभूषित हुए बलराम वहाँ रेवतीके साथ समुद्र-जलमें क्रीडा करने लगे ॥ १२ ॥

[विष्णुपर्व ] अष्टाशीतितमोऽध्यायः ५६१

षोडश स्त्रीसहस्राणि जले जलजलोचनः।
रमयामास गोविन्दो विश्वरूपेण सर्वदृक् ॥ १३ ॥

सबके द्रष्टा कमलनयन गोविन्द सर्वरूपसे अर्थात् जितनी स्त्रियाँ थीं, उतने ही रूप धारण करके जलमें अपनी सोलह हजार स्त्रियोंको रमाते थे ॥ १३ ॥

अहमिष्टा मया सार्द्धं जले वसति केशवः।
इति ता मेनिरे सर्वा रात्रौ नारायणश्रियः ॥ १४ ॥

उस रातमें नारायणस्वरूप श्रीकृष्णकी वे सारी रानियाँ यही मानती थीं कि मैं ही इन्हें अधिक प्रिय हूँ; अतः केशव मेरे ही साथ जलमें विहार कर रहे हैं ॥ १४ ॥

सर्वाः सुरतचिह्नाङ्ग्यः सर्वाः सुरततर्पिताः।
मानमूहुश्च ताः सर्वा गोविन्दे बहुमानजम् ॥ १५ ॥

सभीके अङ्गोंमें सुरतके चिह्न थे। सभी सुरत-सुखका अनुभव करके तृप्त हो गयी थीं; अतः वे सब-की-सब गोविन्दके प्रति बहुमानजनित सम्मानका भाव धारण करती थीं ॥ १५ ॥

अहमिष्टाहमिष्टेति स्निग्धे परिजने तदा।
नारायणश्रियः सर्वा मुदा श्लाघाञ्चक्रिरे शुभाः ॥ १६ ॥

श्रीकृष्णकी वे सभी सुन्दरी रानियाँ अपने स्नेही परिजनोंके समीप प्रसन्नतापूर्वक अपने भाग्यकी सराहना करती हुई कहती थीं कि मैं ही अपने प्राणनाथको अधिक प्रिय हूँ। मैं ही उन्हें अधिक प्यारी हूँ ॥ १६ ॥

करजद्विजचिह्नानि कुचाधरगतानि ताः।
दृष्ट्वा दृष्ट्वा जहृषिरे दर्पणे कमलेक्षणाः ॥ १७ ॥

वे कमलनयनी सुन्दरियाँ दर्पणमें अपने कुचोंपर श्रीकृष्णके नखक्षत और अधरोंपर दन्तक्षतके चिह्न देख-देखकर हर्षमें भर जाती थीं ॥ १७ ॥

गोत्रमुद्दिश्य कृष्णस्य जगिरे कृष्णयोषितः।
पिबन्त्य इव कृष्णस्य नयनैर्वदनाम्बुजम् ॥ १८ ॥

श्रीकृष्णकी वे सुन्दरी पत्नियाँ उनके नाम ले-लेकर गीत गातीं और अपने नेत्रपुटोंसे उनके मुखारविन्दका रस पान करती थीं ॥ १८ ॥

कृष्णार्पितमनोदृष्टयः कान्ता नारायणश्रियः।
मनोहरतरा राजन्नभवन्नेकनिश्चयाः ॥ १९ ॥

राजन्! उनके मन और नेत्र श्रीकृष्णमें ही लगे रहते थे। नारायणकी वे कमनीय भार्याएँ अत्यन्त मनोहारिणी और एक निश्चयपर अटल रहनेवाली थीं ॥ १९ ॥

एकार्पितमनोदृष्टयो नेर्ष्या ताश्चक्रिरेऽङ्गनाः।
नारायणेन देवेन तर्प्यमाणमनोरथाः ॥ २० ॥

नारायणदेव उनके सारे मनोरथ पूर्ण करके उन्हें तृप्त रखते थे; अतः वे अङ्गनाएँ एकको ही अपना हृदय और दृष्टि अर्पित करके भी आपसमें कभी ईर्ष्या नहीं करती थीं ॥ २० ॥

शिरांसि गर्वितान्यूहुः सर्वा निरवशेषतः।
वाल्लभ्यं केशवमयं वहन्त्यश्चारुदर्शनाः ॥ २१ ॥

वे सारी-की-सारी मनोहर दृष्टिवाली (अथवा मनोहर दिखायी देनेवाली) सुन्दरियाँ केशवकी वल्लभा होनेका अथवा केशवको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त करनेका सौभाग्य वहन करती हुई अपने सिरको बड़े गर्वसे ऊँचा किये रहती थीं ॥ २१ ॥

ताभिस्तु सह चिक्रीड सर्वाभिर्हरिरात्मवान्।
विश्वरूपेण विधिना समुद्रे विमले जले ॥ २२ ॥

अपने मनको वशमें रखनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण समुद्रके निर्मल जलमें पूर्वोक्त विश्वरूप विधिसे उन सबके साथ क्रीड़ा करते थे ॥ २२ ॥

उवाह सर्वगन्धाढ्यं स्वच्छं वारि महोदधिः।
तोयं विलवणं मृष्टं वासुदेवस्य शासनात् ॥ २३ ॥

भगवान् वासुदेवके शासनसे उस समय महासागर समस्त सुगन्धोंसे युक्त, स्वच्छ, लवणरहित और शुद्ध स्वादिष्ट जल धारण करता था ॥ २३ ॥

गुल्फदघ्नं जानुदघ्नमूरूदघ्नमथापि वा।
नार्यस्ताः स्तनदघ्नं वा जलं समभिकाङ्क्षितम् ॥ २४ ॥
सिषिचुः केशवं पत्न्यो धारा इव महोदधिम्।
सिषेच ताश्च गोविन्दो मेघः फुल्ललता इव ॥ २५ ॥

समुद्रका वह जल कहीं घुट्टीभर था तो कहीं घुटनोंतक, कहीं जाँघोंतक था तो कहीं स्तनोंतक। उन नारियोंको इतना ही जल अभीष्ट था। श्रीकृष्णकी वे रानियाँ उनपर सब ओरसे जल उलीचने लगीं, जैसे नदियोंकी अनेक धाराएँ महासागरको सींचती हैं। भगवान् गोविन्द भी उनपर जल छिड़कने लगे, मानो मेघ खिली हुई लताओंपर जल बरसा रहा हो ॥ २४-२५ ॥

अवलम्ब्य पराः कण्ठे हरिं हरिणलोचनाः।
उपगूहस्व मां वीर पतामीत्यब्रुवन् स्त्रियः ॥ २६ ॥

५६२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

कितनी ही मृगनयनी नारियाँ श्रीहरिके कण्ठमें अपनी बाँहें डालकर कहने लगीं—‘वीर ! मुझे हृदयसे लगा लो, अपनी भुजाओंमें कस लो; अन्यथा मैं जलमें गिरी जाती हूँ’ ॥ २६ ॥

काश्चित् काष्ठमयैस्तैरुः प्लवैः सर्वाङ्गशोभनाः ।
क्रौञ्चवर्हिणनागानामाकारसदृशैः स्त्रियः ॥ २७ ॥

कितनी ही सर्वाङ्गसुन्दरी स्त्रियाँ क्रौञ्च, मोर तथा नागोंके आकारमें बनी हुई काठकी नौकाओंद्वारा जलपर तैरने लगीं ॥ २७ ॥

मकराकृतिभिश्चान्या मीनाभैरपि चापराः ।
बहुरूपाकृतिधरैः पुप्लवुश्चापराः स्त्रियः ॥ २८ ॥
स्तनकुम्भैस्तथा तेरुः कुम्भैरिव तथापराः ।
समुद्रसलिले रम्ये हर्षयन्त्यो जनार्दनम् ॥ २९ ॥

दूसरी-दूसरी स्त्रियाँ मगर, मत्स्य तथा अन्यान्य विविध प्राणियोंकी आकृति धारण करनेवाली नौकाओंद्वारा तैरने लगीं । कितनी ही रानियाँ समुद्रके रमणीय जलमें श्रीकृष्णको हर्ष प्रदान करती हुई घटोंके समान अपने स्तनकुम्भोंद्वारा तैर रही थीं ॥ २८-२९ ॥

रराम सह रुक्मिण्या जले तस्मिन् मुदा युतः ।
येनैव कार्ययोगेन रमतेऽमरसत्तमः ॥ ३० ॥
तत् तदेव हि ताश्चक्रुर्मुदा नारायणस्त्रियः ।

अमरशिरोमणि श्रीकृष्ण उस जलमें आनन्दपूर्वक महारानी रुक्मिणीके साथ रमण करते थे। वे जिस-जिस कार्य या उपायसे आनन्द मानते, उनकी वे सुन्दरी स्त्रियाँ प्रशंसापूर्वक वही-वही कार्य या उपाय करती थीं ॥ ३०½ ॥

तनुवस्त्रावृतास्तन्व्यो लीलयन्त्यस्तथापराः ।
चिक्रीडुर्वासुदेवस्य जले जलजलोचनाः ॥ ३१ ॥

महीन वस्त्रोंसे ढकी हुई दूसरी तन्वङ्गी एवं कमलनयनी स्त्रियाँ भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करती हुई जलमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ा करती थीं ॥ ३१ ॥

यस्य यस्यास्तु यो भावस्तां तां तेनैव केशवः ।
अनुप्रविश्य भावज्ञो निनायात्मवशं वशी ॥ ३२ ॥

जिस-जिस रानीके मनमें जो-जो भाव था, सबके भावों-को जानने और मनको वशमें रखनेवाले श्रीकृष्ण उसी-उसी भावसे उस स्त्रीके अन्तरमें प्रवेश करके उसे अपने वशमें कर लेते थे ॥ ३२ ॥

हृषीकेशोऽपि भगवान् हृषीकेशः सनातनः ।
बभूव देशकालेन कान्तावशगतः प्रभुः ॥ ३३ ॥

इन्द्रियोंके प्रेरक और सबके स्वामी होकर भी सनातन भगवान् हृषीकेश देश-कालके अनुसार अपनी प्रेयसी पत्नियोंके वशमें हो गये थे ॥ ३३ ॥

कुलशीलसमोऽस्माकं योग्योऽयमिति मेनिरे ।
वंशरूपेण वर्तन्तमङ्गनास्ता जनार्दनम् ॥ ३४ ॥

वे समस्त वनिताएँ अपने कुलके अनुरूप बर्ताव करने-वाले जनार्दनको ऐसा समझती थीं कि ये कुल और शीलमें समान होनेके कारण हमारे ही योग्य हैं ॥ ३४ ॥

तदा दाक्षिण्ययुक्तं तं सितपूर्वाभिभाषिणम् ।
कृष्णं भार्याश्चकमिरे भक्त्या च बहु मेनिरे ॥ ३५ ॥

मुसकराकर बात करनेवाले तथा औदार्य-गुणसे सम्पन्न उन प्राणवल्लभ श्रीकृष्णको उस समय उनकी वे पत्नियाँ हृदयसे चाहने लगीं तथा भक्ति एवं अनुरागके कारण उनका बहुत सम्मान करने लगीं ॥ ३५ ॥

पृथग्गोष्ठ्यः कुमाराणां प्रकाशं स्त्रीगणैः सह ।
अलं चक्रुर्जलं वीराः सागरस्य गुणाकराः ॥ ३६ ॥

यादवकुमारोंकी गोष्ठियाँ अलग थीं । वे वीर यादव-कुमार उत्तम गुणोंकी खान थे और प्रकाशरूपसे स्त्रीसमुदायोंके साथ समुद्रके जलकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ३६ ॥

गीतनृत्यविधिज्ञानां तासां स्त्रीणां जनेश्वर ।
तेजसाप्याहृतानां ते दाक्षिण्यात् तस्थिरे वशे ॥ ३७ ॥

जनेश्वर ! वे स्त्रियाँ गीत और नृत्यकी क्रियाको जानने-वाली थीं तथा उन कुमारोंके तेजसे स्वयं ही उनकी ओर आकृष्ट हुई थीं तो भी वे कुमार उदारताके कारण उनके वशमें स्थित थे ॥ ३७ ॥

शृण्वन्तश्चारुगीतानि तथा खभिनयान्यपि ।
तूर्याण्युत्तमनारीणां मुमुहुर्यदुपूङ्गवाः ॥ ३८ ॥

उन उत्तम नारियोंके मनोहर गीत और वाद्य सुनते तथा उनके सुन्दर अभिनय देखते हुए वे यदुपुङ्गववीर उनपर लट्टू हो रहे थे ॥ ३८ ॥

पञ्चचूडां ततः कृष्णः कौवेर्यश्च वराप्सराः ।
माहेन्द्रीश्चानयामास विश्वरूपेण हेतुना ॥ ३९ ॥

तदनन्तर श्रीकृष्णने विश्वरूप होनेके कारण स्वयं ही प्रेरणा देकर पञ्चचूड़ा नामवाली अप्सराको तथा कुबेरभवन

विष्णुपर्व ] अष्टाशीतितमोऽध्यायः ५६३

और इन्द्रभवनकी भी सुन्दरी अप्सराओंको वहाँ बुला मँगाया ॥ ३९ ॥

ताः प्रोवाचाप्रमेयात्मा सान्त्वयित्वा जगत्प्रभुः।
उत्थापयित्वा प्रणताः कृताञ्जलिपुटास्तथा ॥ ४० ॥

अप्रमेयस्वरूप जगदीश्वर श्रीकृष्णने हाथ जोड़कर चरणोंमें पड़ी हुई उन अप्सराओंको उठाया और सान्त्वना देकर कहा—॥ ४० ॥

क्रीडायुवतयो भैमानां प्रविशध्वमशङ्किताः।
मत्प्रियार्थं वरारोहा रमयध्वं च यादवान् ॥ ४१ ॥

'सुन्दरियो ! तुम निःशङ्क होकर भीमवंशी यादवकुमारोंकी क्रीडायुवतियोंमें प्रविष्ट हो जाओ और मेरा प्रिय करनेके लिये इन यादवोंको सुख पहुँचाओ ॥ ४१ ॥

दर्शयध्वं गुणान् सर्वान् नृत्यगीतै रहःसु च।
तथाभिनययोगेषु वाद्येषु विविधेषु च ॥ ४२ ॥

'नाच, गान, एकान्त-परिचर्या, अभिनय-योग तथा नाना प्रकारके बाजे बजानेकी कलामें तुमलोगोंके पास जितने गुण हों, उन सबको दिखाओ ॥ ४२ ॥

एवं कृते विधास्यामि श्रेयो वो मनसेप्सितम्।
मच्छरीरसमा होते सर्वे निरवशेषतः ॥ ४३ ॥

'ऐसा करनेपर मैं तुम्हें मनोवाञ्छित कल्याण प्रदान करूँगा; क्योंकि ये सब-के-सब यादव मेरे शरीरके ही समान हैं' ॥ ४३ ॥

शिरसाज्ञां तु ताः सर्वाः प्रतिगृह्य हरेस्तदा।
क्रीडायुवतयो विविशुर्भेमानामप्सरोवराः ॥ ४४ ॥

उस समय श्रीहरिकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके वे सब श्रेष्ठ अप्सराएँ यादवकुमारोंकी क्रीडा-युवतियोंमें सम्मिलित हो गयीं ॥ ४४ ॥

ताभिः प्रविष्टमात्राभिर्द्योतितः स महार्णवः।
सौदामिनीभिर्नभसि घनवृन्दमिवानघ ॥ ४५ ॥

निष्पाप नरेश ! उनके प्रवेश करते ही वह महासागर दिव्य प्रभासे उद्दीप्त हो उठा। ठीक उसी तरह, जैसे आकाशमें मेघोंका समुदाय बिजलियोंके चमकनेसे प्रकाशित हो उठता है ॥ ४५ ॥

ता जले स्थलवत् स्थित्वा जगुश्चाप्यथ वादयन्।
चक्रुश्चाभिनयं सम्यक्स्वर्गावास इवाङ्गनाः ॥ ४६ ॥

वे दिव्य अङ्गनाएँ जलमें भी स्थलकी ही भाँति खड़ी हो स्वर्गलोककी ही भाँति गीत गाने, बाजे बजाने तथा सुन्दर अभिनय करने लगीं ॥ ४६ ॥

गन्धैर्माल्यैश्च ता दिव्यैर्वस्त्रैश्चायतलोचनाः।
हेलाभिर्हास्यभावैश्च जह्रर्भैममनांसि ताः ॥ ४७ ॥

वे विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरियाँ दिव्य गन्ध, माल्य तथा वस्त्रोंसे सुशोभित हो अपनी विविध लीलाओं तथा हास्ययुक्त हाव-भावोंसे यादवकुमारोंके चित्त चुराने लगीं ॥ ४७ ॥

कटाक्षैरङ्गितैर्हास्यैः केलिरोषैः प्रसादितैः।
मनोऽनुकूलैर्भेमानां समाजह्रुर्मनांसि ताः ॥ ४८ ॥

कटाक्षों, संकेतों, हास्यों, क्रीडाजनित रोषों तथा प्रसन्नता-सूचक मनोऽनुकूल भावोंके द्वारा वे भीमवंशियोंके मन मोहने लगीं ॥ ४८ ॥

उत्क्षिप्योत्क्षिप्य चाकाशं वातस्कन्धान् बहूंश्च तान्।
मदिरावशगा भैमा मानयन्ति वराप्सराः ॥ ४९ ॥

वे अप्सराएँ उन यादवकुमारोंको ऊपर-ऊपर आकाशमें प्रवह आदि वायुके मार्गोंमें ले जाकर उनके साथ विहार करती थीं, अतः वे मदमत्त हुए भीमवंशीकुमार उन सुन्दरी अप्सराओंका बड़ा सम्मान करते थे ॥ ४९ ॥

कृष्णोऽपि तेषां प्रीत्यर्थं विजह्रे वियति प्रभुः।
सर्वैः षोडशभिः सार्द्धं स्त्रीसहस्रैर्मुदान्वितः ॥ ५० ॥

भगवान् श्रीकृष्ण भी उन यादवोंकी प्रसन्नताके लिये आकाशमें स्थित हो अपनी सोलह हजार स्त्रियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक विहार करते थे ॥ ५० ॥

प्रभावज्ञास्तु ते वीराः कृष्णस्यामिततेजसः।
न जग्मुर्विस्मयं भैमा गाम्भीर्यं परमास्थिताः ॥ ५१ ॥

वे वीर यादव अमित तेजस्वी श्रीकृष्णका प्रभाव जानते थे; अतः आकाशमें क्रीडा करनेके कारण उन्हे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वे उस दशामें भी अत्यन्त गम्भीर बने रहे ॥ ५१ ॥

केचिद् रैवतकं गत्वा पुनरायान्ति भारत।
गृहानन्ये वनान्यन्ये काङ्क्षितान्यरिमर्दन ॥ ५२ ॥

शत्रुमर्दन ! भरतनन्दन ! कुछ यादव रैवतक पर्वतपर जाकर फिर लौट आते थे। दूसरे घरोंमें जाकर आ जाते तथा अन्य लोग अभिलषित वनोंमें घूम फिरकर लौटते थे ॥ ५२ ॥

अपेयः पेयसलिलः सागरश्चाभवत् तदा।
आज्ञया लोकनाथस्य विष्णोरतुलतेजसः ॥ ५३ ॥

५६४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे उस समय अतुल-तेजस्वी लोकनाथ भगवान् विष्णु वैदूर्यतोरणैश्चित्राश्चित्राभिर्मणिभक्तिभिः । ( श्रीकृष्ण ) की आशासे अपेय समुद्रका जल भी पीनेयोग्य मसारगल्वर्कमयैश्चित्रभक्तिशतैरपि ॥ ६० ॥ हो गया था ॥ ५३ ॥ उनमें वैदूर्यमणिके तोरण लगे थे, जिनसे उन महलोंकी अधावन् स्थलवच्चापि जले जलजलोचनाः । विचित्र शोभा होती थी। वे विचित्र मणिमय शय्याओंसे गृह्य हस्ते तथा नार्यो युक्तामज्जंस्तथापि च ॥ ५४ ॥ सुसज्जित थे। मरकत, चन्द्रकान्त और सूर्यकान्तमणिमय वे कमलनयनी नारियाँ जब इच्छा होती, तब जलमें भी विचित्र रागोंसे वे रंजित थे तथा नाना प्रकारके सैकड़ों आस्तरण स्थलकी भाँति दौड़ती थीं और जब चाहतीं परस्पर हाथ ( बिस्तर ) उनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६० ॥ पकड़कर एक साथ ही गोता लगा लेती थीं ॥ ५४ ॥ आक्रीडगरुडच्छन्दाश्चित्राः कनक्रीतिभिः । भक्ष्यभोज्यानि पेयानि चोष्यं लेह्यं तथैव च । क्रौञ्चच्छन्दाः शुकच्छन्दा गजच्छन्दास्तथापरे ॥ ६१ ॥ बहुप्रकारं मनसा ध्याते तेषां भवत्युत ॥ ५५ ॥ खेलके लिये बनाये गये गरुड़के समान भी उन भवनोंकी यादवोंके मनसे चिन्तन करते ही उनके लिये नाना आकृति थी। वे विचित्र भवन सुवर्णकी धाराओंसे शोभा प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य पदार्थ प्रस्तुत पाते थे। कोई क्रौञ्चके समान, कोई तोतेके तुल्य और कितने हो जाते थे ॥ ५५ ॥ ही भवन हाथियोंकी-सी आकृति धारण करते थे ॥ ६१ ॥ अम्लानमाल्यधारिण्यस्ताः स्त्रियस्ताननिन्दितान् । कर्णधारैर्गृहीतास्ता नावः कार्तस्वरोज्ज्वलाः । रहःसु रमयांचक्रुः स्वर्गे देवरतानुगाः ॥ ५६ ॥ सलिलं शोभयामासुः सागरस्य महोर्मिमत् ॥ ६२ ॥ जो कभी कुम्हलाती नहीं थी, ऐसी माला धारण करने- सुवर्णसे प्रकाशित होनेवाली वे नौकाएँ कर्णधारोंके वाली वे दिव्य अप्सराएँ स्वर्गमें देवताओंके साथ की गयी नियन्त्रणमें रहकर उत्ताल तरंगोंसे युक्त सागरकी जलराशिको रतिक्रीडाका अनुसरण करती हुई उन श्रेष्ठ यादवकुमारोंको सुशोभित कर रही थीं ॥ ६२ ॥ एकान्तमें रमणका अवसर देती थीं ॥ ५६ ॥ समुच्छ्रितः सितैः पोतैर्यानपात्रैस्तथैव च । नौभिर्गृहप्रकाराभिश्चिक्रीडुरपराजिताः । नौभिश्च झिल्लिकाभिश्च शुशुभे वरुणालयः ॥ ६३ ॥ स्नातास्तुलितमुदिताः सायाह्नेऽन्धकवृष्णयः ॥ ५७ ॥ सफेद जलपोतों, यात्रोपयोगी बड़ी-बड़ी नावों, वेगवती किसीसे पराजित न होनेवाले अन्धक और वृष्णिवंशके नौकाओं और महल आदिसे युक्त विशाल जहाजोंसे उस वीर सायंकालमें स्नानके पश्चात् अनुलेपन धारण करके वरुणालय ( समुद्र ) की बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ६३ ॥ आनन्दमग्न हो गृहाकार बनी हुई नौकाओं द्वारा क्रीडा पुराण्याकाशगानीव गन्धर्वाणामितस्ततः । करने लगे ॥ ५७ ॥ बभ्रमुः सागरजले भैमयानानि सर्वतः ॥ ६४ ॥ आयताश्चतुरस्राश्च वृत्ताश्च स्वस्तिकास्तथा । यादवोंके वे जलयान समुद्रके जलमें सब ओर चक्कर लगा प्रासादा नौषु कौरव्य विहिता विश्वकर्मणा ॥ ५८ ॥ रहे थे। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो गन्धर्वोंके नगर आकाशमें कुरुनन्दन ! विश्वकर्माने नौकाओंमें अनेक प्रकारके विचर रहे हों ॥ ६४ ॥ महल बनाये थे, जिनमेंसे कुछ लंबे थे और कुछ चौकोर । नन्दनच्छन्दयुक्तेषु यानपात्रेषु भारत । कुछ गोलाकार थे और कुछ स्वस्तिकाकार ॥ ५८ ॥ नन्दनप्रतिमं सर्वं विहितं विश्वकर्मणा ॥ ६५ ॥ कैलासमन्दरच्छन्दा मेरुच्छन्दास्तथैव च । —भारत ! नन्दनवनकी आकृति और समृद्धियोंसे युक्त तथा नानावयश्छन्दास्तेऽप्यीहामृगरूपिणः ॥ ५९ ॥ यानपात्रोंमें विश्वकर्माने सब कुछ नन्दन-जैसा ही बना वे महल कैलास, मन्दराचल और मेरुपर्वतकी भाँति दिया था ॥ ६५ ॥ इच्छानुसार रूप धारण कर लेते थे। कई नाना प्रकारके उद्यानानि सभावृक्षा दीर्घिकाः स्यन्दनानि च । पक्षियों और ईहामृगों ( भेड़ियों ) के समान रूप धारण निवेशितानि शिल्पानि तादृशान्येव सर्वथा ॥ ६६ ॥ करनेवाले थे ॥ ५९ ॥ उद्यान, सभा, वृक्ष, झील और झरने ( या फौवारे )

विष्णुपर्व ] अष्टाशीतितमोऽध्यायः [ ५६५


आदि शिल्प सर्वथा वैसे ही उनमें समाविष्ट किये गये थे ॥ ६६ ॥

स्वर्गच्छन्देषु चान्येषु समासात् स्वर्गसंनिभाः ।
नारायणाज्ञया वीर विहिता विश्वकर्मणा ॥ ६७ ॥
वीर ! स्वर्ग-जैसे बने हुए दूसरे जलयानोंमें विश्वकर्माने भगवान् नारायणकी आज्ञासे स्वर्गकी-सी सारी वस्तुएँ संक्षेपसे रच दी थीं ॥ ६७ ॥

वनेषु रुरुवुर्हृद्यं मधुरं चैव पक्षिणः ।
मनोहरतरं चैव भैमानामतितेजसाम् ॥ ६८ ॥
वहाँके वनोंमें पक्षी हृदयको प्रिय लगनेवाली मधुर बोली बोलते थे । उनकी वह बोली उन अत्यन्त तेजस्वी यादवोंको बहुत ही मनोहर प्रतीत होती थी ॥ ६८ ॥

देवलोकोद्भवाः श्वेता विलेपुः कोकिलास्तदा ।
मधुराणि विचित्राणि यदूनां काङ्क्षितानि च ॥ ६९ ॥
देवलोकमें उत्पन्न हुए सफेद कोकिल उस समय यादव-वीरोंकी इच्छाके अनुसार विचित्र एवं मधुर आलाप छेड़ रहे थे ॥ ६९ ॥

चन्द्रांशुसमरूपेषु हर्म्यपृष्ठेषु बर्हिणः ।
ननृतुर्मधुरारावाः शिखण्डिगणसंवृताः ॥ ७० ॥
चन्द्रमाकी किरणोंके समान रूपवाली श्वेत अट्टालिकाओंपर मीठी बोली बोलनेवाले मोर दूसरे मोरोंसे घिरकर नृत्य करते थे ॥ ७० ॥

पताका यानपात्राणां सर्वाः पक्षिगणायुताः ।
भ्रमरैरुपगीताश्च स्रग्दामासक्तवासिभिः ॥ ७१ ॥
विशाल जलयानोंपर लगी हुई सारी पताकाओंपर पक्षियोंके समुदाय बैठे थे । उनमें जो पुष्पमालाओंकी लड़ियाँ बँधी थीं, उनपर आसक्त होकर रहनेवाले भ्रमर वहाँ गुञ्जारव फैला रहे थे ॥ ७१ ॥

नारायणाज्ञया वृक्षाः पुष्पाणि मुमुचुर्भृशम् ।
ऋतवश्चारुरूपाणि विहायसि गतास्तथा ॥ ७२ ॥
नारायण ( श्रीकृष्ण ) की आज्ञासे वृक्ष तथा ऋतुएँ आकाशमें स्थित हो मनोहर रूपवाले पुष्पोंकी अधिक वर्षा करने लगीं ॥ ७२ ॥

ववौ मनोहो वातो रतिखेदहरः सुखः ।
रजोभिः सर्वपुष्पाणां पृक्तश्चन्दनशैत्यभृत् ॥ ७३ ॥
रतिजनित खेद अथवा श्रमको हर लेनेवाली मनोहर एवं सुखदायिनी हवा चलने लगी, जो सब प्रकारके फूलोंके परागसे संयुक्त तथा चन्दनकी शीतलताको धारण करनेवाली थी ॥ ७३ ॥

शीतोष्णमिच्छतां तत्र बभूव वसुधापते ।
वासुदेवप्रसादेन भैमानां क्रीडतां तदा ॥ ७४ ॥
पृथ्वीपते ! क्रीड़ामें तत्पर होकर सर्दी-गर्मीकी इच्छा रखनेवाले यादवोंको उस समय वहाँ भगवान् वासुदेवकी कृपासे वह सब उनकी रुचिके अनुकूल प्राप्त होती थी ॥ ७४ ॥

न क्षुत्पिपासा न ग्लानिर्न चिन्ता शोक एव च ।
आविवेश तदा भैमान् प्रभावाच्चक्रपाणिनः ॥ ७५ ॥
भगवान् चक्रपाणिके प्रभावसे उस समय उन भीम-वंशियोंके भीतर न तो भूख-प्यास, न ग्लानि, न चिन्ता और न शोकका ही प्रवेश होता था ॥ ७५ ॥

अप्रशान्तमहातूर्या गीतनृत्योपशोभिताः ।
बभूवुः सागरक्रीडा भैमानामतितेजसाम् ॥ ७६ ॥
अत्यन्त तेजस्वी यादवोंकी समुद्रके जलमें होनेवाली वे क्रीड़ाएँ निरन्तर चल रही थीं । उनमें बड़े-बड़े वाद्योंकी ध्वनि शान्त नहीं होती थी तथा गीत और नृत्य उनकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ७६ ॥

बहुयोजनविस्तीर्णं समुद्रं सलिलाशयम् ।
रुद्धा चिक्रीडुरिन्द्राभा भैमाः कृष्णाभिरक्षिताः ॥ ७७ ॥
श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यादव अनेक योजन विस्तृत समुद्रके जलाशयको रोककर क्रीड़ा कर रहे थे ॥ ७७ ॥

परिच्छदस्यानुरूपं यानपात्रं महात्मनः ।
नारायणस्य देवस्य विहितं विश्वकर्मणा ॥ ७८ ॥
विश्वकर्माने महात्मा भगवान् नारायणदेवके लिये उनके विशाल परिवार ( सोलह हजार रानियोंके समुदाय ) के अनुरूप ही जहाज बना रक्खा था ॥ ७८ ॥

रत्नानि यानि त्रैलोक्ये विशिष्टानि विशाम्पते ।
कृष्णस्य तानि सर्वाणि यानपात्रेऽतितेजसः ॥ ७९ ॥
प्रजानाथ ! तीनों लोकोंमें जो विशिष्ट रत्न थे, वे सभी अत्यन्त तेजस्वी श्रीकृष्णके उस यानपात्रमें लगे थे ॥ ७९ ॥

पृथक्पृथङ्किवासाश्च स्त्रीणां कृष्णस्य भारत ।
मणिवैदूर्यचित्रास्ताः कार्तस्वरविभूषिताः ॥ ८० ॥
भारत ! श्रीकृष्णकी स्त्रियोंके लिये उसमें पृथक्-पृथक्

५६६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

निवासस्थान बने थे, जो मणि और वैदूर्यसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न तथा सुवर्णसे विभूषित थे ॥८०॥

सर्वर्तुकुसुमाकीर्णाः सर्वगन्धाधिवासिताः ।
यदुसिंहैः शुभैर्जुष्टाः शकुनैः स्वर्गवासिभिः ॥ ८१ ॥

उन गृहोंमें सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले फूल लगाये गये थे। वहाँ सभी तरहके उत्तम सुगन्ध फैलकर उन भवनोंको सुवासित कर रहे थे। श्रेष्ठ यादव वीर तथा स्वर्गवासी पक्षी उन निवासस्थानोंका सेवन करते थे ॥ ८१ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि भानुमतीहरणे अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें भानुमतीहरणविषयक अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥


एकोननवतितमोऽध्यायः

बलराम और श्रीकृष्ण आदि यादवोंकी जलक्रीड़ा एवं गान आदिका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
रेमे बलश्चन्दनपङ्कदिग्धः
कादम्बरीपानकलः पृथुश्रीः ।
रक्तेक्षणो रेवतिमाश्रयित्वा
प्रलम्बबाहुर्ललितप्रयातः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! बलरामजी अपने अङ्गोंमें चन्दनसे चर्चित थे। मधु पीकर वे बड़े मनोहर लग रहे थे। उनकी शोभा बहुत बढ़ी हुई थी। नेत्र कुछ-कुछ लाल थे तथा भुजाएँ बहुत बड़ी थीं। वे रेवती देवीका सहारा लेकर सुललित गतिसे चल रहे थे ॥१॥

नीलाम्बुदाभे वसने वसान-
श्चन्द्रांशुगौरो मदिराविलाक्षः ।
रराज रामोऽम्बुदमध्यमेत्य
सम्पूर्णबिम्बो भगवानिवेन्दुः ॥ २ ॥

उन्होंने श्याम मेघके समान कान्तिवाले दो नील वस्त्र धारण कर रक्खे थे। उनकी अङ्गकान्ति चन्द्रमाकी किरणोंके समान गौर थी और मधुमाती आँखें अलसायी-सी जान पड़ती थीं। समुद्रके बीचमें आकर भगवान् बलरामजी सम्पूर्ण बिम्बवाले चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे ॥ २ ॥

वामैककर्णामलकुण्डलश्रीः
स्मेरं मनोज्ञाब्जकृतावतंसः ।
तिर्यक्कटाक्षं प्रियया सुमोद
रामः सुखं चार्वभिवीक्ष्यमाणः ॥ ३ ॥

उनके एकमात्र बायें कानमें निर्मल कुण्डलकी शोभा फैल रही थी। उन्होंने दूसरे कानमें मनोहर कमलको ही कर्णभूषणके रूपमें धारण कर रक्खा था। उनकी प्रिया रेवती मन्द मुसकान और बाँकी चितवनके साथ उनकी ओर सुखपूर्वक निहार रही थीं तथा बलरामजी उनके साथ आनन्दमग्न हो रहे थे ॥ ३ ॥

अथाज्ञया कंसनिकुम्भशत्रो-
रुदाररूपोऽप्सरसां गणः सः ।
द्रष्टुं मुदा रेवतिमाजगाम
वेलालयं स्वर्गसमानसृद्ध्या ॥ ४ ॥

तदनन्तर कंस और निकुम्भके शत्रु श्रीकृष्णकी आज्ञासे अप्सराओंका उदार एवं सुन्दर रूपवाला समुदाय स्वर्गके समान समृद्धिशाली समुद्रमें रेवतीका दर्शन करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक उनके पास आया ॥ ४ ॥

तां रेवतीं चाप्यथ वापि रामं
सर्वा नमस्कृत्य वराङ्गयष्ट्यः ।
वाद्यानुरूपं ननृतुः सुगात्र्यः
समन्ततोऽन्या जगिरे च सम्यक् ॥ ५ ॥

उन सबके अङ्ग छड़ीके समान पतले और मनोहर थे। उन समस्त सुन्दरियोंने उन रेवती देवी और बलरामजीको नमस्कार करके बाजेके लयपर नाचना आरम्भ किया। दूसरी अप्सराएँ उन्हें सब ओरसे घेरकर उत्तम रीतिसे गीत गाने लगीं ॥ ५ ॥

चक्रुस्तथैवाभिनयेन रङ्गं
यथावदेषां प्रियमर्थयुक्तम् ।
हृद्यानुकूलं च बलस्य तस्य
तथाज्ञया रेवतराजपुत्र्याः ॥ ६ ॥

वे अप्सराएँ बलराम तथा रेवतराजकुमारी रेवतीकी

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः ५६७ आज्ञासे अभिनयपूर्वक ऐसा खेल खेलने लगीं, जो इन यादवोंको प्रिय, सार्थक, मनोरम और अनुकूल प्रतीत हो ॥६॥ चक्रुहंसन्त्यश्च तथैव रासं तद्देशभाषाकृतिवेषयुक्ताः । सहस्ततालं ललितं सलीलं वराङ्गना मङ्गलसम्भृताङ्ग्यः ॥ ७ ॥ अपने अङ्गोंमें मङ्गलसूचक शृङ्गार धारण करनेवाली वे सुन्दरी अप्सराएँ उस देशकी भाषा, आकृति और वेशसे युक्त हो हँसती और हाथोंपर ताल देती हुई लीलापूर्वक ललित रास (नृत्य-गान) करने लगीं ॥ ७ ॥ संकर्षणाधोक्षजनन्दनानि संकीर्तयन्त्योऽथ च मङ्गलानि । कंसप्रलम्बादिवधं च रम्यं चाणूरघातं च तथैव रङ्गे ॥ ८ ॥ यशोदया च प्रथितं यशोऽथ दामोदरत्वं च जनार्दनस्य । वधं तथारिष्टकधेनुकाभ्यां व्रजे च वासं शकुनीवधं च ॥ ९ ॥ तथा च भग्नौ यमलार्जुनौ तौ सृष्टिं वृकाणामपि वत्सयुक्ताम् । स कालियो नागपतिर्हदे च कृष्णेन दान्तश्च यथा दुरात्मा ॥ १० ॥ शङ्खह्रदादुद्धरणं च वीर पद्मोत्पलानां मधुसूदनेन । गोवर्द्धनोऽर्थे च गवां धृतोऽभूद् यथा च कृष्णेन जनार्दनेन ॥ ११ ॥ कुब्जां यथा गन्धकपीषिकां च कुब्जत्वहीनां कृतवांश्च कृष्णः । वीर ! उस रासमें वे श्रीकृष्ण और बलरामको आनन्द देनेवाली उनकी मङ्गलमयी लीलाओंका संकीर्तन करती थीं । कंस और प्रलम्ब आदिके वधका रमणीय प्रसङ्ग, रङ्गशालामें चाणूर आदिका घात, जिसके कारण यशोदाने जनार्दनका दामोदर नाम और यश फैलाया, वह उलूखलबन्धनकी लीला, अरिष्टासुर और धेनुकासुरका वध, व्रजमें निवास, पूतनाका वध, यमलार्जुन-भङ्ग, भेड़ियेकी सृष्टि, वत्सासुरका वध, यमुना- के ह्रदमें श्रीकृष्णद्वारा दुरात्मा नागराज कालियका दमन, शङ्खनिधिसे युक्त उस यमुनाह्रदसे मधुसूदन श्रीकृष्णद्वारा कमलों और उत्पलोंका उखाड़ा जाना, गौओंकी रक्षाके लिये जनार्दन श्रीकृष्णद्वारा गोवर्धन-धारण, सुगन्धयुक्त अनुलेपन पीसने- वाली कुब्जाके कुब्जत्वको उनके द्वारा निवारण आदि लीला- प्रसङ्ग जैसे-जैसे हुए थे, उन सबका वे अप्सराएँ गान करती थीं ॥ ८-११½ ॥ अवामनं वामनकं च चक्रे कृष्णो यथाऽऽत्मानमजोऽप्यनिन्द्यः॥१२॥ सौभप्रमाथं च हलायुधत्वं वधं मुरस्याप्यथ देवशत्रोः । गान्धारकन्याग्रहने नृपाणां रथे तथा योजनमूर्जितानाम् ॥ १३ ॥ ततः सुभद्राहरणे जयं च युद्धे च वालाहकजम्बुमाले । रत्नप्रवेकं च युधाजितैर्थत् समाहृतं शक्रसमक्षमासीत् ॥ १४ ॥ एतानि चान्यानि च चारुरूपा जगुः स्त्रियः प्रीतिकराणि राजन् । सङ्कर्षणाधोक्षजहर्ष णानि चित्राणि चानेककथाश्रयाणि ॥ १५ ॥ राजन् ! अनवद्य ( स्तुत्य ) और अजन्मा श्रीकृष्णने अपने अवामन (विराट् ) स्वरूपको भी जिस प्रकार वामन बना लिया, जिस प्रकार सौभविमानको मथ डाला तथा बलरामने जिस तरह हलरूप आयुध ग्रहण किया, श्रीकृष्णद्वारा जिस प्रकार देवशत्रु मुरका वध किया गया, गान्धारराज- कन्या शैब्याके विवाहमें जिस प्रकार बलशाली राजाओंको रथमें जोता या बाँधा गया, सुभद्राहरणके समय जिस प्रकार अर्जुन- की विजय हुई, वालाहक और जम्बुमालीके साथ होनेवाले युद्धमें जिस प्रकार श्रीकृष्ण आदिको विजय प्राप्त हुई, युद्धमें जीते गये राक्षसोंद्वारा इन्द्रके सामने ही जो रत्नराशि द्वारका पहुँचायी गयी; इनको तथा अन्य चरित्रोंको, जो यादवोंको प्रसन्न करनेवाले थे, उन मनोहररूपवाली अप्सराओंने गाया । श्रीकृष्ण और बलरामको हर्ष प्रदान करनेवाले जो उनकी अनेक लीलाकथाओंसे सम्बन्ध रखनेवाले विचित्र गीत थे, उन सबका उन्होंने गान किया ॥ १२-१५ ॥ कादम्बरीपानमदोत्कटस्तु बलः पृथुश्रीः स चुकूई रामः ।

५६८ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

सहस्ततालं मधुरं समं च
स भार्यया रेवतराजपुत्र्या ॥ १६ ॥

तदनन्तर मधुपानसे मत्त हुए परम शोभायमान बलराम अपनी पत्नी रेवतराजकुमारी रेवतीके साथ हाथपर ताल देते हुए मधुर स्वरमें सम^१ स्थानके प्रदर्शनपूर्वक गीत गाने लगे ॥ १६ ॥

तं कूर्दमानं मधुसूदनश्च
दृष्ट्वा महात्मा च मुदान्वितोऽभूत् ।
चुकूर्द सत्यासहितो महात्मा
हर्षोगमार्थं च बलस्य धीमान् ॥ १७ ॥

उन्हें गाते देख महात्मा मधुसूदनको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर तो उन बुद्धिमान् महात्मा श्रीकृष्णने भी बलरामजीका हर्ष बढ़ानेके लिये सत्यभामाके साथ गान आरम्भ कर दिया ॥ १७ ॥

समुद्रयात्रार्थमथागतश्च
चुकूर्द पार्थो नरलोकवीरः ।
कृष्णेन सार्द्धं मुदितश्चकूर्द
सुभद्रया चैव वराङ्गयष्ट्या ॥ १८ ॥

नरलोकके प्रमुख वीर कुन्तीनन्दन अर्जुन भी समुद्र-यात्राके लिये वहाँ आये थे। वे भी आनन्दमें मग्न होकर श्रीकृष्ण और सुन्दराङ्गी सुभद्राके साथ गीत अलापने लगे ॥ १८ ॥

गदश्च धीमानथ सारणश्च
प्रद्युम्नसाम्बौ नृप सात्यकिश्च ।
सत्राजितीसूनुरुदारवीर्यः
सुचारुदेष्णश्च सुचारुरूपः ॥ १९ ॥
वीरौ कुमारौ निशठोल्मुकौ च
रामात्मजौ वीरतमौ चुकूर्दतुः ।

नरेश्वर ! फिर तो बुद्धिमान् गद, सारण, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, उदार पराक्रमी सत्यभामाकुमार भानु और अत्यन्त मनोहर रूपवाले सुचारुदेष्ण, बलरामजीके पुत्र दोनों वीर कुमार निशठ और उल्मुक जो अत्यन्त वीर थे, गाने लगे ॥ १९½ ॥

अक्रूरसेनापतिशंकवश्च
तथापरे भैमकुलप्रधानाः ॥ २० ॥
तद् यानपात्रं ववृधे तदानीं
कृष्णप्रभावेण जनेन्द्रपुत्र ।
आपूर्णमापूर्णमुदारकीर्ते
चुकूर्दद्भिर्नृप भैममुख्यैः ॥ २१ ॥

अक्रूर, यादव-सेनापति अनाधृष्टि, शङ्कु तथा भीमकुलके अन्य प्रधान पुरुष भी वहाँ गान करने लगे। उदार कीर्ति-वाले नरेन्द्रकुमार ! उस समय वह यानपात्र (जहाज) गाते हुए प्रमुख यादव वीरोंसे ज्यों-ज्यों भरता गया त्यों-ही-त्यों श्रीकृष्णके प्रभावसे बढ़ता चला गया ॥ २०-२१ ॥

तै राससक्तैरतिकूर्दमानै-
र्यदुप्रवीरैरमरप्रकाशैः ।
हर्षान्वितं वीर जगत् तथाभू-
च्छेमुश्च पापानि जनेन्द्रसूनो ॥ २२ ॥

वीर राजकुमार ! रासमें संलग्न हो अत्यन्त गीत गाने-वाले उन देवोपम यादववीरोंके साथ सारा जगत् हर्षोल्लाससे परिपूर्ण हो गया। सबके पाप-ताप शान्त हो गये ॥ २२ ॥

देवातिथिश्चात्र च नारदोऽथ
विप्रः प्रियार्थं मुरकेशिशत्रोः ।
चुकूर्द मध्ये यदुसत्तमानां
जटाकलापागलितैकदेशः ॥ २३ ॥

तदनन्तर मुर और केशीके शत्रु श्रीकृष्णका प्रिय करनेके लिये देवताओंके अतिथि विप्रवर नारदजी उन यादव-शिरोमणियोंके बीचमें आकर गान करने लगे। उनके शरीर-का एक देश उनके जटा-कलापसे आच्छादित था ॥ २३ ॥

रासप्रणेता मुनि राजपुत्र
स एव तत्राभवदप्रमेयः ।


१. संगीतमें वह स्थान, जहाँ गाने-बजानेवालोंका सिर या हाथ आप-से-आप हिल जाता है । वह स्थान तालके अनुसार निश्चित होता है । जैसे तितालेमें दूसरे तालपर और चौतालमें पहले तालपर सम होता है । इसी प्रकार भिन्न तालोंमें भिन्न-भिन्न स्थानों-पर सम होता है । वाद्योंका आरम्भ तथा गीतों और वाद्योंका अन्त इसी समपर होता है । परंतु गाने-बजानेके बीच-बीचमें भी सम बराबर आता रहता है ।

२. श्रीमद्भागवतके अनुसार सत्यभामाके बड़े बेटेका नाम भानु था । इनसे छोटे नौ भाइयोंके नाम इस प्रकार हैं—सुभानु, प्रभानु, भानुमान्, चन्द्रभानु, बृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु ।

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः [ ५६९

मध्यं च गत्वा च चुक्कूर्द भूयो
हेलाविकारैः सविडम्बिताङ्गैः ॥ २४ ॥

राजपुत्र ! वे अप्रमेयस्वरूप नारदमुनि ही वहाँ रास-नृत्यके प्रणेता (संचालक या सूत्रधार) हो गये। वे अपने अनुकरणशील अङ्गोंद्वारा लीलाका अनुकरण करते हुए यादव-मण्डलीके मध्यमें पहुँचकर गीत गाने लगे ॥ २४ ॥

स सत्यभामामथ केशवं च
पार्थं सुभद्रां च बलं च देवम् ।
देवीं तथा रेवतराजपुत्रीं
संदृश्य संदृश्य जहा़स धीमान् ॥ २५ ॥

वे बुद्धिमान् मुनि सत्यभामा, श्रीकृष्ण, अर्जुन, सुभद्रा, बलदेव तथा रेवतराजकुमारी रेवती देवीकी ओर देख-देखकर हँस रहे थे ॥ २५ ॥

ता हासयामास सुधैर्ययुक्ता-
स्तैस्तैरुपायैः परिहासशीलः ।
चेष्टानुकारैर्हसितानुकारै-
र्ली़लानुकारैरपरैश्च धीमान् ॥ २६ ॥

परिहासशील बुद्धिमान् नारदजी किसीकी चेष्टाओंका, किसीकी हँसीका और किसीकी लीलाओंका अनुकरण करके तथा अन्य प्रकारके दूसरे-दूसरे उपायोंद्वारा उन अत्यन्त धैर्य-शालिनी देवियोंको भी हँसा देते थे ॥ २६ ॥

आभाषितं किंचिदिवोपलक्ष्य
नादातिनादान् भगवान् मुमोच ।
हसन् विहासांश्च जहा़स हर्षा-
द्द्वास्यागमे कृष्णविनोदनार्थम् ॥ २७ ॥

जब कोई कुछ मन्दस्वरमें बहुत थोड़ा और धीरे-धीरे बोलता तो ऐश्वर्यशाली नारदजी उसके उत्तरमें बहुत ही ऊँचे स्वरमें सिंहनाद-सा करते हुए जोर-जोरसे बोलने लगते थे और हास्यके अवसरपर हँसते-हँसते हर्षातिरेकसे अट्टहास करने लगते थे। यह सब कुछ वे श्रीकृष्णके मनोरञ्जनके लिये करते थे ॥ २७ ॥

कृष्णाज्ञया सातिशयानि तत्र
यथानुरूपाणि ददुर्युवत्यः ।
रत्नानि वस्त्राणि च रूपवन्ति
जगत्प्रधानानि नृदेवसूनो ॥ २८ ॥

नरदेवकुमार ! श्रीकृष्णकी आज्ञासे वहाँ बैठी हुई युवतियोंने जगत्के प्रधान-प्रधान रत्न, सुन्दर वस्त्र जो मुनिके अनुरूप थे, उन्हें अधिक मात्रामें दिये ॥ २८ ॥

माल्यानि च स्वर्गसमुद्भवानि
संतानदामान्यतिमुक्तकानि ।
सर्वर्तुकान्यप्यनयँस्तदानीं
ददुर्ह रेरिङ्गितकालतज्ज्ञाः ॥ २९ ॥

श्रीकृष्णके संकेत तथा समयकी आवश्यकताको समझने-वाली उन रानियोंने उस समय स्वर्गीय पुष्पहार, संतान (पारिजात) पुष्पोंकी लड़ियाँ, अतिमुक्तक तथा सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले फूल उन्हें अर्पित किये ॥ २९ ॥

रासावसाने त्वथ गृह्य हस्ते
महामुनिं नारदमप्रमेयः ।
पपात कृष्णो भगवान् समुद्रे
सान्त्राजितीं चार्जुनमेव चाथ ॥ ३० ॥

रासके अन्तमें अप्रमेयस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण नारद मुनिका हाथ पकड़कर तथा सत्यभामा और अर्जुनको भी साथमें लेकर समुद्रके जलमें कूद पड़े ॥ ३० ॥

उवाच चामेयपराक्रमोऽथ
शैनेयमीषत्प्रहसन् पृथुश्रीः ।
द्विधा कृतास्मिन् पतताशु भूत्वा
क्रीडाजले नोऽस्तु सहाङ्गनाभिः ॥ ३१ ॥

तदनन्तर अप्रमेय पराक्रमी तथा प्रचुर शोभासे सम्पन्न श्रीकृष्णने किञ्चित् मुसकराकर सात्यकिसे कहा—'तुम सब लोग दो भागोंमें बँटकर अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ ही इस क्रीड़ाजलमें कूद पड़ो ॥ ३१ ॥

सरेवतीकोऽस्तु बलोऽर्द्धनेता
पुत्रा मदीयाश्च सहार्द्धभैमाः ।
भैमार्द्धमेवाथ बलात्मजाश्च
मत्पक्षिणः सन्तु समुद्रतोये ॥ ३२ ॥

'मेरे सारे पुत्र और आधे यदुवंशी इन सबको मिलाकर जो आधे द्वारकावासियोंका दल होगा, उसके नेता रेवती-

५७०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

सहित बलभद्रजी हों और आधे भीमवंशियोंके साथ बलराम-जीके सभी पुत्र ये मेरे पक्षमें रहें। इस प्रकार समुद्रके जलमें (दो दलोंमें बँटकर हमलोग क्रीड़ा करें)' ॥ ३२ ॥

आज्ञापयामास ततः समुद्रं
कृष्णः स्मितं प्राञ्जलिर्न प्रतीतः ।
सुगन्धतोयो भव मृष्टतोय-
स्तथा भव ग्राहविवर्जितश्च ॥ ३३ ॥

तदनन्तर श्रीकृष्णने पूर्ण विश्वस्त होकर वहाँ हाथ जोड़कर मुसकराते हुए समुद्रको आज्ञा दी—'तुम अपने जलको सुगन्धित और शुद्ध एवं स्वादिष्ट बना लो तथा ग्राहोंसे रहित हो जाओ ॥ ३३ ॥

हृद्या च ते रत्नविभूषिता तु
सा वेलिका भूरथ पत्सुखा च।
मनोऽनुकूलं च जनस्य तत्तत्
प्रयच्छ विज्ञास्यसि मत्प्रभावात् ॥ ३४ ॥

'तुम्हारी तटभूमि रत्नोंसे विभूषित दिखायी दे, पैरोंके लिये सुखदायिनी हो तथा लोगोंके लिये जो मनोऽनुकूल वस्तुएँ हों, वे सब उन्हें अर्पण करो। मेरे प्रभावसे तुम्हें सबकी अभीष्ट वस्तुओंका ज्ञान हो जायगा ॥ ३४ ॥

भवस्यपेयोऽप्यथ चेष्टपेयो
जनस्य सर्वस्य मनोऽनुकूलः ।
वैडूर्यमुक्तामणिहेमचित्रा
भवन्तु मत्स्यास्त्वयि सौम्यरूपाः ॥ ३५ ॥

'यद्यपि तुम्हारा जल अपेय है तो भी वह प्रिय एवं पीने योग्य हो जायगा। तुम सब लोगोंके मनोऽनुकूल हो जाओगे। तुम्हारे भीतर जो मत्स्य हैं, वे वैदूर्य, मोती, मणि और सुवर्णसे चित्रित तथा सौम्य रूपवाले हो जायेंगे ॥ ३५ ॥

बिभ्रस्व च त्वं कमलोत्पलानि
सुगन्धसुस्पर्शरसक्षमाणि ।
षट्पादजुष्टानि मनोहराणि
कीलालवर्णैश्च समन्वितानि ॥ ३६ ॥

'तुम लाल रंगके कमल और उत्पल धारण करो, जो उत्तम गन्ध, सुखद स्पर्श तथा रुधिर रसको प्रकट करनेमें समर्थ हों । वे भ्रमरोंसे सेवित तथा देखनेमें मनोहर हों ॥ ३६ ॥

मैरेयमाध्वीकसुरासवानां
कुम्भांश्च पूर्णान् स्थापयस्व तोये।
जाम्बूनदं पाननिमित्तमेषां
पात्रं पपुर्येषु ददस्व भैमाः ॥ ३७ ॥

'तुम अपने जलके ऊपर मैरेय, माध्वीक, सुरा और आसव नामक मधुसे भरे हुए कलश स्थापित करो। साथ ही इनके पीनेके लिये सोनेके पानपात्र दो, जिनमें ये यादव मधुपान कर सकें ॥ ३७ ॥

पुष्पोच्चयैर्वासितशीततोयो
भवाप्रमत्तः खलु तोयराशे।
यथा व्यलीकं न भवेद् यदूनां
सस्त्रीजनानां कुरु तत् प्रयत्नम् ॥ ३८ ॥

'जलनिधे ! तुम निश्चय ही ऐसे बन जाओ, जिससे तुम्हारा शीतल जल फूलोंकी राशिसे वासित हो जाय। इसके लिये सतत सावधान रहो और ऐसा प्रयत्न करो, जिससे स्त्री-पुरुषोंसहित यादवोंके प्रति कोई विपरीत बर्ताव न हो जाय' ॥ ३८ ॥

इतीदमुक्त्वा भगवान् समुद्रं
ततः प्रचिक्रीड सहार्जुनेन ।
सिषेच पूर्वं नृप नारदं तु
‘सात्राजिती कृष्णमुखेक्षिताज्ञा ॥ ३९ ॥

समुद्रसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ क्रीड़ा करने लगे। नरेश्वर ! श्रीकृष्णके मुखके संकेतोंको समझनेवाली सत्यभामाने पहले देवर्षि नारदपर जल उछालकर उन्हें भिगो दिया ॥ ३९ ॥

ततो मदावर्जितचारुदेहः
पपात रामः सलिले सलीलम्।
साकारमालम्ब्य करं करेण
मनोहरां रैवतराजपुत्रीम् ॥ ४० ॥

तदनन्तर मदके आवेशसे रहित मनोहर शरीरवाले बलरामजी अपने हाथसे मनोहारिणी रैवतराजकुमारी रेवतीका हाथ पकड़कर इच्छानुसार गीत गाते हुए लीलापूर्वक जलमें कूद पड़े ॥ ४० ॥

कृष्णात्मजा ये त्वथ भैममुख्या
रामस्य पश्चात् पतिताः समुद्रे ।

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः [ ५७१


विरागवस्त्राभरणाः प्रहृष्टाः
क्रीडाभिरामा मदिरविक्लाक्षाः ॥ ४१ ॥

बलरामजीके कूदनेके पश्चात् श्रीकृष्णके पुत्र तथा भीमवंशियोंके प्रधान-प्रधान व्यक्ति नाना प्रकारके रंगवाले वस्त्र और आभूषण धारण किये हर्षमें भरकर समुद्रमें कूद पड़े । उस समय वे जलक्रीड़ामें अभिरत थे और उनकी आँखें मधुसे मतवाली हो रही थीं ॥ ४१ ॥

शेषास्तु भैमा हरिमभ्युपेताः
क्रीडाभिरामा निशठोल्मुकाद्याः ।
विचित्रवस्त्राभरणाश्च मत्ताः
संतानमाल्यावृतकण्ठदेशाः ॥ ४२ ॥

शेष यादव तथा निशठ और उल्मुक आदि बलरामपुत्र क्रीड़ामें अभिरत होकर श्रीकृष्णके निकट गये । वे विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और मदमत्त थे तथा उनके कण्ठदेश संतान-पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत थे ॥ ४२ ॥

वीर्योपपन्नाः कृतचारुचिह्ना
विलिप्तगात्रा जलपात्रहस्ताः ।
गीतानि तद्वेषमनोहराणि
स्वरोपपन्नान्यथ गायमानाः ॥ ४३ ॥

वे सब-के-सब बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा मनोहर वेषभूषासे युक्त थे । उनके अङ्गोंमें चन्दनका लेप लगा था । वे हाथोंमें जलपात्र लिये हुए थे और उस वेषके अनुरूप स्वरसम्पन्न मनोहर गीत गा रहे थे ॥ ४३ ॥

ततः प्रचक्रुर्जलावादितानि
नानास्वराणि प्रियवाद्यघोषाः ।
सहाप्सरोभिस्त्रिदिवालयाभिः
कृष्णाज्ञया वेशवधूशतानि ॥ ४४ ॥

तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी आज्ञासे स्वर्गवासिनी अप्सराओंके साथ सैकड़ों वेशवधुओंने, जिन्हें वाद्यघोष बहुत ही प्रिय था, नाना स्वरोंमें जल-तरंग आदि बाजे बजाने आरम्भ किये ॥ ४४ ॥

आकाशगङ्गाजलवादनज्ञाः
सदा युवत्यो मदनैकचित्ताः ।
अवादयंस्ता जलदर्ददुरांश्च
वाद्यानुरूपं जगिरे च हृष्टाः ॥ ४५ ॥

अप्सराएँ नित्य युवती, एकमात्र काममें ही मनको लगानेवाली तथा आकाशगङ्गाके जलसे बाजा बजानेकी कलाका ज्ञान रखनेवाली थीं । उन्होंने जलदर्ददुर^१ बजाये और हर्षमें भरकर उस वाद्यके अनुरूप गीत भी गाये ॥ ४५ ॥

कुशेशयाकोशविशालनेत्राः
कुशेशयापीडविभूषिताश्च ।
कुशेशयानां रविबोधितानां
जहुः श्रियं ताः सुरचारुमुख्यः ॥ ४६ ॥

स्वर्गीय अप्सराओंके नेत्र कमलकलिकाओंके समान विशाल थे । वे कमलोंके ही मुकुटोंसे विभूषित थीं तथा सूर्यकी किरणोंद्वारा खिले हुए कमलोंकी शोभाको चुराये लेती थीं । उन सबके मुख देवताओंके समान मनोहर थे ॥ ४६ ॥

स्त्रीवक्त्रचन्द्रैः सकलेन्दुकल्पै
रराज राजञ्छतशः समुद्रः ।
यदृच्छया दैवविधानतो वा
नभो यथा चन्द्रसहस्रकीर्णम् ॥ ४७ ॥

राजन् ! सम्पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान मनोहर नारियोंके सैकड़ों मुख-चन्द्रोंसे अलंकृत हुआ समुद्र उस आकाशके समान शोभा पा रहा था, जो अकस्मात् या दैवके विधानके अनुसार सहस्रों चन्द्रमाओंसे व्याप्त हो गया हो ॥ ४७ ॥

समुद्रमेघः स रराज राज-
ञ्छतह्रदास्त्रीप्रभयाभिरामः ।
सौदामिनीभिन्न इवाम्बुनाथो
देदीप्यमानो नभसीव मेघः ॥ ४८ ॥

नरेश्वर ! विद्युत्‌के समान कान्तिमती स्त्रियोंकी प्रभासे अत्यन्त मनोहर दिखायी देनेवाला वह समुद्ररूपी मेघ उसी तरह सुशोभित हो रहा था, जैसे जलका स्वामी मेघ आकाशमें बिजलियोंसे संयुक्त होकर अत्यन्त उद्भासित हो उठता है ॥ ४८ ॥

नारायणश्चैव सनारदश्च
सिषेच पक्षे कृतचारुचिह्नः ।
बलं सपक्षं कृतचारुचिह्नं
स चैव पक्षं मधुसूदनस्य ॥ ४९ ॥

सुन्दर एवं मनोहर वेश-भूषा धारण किये भगवान् श्रीकृष्ण और नारद अपने दलके लोगोंके साथ स्थित हो सुन्दर वेश-भूषावाले बलराम तथा उनके पक्षके लोगोंपर पानी उछालने लगे और बलराम-पक्षके लोग भी श्रीकृष्णके पक्षवालोंको जलसे भिगोने लगे ॥ ४९ ॥


^१. प्राचीन कालका एक बाजा, जिसपर चमड़ा मढ़ा होता था।

५७२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

हस्तप्रमुक्तैर्जल्यन्त्रकैश्च
प्रहृष्टरूपाः सिषिचुस्तदानीम्।
रागोद्धता वारुणिपानमत्ताः
संकर्षणाधोक्षजदेवपत्न्यः ॥ ५० ॥

उस समय जिनका सारा शरीर हर्षोल्लाससे परिपूर्ण हो रहा था, वे मद्यपानसे मत्त और रागसे उद्धत हुई बलराम और श्रीकृष्णकी पत्नियाँ अपने हाथों तथा जलयन्त्रों (पिचकारियों) से दूसरोंको भिगोने लगीं ॥ ५० ॥

आरक्तनेत्रा जलमुक्तिसक्ताः
स्त्रीणां समक्षं पुरुषायमाणाः।
ते नोपरेमुः सुचिरं च भैमा
मानं वहन्तो मदनं मदं च ॥ ५१ ॥

वे भीमवंशी यादव अपने हृदयमें मान, मदन और मदको धारण किये कुछ-कुछ लाल नेत्रोंसे युक्त हो पानी उछालनेमें लगे थे और स्त्रियोंके समक्ष पुरुषार्थ दिखा रहे थे। वे बहुत देरतक उस जलक्रीड़ासे विरत नहीं हुए ॥ ५१ ॥

अतिप्रसङ्गं तु विचिन्त्य कृष्ण-
स्तान् वारयामास रथाङ्गपाणिः।
स्वयं निवृत्तो जलवाद्यशब्दैः
सनारदः पार्थसहायवांश्च ॥ ५२ ॥

उनकी अत्यन्त बढ़ती हुई आसक्तिका विचार करके चक्रपाणि भगवान् विष्णुने उन सबको रोक दिया और जलवाद्यके मधुर शब्दोंको सुनते हुए वे देवर्षि नारद और अर्जुनके साथ स्वयं भी जल-विहारसे निवृत्त हो गये ॥ ५२ ॥

कृष्णोङ्गितज्ञा जलयुद्धसङ्गाद्
भैमा निवृत्ता दृढमानिनोऽपि।
नित्यं तथाऽऽनन्दकराः प्रियाणां
प्रियाश्च तेषां ननृतुः प्रतीताः ॥ ५३ ॥

श्रीकृष्णके संकेतोंको समझनेवाले भीमवंशी यादव सुदृढ़ अभिमानसे युक्त होनेपर भी उस जलयुद्धके प्रसंगसे निवृत्त हो गये। तदनन्तर उन प्रिय पुरुषोंको नित्य आनन्द देनेवाली उनकी प्यारी वारवनिताएँ विश्वस्त होकर नृत्य करने लगीं ॥

नृत्यावसाने भगवानुपेन्द्र-
स्तत्याज धीमानथ तोयसङ्गान्।
उत्तीर्य तोयादनुकूललेपं
जग्राह दत्त्वा मुनिसत्तमाय ॥ ५४ ॥

नृत्यके अन्तमें बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने जलक्रीड़ाके प्रसंग त्याग दिये। उन्होंने जलसे ऊपर आकर मुनिवर नारदजीको अनुकूल चन्दनका लेप देकर फिर स्वयं भी उसे ग्रहण किया ॥ ५४ ॥

उपेन्द्रमुत्तीर्णमथाशु दृष्ट्वा
भैमा हि ते तत्यजुरेव तोयम्।
विविक्तगात्रास्त्वथ पानभूमिं
कृष्णाज्ञया ते ययुरप्रमेयाः ॥ ५५ ॥

भगवान् श्रीकृष्णको जलसे बाहर निकला देख अन्य यादवोंने भी जलक्रीड़ा त्याग दी। फिर वे अप्रमेय शक्तिशाली यादव शुद्ध शरीर हो श्रीकृष्णकी आज्ञासे पानभूमि (रसोईका स्थान) में गये ॥ ५५ ॥

यथानुपूर्व्या च यथावयश्च
यत्सन्नियोगाच्च तदोपविष्टाः।
अन्नानि वीरा बुभुजुः प्रतीताः
पपुश्च पेयानि यथानुकूलम् ॥ ५६ ॥

वहाँ वे क्रमशः अवस्था और सम्बन्धके अनुसार उस समय भोजनके लिये बैठे। तदनन्तर उन प्रख्यात वीरोंने अपनी रुचिके अनुकूल अन्न खाये और पेय रसोंका पान किया ॥ ५६ ॥

मांसानि पक्वानि फलाम्लकानि
चुक्रोत्तरेणाथ च दाडिमेन।
निष्टप्तशूलाञ्छकलान् पशूंश्च
तत्रोपजह्रुः शुचयोऽथ सूदाः ॥ ५७ ॥

पके फलोंके गूदे, खट्टे फल, अधिक खट्टे अनारके साथ शूलमें गूँथकर सेंके गये कन्द या फलोंके टुकड़े, पोषक तत्त्व (अन्न)—ये सब पदार्थ पवित्र रसोइयोंने उनके लिये परोसे ॥ ५७ ॥

सुखिन्नशूल्यान् महिषांश्च बाला-
ञ्छूल्यान् सुनिष्प्रुतघृतावरुसिकान्।


१०. (प्रश्न-) कतमः प्रजापतिः ? प्रजापति अर्थात् प्रजाका पालन करनेवाला कौन है ? (उत्तर-) पशुरिति, पशु ही प्रजापालक है। शतपथ ब्राह्मणके इस प्रश्नोत्तरसे यह सूचित होता है कि जो पदार्थ या शक्तियाँ प्रजाका पोषण करनेवाली हैं, उन्हें पशु कहा गया है। 'नृणां व्रीहिमयाः पशवः'—इस उक्ति के अनुसार मनुष्योंके लिये पोषक तत्त्व अन्न ही है।

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः [ ५७३


वृक्षाम्लसौवर्चलचुक्रपूर्णान्
पौरोगवोक्त्या उपजह्रुरेषाम् ॥ ५८ ॥

शूलमें गूँथकर पकाये गये भैंसाकन्द तथा अन्यान्य कन्द या मूल-फल, नारियल, तपे हुए घीमें तले गये अन्यान्य खाद्यपदार्थ, अम्लवेत, कालानमक और चूकके मेलसे बने हुए लेह्यपदार्थ (चटनी)—ये सब वस्तुएँ पाकशालाध्यक्षके कहनेसे रसोइयोंने इन यादवोंके लिये प्रस्तुत कीं ॥ ५८ ॥

पौरोगवोक्त्या विधिना मृगाणां
मांसानि सिद्धानि च पीवराणि ।
नानाप्रकारान्युपजह्रुरेषाम्
मृष्टानि पक्वानि च चुक्रचूतैः ॥ ५९ ॥

पाकशालाध्यक्षके बताये अनुसार विधिवत् तैयार किये गये मृगनामक कन्दविशेषके मोटे-मोटे गूदे, आमकी खटाई डालकर बनाये गये नाना प्रकारके विशुद्ध व्यञ्जन भी इनके लिये परोसे गये ॥ ५९ ॥

पार्श्वानि चान्ये शकलानि तत्र
ददुः पशूनां घृतमृक्षितानि ।
सामुद्रचूर्णैरवचूर्णितानि
चूर्णेन मृष्टेन समारिचेन ॥ ६० ॥

दूसरे रसोइयोंने पास रखे हुए पोषक शाकोंके टुकड़े-टुकड़े करके उन्हें घीमें तल दिये और उनमें नमक तथा मिर्चके चूर्ण मिलाकर खानेवालोंको परोस दिये ॥ ६० ॥

समूलकैर्दाडिममातुलिङ्गैः
पर्णासहिङ्ग्‌वार्द्रकभूस्तृणैश्च ।
तदोपदंशैः सुमुखोत्चरैस्ते
पानानि हृष्टाः पपुरप्रमेयाः ॥ ६१ ॥

मूली, अनार, बिजौरा नींबू, तुलसी, हींग और भूस्तृण-नामक शाकविशेषके साथ सुन्दर मुखवाले पानपात्र लेकर उन अप्रमेय शक्तिशाली यादवोंने बड़े हर्षके साथ पेय-रसका पान किया ॥ ६१ ॥

कट्वाङ्गशूलैरपि पक्षिभिश्च
घृताम्लसौवर्चलतैलसिक्तैः ।
मैरेयमाध्वीकसुरासवांस्ते
पपुः प्रियाभिः परिवार्यमाणाः ॥ ६२ ॥

कट्वाङ्ग अर्थात् कटुक—परवल, शूलहर (हींग) तथा नमक-खटाई मिलाकर घी और तेलमे सेंके गये लकुच या बड़हर<sup></sup>के साथ मैरेय, माध्वीक, सुरासव नामक मधुका उन यादवोंने अपनी प्रियतमाओंसे घिरे रहकर पान किया ॥

श्वेतेन युक्तानपि शोणितेन
भक्ष्यान् सुगन्धांल्लवणाम्बितांश्च।
आर्द्राङ्किलादान् घृतपूर्णकांश्च
नानाप्रकारानपि खण्डखाद्यान् ॥ ६३ ॥

नरेश्वर ! श्वेत रंगके खाद्य-पदार्थ मिश्री आदि तथा लाल रंगके फलके साथ नाना प्रकारके सुगन्धित एवं नमकीन भोजन एवं आर्द्र (रसदार साग), किलाद (भैंसके दूधमें पकाये गये खीर आदि), घीसे भरे हुए पदार्थ (पूआ-हलुआ आदि) तथा भाँति-भाँतिके खण्ड-खाद्य (खाँड़ आदि) उन्होंने खाये ॥ ६३ ॥

अपानपाश्चोद्धवभोजमुख्याः
शाकैश्च सूपैश्च बहुप्रकारैः ।
पेयैश्च दध्ना पयसा च वीराः
स्वन्नानि राजन् बुभुजुः प्रहृष्टाः ॥ ६४ ॥

राजन् ! उद्धव, भोज आदि श्रेष्ठ यादव वीरोंने जो मादक रसोंका पान नहीं करते थे, बड़े हर्षके साथ नाना प्रकारके साग, दाल, पेय-पदार्थ तथा दही-दूध आदिके साथ उत्तम अन्नका भोजन किया ॥ ६४ ॥

तथारनालांश्च बहुप्रकारान्
पपुः सुगन्धानपि पालवीषु ।
श्रुतं पयः शर्करया च युक्तं
फलप्रकारांश्च बहुंश्च खादन् ॥ ६५ ॥

उन्होंने प्यालोंमें अनेक प्रकारके सुगन्धित आरनाल (कांजीरस) का पान किया। चीनी मिलाये हुए गरम-गरम दूध पीया और भाँति-भाँतिके फल भी खाये ॥ ६५ ॥

तृप्ताः प्रवृत्ताः पुनरेव वीरा-
स्ते भैसमुख्या वनितासहायाः ।
गीतानि रम्याणि जगुः प्रहृष्टाः
कान्ताभिनीतानि मनोहराणि ॥ ६६ ॥

खा-पीकर तृप्त होनेके पश्चात् वे मुख्य-मुख्य यदुवंशी वीर पुनः स्त्रियोंको साथ लेकर बड़े हर्षके साथ रमणीय एवं मनोहर गीत गाने लगे। उनकी प्रेयसी कामिनियाँ अपने हावभावद्वारा उन गीतोंके अर्थका अभिनय करती जाती हैं ॥


<sup>१. यहाँ पक्षीका अर्थ खगवक्त्र है, जो लकुच या बड़हरका बोधक है।</sup>

५७४श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आज्ञापयामास ततः स तस्यां
निशि प्रहृष्टो भगवानुपेन्द्रः।
छालिक्यगेयं बहुसंनिधानं
यदेव गान्धर्वमुदाहरन्ति ॥ ६७ ॥

तदनन्तर हर्षमें भरे हुए भगवान् उपेन्द्रने उस रातमें बहुसंख्यक मनुष्योंद्वारा सम्पन्न होनेवाले उस छालिक्य गानके लिये आज्ञा दी, जिसे गान्धर्व कहते हैं ॥ ६७ ॥

जग्राह वीणामथ नारदस्तु
षड्ग्रामरागादिसमाधियुक्ताम् ।
हल्लीसकं तु स्वयमेव कृष्णः
सवंशघोषं नरदेव पार्थः ॥ ६८ ॥
मृदङ्गवाद्यानपरांश्च वाद्यान्
वराप्सरस्ता जगृहुः प्रतीताः ।
आसारितान्ते च ततः प्रतीता
रम्भोत्थिता साभिनयार्थतत्त्वज्ञा ॥ ६९ ॥

उस समय नारदजीने अपनी वीणा सँभाली, जो छः ग्रामोंपर आधारित राग आदिके द्वारा चित्तको एकाग्र कर देनेवाली थी। नरदेव ! साक्षात् श्रीकृष्णने वंशी बजाकर हल्लीसक ( रास ) नामक नृत्यका आयोजन किया। कुन्तीपुत्र अर्जुनने मृदङ्ग वाद्य ग्रहण किया। अन्य वाद्यको श्रेष्ठ अप्सराओंने ग्रहण किया, जो उनके वादन-कलामें प्रख्यात थीं। आसारित³ (प्रथम आसारनर्तकी-प्रवेश) के बाद अभिनयके अर्थतत्त्वका ज्ञान रखनेवाली रम्भा नामक अप्सरा उठी, जो अपनी अभिनयकलाके लिये विख्यात थी ॥ ६८-६९ ॥

तयाभिनीते वरगात्रयष्ट्या
तुतोष रामश्च जनार्दनश्च ।
अथोर्वशी चारुविशालनेत्रा
हेमा च राजन्नथ मिश्रकेशी ॥ ७० ॥
तिलोत्तमा चाप्यथ मेनका च
एतास्तथान्याश्च हरिप्रियार्थम् ।
जगुस्तथैवाभिनयं च चक्रु-
रिष्टैश्च कामैर्मनसोऽनुकूलैः ॥ ७१ ॥

उसकी अङ्गयष्टि बड़ी सुन्दर थी। उसके द्वारा अभिनय किये जानेपर बलराम और श्रीकृष्णको बड़ा संतोष हुआ। राजन् ! तदनन्तर मनोहर एवं विशाल नेत्रोंवाली उर्वशी, हेमा, मिश्रकेशी, तिलोत्तमा और मेनका—ये तथा और भी बहुत-सी अप्सराएँ श्रीकृष्णका प्रिय करनेके लिये मनके अनुकूल प्रिय कामनाओंको प्रस्तुत करती हुई गाने और अभिनय करने लगीं ॥ ७०-७१ ॥

ता वासुदेवेऽप्यनुरक्तचित्ताः
स्वगीतनृत्याभिनयैरुदारैः ।
नरेन्द्रसूनो परितोषितेन
ताम्बूलयोगाश्च वराप्सरोभिः ॥ ७२ ॥
तदागताभिर्नृवराह्तास्तु
कृष्णेप्सया मानमयास्तथैव ।

नरेन्द्रकुमार ! वे रम्भा आदि अप्सराएँ मन ही-मन


१. क्रमशः सात स्वरोंका समूह ग्राम कहलाता है। संगीतमें सुभीतेके लिये षड्ज, मध्यम और पञ्चम तथा किसी-किसीके मतसे षड्ज, मध्यम और गान्धार नामक तीन ग्राम निश्चित कर लिये गये हैं। जिन्हें क्रमशः नन्द्यावर्त, सुभद्र और जीमूत भी कहते हैं तथा जिनके देवता क्रमसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं। प्रत्येक ग्राममें सात-सात मूर्च्छनाएँ होती हैं। सा ( षड्ज ) से आरम्भ करके ( सा रे ग म प ध नि ) जो सात स्वर हों, उनके समूहको षड्ज ग्राम, म ( मध्यम ) से आरम्भ करके ( म प ध नि सा रे ग ) जो सात स्वर हों, उनके समूहको मध्यम ग्राम और इसी प्रकार गा ( गांधार ) या प ( पञ्चम ) से आरम्भ करके जो स्वर हों, उनके समूहको गांधार अथवा पञ्चम (जैसी अवस्था हो) ग्राम मानते हैं। इनमेंसे पहले दो ग्रामोंका व्यवहार तो इसी लोकमें मनुष्योंद्वारा होता है, पर तीसरे ग्रामका व्यवहार स्वर्गलोकमें नारद करते हैं। यहाँ रागोंके छः स्थानोंको छः ग्राम कहा गया है, जिनके नाम इस प्रकार हैं—मध्य, शुद्ध, भिन्न, गौड, मिश्र और गीत।

२. बहुत-सी स्त्रियोंके साथ किया जानेवाला नृत्य हल्लीसक या रास कहलाता है।

३. भरत मुनिने नृत्य-विधिमें चार प्रकारके आसार (चिह्न) या आसारितका उपदेश किया है, जो क्रमशः इस प्रकार है—पहले नर्तकीका प्रवेश होता है, यह प्रथम आसार है। तदनन्तर आसारित अर्थका अभिनय होता है, जिसे नाट्य कहते हैं, यही उसका दूसरा भेद है। तत्पश्चात् तालका अनुसरण करते हुए जो अङ्गहारण अङ्गविक्षेप ( चमकना, मटकना और हाथ-पैर हिलाना ) होता है, यही तीसरा आसार है। तदनन्तर देवताके चिह्न रूपसे जो नृत्य किया जाता है, वह चौथा आसार है। यहाँ नर्तकीप्रवेश नामक प्रथम आसारके अन्तमें नाट्यके लिये अभिनयकुशल रम्भा खड़ी हुई। उसके द्वारा द्वितीय आसार अर्थात् अभिनय सम्पन्न हो जानेपर शेष दो आसारोंकी पूर्तिके लिये उर्वशी आदिका उपयोग हुआ।

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः ५७५


वसुदेवनन्दन भगवान् कृष्णमें अनुरक्त थीं। उन्होंने अपने गीत, नृत्य एवं उदार अभिनयोंद्वारा सबको संतोष प्रदान करके प्रसन्न कर लिया। नरेश्वर! उस समय श्रीकृष्णकी इच्छासे जलक्रीडामें आयी हुई उन श्रेष्ठ अप्सराओंने उनकी ओरसे पानके बीड़े प्राप्त किये, जो उनके लिये सम्मान-स्वरूप थे॥ ७२ १/२ ॥

फलानि गन्धोत्तमवन्ति वीरा-
श्छालिक्यगान्धर्वमथाहृतं च॥ ७३॥
कृष्णेच्छया च त्रिदिवान्नुदेव
अनुग्रहार्थं भुवि मानुषाणाम्।

नरदेव ! श्रीकृष्णकी इच्छासे मनुष्योंपर अनुग्रह करनेके लिये स्वर्गसे वह छालिक्य गान्धर्व (दिव्य संगीत एवं नृत्य-विशेष ) भूतलपर लाया गया था; साथ ही उत्तम गन्धोंसे युक्त देवयोग्य फल भी यहाँ लाये गये थे। वीर यादवोंने इन सबका रसास्वादन किया ॥ ७३ १/२ ॥

स्थितं च रम्यं हरितेजसेव
प्रयोजयामास स रौक्मिणेयः ॥ ७४॥
छालिक्यगान्धर्वमुदारबुद्धि-
स्तेनैव ताम्बूलमथ प्रयुक्तम्।

वह रमणीय छालिक्य गान्धर्व भगवान् श्रीकृष्णके ही प्रभावसे इस पृथ्वीपर प्रद्युम्न आदिमें प्रतिष्ठित हुआ । उदारबुद्धि रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नने उक्त गान्धर्व-कलाको प्रयोगमें लाकर दिखाया भी था । उन्होंने ही ताम्बूलका प्रयोग किया ॥ ७४ १/२ ॥

प्रयोजितं पञ्चभिरिन्द्रतुल्यै-
श्छालिक्यमिष्टं सततं नराणाम् ॥ ७५॥
शुभावहं वृद्धिकरं प्रशस्तं
मङ्गल्यमेवाथ तथा यशस्यम् ।
पुण्यं च पुष्ट्यभ्युदयावहं च
नारायणस्येष्टमुदारकीर्तेः ॥ ७६॥

इन्द्रतुल्य पराक्रमी पाँच वीरों ( श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और साम्ब) ने यहाँ छालिक्य गान्धर्व-का आयोजन किया था, जो मनुष्योंको सदा ही अभीष्ट है। वह शुभकारक, वृद्धि करनेवाला, प्रशस्त, मङ्गलकारी, यशोवर्द्धक, पुण्यदायक, पुष्टि और अभ्युदयको देनेवाला है । उदारकीर्तिवाले भगवान् नारायणको वह परम प्रिय है ॥ ७५-७६ ॥

जयावहं धर्मभरावहं च
दुःस्वप्ननाशं परिकीर्त्यमानम्।
करोति पापं च तथा विहन्ति
शृण्वन् सुरावासगतो नरेन्द्रः॥ ७७ ॥
छालिक्यगान्धर्वमुदारकीर्ति-
र्मेने किलैकं दिवसं सहस्रम् ।
चतुर्युगानां नृप रेवतोऽथ
ततः प्रवृत्ता च कुमारजातिः ॥ ७८ ॥
गान्धर्वजातिश्च तथापरापि
दीपाद् यथा दीपशतानि राजन्।

उसकी चर्चा करने मात्रसे वह विजयकी प्राप्ति और धर्मका लाभ कराता है । दुःस्वप्नका नाश और पापका निवारण कर देता है । किसी समय देवलोकमें गये हुए उदारकीर्ति राजा रैवतने छालिक्य गान्धर्वको इतनी तन्मयताके साथ सुना था कि उन्हें चार हजार युगोंका समय भी एक दिनके समान ही प्रतीत हुआ । राजन्! उसी छालिक्य गान्धर्वसे कुमारजाति तथा अन्य गान्धर्व जातिकी प्रवृत्ति हुई है। ठीक उसी तरह, जैसे एक दीपकसे सैकड़ों दीपक जल जाते हैं ॥ ७७-७८ १/२ ॥

विवेद कृष्णश्च स नारदश्च
प्रद्युम्नमुख्यैर्नृप भैमुख्यैः ॥ ७९ ॥
विज्ञानमेतद्धि परे यथाव-
दुद्देशमात्राच्च जनास्तु लोके ।
जानन्ति छालिक्यगुणोदयानां
तोयं नदीनामथवा समुद्रः ॥ ८० ॥
ज्ञातुं समर्थो हि महागिरिर्वा
फलाग्रतो वा गुणतोऽथ वापि।
शक्यं न छालिक्यमृते तपोभिः
स्थाने विधानान्यथ मूर्च्छनासु ॥ ८१ ॥

नरेश्वर ! प्रद्युम्न आदि मुख्य-मुख्य यादवोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण और नारदजी ही छालिक्य गुणोदयके इस विज्ञानको यथावत् रूपसे जानते हैं । संसारके दूसरे मनुष्योंको तो इसकी नाम मात्रकी ही जानकारी है। जैसे नदियोंके जलको समुद्र अथवा कोई विशाल पर्वत ही यथार्थ रूपसे जान सकता है, उसी प्रकार भगवान् ही छालिक्यके श्रेष्ठ फल अथवा गुणोंको ठीक-ठीक जानते हैं। तपस्या किये बिना छालिक्य गान्धर्वको तथा उसकी

५७६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

मूर्च्छनाविषयक विधानको नहीं जाना जा सकता । यह कथन सर्वथा उचित ही है ॥ ७९-८१ ॥

षड्ग्रामरागेषु च तन्तु कार्यं
तस्यैकदेशावयवेन राजन् ।
लेशाभिधानां सुकुमारजातिं
निष्ठां सुदुःखेन नराः प्रयान्ति ॥ ८२ ॥

राजन् ! छः ग्रामोंवाले जो राग हैं, उनमें भी छालिक्यका उसके एकदेशीय अवयवके द्वारा गान करना चाहिये । लेश नामक जो छालिक्यकी सुकुमार जाति है, उसका गान करनेवाले मनुष्य भी बड़े दुःखसे ( कठिनाईसे ) उसकी समाप्ति कर पाते हैं ( फिर सम्पूर्ण छालिक्यके गानकी तो बात ही क्या है ? ) ॥ ८२ ॥

छालिक्यगान्धर्वगुणोदयेषु
ये देवगन्धर्वमहर्षिसंघाः ।
निष्ठां प्रयान्तीत्यवगच्छ बुद्ध्या
छालिक्यमेवं मधुसूदनेन ॥ ८३ ॥
भैमोत्तमानां नरदेव दत्तं
लोकस्य चानुग्रहकाम्ययैव ।
गतं प्रतिष्ठाममरोपगेयं
बाला युवानश्च तथैव वृद्धाः ॥ ८४.१॥
क्रीडन्ति भैमाः प्रसवोत्सवेषु
पूर्वं तु बालाः समुदावहन्ति ।
वृद्धाश्च पश्चात् प्रतिमानयन्ति
स्थानेषु नित्यं प्रतिमानयन्ति ॥ ८५ ॥

नरदेव ! जो देवता, गन्धर्व और महर्षियोंके समुदाय हैं, वे ही छालिक्य गान्धर्वके गुणोंके प्रकट करनेकी कलामें पारंगत होते हैं । इस बातको तुम अपनी बुद्धिद्वारा अच्छी तरह जान लो । ऐसा समझकर ही भगवान् मधुसूदनने सम्पूर्ण जगत्‌पर अनुग्रह करनेकी इच्छासे मुख्य यादवोंको छालिक्य गान्धर्वका ज्ञान प्रदान किया था । वह देवताओं-द्वारा गाये जाने योग्य छालिक्य इस प्रकार मनुष्यलोकमें प्रतिष्ठित हुआ है । बालक, युवक और वृद्ध यदुवंशी जन्मोत्सवोंमें उक्त गान्धर्वद्वारा क्रीड़ा या मनोरञ्जन करते थे । पहले बालक उस कलाको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करने लगे । तत्पश्चात् वृद्धलोग भी उसके प्रति आदरका भाव दिखाने लगे; फिर तो सब लोग सदा सभी स्थानोंमें उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ८३—८५ ॥

मर्त्येषु मर्त्यान् यदवोऽतिवीराः
स्ववंशधर्मं समनुस्मरन्तः ।
पुरातनं धर्मविधानतज्ज्ञाः
प्रीतिः प्रमाणं न वयः प्रमाणम् ॥ ८६ ॥

धर्मके विधानको जाननेवाले अत्यन्त वीर यादव अपने पुरातन वंश-धर्मका स्मरण करते हुए मर्त्यलोकमें मनुष्योंको जो सदा सम्मान देते थे, वह इस बातका सूचक है कि प्रेम ही प्रधान एवं महत्त्वकी वस्तु है । अवस्थाका महत्त्व नहीं है ॥ ८६ ॥

प्रीतिप्रमाणानि हि सौहृदानि
प्रीतिं पुरस्कृत्य हि ते दशार्हाः ।
वृष्ण्यन्धकाः पुत्रसखा बभूवु-
र्विसर्जिताः केशिविनाशनेन ॥ ८७ ॥

सौहार्दका मूल आधार है प्रेम । अतः वे दशार्ह, वृष्णि और अन्धक-वंशी यादव पुत्रोंके साथ भी मित्रवत् बर्ताव करते थे । उस उत्सवके बाद भगवान् केशिविनाशन श्रीकृष्णने उन सबको विदा कर दिया ॥ ८७ ॥

स्वर्गं गताश्चाप्सरसां समूहाः
कृत्वा प्रणामं मधुकंसशत्रोः ।
प्रहृष्टरूपस्य सुहृष्टरूपा
बभूव हृष्टः सुरलोकसङ्घः ॥ ८८ ॥

तत्पश्चात् वे अप्सराएँ भी मधु और कंसके शत्रु आनन्दमूर्ति श्रीकृष्णको प्रणाम करके स्वयं भी अत्यन्त हर्षमें मग्न हो स्वर्गलोकको चली गयीं । उस समय देवताओंके समुदायमें हर्ष छा गया ॥ ८८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि भानुमतीहरणे छालिक्यक्रीडावर्णने एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें भानुमतीहरणके प्रसङ्गमें छालिक्यक्रीड़ाका वर्णनविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥