भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 591

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः [ ५६९

मध्यं च गत्वा च चुक्कूर्द भूयो
हेलाविकारैः सविडम्बिताङ्गैः ॥ २४ ॥

राजपुत्र ! वे अप्रमेयस्वरूप नारदमुनि ही वहाँ रास-नृत्यके प्रणेता (संचालक या सूत्रधार) हो गये। वे अपने अनुकरणशील अङ्गोंद्वारा लीलाका अनुकरण करते हुए यादव-मण्डलीके मध्यमें पहुँचकर गीत गाने लगे ॥ २४ ॥

स सत्यभामामथ केशवं च
पार्थं सुभद्रां च बलं च देवम् ।
देवीं तथा रेवतराजपुत्रीं
संदृश्य संदृश्य जहा़स धीमान् ॥ २५ ॥

वे बुद्धिमान् मुनि सत्यभामा, श्रीकृष्ण, अर्जुन, सुभद्रा, बलदेव तथा रेवतराजकुमारी रेवती देवीकी ओर देख-देखकर हँस रहे थे ॥ २५ ॥

ता हासयामास सुधैर्ययुक्ता-
स्तैस्तैरुपायैः परिहासशीलः ।
चेष्टानुकारैर्हसितानुकारै-
र्ली़लानुकारैरपरैश्च धीमान् ॥ २६ ॥

परिहासशील बुद्धिमान् नारदजी किसीकी चेष्टाओंका, किसीकी हँसीका और किसीकी लीलाओंका अनुकरण करके तथा अन्य प्रकारके दूसरे-दूसरे उपायोंद्वारा उन अत्यन्त धैर्य-शालिनी देवियोंको भी हँसा देते थे ॥ २६ ॥

आभाषितं किंचिदिवोपलक्ष्य
नादातिनादान् भगवान् मुमोच ।
हसन् विहासांश्च जहा़स हर्षा-
द्द्वास्यागमे कृष्णविनोदनार्थम् ॥ २७ ॥

जब कोई कुछ मन्दस्वरमें बहुत थोड़ा और धीरे-धीरे बोलता तो ऐश्वर्यशाली नारदजी उसके उत्तरमें बहुत ही ऊँचे स्वरमें सिंहनाद-सा करते हुए जोर-जोरसे बोलने लगते थे और हास्यके अवसरपर हँसते-हँसते हर्षातिरेकसे अट्टहास करने लगते थे। यह सब कुछ वे श्रीकृष्णके मनोरञ्जनके लिये करते थे ॥ २७ ॥

कृष्णाज्ञया सातिशयानि तत्र
यथानुरूपाणि ददुर्युवत्यः ।
रत्नानि वस्त्राणि च रूपवन्ति
जगत्प्रधानानि नृदेवसूनो ॥ २८ ॥

नरदेवकुमार ! श्रीकृष्णकी आज्ञासे वहाँ बैठी हुई युवतियोंने जगत्के प्रधान-प्रधान रत्न, सुन्दर वस्त्र जो मुनिके अनुरूप थे, उन्हें अधिक मात्रामें दिये ॥ २८ ॥

माल्यानि च स्वर्गसमुद्भवानि
संतानदामान्यतिमुक्तकानि ।
सर्वर्तुकान्यप्यनयँस्तदानीं
ददुर्ह रेरिङ्गितकालतज्ज्ञाः ॥ २९ ॥

श्रीकृष्णके संकेत तथा समयकी आवश्यकताको समझने-वाली उन रानियोंने उस समय स्वर्गीय पुष्पहार, संतान (पारिजात) पुष्पोंकी लड़ियाँ, अतिमुक्तक तथा सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले फूल उन्हें अर्पित किये ॥ २९ ॥

रासावसाने त्वथ गृह्य हस्ते
महामुनिं नारदमप्रमेयः ।
पपात कृष्णो भगवान् समुद्रे
सान्त्राजितीं चार्जुनमेव चाथ ॥ ३० ॥

रासके अन्तमें अप्रमेयस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण नारद मुनिका हाथ पकड़कर तथा सत्यभामा और अर्जुनको भी साथमें लेकर समुद्रके जलमें कूद पड़े ॥ ३० ॥

उवाच चामेयपराक्रमोऽथ
शैनेयमीषत्प्रहसन् पृथुश्रीः ।
द्विधा कृतास्मिन् पतताशु भूत्वा
क्रीडाजले नोऽस्तु सहाङ्गनाभिः ॥ ३१ ॥

तदनन्तर अप्रमेय पराक्रमी तथा प्रचुर शोभासे सम्पन्न श्रीकृष्णने किञ्चित् मुसकराकर सात्यकिसे कहा—'तुम सब लोग दो भागोंमें बँटकर अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ ही इस क्रीड़ाजलमें कूद पड़ो ॥ ३१ ॥

सरेवतीकोऽस्तु बलोऽर्द्धनेता
पुत्रा मदीयाश्च सहार्द्धभैमाः ।
भैमार्द्धमेवाथ बलात्मजाश्च
मत्पक्षिणः सन्तु समुद्रतोये ॥ ३२ ॥

'मेरे सारे पुत्र और आधे यदुवंशी इन सबको मिलाकर जो आधे द्वारकावासियोंका दल होगा, उसके नेता रेवती-