भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः [ ५६९

मध्यं च गत्वा च चुक्कूर्द भूयो
हेलाविकारैः सविडम्बिताङ्गैः ॥ २४ ॥

राजपुत्र ! वे अप्रमेयस्वरूप नारदमुनि ही वहाँ रास-नृत्यके प्रणेता (संचालक या सूत्रधार) हो गये। वे अपने अनुकरणशील अङ्गोंद्वारा लीलाका अनुकरण करते हुए यादव-मण्डलीके मध्यमें पहुँचकर गीत गाने लगे ॥ २४ ॥

स सत्यभामामथ केशवं च
पार्थं सुभद्रां च बलं च देवम् ।
देवीं तथा रेवतराजपुत्रीं
संदृश्य संदृश्य जहा़स धीमान् ॥ २५ ॥

वे बुद्धिमान् मुनि सत्यभामा, श्रीकृष्ण, अर्जुन, सुभद्रा, बलदेव तथा रेवतराजकुमारी रेवती देवीकी ओर देख-देखकर हँस रहे थे ॥ २५ ॥

ता हासयामास सुधैर्ययुक्ता-
स्तैस्तैरुपायैः परिहासशीलः ।
चेष्टानुकारैर्हसितानुकारै-
र्ली़लानुकारैरपरैश्च धीमान् ॥ २६ ॥

परिहासशील बुद्धिमान् नारदजी किसीकी चेष्टाओंका, किसीकी हँसीका और किसीकी लीलाओंका अनुकरण करके तथा अन्य प्रकारके दूसरे-दूसरे उपायोंद्वारा उन अत्यन्त धैर्य-शालिनी देवियोंको भी हँसा देते थे ॥ २६ ॥

आभाषितं किंचिदिवोपलक्ष्य
नादातिनादान् भगवान् मुमोच ।
हसन् विहासांश्च जहा़स हर्षा-
द्द्वास्यागमे कृष्णविनोदनार्थम् ॥ २७ ॥

जब कोई कुछ मन्दस्वरमें बहुत थोड़ा और धीरे-धीरे बोलता तो ऐश्वर्यशाली नारदजी उसके उत्तरमें बहुत ही ऊँचे स्वरमें सिंहनाद-सा करते हुए जोर-जोरसे बोलने लगते थे और हास्यके अवसरपर हँसते-हँसते हर्षातिरेकसे अट्टहास करने लगते थे। यह सब कुछ वे श्रीकृष्णके मनोरञ्जनके लिये करते थे ॥ २७ ॥

कृष्णाज्ञया सातिशयानि तत्र
यथानुरूपाणि ददुर्युवत्यः ।
रत्नानि वस्त्राणि च रूपवन्ति
जगत्प्रधानानि नृदेवसूनो ॥ २८ ॥

नरदेवकुमार ! श्रीकृष्णकी आज्ञासे वहाँ बैठी हुई युवतियोंने जगत्के प्रधान-प्रधान रत्न, सुन्दर वस्त्र जो मुनिके अनुरूप थे, उन्हें अधिक मात्रामें दिये ॥ २८ ॥

माल्यानि च स्वर्गसमुद्भवानि
संतानदामान्यतिमुक्तकानि ।
सर्वर्तुकान्यप्यनयँस्तदानीं
ददुर्ह रेरिङ्गितकालतज्ज्ञाः ॥ २९ ॥

श्रीकृष्णके संकेत तथा समयकी आवश्यकताको समझने-वाली उन रानियोंने उस समय स्वर्गीय पुष्पहार, संतान (पारिजात) पुष्पोंकी लड़ियाँ, अतिमुक्तक तथा सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले फूल उन्हें अर्पित किये ॥ २९ ॥

रासावसाने त्वथ गृह्य हस्ते
महामुनिं नारदमप्रमेयः ।
पपात कृष्णो भगवान् समुद्रे
सान्त्राजितीं चार्जुनमेव चाथ ॥ ३० ॥

रासके अन्तमें अप्रमेयस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण नारद मुनिका हाथ पकड़कर तथा सत्यभामा और अर्जुनको भी साथमें लेकर समुद्रके जलमें कूद पड़े ॥ ३० ॥

उवाच चामेयपराक्रमोऽथ
शैनेयमीषत्प्रहसन् पृथुश्रीः ।
द्विधा कृतास्मिन् पतताशु भूत्वा
क्रीडाजले नोऽस्तु सहाङ्गनाभिः ॥ ३१ ॥

तदनन्तर अप्रमेय पराक्रमी तथा प्रचुर शोभासे सम्पन्न श्रीकृष्णने किञ्चित् मुसकराकर सात्यकिसे कहा—'तुम सब लोग दो भागोंमें बँटकर अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ ही इस क्रीड़ाजलमें कूद पड़ो ॥ ३१ ॥

सरेवतीकोऽस्तु बलोऽर्द्धनेता
पुत्रा मदीयाश्च सहार्द्धभैमाः ।
भैमार्द्धमेवाथ बलात्मजाश्च
मत्पक्षिणः सन्तु समुद्रतोये ॥ ३२ ॥

'मेरे सारे पुत्र और आधे यदुवंशी इन सबको मिलाकर जो आधे द्वारकावासियोंका दल होगा, उसके नेता रेवती-

५७०श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

सहित बलभद्रजी हों और आधे भीमवंशियोंके साथ बलराम-जीके सभी पुत्र ये मेरे पक्षमें रहें। इस प्रकार समुद्रके जलमें (दो दलोंमें बँटकर हमलोग क्रीड़ा करें)' ॥ ३२ ॥

आज्ञापयामास ततः समुद्रं
कृष्णः स्मितं प्राञ्जलिर्न प्रतीतः ।
सुगन्धतोयो भव मृष्टतोय-
स्तथा भव ग्राहविवर्जितश्च ॥ ३३ ॥

तदनन्तर श्रीकृष्णने पूर्ण विश्वस्त होकर वहाँ हाथ जोड़कर मुसकराते हुए समुद्रको आज्ञा दी—'तुम अपने जलको सुगन्धित और शुद्ध एवं स्वादिष्ट बना लो तथा ग्राहोंसे रहित हो जाओ ॥ ३३ ॥

हृद्या च ते रत्नविभूषिता तु
सा वेलिका भूरथ पत्सुखा च।
मनोऽनुकूलं च जनस्य तत्तत्
प्रयच्छ विज्ञास्यसि मत्प्रभावात् ॥ ३४ ॥

'तुम्हारी तटभूमि रत्नोंसे विभूषित दिखायी दे, पैरोंके लिये सुखदायिनी हो तथा लोगोंके लिये जो मनोऽनुकूल वस्तुएँ हों, वे सब उन्हें अर्पण करो। मेरे प्रभावसे तुम्हें सबकी अभीष्ट वस्तुओंका ज्ञान हो जायगा ॥ ३४ ॥

भवस्यपेयोऽप्यथ चेष्टपेयो
जनस्य सर्वस्य मनोऽनुकूलः ।
वैडूर्यमुक्तामणिहेमचित्रा
भवन्तु मत्स्यास्त्वयि सौम्यरूपाः ॥ ३५ ॥

'यद्यपि तुम्हारा जल अपेय है तो भी वह प्रिय एवं पीने योग्य हो जायगा। तुम सब लोगोंके मनोऽनुकूल हो जाओगे। तुम्हारे भीतर जो मत्स्य हैं, वे वैदूर्य, मोती, मणि और सुवर्णसे चित्रित तथा सौम्य रूपवाले हो जायेंगे ॥ ३५ ॥

बिभ्रस्व च त्वं कमलोत्पलानि
सुगन्धसुस्पर्शरसक्षमाणि ।
षट्पादजुष्टानि मनोहराणि
कीलालवर्णैश्च समन्वितानि ॥ ३६ ॥

'तुम लाल रंगके कमल और उत्पल धारण करो, जो उत्तम गन्ध, सुखद स्पर्श तथा रुधिर रसको प्रकट करनेमें समर्थ हों । वे भ्रमरोंसे सेवित तथा देखनेमें मनोहर हों ॥ ३६ ॥

मैरेयमाध्वीकसुरासवानां
कुम्भांश्च पूर्णान् स्थापयस्व तोये।
जाम्बूनदं पाननिमित्तमेषां
पात्रं पपुर्येषु ददस्व भैमाः ॥ ३७ ॥

'तुम अपने जलके ऊपर मैरेय, माध्वीक, सुरा और आसव नामक मधुसे भरे हुए कलश स्थापित करो। साथ ही इनके पीनेके लिये सोनेके पानपात्र दो, जिनमें ये यादव मधुपान कर सकें ॥ ३७ ॥

पुष्पोच्चयैर्वासितशीततोयो
भवाप्रमत्तः खलु तोयराशे।
यथा व्यलीकं न भवेद् यदूनां
सस्त्रीजनानां कुरु तत् प्रयत्नम् ॥ ३८ ॥

'जलनिधे ! तुम निश्चय ही ऐसे बन जाओ, जिससे तुम्हारा शीतल जल फूलोंकी राशिसे वासित हो जाय। इसके लिये सतत सावधान रहो और ऐसा प्रयत्न करो, जिससे स्त्री-पुरुषोंसहित यादवोंके प्रति कोई विपरीत बर्ताव न हो जाय' ॥ ३८ ॥

इतीदमुक्त्वा भगवान् समुद्रं
ततः प्रचिक्रीड सहार्जुनेन ।
सिषेच पूर्वं नृप नारदं तु
‘सात्राजिती कृष्णमुखेक्षिताज्ञा ॥ ३९ ॥

समुद्रसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ क्रीड़ा करने लगे। नरेश्वर ! श्रीकृष्णके मुखके संकेतोंको समझनेवाली सत्यभामाने पहले देवर्षि नारदपर जल उछालकर उन्हें भिगो दिया ॥ ३९ ॥

ततो मदावर्जितचारुदेहः
पपात रामः सलिले सलीलम्।
साकारमालम्ब्य करं करेण
मनोहरां रैवतराजपुत्रीम् ॥ ४० ॥

तदनन्तर मदके आवेशसे रहित मनोहर शरीरवाले बलरामजी अपने हाथसे मनोहारिणी रैवतराजकुमारी रेवतीका हाथ पकड़कर इच्छानुसार गीत गाते हुए लीलापूर्वक जलमें कूद पड़े ॥ ४० ॥

कृष्णात्मजा ये त्वथ भैममुख्या
रामस्य पश्चात् पतिताः समुद्रे ।

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः [ ५७१


विरागवस्त्राभरणाः प्रहृष्टाः
क्रीडाभिरामा मदिरविक्लाक्षाः ॥ ४१ ॥

बलरामजीके कूदनेके पश्चात् श्रीकृष्णके पुत्र तथा भीमवंशियोंके प्रधान-प्रधान व्यक्ति नाना प्रकारके रंगवाले वस्त्र और आभूषण धारण किये हर्षमें भरकर समुद्रमें कूद पड़े । उस समय वे जलक्रीड़ामें अभिरत थे और उनकी आँखें मधुसे मतवाली हो रही थीं ॥ ४१ ॥

शेषास्तु भैमा हरिमभ्युपेताः
क्रीडाभिरामा निशठोल्मुकाद्याः ।
विचित्रवस्त्राभरणाश्च मत्ताः
संतानमाल्यावृतकण्ठदेशाः ॥ ४२ ॥

शेष यादव तथा निशठ और उल्मुक आदि बलरामपुत्र क्रीड़ामें अभिरत होकर श्रीकृष्णके निकट गये । वे विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और मदमत्त थे तथा उनके कण्ठदेश संतान-पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत थे ॥ ४२ ॥

वीर्योपपन्नाः कृतचारुचिह्ना
विलिप्तगात्रा जलपात्रहस्ताः ।
गीतानि तद्वेषमनोहराणि
स्वरोपपन्नान्यथ गायमानाः ॥ ४३ ॥

वे सब-के-सब बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा मनोहर वेषभूषासे युक्त थे । उनके अङ्गोंमें चन्दनका लेप लगा था । वे हाथोंमें जलपात्र लिये हुए थे और उस वेषके अनुरूप स्वरसम्पन्न मनोहर गीत गा रहे थे ॥ ४३ ॥

ततः प्रचक्रुर्जलावादितानि
नानास्वराणि प्रियवाद्यघोषाः ।
सहाप्सरोभिस्त्रिदिवालयाभिः
कृष्णाज्ञया वेशवधूशतानि ॥ ४४ ॥

तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी आज्ञासे स्वर्गवासिनी अप्सराओंके साथ सैकड़ों वेशवधुओंने, जिन्हें वाद्यघोष बहुत ही प्रिय था, नाना स्वरोंमें जल-तरंग आदि बाजे बजाने आरम्भ किये ॥ ४४ ॥

आकाशगङ्गाजलवादनज्ञाः
सदा युवत्यो मदनैकचित्ताः ।
अवादयंस्ता जलदर्ददुरांश्च
वाद्यानुरूपं जगिरे च हृष्टाः ॥ ४५ ॥

अप्सराएँ नित्य युवती, एकमात्र काममें ही मनको लगानेवाली तथा आकाशगङ्गाके जलसे बाजा बजानेकी कलाका ज्ञान रखनेवाली थीं । उन्होंने जलदर्ददुर^१ बजाये और हर्षमें भरकर उस वाद्यके अनुरूप गीत भी गाये ॥ ४५ ॥

कुशेशयाकोशविशालनेत्राः
कुशेशयापीडविभूषिताश्च ।
कुशेशयानां रविबोधितानां
जहुः श्रियं ताः सुरचारुमुख्यः ॥ ४६ ॥

स्वर्गीय अप्सराओंके नेत्र कमलकलिकाओंके समान विशाल थे । वे कमलोंके ही मुकुटोंसे विभूषित थीं तथा सूर्यकी किरणोंद्वारा खिले हुए कमलोंकी शोभाको चुराये लेती थीं । उन सबके मुख देवताओंके समान मनोहर थे ॥ ४६ ॥

स्त्रीवक्त्रचन्द्रैः सकलेन्दुकल्पै
रराज राजञ्छतशः समुद्रः ।
यदृच्छया दैवविधानतो वा
नभो यथा चन्द्रसहस्रकीर्णम् ॥ ४७ ॥

राजन् ! सम्पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान मनोहर नारियोंके सैकड़ों मुख-चन्द्रोंसे अलंकृत हुआ समुद्र उस आकाशके समान शोभा पा रहा था, जो अकस्मात् या दैवके विधानके अनुसार सहस्रों चन्द्रमाओंसे व्याप्त हो गया हो ॥ ४७ ॥

समुद्रमेघः स रराज राज-
ञ्छतह्रदास्त्रीप्रभयाभिरामः ।
सौदामिनीभिन्न इवाम्बुनाथो
देदीप्यमानो नभसीव मेघः ॥ ४८ ॥

नरेश्वर ! विद्युत्‌के समान कान्तिमती स्त्रियोंकी प्रभासे अत्यन्त मनोहर दिखायी देनेवाला वह समुद्ररूपी मेघ उसी तरह सुशोभित हो रहा था, जैसे जलका स्वामी मेघ आकाशमें बिजलियोंसे संयुक्त होकर अत्यन्त उद्भासित हो उठता है ॥ ४८ ॥

नारायणश्चैव सनारदश्च
सिषेच पक्षे कृतचारुचिह्नः ।
बलं सपक्षं कृतचारुचिह्नं
स चैव पक्षं मधुसूदनस्य ॥ ४९ ॥

सुन्दर एवं मनोहर वेश-भूषा धारण किये भगवान् श्रीकृष्ण और नारद अपने दलके लोगोंके साथ स्थित हो सुन्दर वेश-भूषावाले बलराम तथा उनके पक्षके लोगोंपर पानी उछालने लगे और बलराम-पक्षके लोग भी श्रीकृष्णके पक्षवालोंको जलसे भिगोने लगे ॥ ४९ ॥


^१. प्राचीन कालका एक बाजा, जिसपर चमड़ा मढ़ा होता था।

५७२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

हस्तप्रमुक्तैर्जल्यन्त्रकैश्च
प्रहृष्टरूपाः सिषिचुस्तदानीम्।
रागोद्धता वारुणिपानमत्ताः
संकर्षणाधोक्षजदेवपत्न्यः ॥ ५० ॥

उस समय जिनका सारा शरीर हर्षोल्लाससे परिपूर्ण हो रहा था, वे मद्यपानसे मत्त और रागसे उद्धत हुई बलराम और श्रीकृष्णकी पत्नियाँ अपने हाथों तथा जलयन्त्रों (पिचकारियों) से दूसरोंको भिगोने लगीं ॥ ५० ॥

आरक्तनेत्रा जलमुक्तिसक्ताः
स्त्रीणां समक्षं पुरुषायमाणाः।
ते नोपरेमुः सुचिरं च भैमा
मानं वहन्तो मदनं मदं च ॥ ५१ ॥

वे भीमवंशी यादव अपने हृदयमें मान, मदन और मदको धारण किये कुछ-कुछ लाल नेत्रोंसे युक्त हो पानी उछालनेमें लगे थे और स्त्रियोंके समक्ष पुरुषार्थ दिखा रहे थे। वे बहुत देरतक उस जलक्रीड़ासे विरत नहीं हुए ॥ ५१ ॥

अतिप्रसङ्गं तु विचिन्त्य कृष्ण-
स्तान् वारयामास रथाङ्गपाणिः।
स्वयं निवृत्तो जलवाद्यशब्दैः
सनारदः पार्थसहायवांश्च ॥ ५२ ॥

उनकी अत्यन्त बढ़ती हुई आसक्तिका विचार करके चक्रपाणि भगवान् विष्णुने उन सबको रोक दिया और जलवाद्यके मधुर शब्दोंको सुनते हुए वे देवर्षि नारद और अर्जुनके साथ स्वयं भी जल-विहारसे निवृत्त हो गये ॥ ५२ ॥

कृष्णोङ्गितज्ञा जलयुद्धसङ्गाद्
भैमा निवृत्ता दृढमानिनोऽपि।
नित्यं तथाऽऽनन्दकराः प्रियाणां
प्रियाश्च तेषां ननृतुः प्रतीताः ॥ ५३ ॥

श्रीकृष्णके संकेतोंको समझनेवाले भीमवंशी यादव सुदृढ़ अभिमानसे युक्त होनेपर भी उस जलयुद्धके प्रसंगसे निवृत्त हो गये। तदनन्तर उन प्रिय पुरुषोंको नित्य आनन्द देनेवाली उनकी प्यारी वारवनिताएँ विश्वस्त होकर नृत्य करने लगीं ॥

नृत्यावसाने भगवानुपेन्द्र-
स्तत्याज धीमानथ तोयसङ्गान्।
उत्तीर्य तोयादनुकूललेपं
जग्राह दत्त्वा मुनिसत्तमाय ॥ ५४ ॥

नृत्यके अन्तमें बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने जलक्रीड़ाके प्रसंग त्याग दिये। उन्होंने जलसे ऊपर आकर मुनिवर नारदजीको अनुकूल चन्दनका लेप देकर फिर स्वयं भी उसे ग्रहण किया ॥ ५४ ॥

उपेन्द्रमुत्तीर्णमथाशु दृष्ट्वा
भैमा हि ते तत्यजुरेव तोयम्।
विविक्तगात्रास्त्वथ पानभूमिं
कृष्णाज्ञया ते ययुरप्रमेयाः ॥ ५५ ॥

भगवान् श्रीकृष्णको जलसे बाहर निकला देख अन्य यादवोंने भी जलक्रीड़ा त्याग दी। फिर वे अप्रमेय शक्तिशाली यादव शुद्ध शरीर हो श्रीकृष्णकी आज्ञासे पानभूमि (रसोईका स्थान) में गये ॥ ५५ ॥

यथानुपूर्व्या च यथावयश्च
यत्सन्नियोगाच्च तदोपविष्टाः।
अन्नानि वीरा बुभुजुः प्रतीताः
पपुश्च पेयानि यथानुकूलम् ॥ ५६ ॥

वहाँ वे क्रमशः अवस्था और सम्बन्धके अनुसार उस समय भोजनके लिये बैठे। तदनन्तर उन प्रख्यात वीरोंने अपनी रुचिके अनुकूल अन्न खाये और पेय रसोंका पान किया ॥ ५६ ॥

मांसानि पक्वानि फलाम्लकानि
चुक्रोत्तरेणाथ च दाडिमेन।
निष्टप्तशूलाञ्छकलान् पशूंश्च
तत्रोपजह्रुः शुचयोऽथ सूदाः ॥ ५७ ॥

पके फलोंके गूदे, खट्टे फल, अधिक खट्टे अनारके साथ शूलमें गूँथकर सेंके गये कन्द या फलोंके टुकड़े, पोषक तत्त्व (अन्न)—ये सब पदार्थ पवित्र रसोइयोंने उनके लिये परोसे ॥ ५७ ॥

सुखिन्नशूल्यान् महिषांश्च बाला-
ञ्छूल्यान् सुनिष्प्रुतघृतावरुसिकान्।


१०. (प्रश्न-) कतमः प्रजापतिः ? प्रजापति अर्थात् प्रजाका पालन करनेवाला कौन है ? (उत्तर-) पशुरिति, पशु ही प्रजापालक है। शतपथ ब्राह्मणके इस प्रश्नोत्तरसे यह सूचित होता है कि जो पदार्थ या शक्तियाँ प्रजाका पोषण करनेवाली हैं, उन्हें पशु कहा गया है। 'नृणां व्रीहिमयाः पशवः'—इस उक्ति के अनुसार मनुष्योंके लिये पोषक तत्त्व अन्न ही है।

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः [ ५७३


वृक्षाम्लसौवर्चलचुक्रपूर्णान्
पौरोगवोक्त्या उपजह्रुरेषाम् ॥ ५८ ॥

शूलमें गूँथकर पकाये गये भैंसाकन्द तथा अन्यान्य कन्द या मूल-फल, नारियल, तपे हुए घीमें तले गये अन्यान्य खाद्यपदार्थ, अम्लवेत, कालानमक और चूकके मेलसे बने हुए लेह्यपदार्थ (चटनी)—ये सब वस्तुएँ पाकशालाध्यक्षके कहनेसे रसोइयोंने इन यादवोंके लिये प्रस्तुत कीं ॥ ५८ ॥

पौरोगवोक्त्या विधिना मृगाणां
मांसानि सिद्धानि च पीवराणि ।
नानाप्रकारान्युपजह्रुरेषाम्
मृष्टानि पक्वानि च चुक्रचूतैः ॥ ५९ ॥

पाकशालाध्यक्षके बताये अनुसार विधिवत् तैयार किये गये मृगनामक कन्दविशेषके मोटे-मोटे गूदे, आमकी खटाई डालकर बनाये गये नाना प्रकारके विशुद्ध व्यञ्जन भी इनके लिये परोसे गये ॥ ५९ ॥

पार्श्वानि चान्ये शकलानि तत्र
ददुः पशूनां घृतमृक्षितानि ।
सामुद्रचूर्णैरवचूर्णितानि
चूर्णेन मृष्टेन समारिचेन ॥ ६० ॥

दूसरे रसोइयोंने पास रखे हुए पोषक शाकोंके टुकड़े-टुकड़े करके उन्हें घीमें तल दिये और उनमें नमक तथा मिर्चके चूर्ण मिलाकर खानेवालोंको परोस दिये ॥ ६० ॥

समूलकैर्दाडिममातुलिङ्गैः
पर्णासहिङ्ग्‌वार्द्रकभूस्तृणैश्च ।
तदोपदंशैः सुमुखोत्चरैस्ते
पानानि हृष्टाः पपुरप्रमेयाः ॥ ६१ ॥

मूली, अनार, बिजौरा नींबू, तुलसी, हींग और भूस्तृण-नामक शाकविशेषके साथ सुन्दर मुखवाले पानपात्र लेकर उन अप्रमेय शक्तिशाली यादवोंने बड़े हर्षके साथ पेय-रसका पान किया ॥ ६१ ॥

कट्वाङ्गशूलैरपि पक्षिभिश्च
घृताम्लसौवर्चलतैलसिक्तैः ।
मैरेयमाध्वीकसुरासवांस्ते
पपुः प्रियाभिः परिवार्यमाणाः ॥ ६२ ॥

कट्वाङ्ग अर्थात् कटुक—परवल, शूलहर (हींग) तथा नमक-खटाई मिलाकर घी और तेलमे सेंके गये लकुच या बड़हर<sup></sup>के साथ मैरेय, माध्वीक, सुरासव नामक मधुका उन यादवोंने अपनी प्रियतमाओंसे घिरे रहकर पान किया ॥

श्वेतेन युक्तानपि शोणितेन
भक्ष्यान् सुगन्धांल्लवणाम्बितांश्च।
आर्द्राङ्किलादान् घृतपूर्णकांश्च
नानाप्रकारानपि खण्डखाद्यान् ॥ ६३ ॥

नरेश्वर ! श्वेत रंगके खाद्य-पदार्थ मिश्री आदि तथा लाल रंगके फलके साथ नाना प्रकारके सुगन्धित एवं नमकीन भोजन एवं आर्द्र (रसदार साग), किलाद (भैंसके दूधमें पकाये गये खीर आदि), घीसे भरे हुए पदार्थ (पूआ-हलुआ आदि) तथा भाँति-भाँतिके खण्ड-खाद्य (खाँड़ आदि) उन्होंने खाये ॥ ६३ ॥

अपानपाश्चोद्धवभोजमुख्याः
शाकैश्च सूपैश्च बहुप्रकारैः ।
पेयैश्च दध्ना पयसा च वीराः
स्वन्नानि राजन् बुभुजुः प्रहृष्टाः ॥ ६४ ॥

राजन् ! उद्धव, भोज आदि श्रेष्ठ यादव वीरोंने जो मादक रसोंका पान नहीं करते थे, बड़े हर्षके साथ नाना प्रकारके साग, दाल, पेय-पदार्थ तथा दही-दूध आदिके साथ उत्तम अन्नका भोजन किया ॥ ६४ ॥

तथारनालांश्च बहुप्रकारान्
पपुः सुगन्धानपि पालवीषु ।
श्रुतं पयः शर्करया च युक्तं
फलप्रकारांश्च बहुंश्च खादन् ॥ ६५ ॥

उन्होंने प्यालोंमें अनेक प्रकारके सुगन्धित आरनाल (कांजीरस) का पान किया। चीनी मिलाये हुए गरम-गरम दूध पीया और भाँति-भाँतिके फल भी खाये ॥ ६५ ॥

तृप्ताः प्रवृत्ताः पुनरेव वीरा-
स्ते भैसमुख्या वनितासहायाः ।
गीतानि रम्याणि जगुः प्रहृष्टाः
कान्ताभिनीतानि मनोहराणि ॥ ६६ ॥

खा-पीकर तृप्त होनेके पश्चात् वे मुख्य-मुख्य यदुवंशी वीर पुनः स्त्रियोंको साथ लेकर बड़े हर्षके साथ रमणीय एवं मनोहर गीत गाने लगे। उनकी प्रेयसी कामिनियाँ अपने हावभावद्वारा उन गीतोंके अर्थका अभिनय करती जाती हैं ॥


<sup>१. यहाँ पक्षीका अर्थ खगवक्त्र है, जो लकुच या बड़हरका बोधक है।</sup>

५७४श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

आज्ञापयामास ततः स तस्यां
निशि प्रहृष्टो भगवानुपेन्द्रः।
छालिक्यगेयं बहुसंनिधानं
यदेव गान्धर्वमुदाहरन्ति ॥ ६७ ॥

तदनन्तर हर्षमें भरे हुए भगवान् उपेन्द्रने उस रातमें बहुसंख्यक मनुष्योंद्वारा सम्पन्न होनेवाले उस छालिक्य गानके लिये आज्ञा दी, जिसे गान्धर्व कहते हैं ॥ ६७ ॥

जग्राह वीणामथ नारदस्तु
षड्ग्रामरागादिसमाधियुक्ताम् ।
हल्लीसकं तु स्वयमेव कृष्णः
सवंशघोषं नरदेव पार्थः ॥ ६८ ॥
मृदङ्गवाद्यानपरांश्च वाद्यान्
वराप्सरस्ता जगृहुः प्रतीताः ।
आसारितान्ते च ततः प्रतीता
रम्भोत्थिता साभिनयार्थतत्त्वज्ञा ॥ ६९ ॥

उस समय नारदजीने अपनी वीणा सँभाली, जो छः ग्रामोंपर आधारित राग आदिके द्वारा चित्तको एकाग्र कर देनेवाली थी। नरदेव ! साक्षात् श्रीकृष्णने वंशी बजाकर हल्लीसक ( रास ) नामक नृत्यका आयोजन किया। कुन्तीपुत्र अर्जुनने मृदङ्ग वाद्य ग्रहण किया। अन्य वाद्यको श्रेष्ठ अप्सराओंने ग्रहण किया, जो उनके वादन-कलामें प्रख्यात थीं। आसारित³ (प्रथम आसारनर्तकी-प्रवेश) के बाद अभिनयके अर्थतत्त्वका ज्ञान रखनेवाली रम्भा नामक अप्सरा उठी, जो अपनी अभिनयकलाके लिये विख्यात थी ॥ ६८-६९ ॥

तयाभिनीते वरगात्रयष्ट्या
तुतोष रामश्च जनार्दनश्च ।
अथोर्वशी चारुविशालनेत्रा
हेमा च राजन्नथ मिश्रकेशी ॥ ७० ॥
तिलोत्तमा चाप्यथ मेनका च
एतास्तथान्याश्च हरिप्रियार्थम् ।
जगुस्तथैवाभिनयं च चक्रु-
रिष्टैश्च कामैर्मनसोऽनुकूलैः ॥ ७१ ॥

उसकी अङ्गयष्टि बड़ी सुन्दर थी। उसके द्वारा अभिनय किये जानेपर बलराम और श्रीकृष्णको बड़ा संतोष हुआ। राजन् ! तदनन्तर मनोहर एवं विशाल नेत्रोंवाली उर्वशी, हेमा, मिश्रकेशी, तिलोत्तमा और मेनका—ये तथा और भी बहुत-सी अप्सराएँ श्रीकृष्णका प्रिय करनेके लिये मनके अनुकूल प्रिय कामनाओंको प्रस्तुत करती हुई गाने और अभिनय करने लगीं ॥ ७०-७१ ॥

ता वासुदेवेऽप्यनुरक्तचित्ताः
स्वगीतनृत्याभिनयैरुदारैः ।
नरेन्द्रसूनो परितोषितेन
ताम्बूलयोगाश्च वराप्सरोभिः ॥ ७२ ॥
तदागताभिर्नृवराह्तास्तु
कृष्णेप्सया मानमयास्तथैव ।

नरेन्द्रकुमार ! वे रम्भा आदि अप्सराएँ मन ही-मन


१. क्रमशः सात स्वरोंका समूह ग्राम कहलाता है। संगीतमें सुभीतेके लिये षड्ज, मध्यम और पञ्चम तथा किसी-किसीके मतसे षड्ज, मध्यम और गान्धार नामक तीन ग्राम निश्चित कर लिये गये हैं। जिन्हें क्रमशः नन्द्यावर्त, सुभद्र और जीमूत भी कहते हैं तथा जिनके देवता क्रमसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं। प्रत्येक ग्राममें सात-सात मूर्च्छनाएँ होती हैं। सा ( षड्ज ) से आरम्भ करके ( सा रे ग म प ध नि ) जो सात स्वर हों, उनके समूहको षड्ज ग्राम, म ( मध्यम ) से आरम्भ करके ( म प ध नि सा रे ग ) जो सात स्वर हों, उनके समूहको मध्यम ग्राम और इसी प्रकार गा ( गांधार ) या प ( पञ्चम ) से आरम्भ करके जो स्वर हों, उनके समूहको गांधार अथवा पञ्चम (जैसी अवस्था हो) ग्राम मानते हैं। इनमेंसे पहले दो ग्रामोंका व्यवहार तो इसी लोकमें मनुष्योंद्वारा होता है, पर तीसरे ग्रामका व्यवहार स्वर्गलोकमें नारद करते हैं। यहाँ रागोंके छः स्थानोंको छः ग्राम कहा गया है, जिनके नाम इस प्रकार हैं—मध्य, शुद्ध, भिन्न, गौड, मिश्र और गीत।

२. बहुत-सी स्त्रियोंके साथ किया जानेवाला नृत्य हल्लीसक या रास कहलाता है।

३. भरत मुनिने नृत्य-विधिमें चार प्रकारके आसार (चिह्न) या आसारितका उपदेश किया है, जो क्रमशः इस प्रकार है—पहले नर्तकीका प्रवेश होता है, यह प्रथम आसार है। तदनन्तर आसारित अर्थका अभिनय होता है, जिसे नाट्य कहते हैं, यही उसका दूसरा भेद है। तत्पश्चात् तालका अनुसरण करते हुए जो अङ्गहारण अङ्गविक्षेप ( चमकना, मटकना और हाथ-पैर हिलाना ) होता है, यही तीसरा आसार है। तदनन्तर देवताके चिह्न रूपसे जो नृत्य किया जाता है, वह चौथा आसार है। यहाँ नर्तकीप्रवेश नामक प्रथम आसारके अन्तमें नाट्यके लिये अभिनयकुशल रम्भा खड़ी हुई। उसके द्वारा द्वितीय आसार अर्थात् अभिनय सम्पन्न हो जानेपर शेष दो आसारोंकी पूर्तिके लिये उर्वशी आदिका उपयोग हुआ।

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः ५७५


वसुदेवनन्दन भगवान् कृष्णमें अनुरक्त थीं। उन्होंने अपने गीत, नृत्य एवं उदार अभिनयोंद्वारा सबको संतोष प्रदान करके प्रसन्न कर लिया। नरेश्वर! उस समय श्रीकृष्णकी इच्छासे जलक्रीडामें आयी हुई उन श्रेष्ठ अप्सराओंने उनकी ओरसे पानके बीड़े प्राप्त किये, जो उनके लिये सम्मान-स्वरूप थे॥ ७२ १/२ ॥

फलानि गन्धोत्तमवन्ति वीरा-
श्छालिक्यगान्धर्वमथाहृतं च॥ ७३॥
कृष्णेच्छया च त्रिदिवान्नुदेव
अनुग्रहार्थं भुवि मानुषाणाम्।

नरदेव ! श्रीकृष्णकी इच्छासे मनुष्योंपर अनुग्रह करनेके लिये स्वर्गसे वह छालिक्य गान्धर्व (दिव्य संगीत एवं नृत्य-विशेष ) भूतलपर लाया गया था; साथ ही उत्तम गन्धोंसे युक्त देवयोग्य फल भी यहाँ लाये गये थे। वीर यादवोंने इन सबका रसास्वादन किया ॥ ७३ १/२ ॥

स्थितं च रम्यं हरितेजसेव
प्रयोजयामास स रौक्मिणेयः ॥ ७४॥
छालिक्यगान्धर्वमुदारबुद्धि-
स्तेनैव ताम्बूलमथ प्रयुक्तम्।

वह रमणीय छालिक्य गान्धर्व भगवान् श्रीकृष्णके ही प्रभावसे इस पृथ्वीपर प्रद्युम्न आदिमें प्रतिष्ठित हुआ । उदारबुद्धि रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नने उक्त गान्धर्व-कलाको प्रयोगमें लाकर दिखाया भी था । उन्होंने ही ताम्बूलका प्रयोग किया ॥ ७४ १/२ ॥

प्रयोजितं पञ्चभिरिन्द्रतुल्यै-
श्छालिक्यमिष्टं सततं नराणाम् ॥ ७५॥
शुभावहं वृद्धिकरं प्रशस्तं
मङ्गल्यमेवाथ तथा यशस्यम् ।
पुण्यं च पुष्ट्यभ्युदयावहं च
नारायणस्येष्टमुदारकीर्तेः ॥ ७६॥

इन्द्रतुल्य पराक्रमी पाँच वीरों ( श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और साम्ब) ने यहाँ छालिक्य गान्धर्व-का आयोजन किया था, जो मनुष्योंको सदा ही अभीष्ट है। वह शुभकारक, वृद्धि करनेवाला, प्रशस्त, मङ्गलकारी, यशोवर्द्धक, पुण्यदायक, पुष्टि और अभ्युदयको देनेवाला है । उदारकीर्तिवाले भगवान् नारायणको वह परम प्रिय है ॥ ७५-७६ ॥

जयावहं धर्मभरावहं च
दुःस्वप्ननाशं परिकीर्त्यमानम्।
करोति पापं च तथा विहन्ति
शृण्वन् सुरावासगतो नरेन्द्रः॥ ७७ ॥
छालिक्यगान्धर्वमुदारकीर्ति-
र्मेने किलैकं दिवसं सहस्रम् ।
चतुर्युगानां नृप रेवतोऽथ
ततः प्रवृत्ता च कुमारजातिः ॥ ७८ ॥
गान्धर्वजातिश्च तथापरापि
दीपाद् यथा दीपशतानि राजन्।

उसकी चर्चा करने मात्रसे वह विजयकी प्राप्ति और धर्मका लाभ कराता है । दुःस्वप्नका नाश और पापका निवारण कर देता है । किसी समय देवलोकमें गये हुए उदारकीर्ति राजा रैवतने छालिक्य गान्धर्वको इतनी तन्मयताके साथ सुना था कि उन्हें चार हजार युगोंका समय भी एक दिनके समान ही प्रतीत हुआ । राजन्! उसी छालिक्य गान्धर्वसे कुमारजाति तथा अन्य गान्धर्व जातिकी प्रवृत्ति हुई है। ठीक उसी तरह, जैसे एक दीपकसे सैकड़ों दीपक जल जाते हैं ॥ ७७-७८ १/२ ॥

विवेद कृष्णश्च स नारदश्च
प्रद्युम्नमुख्यैर्नृप भैमुख्यैः ॥ ७९ ॥
विज्ञानमेतद्धि परे यथाव-
दुद्देशमात्राच्च जनास्तु लोके ।
जानन्ति छालिक्यगुणोदयानां
तोयं नदीनामथवा समुद्रः ॥ ८० ॥
ज्ञातुं समर्थो हि महागिरिर्वा
फलाग्रतो वा गुणतोऽथ वापि।
शक्यं न छालिक्यमृते तपोभिः
स्थाने विधानान्यथ मूर्च्छनासु ॥ ८१ ॥

नरेश्वर ! प्रद्युम्न आदि मुख्य-मुख्य यादवोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण और नारदजी ही छालिक्य गुणोदयके इस विज्ञानको यथावत् रूपसे जानते हैं । संसारके दूसरे मनुष्योंको तो इसकी नाम मात्रकी ही जानकारी है। जैसे नदियोंके जलको समुद्र अथवा कोई विशाल पर्वत ही यथार्थ रूपसे जान सकता है, उसी प्रकार भगवान् ही छालिक्यके श्रेष्ठ फल अथवा गुणोंको ठीक-ठीक जानते हैं। तपस्या किये बिना छालिक्य गान्धर्वको तथा उसकी

५७६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

मूर्च्छनाविषयक विधानको नहीं जाना जा सकता । यह कथन सर्वथा उचित ही है ॥ ७९-८१ ॥

षड्ग्रामरागेषु च तन्तु कार्यं
तस्यैकदेशावयवेन राजन् ।
लेशाभिधानां सुकुमारजातिं
निष्ठां सुदुःखेन नराः प्रयान्ति ॥ ८२ ॥

राजन् ! छः ग्रामोंवाले जो राग हैं, उनमें भी छालिक्यका उसके एकदेशीय अवयवके द्वारा गान करना चाहिये । लेश नामक जो छालिक्यकी सुकुमार जाति है, उसका गान करनेवाले मनुष्य भी बड़े दुःखसे ( कठिनाईसे ) उसकी समाप्ति कर पाते हैं ( फिर सम्पूर्ण छालिक्यके गानकी तो बात ही क्या है ? ) ॥ ८२ ॥

छालिक्यगान्धर्वगुणोदयेषु
ये देवगन्धर्वमहर्षिसंघाः ।
निष्ठां प्रयान्तीत्यवगच्छ बुद्ध्या
छालिक्यमेवं मधुसूदनेन ॥ ८३ ॥
भैमोत्तमानां नरदेव दत्तं
लोकस्य चानुग्रहकाम्ययैव ।
गतं प्रतिष्ठाममरोपगेयं
बाला युवानश्च तथैव वृद्धाः ॥ ८४.१॥
क्रीडन्ति भैमाः प्रसवोत्सवेषु
पूर्वं तु बालाः समुदावहन्ति ।
वृद्धाश्च पश्चात् प्रतिमानयन्ति
स्थानेषु नित्यं प्रतिमानयन्ति ॥ ८५ ॥

नरदेव ! जो देवता, गन्धर्व और महर्षियोंके समुदाय हैं, वे ही छालिक्य गान्धर्वके गुणोंके प्रकट करनेकी कलामें पारंगत होते हैं । इस बातको तुम अपनी बुद्धिद्वारा अच्छी तरह जान लो । ऐसा समझकर ही भगवान् मधुसूदनने सम्पूर्ण जगत्‌पर अनुग्रह करनेकी इच्छासे मुख्य यादवोंको छालिक्य गान्धर्वका ज्ञान प्रदान किया था । वह देवताओं-द्वारा गाये जाने योग्य छालिक्य इस प्रकार मनुष्यलोकमें प्रतिष्ठित हुआ है । बालक, युवक और वृद्ध यदुवंशी जन्मोत्सवोंमें उक्त गान्धर्वद्वारा क्रीड़ा या मनोरञ्जन करते थे । पहले बालक उस कलाको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करने लगे । तत्पश्चात् वृद्धलोग भी उसके प्रति आदरका भाव दिखाने लगे; फिर तो सब लोग सदा सभी स्थानोंमें उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ८३—८५ ॥

मर्त्येषु मर्त्यान् यदवोऽतिवीराः
स्ववंशधर्मं समनुस्मरन्तः ।
पुरातनं धर्मविधानतज्ज्ञाः
प्रीतिः प्रमाणं न वयः प्रमाणम् ॥ ८६ ॥

धर्मके विधानको जाननेवाले अत्यन्त वीर यादव अपने पुरातन वंश-धर्मका स्मरण करते हुए मर्त्यलोकमें मनुष्योंको जो सदा सम्मान देते थे, वह इस बातका सूचक है कि प्रेम ही प्रधान एवं महत्त्वकी वस्तु है । अवस्थाका महत्त्व नहीं है ॥ ८६ ॥

प्रीतिप्रमाणानि हि सौहृदानि
प्रीतिं पुरस्कृत्य हि ते दशार्हाः ।
वृष्ण्यन्धकाः पुत्रसखा बभूवु-
र्विसर्जिताः केशिविनाशनेन ॥ ८७ ॥

सौहार्दका मूल आधार है प्रेम । अतः वे दशार्ह, वृष्णि और अन्धक-वंशी यादव पुत्रोंके साथ भी मित्रवत् बर्ताव करते थे । उस उत्सवके बाद भगवान् केशिविनाशन श्रीकृष्णने उन सबको विदा कर दिया ॥ ८७ ॥

स्वर्गं गताश्चाप्सरसां समूहाः
कृत्वा प्रणामं मधुकंसशत्रोः ।
प्रहृष्टरूपस्य सुहृष्टरूपा
बभूव हृष्टः सुरलोकसङ्घः ॥ ८८ ॥

तत्पश्चात् वे अप्सराएँ भी मधु और कंसके शत्रु आनन्दमूर्ति श्रीकृष्णको प्रणाम करके स्वयं भी अत्यन्त हर्षमें मग्न हो स्वर्गलोकको चली गयीं । उस समय देवताओंके समुदायमें हर्ष छा गया ॥ ८८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि भानुमतीहरणे छालिक्यक्रीडावर्णने एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें भानुमतीहरणके प्रसङ्गमें छालिक्यक्रीड़ाका वर्णनविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥

विष्णुपर्व ] नवतितमोऽध्यायः ५७७


नवतितमोऽध्यायः

निकुम्भद्वारा भानुमतीका अपहरण, श्रीकृष्ण, अर्जुन और प्रद्युम्नके साथ उसका युद्ध, गोकर्णतीर्थमें उसका पतन, प्रद्युम्नका भानुमतीको लेकर द्वारका पहुँचाना, फिर तीनोंका निकुम्भके साथ युद्ध, उसकी अद्भुत मायाका वर्णन और श्रीकृष्णद्वारा निकुम्भका वध

वैशम्पायन उवाच
तेषां क्रीडावसक्तानां यदूनां पुण्यकर्मणाम्।
छिद्रमासाद्य दुर्बुद्धिर्देवशत्रुर्दुरासदः ॥ १ ॥
कन्यां भानुमतीं नाम भानोर्दुहितरं नृप।
जहारात्मवधाकाङ्क्षी निकुम्भो नाम दानवः ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! जब पुण्यकर्मा यदुवंशी जलक्रीड़ामे आसक्त हो रहे थे, उसी समय मौका पाकर दुर्जय देवद्रोही दुर्बुद्धि दानव निकुम्भने मानो अपने ही वधकी इच्छासे भानु नामक यादवकी पुत्री भानुमतीका अपहरण कर लिया ॥ १-२ ॥

अन्तर्हितो मोहयित्वा यदूनां प्रमदाजनम् ।
मायावी मायया राजन् पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥ ३ ॥

राजन् ! अदृश्यरूपसे अन्तःपुरमें पहुँचकर मायाद्वारा यादवोंकी स्त्रियोंको मोहित करके उस मायावी दानवने पहलेके वैरको याद रखते हुए ही भानुमतीका अपहरण किया था ॥ ३ ॥

भ्रातुर्हि वज्रनाभस्य तस्य कन्या प्रभावती ।
प्रद्युम्नेन हृता वीर वज्रनाभस्तथा हतः ॥ ४ ॥

वीर नरेश ! उसके भाई वज्रनाभकी एक कन्या थी, जो प्रभावतीके नामसे विख्यात थी । प्रद्युम्नेन उसे हर लिया और वज्रनाभको भी मार डाला ॥ ४ ॥

भानोरेव तथारण्ये वसत्यवचरेण हि।
अस्वाधीने दुराधर्षे छिद्रज्ञो दानवाधमः ॥ ५ ॥

तबसे वह नीच दानव अवसरकी खोजके लिये भानुके ही उपवनमे रहा करता था । भानुका कन्यापुर यद्यपि बड़ा ही दुर्धर्ष था, तथापि उस समय किसी रक्षकके अधीन नहीं था । उसकी इस दुर्बलताको दानवाधम निकुम्भ जानता था; ( इसलिये उसे कन्याको हर लेनेका अवसर मिल गया )॥५॥

कन्यापुरे महानादः सहसा समुपस्थितः।
तस्यां ह्रियन्त्यां कन्यायां रुदन्त्यां समितिंजय ॥ ६ ॥

शत्रुविजयी नरेश ! जब उस भानुकुमारीका अपहरण होने लगा और वह रोने-चिल्लाने लगी, उस समय सहसा कन्यापुरमे बड़े जोरसे कोलाहल मच गया ॥ ६ ॥

वसुदेवाहुकौ वीरौ दंशितौ निर्गतावुभौ ।
आर्तनादमुपश्रुत्य भानोः कन्यापुरे तदा ॥ ७ ॥

भानुके कन्यापुरमे होनेवाले आर्तनादको सुनकर वीर वसुदेव और उग्रसेन दोनों कवच धारण करके तत्काल बाहर निकले ॥ ७ ॥

न दृष्टिगोचरे तौ तु ददृशातेऽपकारिणम् ।
तथैव दंशितौ यातौ यत्र कृष्णो महाबलः ॥ ८ ॥

परंतु जहाँतक उनकी दृष्टि गयी, वहाँतक किसी अपराधीको उन्होंने नहीं देखा; फिर वे दोनों उसी तरह कवच बाँधे उस स्थानपर गये, जहाँ महाबली श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ ८ ॥

श्रुतार्थः स्वं विमानं तदारुरोह जनार्दनः ।
पार्थेन सहितस्तार्क्ष्यं नागशत्रुमरिंदमः ॥ ९ ॥

उनके मुखसे द्वारकापुरका सब समाचार सुनकर शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीकृष्ण उस समय अर्जुनके साथ अपने वाहन सर्पशत्रु गरुड़पर आरूढ़ हुए ॥ ९ ॥

रथी त्वमनुगच्छेति संदिश्य मकरध्वजम् ।
त्वरेति गरुडं वीरः संदिदेश च काश्यपम् ॥ १० ॥

फिर वे वीर श्रीकृष्ण प्रद्युम्नको यह आदेश देकर कि तुम रथपर बैठकर मेरे साथ आओ, कश्यपनन्दन गरुड़से बोले, शीघ्रता करो ॥ १० ॥

वज्रं नगरमायान्तं निकुम्भं रणदुर्जयम् ।
पार्थकृष्णौ महात्मानावासेदतूररिंदमौ ॥ ११ ॥

वज्र नामक नगरकी ओर जाते हुए रणदुर्जय निकुम्भको शत्रुओंका दमन करनेवाले महात्मा अर्जुन और श्रीकृष्णने रास्तेमे ही पा लिया ॥ ११ ॥

प्रद्युम्नश्च महातेजा मायिनां प्रवरो नृप ।
निकुम्भश्चाथ तान् दृष्ट्वा त्रिधाऽऽत्मानमथाकरोत् ॥१२॥

नरेश्वर ! मायावियोंमे श्रेष्ठ महातेजस्वी प्रद्युम्न भी उसके पास जा पहुँचे । निकुम्भने उन तीनोंको देखकर अपने तीन रूप बना लिये ॥ १२ ॥

तान् सर्वान् योधयामास निकुम्भः प्रहसन्निव ।
बहुकण्टकगुर्वीभिर्गदाभिरमरोपमः ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् देवोपम वीरे निकुम्भ अनेक काँटोंसे भरी हुई भारी गदाके द्वारा उन सबके साथ हँसता हुआ-सा युद्ध करने लगा ॥ १३ ॥

सव्येनालम्ब्य हस्तेन कन्यां भानुमतीं नृप ।
दक्षिणेनाथ हस्तेन गदया प्राहरत् पुनः ॥ १४ ॥

नरेश्वर ! बाये हाथसे यादवकन्या भानुमतीको पकड़कर


म० ह० १९.-

५७८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

( उसे ढालकी भाँति सामने रखकर ) वह दाहिने हाथसे बारंबार गदाका प्रहार करता था ॥ १४ ॥

कन्यार्थं न च कृष्णौ वा कामो वा नृपसत्तम ।
निर्दयं प्रहरन्ति स्म निकुम्भे च महासुरे ॥ १५ ॥

नृपश्रेष्ठ ! कन्याकी रक्षाके लिये ही श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा प्रद्युम्न उस निकुम्भ नामक महान् असुरपर निर्दयतापूर्वक प्रहार नहीं करते थे ॥ १५ ॥

समर्थास्ते महात्मानः शत्रुं हन्तुं दुरासदाः ।
निश्श्वसुर्नरपते दयाभारावपीडिताः ॥ १६ ॥

महाराज ! वे दुर्जय महात्मा उस शत्रु्का वध करनेमें सर्वथा समर्थ थे तो भी दयाके भारसे दबे होनेके कारण वे निःश्वास लेकर रह जाते थे ॥ १६ ॥

श्रेष्ठो धनुष्मतां पार्थः सर्वथा कुशलो युधि ।
नागोष्ट्रविधिना दैत्यं शरपङ्क्त्या जघान ह ॥ १७ ॥

धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन युद्धमें सर्वथा कुशल थे; अतः वे नागोष्ट्र-विधिसे अपने बाणसमूहद्वारा उस दैत्यको घायल करने लगे ॥ १७ ॥

ते तु वैतस्तिकैर्बाणैर्विविधान् दानवान् युधि ।
न कन्यां कलया युक्त्या शिक्षया च महीपते ॥ १८ ॥

पृथ्वीनाथ ! वे श्रीकृष्ण आदि वीर अपनी कला, युक्ति और शिक्षाके प्रभावसे एक-एक बित्तेके बाणोंद्वारा नाना प्रकारके दानवोंको उस युद्धमें घायल करते थे; किंतु राजकन्याको चोट नहीं लगने देते थे ॥ १८ ॥

ततः स कन्यया सार्द्धं तत्रैवान्तरधीयत ।
आसुरीमाश्रितो मायां न च तां वेत्ति कश्चन ॥ १९ ॥

तब वह आसुरी मायाका आश्रय लेकर कन्याके साथ वहीं अन्तर्धान हो गया । उस मायाको उन तीनोंमेंसे कोई नहीं जानता था ॥ १९ ॥

तं कृष्णौ रौक्मिणेयश्च पृष्ठतोऽनुययुस्तदा ।
हारितः शकुनो भूत्वा तस्थावथ महासुरः ॥ २० ॥

श्रीकृष्ण, अर्जुन और प्रद्युम्न तीनोंने ही तत्काल उस दानवका पीछा किया । आगे जाकर वह महान् असुर हारित पक्षी होकर बैठ गया ॥ २० ॥

तं बाणैः पुनरेवाथ वीरो भूयो धनंजयः ।
वैतस्तिकैर्मर्मभिद्भिः कन्यां रक्षन्नताडयत् ॥ २१ ॥

तब वीर धनंजयने पुनः कन्याकी रक्षा करते हुए वैतस्तिक नामक मर्मभेदी बाणोंद्वारा उस दैत्यपर प्रहार किया ॥

स इमां पृथिवीं कृत्स्नां सप्तद्वीपां महासुरः ।
बभ्रामानुगतश्चैव तैर्वीरैररिमर्दनः ॥ २२ ॥

तब वह शत्रुसूदन महान् असुर इस सात द्वीपोंसे युक्त सारी पृथ्वीपर चक्कर लगाने लगा और वे तीनों वीर निरन्तर उसका पीछा करते रहे ॥ २२ ॥

गोकर्णस्योपरिष्टात्तु पर्वतस्य महासुरः ।
पपात वेलां गङ्गायाः पुलिने सह कन्यया ॥ २३ ॥

वह महान् असुर जब गोकर्ण पर्वतके ऊपरसे होकर निकलने लगा, उस समय कन्यासहित गङ्गातीरपर समुद्रके किनारे गिर पड़ा ॥ २३ ॥

न देवा नासुराश्चापि लङ्घयन्ति तपोधनाः ।
गोकर्णं तेजसा गुप्तं महादेवस्य भारत ॥ २४ ॥

भरतनन्दन ! गोकर्ण पर्वत महादेवजीके तेजसे सुरक्षित है । उसे देवता, असुर तथा तपोधन महर्षि भी नहीं लाँघ सकते हैं ॥ २४ ॥

एतदन्तरमासाद्य प्रद्युम्नः शीघ्रविक्रमः ।
कन्यां भानुमतीं भैमो जग्राह रणदुर्जयः ॥ २५ ॥

यह अवसर पाकर भीमकुलभूषण शीघ्रपराक्रमी रणदुर्जय वीर प्रद्युम्नने उस कन्या भानुमतीको अपने साथ ले लिया २५

असुरः सोऽर्दितो राजन् कृष्णाभ्यां निशितैः शरैः ।
त्यक्त्वाथोत्तरगोकर्णं निकुम्भो दक्षिणां दिशम् ।
जगाम पृष्ठतो यातौ कृष्णौ तार्क्यगतौ तदा ॥ २६ ॥

राजन् ! श्रीकृष्ण और अर्जुनद्वारा तीखे बाणोंसे पीड़ित किया गया असुर निकुम्भ उत्तर गोकर्णको त्यागकर दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया । गरुड़पर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन भी उस समय उसके पीछे-पीछे गये ॥ २६ ॥

विवेश षट्पुरं चैव ज्ञातीनामालयं तदा ।
तत्र वीरौ गुहाद्वारि कृष्णौ रात्रौ तदोपतुः ॥ २७ ॥

निकुम्भ अपने सजातीय बन्धुओंके निवासस्थान षट्पुरमें जा घुसा । श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों वीर रातमें वहाँ गुफाके द्वारपर बैठे रहे ॥ २७ ॥

रौक्मिणेयोऽपि कृष्णेन संदिष्टो द्वारकां पुरीम् ।
अनयद् भानुतनयां प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ २८ ॥

श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने प्रसन्नमनसे भानुकुमारी भानुमतीको द्वारकापुरीमें पहुँचा दिया २८

नयित्वा चाययौ वीरः षट्पुरं दानवाकुलम् ।
ददर्श च गुहाद्वारि कृष्णौ भीमपराक्रमौ ॥ २९ ॥

उसे पहुँचाकर वीर प्रद्युम्न पुनः दानवोंसे भरे हुए षट्पुरमें आये और वहाँ गुफाके द्वारपर भयंकर पराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुनसे मिले ॥ २९ ॥


१. नागोष्ट्रका अर्थ है सर्प और ऊँट । किसी वनमें एक ऊँटके शरीरपर अजगर सर्प लिपट गया था । यह देख किसी धनुर्धर वीरने अपना अस्त्र-लाघव दिखाते हुए ऐसा बाण मारा, जिससे अजगर तो मारा गया, किंतु ऊँट बाल-बाल बच गया । यही नागोष्ट्र-विधि है । ये अर्जुन आदि वीर अपने बाणोंसे दैत्यको घायल करते थे, किंतु कन्याके शरीरपर आंच नहीं आने देते थे ।

विष्णु पर्व ]नवतितमोऽध्यायः५७९

उषतुर्द्वारमाक्रम्य षट्पुरस्य महाबलौ ।
कृष्णौ प्रद्युम्नसहितौ निकुम्भवधकाङ्क्षिणौ ॥ ३० ॥

निकुम्भके वधकी इच्छा रखनेवाले महाबली श्रीकृष्ण और अर्जुन प्रद्युम्नके साथ षट्पुरका दरवाजा घेरकर बैठे थे॥

ततोऽन्तरमेतस्माद् बिलादतिबलस्तदा ।
निर्जगाम बली योद्धुं निकुम्भो भीमविक्रमः ॥ ३१ ॥

तदनन्तर भयंकर पराक्रमी अत्यन्त बलशाली बली निकुम्भ युद्धके लिये उस बिलसे बाहर निकला ॥ ३१ ॥

तस्य निर्गच्छतस्तस्माद् बिलात्पार्थो विशाम्पते ।
रुरोध सर्वतो मार्गं शरैर्गाण्डीवनिःसृतैः ॥ ३२ ॥

प्रजानाथ ! उस बिलसे निकलते समय निकुम्भके मार्गको अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा चारो ओरसे अवरुद्ध कर दिया ॥ ३२ ॥

सोऽभिसृत्य गदां घोरामुद्यम्य बहुकण्टकाम् ।
शिरस्यताडयत् पार्थं निकुम्भो बलिनां वरः ॥ ३३ ॥

तब बलवानोंमें श्रेष्ठ निकुम्भने निकट आकर बहुतेरे कण्टकोंसे भरी हुई अपनी भयानक गदाको उठाकर अर्जुनके मस्तकपर दे मारा ॥ ३३ ॥

अदृष्टेनाहतो वीरः शिरस्यथ मुमोह सः ।
गदयाभिहते पार्थे रक्तं वमति मुह्यति ॥ ३४ ॥
हसित्वा सोऽसुरो दृप्तो रौक्मिणेयमताडयत् ।
तं प्राङ्मुखमुखं वीरं मायावी मायिनां वरम् ।
अदृष्टेनाहतो वीरः शिरस्यथ मुमोह सः ॥ ३५ ॥

उसने अदृश्य रहकर यह आघात किया था । सिरपर गदाकी चोट पड़नेसे वीर अर्जुन मूर्च्छित हो गये । वे रक्त वमन करते हुए जब अचेत हो गये, तब उस घमंडी एवं मायावी असुरने हँसकर मायावियोंमें श्रेष्ठ वीर रुक्मिणी-कुमारको चोट पहुँचायी। वे पूर्वाभिमुख होकर खड़े थे; अतः उस असुरको उन्होंने देखा नहीं था । उस अदृश्य असुरके द्वारा सिरपर आघात होनेसे वीर प्रद्युम्नको भी मूर्च्छा आ गयी ॥ ३४-३५ ॥

तथागतौ तु दृष्ट्वा तौ मुह्यमानौ क्षतादितौ ।
अभिदुद्राव गोविन्दो निकुम्भं क्रोधमूर्च्छितः ॥ ३६ ॥
कौमोदकीं समुद्यम्य गदपूर्वोद्भवो गदाम् ।

भारी आघातसे पीड़ित हो अचेत पड़े हुए उन दोनों वीरोंको देखकर भगवान् श्रीकृष्णका क्रोध बहुत बढ़ गया और वे गदके बड़े भाई गोविन्द कौमोदकी गदा उठाकर निकुम्भकी ओर दौड़े ॥ ३६३ ॥

तावन्योन्यं दुराधर्षौ गर्जन्तावभिपेततुः ॥ ३७ ॥
ऐरावतगतः शक्रः सर्वैर्देवगणैः सह ।
ददर्श तन्महायुद्धं घोरं देवासुरं तदा ॥ ३८ ॥

वे दोनों दुर्धर्ष वीर गर्जना करते हुए एक-दूसरेपर टूट पड़े । ऐरावतपर बैठे हुए इन्द्र समस्त देवताओंके साथ आकर उस समय देवताओं और असुरोंके उस घोर महायुद्धको देखने लगे ॥ ३७-३८ ॥

दृष्ट्वा देवान् हृषीकेशश्चित्रैर्युद्धैररिंदमः ।
इयेष दानवं हन्तुं देवानां हितकाम्यया ॥ ३९ ॥

देवताओंको देखकर शत्रुओंका दमन करनेवाले श्रीकृष्णने उनके हितकी कामनासे विचित्र युद्धोंद्वारा उस दानवको मार डालनेकी इच्छा की ॥ ३९ ॥

स मण्डलानि चित्राणि दर्शयामास केशवः ।
कौमोदकीं महाबाहुर्लालयन् युद्धकोविदः ॥ ४० ॥

युद्धकलाकोविद महाबाहु श्रीकृष्ण अपनी कौमोदकी गदाका लालन करते हुए विचित्र मण्डल (पैंतरे) दिखाने लगे ॥ ४० ॥

तथैवासुरमुख्योधपि गदां तां बहुकण्टकाम् ।
शिक्षया भ्रामयाणोऽथ मण्डलानि चचार ह ॥ ४१ ॥

इसी प्रकार असुरोंमें श्रेष्ठ निकुम्भ भी अपनी बहुत-से कण्टकोंवाली गदाको शिक्षाके अनुसार घुमाता हुआ पैंतरे दिखाने लगा ॥ ४१ ॥

वृषभाविव गर्जन्तौ वृहन्ताविव कुञ्जरौ ।
दृषितान्तरमासाद्य क्रुद्धौ शालावृकाविव ॥ ४२ ॥

जैसे वासिता-मैथुनकी इच्छावाली गायको अपने बीचमें पाकर दो साँड़ हेंकड़ते हुए आपसमें लड़ते हैं; जैसे वासिता हथिनीके लिये दो हाथी चिग्घाड़ते हुए परस्पर युद्ध करते हैं तथा जैसे दो भेड़िये किसी माँदा भेड़ियाके लिये परस्पर जूझते हैं, उसी प्रकार वे श्रीकृष्ण और निकुम्भ क्रोधमें भरकर एक दूसरेसे भिड़े हुए थे ॥ ४२ ॥

आजघान निकुम्भस्तु गदया गदपूर्वजम् ।
स्पष्टाष्टघण्टया वीर नादं मुक्त्वातिदारुणम् ॥ ४३ ॥

वीर नरेश ! निकुम्भने अत्यन्त भयंकर सिंहनाद करके जिसमें आठ घण्टियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं, ऐसी गदाके द्वारा भगवान् गदाग्रजपर आघात किया ॥ ४३ ॥

तत्कालमेव कृष्णोऽपि भ्रामयित्वा महागदाम् ।
निकुम्भमूर्धनि तदा पातयामास भारत ॥ ४४ ॥

भरतनन्दन ! भगवान् श्रीकृष्णने तत्काल ही अपनी विशाल गदा घुमाकर उस समय निकुम्भके मस्तकपर दे मारी ॥ ४४ ॥

• अवष्टभ्य मुहूर्त्तं तु हरिः कौमोदकीं गदाम् ।
तस्थौ जगद्गुरुर्धीमान् सुमोह पतितः क्षितौ ॥ ४५ ॥

उस समय बुद्धिमान् जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण दो घड़ी-तक कौमोदकी गदाको थामे हुए खड़े रहे । तत्पश्चात् (अपनी ही इच्छासे) मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४५ ॥

५८० | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

हाहाभूतं जगत् सर्वं तत्कालमभवत् तदा ।
तथागते वासुदेवे नरदेव महात्मनि ॥ ४६ ॥
नरदेव ! उस समय महात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी वैसी अवस्था हो जानेपर तत्काल सारे जगत्‌में हाहाकार मच गया ॥ ४६ ॥

आकाशगङ्गातोयेन शीतेन च सुगन्धिना ।
सिषेचामृतमिश्रेण कृष्णं देवेश्वरः स्वयम् ॥ ४७ ॥
स्वयं देवेश्वर इन्द्रने अमृतमिश्रित आकाशगङ्गाके शीतल एवं सुगन्धित जलसे श्रीकृष्णका अभिषेक किया ॥ ४७ ॥

नूनमात्मेच्छया कृष्णस्तथा चक्रे सुरोत्तमः ।
को हि शक्तो महात्मानं युद्धे मोहयितुं हरिम् ॥ ४८ ॥
निश्चय ही सुरश्रेष्ठ श्रीकृष्णने अपनी इच्छासे ही ऐसा (मूर्च्छाका अभिनय) किया था; अन्यथा युद्धमें उन महात्मा श्रीहरिको मूर्च्छित कर देनेकी शक्ति किसमें है ? ॥ ४८ ॥

कृष्णः प्रत्यागतप्राणश्चक्रमुद्यम्य भारत ।
प्रतीच्छेति दुरात्मानमुवाच रिपुनाशनः ॥ ४९ ॥
भारत ! सचेत होनेपर शत्रुनाशन श्रीकृष्णने चक्र उठाकर उस दुरात्मासे कहा—‘अरे ! अब इस चक्रकी चोट सहन कर’ ॥ ४९ ॥

निकुम्भोऽप्यतिमायावी उत्पपात दुरासदः ।
शरीरं तत् परित्यज्य न तु तं वेत्ति केशवः ॥ ५० ॥
उनकी यह बात सुनकर अत्यन्त मायावी दुर्जय वीर निकुम्भ भी अपने उस शरीरको वहीं त्यागकर ऊपरकी ओर उड़ गया । श्रीकृष्णको उसकी इस चालका पता न लगा ॥ ५० ॥

मुमूर्षति मृतो वायमिति मत्वा जनार्दनः ।
ररक्ष स्मरमाणोऽथ वीरो वीरव्रतं विभो ॥ ५१ ॥
प्रभो ! यह मरना चाहता है अथवा मर गया है—ऐसा समझकर वीर-व्रतका स्मरण रखते हुए वीर जनार्दनने उसकी रक्षा की (गिरे हुए उस दानवके शरीरपर अपना अस्त्र नहीं चलाया) ॥ ५१ ॥

अथ प्रद्युम्नकौन्तेयावागतौ लब्धचेतनौ ।
स्थितौ नारायणाभ्याशे निकुम्भवधनिश्चितौ ॥ ५२ ॥
तदनन्तर प्रद्युम्न और अर्जुन दोनों सचेत हो श्रीकृष्णके निकट आकर खड़े हो गये । उन दोनोंने निकुम्भके वधका निश्चय कर लिया था ॥ ५२ ॥

प्रद्युम्नोऽप्यथ मायावी विदितः कृष्णमब्रवीत् ।
निकुम्भस्तात नास्त्यत्र गतः क्वापि सुदुर्मतिः ॥ ५३ ॥
प्रद्युम्न भी मायावी थे; अतः उन्होंने निकुम्भकी मायाको पहचान लिया और श्रीकृष्णसे कहा—‘तात ! निकुम्भ यहाँ नहीं है । वह दुर्बुद्धि कहीं चला गया’ ॥ ५३ ॥


प्रद्युम्नेनैवमुक्ते तु तन्ननाश कलेवरम् ।
प्रजहासाथ भगवानर्जुनेन सह प्रभुः ॥ ५४ ॥
प्रद्युम्नके इतना कहते ही निकुम्भका वह कलेवर अदृश्य हो गया । यह देख अर्जुनके साथ भगवान् श्रीकृष्ण जोर-जोरसे हँसने लगे ॥ ५४ ॥

तदायुतसहस्राणि निकुम्भानां जनाधिप ।
ददृशुस्ते ततो वीराः क्षितौ दिवि च सर्वतः ॥ ५५ ॥
नरेश्वर ! इतनेहीमें उन वीरोंने पृथ्वीपर, आकाशमें तथा सब ओर सहस्रों अयुत (एक करोड़) निकुम्भके शरीर देखे ॥ ५५ ॥

सहस्राण्येव कृष्णं तु तथा पार्थमरिंदम ।
रौक्मिणेयं तथा वीरं तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ५६ ॥
शत्रुदमन नरेश ! श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा रुक्मिणीकुमार वीर प्रद्युम्नके भी सहस्रों शरीर दिखायी दिये । वह अद्भुत-सा दृश्य प्रकट हुआ ॥ ५६ ॥

पाण्डवस्य धनुः केचित्केचिदस्य महाशरान् ।
अन्येऽस्य जगृहुर्हस्तावन्थे पादौ महासुराः ॥ ५७ ॥
किन्हीं महान् असुरोंने अर्जुनका धनुष ले लिया, किन्हींने उनके बड़े-बड़े बाण छीन लिये, दूसरोंने उनके दोनों हाथ पकड़ लिये और अन्य असुरोंने उनके दोनों पैर ॥

एवं गृहाय तं वीरमगमंस्ते विहायसि ।
पार्थानामपि कोट्यस्तु गृहीतानां तदाभवन् ॥ ५८ ॥
इस तरह वीर अर्जुनको पकड़कर वे सब आकाशमें ले गये; फिर उन असुरोंद्वारा पकड़े गये अर्जुनके करोड़ों रूप हो गये ॥ ५८ ॥

नान्तं ददर्श कृष्णश्च कार्ष्णिश्च रिपुनाशनौ ।
विच्छिद्य तौ शरैर्वीरौ निकुम्भं पार्थवर्जितौ ॥ ५९ ॥
शत्रुओंका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण और प्रद्युम्न दोनों वीरोंने पार्थसे रहित हो अपने बाणोंसे निकुम्भको काट डाला तो भी उसका अन्त होता नहीं देखा ॥ ५९ ॥

एकैकस्तु द्विधा च्छिन्नो द्वेधा भवति भारत ।
दिव्यज्ञानस्तदा कृष्णो भगवाननुदष्टवान् ॥ ६० ॥
भारत ! एक-एक निकुम्भके दो टुकड़े कर देनेपर वह एकसे दो रूप धारण कर लेता था । उस समय दिव्य-ज्ञानसम्पन्न भगवान् श्रीकृष्णने बारंबार उसके विषयमें विचार किया ॥ ६० ॥

निकुम्भं तत्त्वतश्चापि ददर्श मधुसूदनः ।
स्रष्टारं सर्वमायानां हर्त्तारं फाल्गुनस्य च ॥ ६१ ॥
तब भगवान् मधुसूदनने सम्पूर्ण मायाओंके स्रष्टा तथा अर्जुनका अपहरण करनेवाले निकुम्भको यथार्थ रूपसे देखा ॥

विष्णुपूर्व ] नवतितमोऽध्यायः ५८१


स चक्रेण शिरस्तस्य चकर्त्तासुरसूदनः ।
पश्यतां सर्वभूतानां भूतभव्यभवो हरिः ॥ ६२ ॥

भूत, वर्तमान और भविष्यको उत्पन्न करनेवाले असुरसूदन श्रीहरिने समस्त प्राणियोंके देखते-देखते अपने चक्रसे निकुम्भका सिर काट लिया ॥ ६२ ॥

स मुक्त्वा फाल्गुनं राजञ्छिन्ने शिरसि भारत ।
पपातासुरमुख्योऽथ च्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ ६३ ॥

राजन् ! भरतनन्दन ! सिर कट जानेपर वह मुख्य असुर अर्जुनको छोड़कर जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ६३ ॥

अथाकाशगतं पार्थं पतमानं विहायसः ।
कृष्णवाक्येन जग्राह कार्ष्णिर्वियति मानद ॥ ६४ ॥

मानद ! उस समय श्रीकृष्णकी आज्ञासे प्रद्युम्नने आकाशमें पहुँचकर वहाँसे गिरते हुए अर्जुनको पकड़ लिया ॥

निकुम्भे पतिते भूमौ समाश्वास्य धनंजयम् ।
जगाम द्वारकां देवः पार्थकामसमन्वितः ॥ ६५ ॥

निकुम्भके धराशायी हो जानेपर अर्जुनको आश्वासन दे उनके और प्रद्युम्नके साथ भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकाको चले गये ॥ ६५ ॥

समियाय दशार्होऽथ द्वारकां मुदितो विभुः ।
नारदं च महात्मानं ववन्दे यदुनन्दनः ॥ ६६ ॥

दशार्हवंशी यदुकुलनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने बड़ी प्रसन्नताके साथ द्वारकामें पदार्पण किया और वहाँ महात्मा नारदजीको मस्तक झुकाया ॥ ६६ ॥

नारदोऽथ महातेजा भानुं यादवमब्रवीत् ।
भानो मा कार्षीर्मन्युं त्वं श्रूयतां भैमनन्दन ॥ ६७ ॥

तदनन्तर महातेजस्वी नारदजीने भानु नामक यादवसे कहा—"भैमनन्दन ! भानो ! कन्याका अपहरण होनेके कारण मनमें खेद न करो । मेरी बात सुनो ॥ ६७ ॥

क्रीडन्त्या रैवतोद्याने दुर्वासाः कोपितोऽनया ।
स शशाप ततो रोषान्मुनिर्दुहितरं तव ॥ ६८ ॥

"यह भानुमती किसी दिन रैवतवनके उद्यानमें खेल रही थी । वहाँ इसने दुर्वासा मुनिको क्रोध दिला दिया । तब मुनिने क्रोधवश आपकी पुत्रीको शाप दे दिया—॥ ६८ ॥

अतिदुर्ललितैः कन्या शत्रुहस्तं गमिष्यति ।
सुतार्थे ते मया सार्द्धं मुनिभिः स प्रसादितः ॥ ६९ ॥
बालां व्रतवतीं कन्यामनागसमिमां मुने ।
शप्तवानसि धर्मज्ञ कथं धर्मभृतां वर ।
अनुग्रहं विधत्स्वात्र वयं विज्ञापयामहे ॥ ७० ॥

"यह कन्या अपनी दुर्ललित चेष्टाओंसे शत्रुके हाथमें पड़ जायगी ।' उस समय मैंने तथा दूसरे मुनियोंने आपकी इस पुत्रीके लिये दुर्वासाको प्रसन्न किया और कहा--'मुने ! यह बाला ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाली कन्या है । इसने आपका कोई अपराध भी नहीं किया है; फिर आपने इसे कैसे शाप दे दिया ? धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मज्ञ महर्षे ! इस कन्यापर अनुग्रह कीजिये । इसके लिये हमलोग यहाँ प्रार्थना करते हैं' ॥ ६९-७० ॥

अस्माभिरेवमुक्तस्तु दुर्वासा भैमनन्दन ।
उवाचाधोमुखो भूत्वा मुहूर्तं कृपयान्वितः ॥ ७१ ॥

"भैमनन्दन ! हमारे ऐसा कहनेपर दुर्वासाजी नीचे मुँह किये दो घड़ीतक मौन रहे; फिर दयापूर्वक बोले--॥ ७१ ॥

यदवोचमहं वाक्यं तत् तथा न तदन्यथा ।
रिपुहस्तमवश्या हि गमिष्यति न संशयः ॥ ७२ ॥
अदूषिता तु धर्मेण भर्तारमुपलप्स्यति ।
बहुपुत्रा बहुधना सुभगा च भविष्यति ॥ ७३ ॥

" 'महर्षियो ! मैंने जो बात कही है, वह उसी तरह होगी । उसे कोई बदल नहीं सकता । यह शत्रुके हाथमें अवश्य पड़ेगी, इसमें संशय नहीं है; परंतु यह भी निश्चय है कि यह दूषित नहीं होने पायगी और धर्मके अनुसार पतिको प्राप्त करेगी । इसके बहुत-से पुत्र होंगे । यह बहुत धनसे सम्पन्न और सौभाग्यवती होगी ॥ ७२-७३ ॥

सुगन्धगन्धा च सदा कुमारी च पुनः पुनः ।
न च शोकमिमं घोरं तन्वङ्गी धारयिष्यति ॥ ७४ ॥

" 'इसके शरीरकी गन्ध सदा सुगन्धित होगी । यह पति-समागमकै पश्चात् बारंबार कुमारी ही बनी रहेगी । इस कृशाङ्गी कन्याको अपने अपहरणजनित घोर शोकका स्मरण नहीं रहेगा' ॥ ७४ ॥

एवं भानुमती वीर सहदेवाय दीयताम् ।
श्रद्दधानः स शूरश्च धर्मशीलश्च पाण्डवः ॥ ७५ ॥

"वीर भानो ! तुम मेरी बात मानकर भानुमतीका सहदेवके साथ ब्याह कर दो; क्योंकि पाण्डुपुत्र सहदेव श्रद्धालु, शूरवीर तथा धर्मशील हैं" ॥ ७५ ॥

ततो भानुमतीं भानुर्ददौ माद्रीसुताय वै ।
सहदेवाय धर्मात्मा नारदस्य वचः स्मरन् ॥ ७६ ॥

तदनन्तर नारदजीके वचनोंको याद रखते हुए धर्मात्मा भानुने अपनी कन्या भानुमती माद्रीकुमार सहदेवको दे दी ॥

आनीतः सहदेवश्च प्रेषितश्चक्रपाणिना ।
विवाहे च तदा वृत्ते सभार्यः स पुरीं गतः ॥ ७७ ॥

चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्णने सहदेवको बुलवाया और उस समय विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर उन्हें पत्नीसहित विदा कर दिया, फिर वे अपनी पुरीको चले गये ॥ ७७ ॥

इमं कृष्णस्य विजयं यः पठेच्छृणुयादथ ।

५८२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

विजयं सर्वकृत्येषु श्रद्दधानो लभेन्नरः ॥ ७८ ॥
जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भगवान् श्रीकृष्णकी इस विजय-वार्ताको पढ़ेगा या सुनेगा, वह सभी कार्योंमें विजय प्राप्त करेगा ॥ ७८ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि भानुमतीहरणे निकुम्भवधो नाम नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें भानुमतीहरणके प्रसङ्गमें निकुम्भका वधविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥


एकनवतितमोऽध्यायः

वज्रनाभकी तपस्या और वरप्राप्ति, उसका त्रिभुवन-विजयके लिये उद्योग, इन्द्रकी श्रीकृष्णसे वार्ता, भद्रनामा नटको मुनियोंका वरदान, इन्द्रका हंसोंको आवश्यक कर्तव्य बताकर वज्रनाभपुरमें भेजना

जनमेजय उवाच

भानुमत्यापहरणं विजयं केशवस्य च ।
छालिक्यनयनं चैव देवलोकान्महामुने ॥ १ ॥
क्रीडां च सागरे दिव्यां वृष्णीनाममितौजसाम् ।
अश्रौषं परमाश्चर्यं मुने धर्मभृतां वर ॥ २ ॥

**जनमेजयन कहा—**धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महामुने ! भानुमतीका अपहरण, श्रीकृष्णकी विजय, देवलोकसे छालिक्य गान्धर्वका आनयन और अत्यन्त तेजस्वी वृष्णिवंशियोंकी समुद्रमें होनेवाली दिव्यक्रीड़ा—इन सबका अत्यन्त आश्चर्य-युक्त वर्णन मैंने सुना है ॥ १-२ ॥

वज्रनाभवधो ह्युक्तो निकुम्भवधकीर्तने ।
तन्मे कौतूहलं श्रोतुं प्रसादाद् भवतो मुने ॥ ३ ॥

मुने ! निकुम्भ-वधका वर्णन करते समय आपने वज्रनाभके वधकी भी चर्चा की है। आपकी कृपासे उसे सुननेके लिये मेरे मनमें कौतूहल हो रहा है ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

हन्त ते वर्तयिष्यामि वज्रनाभवधं नृप ।
विजयं चैव कामस्य साम्बस्यैव च भारत ॥ ४ ॥

**वैशम्पायनजीने कहा—**नरेश्वर ! भरतनन्दन ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें वज्रनाभके वधका वृत्तान्त बताऊँगा । साथ ही प्रद्युम्न और साम्बकी विजयका भी वर्णन करूँगा ॥ ४ ॥

मेरोः सानौ नरपते तपश्चक्रे महासुरः ।
वज्रनाभ इति ख्यातो निश्चितः समितिंजयः ॥ ५ ॥

नरेन्द्र ! वज्रनाभ नामसे विख्यात महान् असुर निश्चय ही युद्धमें विजय पानेवाला था । एक समय उसने मेरुपर्वतके शिखरपर बड़ी भारी तपस्या की ॥ ५ ॥

तस्य तुष्टो महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः ।
वरेण च्छन्दयामास तपसा परितोषितः ॥ ६ ॥

उसकी तपस्यासे महातेजस्वी लोकपितामह ब्रह्माजी बहुत संतुष्ट हुए । उन्होंने प्रसन्न होकर उससे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ॥ ६ ॥

अवध्यत्वं स देवेभ्यो वव्रे दानवसत्तमः ।
पुरं वज्रपुरं चापि सर्वरत्नमयं शुभम् ॥ ७ ॥

तब उस श्रेष्ठ दानवने देवताओंसे अवध्य होनेका वर माँगा; साथ ही सम्पूर्ण रत्नोंके बने हुए सुन्दर वज्रपुर नामक नगरकी भी याचना की ॥ ७ ॥

स्वच्छन्देन प्रवेशश्च न वायोरपि भारत ।
अचिन्तितेन कामानामुपपत्तिर्नराधिप ॥ ८ ॥

भारत ! उस नगरमें स्वच्छन्दतापूर्वक वायुका भी प्रवेश नहीं होता था । नरेश्वर ! बिना चिन्तन किये ही वहाँ सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंकी प्राप्ति होती रहती थी ॥ ८ ॥

शाखानगरमुख्यानां संवाहानां शतानि च ।
नगरस्याप्रमेयस्य समन्ताज्जनमेजय ॥ ९ ॥

जनमेजय ! उस अप्रमेय नगरके चारों ओर शाखा-नगरोंके मुख्य-मुख्य सैकड़ों उद्यान शोभा पाते थे, जो चहारदीवारियोंसे घिरे हुए थे ॥ ९ ॥

तथा तदभवत् तस्य वरदानेन भारत ।
उवास वज्रनगरे वज्रनाभो महासुरः ॥ १० ॥

भारत ! उसको मिले हुए वरदानसे ही वह नगर उस रूपमें प्रतिष्ठित हुआ था । महान् असुर वज्रनाभ उस वज्र-नगरमें निवास करता था ॥ १० ॥

कोटिशो वरलब्धं तमसुराः परिवार्य ते ।
ऊषुर्वज्रपुरे राजन् संवाहेषु तथैव च ॥ ११ ॥
शाखानगरमुख्येषु रम्येषु च नराधिप ।
हृष्टपुष्टप्रमुदिता नृप देवस्य शत्रवः ॥ १२ ॥

राजन् ! वर पाये हुए वज्रनाभको सब ओरसे घेरकर करोड़ों देवद्रोही असुर हृष्ट, पुष्ट और आनन्दित हो वज्रपुरमें तथा उसके शाखानगरोंके मुख्य-मुख्य घिरे हुए उद्यानोंमें निवास करते थे ॥ ११-१२ ॥

विष्णुपर्व ] एकनवतितमोऽध्यायः ५८३


वज्रनाभोऽथ दुष्टात्मा वरदानेन दर्पितः ।
पुरस्य चात्मनश्चैव जगद् बाधितुमुद्यतः ॥ १३ ॥
अपनेको तथा अपने नगरको प्राप्त हुए वरदानसे घमंडमें भरा हुआ दुष्टात्मा वज्रनाभ सम्पूर्ण जगत्‌को कष्ट देनेके लिये उद्यत हो गया ॥ १३ ॥

महेन्द्रमब्रवीद् गत्वा देवलोकं विशाम्पते ।
अहमीशितुमिच्छामि त्रैलोक्यं पाकशासन ॥ १४ ॥
प्रजानाथ ! वह देवलोकमें जाकर महेन्द्रसे बोला— 'पाकशासन ! मैं तीनों लोकोंपर शासन करना चाहता हूँ ॥ १४

अथवा मे प्रयच्छस्व युद्धं देवगणेश्वर ।
सामान्यं हि जगत्कृत्स्नं काश्यपानां महात्मनाम् ॥ १५॥
'देवगणेश्वर ! ( या तो मेरे लिये देवलोक खाली कर दो ) अथवा मुझे युद्ध प्रदान करो; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्‌पर सभी महामनस्वी कश्यपपुत्रोंका समान अधिकार है' ॥ १५ ॥

स बृहस्पतिना सार्द्धं मन्त्रयित्वा महेश्वरः ।
वज्रनाभं सुरश्रेष्ठः प्रोवाच कुरुवंशज ॥ १६ ॥
कुरुनन्दन ! तब सुरश्रेष्ठ महेश्वर इन्द्रने वृहस्पतिजीके साथ सलाह करके वज्रनाभसे कहा—॥ १६ ॥

सत्रेपु दीक्षितः सौम्य कश्यपो नः पिता मुनिः ।
तस्मिन् वृत्ते यथा न्यायं तथा स हि करिष्यति ॥ १७ ॥
'सौम्य ! हम सबके पिता कश्यप मुनि यज्ञकी दीक्षा ले चुके हैं । उनका वह यज्ञ पूर्ण हो जानेपर वे जैसा उचित समझेंगे, वैसा हमलोगोंके लिये निर्णय कर देंगे' ॥ १७ ॥

ततः स पितरं गत्वा कश्यपं दानवोऽब्रवीत् ।
यथोक्तं देवराजेन तमुवाचाथ कश्यपः ॥ १८ ॥
तब उस दानवने अपने पिता कश्यपके पास जाकर देवराज इन्द्रने जो कुछ कहा था, सब कह सुनाया । उसकी बात सुनकर कश्यपजीने कहा—॥ १८ ॥

सत्रे वृत्ते करिष्यामि यथा न्याय्यं भविष्यति ।
त्वं तु वज्रपुरे पुत्र वस गच्छ समाहितः ॥ १९ ॥
'वत्स ! यज्ञ समाप्त हो जानेपर जैसा उचित होगा, वैसा करूँगा । तबतक तुम वज्रपुरमें चलकर सावधान होकर रहो' ॥ १९ ॥

एवमुक्ते वज्रनाभः स्वमेव नगरं गतः ।
महेन्द्रोऽपि ययौ देवो द्वारकां द्वारशालिनीम् ॥ २०॥
पिताके ऐसा कहनेपर वज्रनाभ अपने ही नगरको चला गया । उधर महेन्द्रदेव भी सुन्दर द्वारसे सुशोभित होनेवाली द्वारकापुरीको गये ॥ २० ॥

गत्वा चान्तर्हितो देवो वासुदेवमथाब्रवीत् ।
वज्रनाभस्य वृत्तान्तं तमुवाच जनार्दनः ॥ २१ ॥
वहाँ जाकर अदृश्य होकर ही इन्द्रदेवने भगवान् श्रीकृष्णसे वज्रनाभका सारा वृत्तान्त कह सुनाया । तब श्रीकृष्ण उनसे बोले—॥ २१ ॥

शौरेरुपस्थितो देव वाजिमेधो महाक्रतुः ।
तस्मिन् वृत्ते वज्रनाभं पातयिष्यामि वासव ॥ २२ ॥
'देव ! वासव ! मेरे पिताजीका अश्वमेध नामक महान् यज्ञ उपस्थित है । उसके पूर्ण हो जानेपर मैं वज्रनाभको अवश्य मार गिराऊँगा ॥ २२ ॥

तत्रोपायं प्रवेशे तु चिन्तयावः सतां गते ।
नानिच्छया प्रवेशोऽस्ति तत्र वायोरपि प्रभो ॥ २३ ॥
सत्पुरुषोंके आश्रयदाता प्रभो ! उसके नगरमें प्रवेश करनेका क्या उपाय है—यह हम दोनों सोचें; क्योंकि वज्रनाभकी इच्छाके बिना वहाँ वायुका भी प्रवेश नहीं हो सकता' ॥ २३ ॥

ततो गतो देवराजो वासुदेवेन सत्कृतः ।
वाजिमेधे च सम्प्राप्ते वसुदेवस्य भारत ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् श्रीकृष्णके द्वारा सत्कार पाकर देवराज इन्द्र चले गये । भारत ! जब वसुदेवजीका अश्वमेध यज्ञ प्राप्त हुआ ( तब उसमें देवराज इन्द्र भी पधारे । ) ॥ २४ ॥

तस्मिन् यज्ञे वर्तमाने प्रवेशार्थं सुरोत्तमौ ।
चिन्तयामासतुर्वीरौ देवराजाच्युतावुभौ ॥ २५ ॥
जब वह यज्ञ चालू हुआ, उस समय सुरश्रेष्ठ वीर-देवराज-इन्द्र और श्रीकृष्ण दोनों वज्रपुरमें प्रवेश करनेके लिये कोई उपाय सोचने लगे ॥ २५ ॥

तत्र यज्ञे वर्तमाने सुनाट्येन नटस्तदा ।
महर्षींस्तोषयामास भद्रनामेति नामतः ॥ २६ ॥
उस यज्ञमे भद्रनामा नामक एक नटने अपने उत्तम नाट्यके द्वारा महर्षियोंको संतुष्ट किया ॥ २६ ॥

तं वरेण मुनिश्रेष्ठाश्छन्दयामासुरात्मवत् ।
स वव्रे तु नटो भद्रो वरं देवेश्वरोपमः ॥ २७ ॥
देवेन्द्रकृष्णच्छन्देन सरस्वत्या प्रचोदितः ।
प्रणिपत्य मुनिश्रेष्ठानश्वमेधे समागतान् ॥ २८ ॥
तब उन श्रेष्ठ मुनियोंने उसे अपने योग्य वर माँगनेके लिये कहा । तब देवेन्द्र तथा श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार सरस्वतीसे प्रेरित हो अश्वमेध यज्ञमें पधारे हुए मुनिवरोंको प्रणाम करके देवेन्द्रतुल्य भद्रनामक नटने इस प्रकार वर माँगा ॥ २७-२८ ॥

नट उवाच
भोज्यो द्विजानां सर्वेषां भवेयं मुनिसत्तमाः ।
सप्तद्वीपां च पृथिवीं विचरेयमिमामहम् ॥ २९ ॥

५८४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

प्रसिद्धाकाशगमनः शक्नुवंश्च विशेषतः।
अवध्यः सर्वभूतानां स्थावरा ये च जङ्गमाः ॥ ३० ॥

नट बोला—मुनिवरो ! मैं समस्त द्विजोंके लिये भोजनीय होऊँ अर्थात् सब द्विज मुझे सादर भोजन करावें। अथवा समस्त ब्राह्मण मेरा अन्न भोजन करें। सातों द्वीपोंसे युक्त इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर मैं विचरण कर सकूँ। आकाशमें चलने-फिरनेकी उत्कृष्ट शक्ति मुझे प्राप्त हो। मैं विशेष शक्तिशाली रहकर स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंके लिये अवध्य होऊँ ॥ २९-३० ॥

यस्य यस्य च वेषेण प्रविशेयमहं खलु।
मृतस्य जीवतो वापि भाव्येनोत्पादितस्य वा ॥ ३१ ॥
सतूर्यस्तादृशः स्यां वै जरारोगविवर्जितः।
तुष्येयुर्मुनयो नित्यमन्ये च मम सर्वदा ॥ ३२ ॥

जो मर गया है, जीवित है, अथवा जो भविष्यरूपसे मेरे द्वारा तत्काल उत्पन्न किया गया है, ऐसे लोगोंमेंसे जिस-जिसके वेषसे मैं कहीं प्रवेश करना चाहूँ, मैं वाद्योंसहित ठीक वैसा ही हो जाऊँ ! जरा और रोग मुझे छू न सकें। मुझपर ऋषि-मुनि तथा अन्य लोग भी नित्य-निरन्तर संतुष्ट रहें ॥ ३१-३२ ॥

एवमस्त्विति सम्प्रोक्तो ब्राह्मणैर्नृपते नटः।
सप्तद्वीपां वसुमतीं पर्यटत्यमरोपमः ॥ ३३ ॥

नरेश्वर ! तब ब्राह्मणोंने 'एवमस्तु' कहकर उस नटको अभीष्ट वरदान दे दिया। तबसे वह देवोपम शक्तिशाली नट सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीपर विचरण करता रहता है ॥ ३३ ॥

पुराणि दानवेन्द्राणामुत्तरांश्च कुरूंस्तथा।
भद्राश्वांश्च केतुमालांश्च कालाग्नद्वीपमेव च ॥ ३४ ॥

वह दानवेन्द्रोंके नगरोंमें तथा उत्तर-कुरु, भद्राश्व, केतुमाल तथा कालाग्न द्वीपमें घूमा करता था ॥ ३४ ॥

पर्वणीषु तु सर्वासु द्वारकां यदुमण्डिताम्।
आयाति वरदत्तः स लोकवीरो महानटः ॥ ३५ ॥

वह वर पाया हुआ लोकवीर महानट सभी पर्वोपर यादवोंसे अलंकृत द्वारकापुरीमें आया करता था ॥ ३५ ॥

ततो हंसान् धार्तराष्ट्रान् देवलोकनिवासिनः।
उवाच भगवान्छक्रः सान्त्वयित्वा सुरेश्वरः ॥ ३६ ॥

तदनन्तर देवलोकमें निवास करनेवाले हंसोंको, जो धृतराष्ट्री एवं कश्यपके वंशज थे, देवराज इन्द्रने बुलवाया और उन्हें सान्त्वना देकर कहा—॥ ३६ ॥

भवन्तो भ्रातरोऽस्माकं काश्यपा देवपक्षिणः।
विमानवाहा देवानां सुकृतीनां तथैव च ॥ ३७ ॥

'हंसो ! तुम लोकपिता कश्यपजीकी संतति होनेके कारण हमारे भाई हो, देवपक्षी हो तथा देवताओं और पुण्यात्माओं-के विमानवाहक हो ॥ ३७ ॥

देवानानास्ति कर्तव्यं कार्यं शत्रुवधान्वितम्।
तत् कर्तव्यं न मन्त्रश्च भेत्तव्यो वः कथंचन ॥ ३८ ॥

'इस समय देवताओंके सामने शत्रुवध-सम्बन्धी कार्य उपस्थित है, जो हम सबके लिये आवश्यक कर्तव्य है। उस कार्यको तुम्हें पूरा करना है और इस गुप्त मन्त्रको किसी तरह फूटने नहीं देना है ॥ ३८ ॥

न कुर्वतां देवताज्ञामुग्रो दण्डः पतेदपि।
सर्वत्राप्रतिषिद्धं वो गमनं हंससत्तमाः ॥ ३९ ॥

'देवताओंकी इस आज्ञाका पालन न करनेपर तुम्हारे ऊपर भयानक दण्ड भी पड़ सकता है। श्रेष्ठ हंसो ! तुम्हारी सर्वत्र अप्रतिहत गति है ॥ ३९ ॥

गत्वाप्रवेश्यमन्येषां वज्रनाभपुरोत्तमम्।
इतोऽन्तःपुरवापीषु चरध्वमुचितं हि वः ॥ ४० ॥

'वज्रनाभके श्रेष्ठ नगरमें प्रवेश करना दूसरोंके लिये असम्भव है। तुम वहाँ जाकर अन्तःपुरकी बावड़ियोंमें विचरो, क्योंकि यह कार्य तुम्हारे ही योग्य है ॥ ४० ॥

तस्यास्ति कन्यारत्नं हि त्रैलोक्यातिशयं शुभम्।
नाम्ना प्रभावती नाम चन्द्राभेव प्रभावती ॥ ४१ ॥

'वज्रनाभके एक रत्नस्वरूपा कन्या है, जो त्रिलोकीमें अतिशय सुन्दरी है। उसका नाम प्रभावती है। वह ऐसी प्रतीत होती है मानो चन्द्रमाकी आभा ही उसकी प्रभा बनकर प्रकाशित हो रही हो ॥ ४१ ॥

वरदानेन सा लब्धा मात्रा किल वरानना।
हैमवत्या महादेव्याः सकाशादिति नः श्रुतम् ॥ ४२ ॥

'उसकी माताने गिरिराज हिमवान्की पुत्री महादेवी उमासे मिले हुए वरदानके प्रभावसे उस सुन्दर मुखवाली कन्याको प्राप्त किया है, ऐसा हमारे सुननेमें आया है ॥४२॥

स्वयंवरा च सा कन्या वन्धुभिः स्थापिता सती।
आत्मेच्छया पतिं हंसा वरयिष्यति शोभना ॥ ४३ ॥

'हंसो ! अपने बन्धुओंद्वारा सुरक्षित हुई वह सुन्दरी कन्या प्रभावती स्वयंवरा है। स्वयंवरमें अपनी इच्छाके अनुसार पतिका वरण करेगी ॥ ४३ ॥

तद्भवद्भिर्गुणा वाच्याः प्रद्युम्नस्य महात्मनः।
सद्भूताः कुलरूपस्य शीलस्य वयसस्तथा ॥ ४४ ॥

'अतः तुमलोग प्रभावतीके सम्मुख महात्मा प्रद्युम्नके उत्तम कुल, सुन्दर रूप, अच्छे शील-स्वभाव तथा नयी अवस्थाके श्रेष्ठ गुणोंका बखान करो ॥ ४४ ॥

यदा सा रक्तभावा च वज्रनाभसुता सती।
तस्याः सकाशात् संदेशो नयितव्यः समाधिना ॥४५॥
प्रद्युम्नस्य पुनस्तस्मादानयध्वं तथैव च।
स्वबुद्ध्या प्राप्तकालं च संविधेयं हितं मम ॥ ४६ ॥

विष्णुपर्व ] द्विनवतितमोऽध्यायः [ ५८५

'वज्रनाभकी वह सती साध्वी पुत्री जब प्रद्युम्नके प्रति हृदयसे अनुरक्त हो जाय, तब एकाग्रचित्त होकर उसका संदेश तुम्हे प्रद्युम्नके पास पहुँचाना चाहिये; फिर वहाँसे तुम लोग उस संदेशका उत्तर लाया करो। साथ ही, अपनी बुद्धिसे भी सोच-विचारकर अवसरके अनुरूप कार्य करके मेरा हित-साधन करो ॥ ४५-४६ ॥

नेत्रवक्त्रप्रसादश्च कर्तव्यस्तत्र सर्वथा ॥ ४७ ॥
तथा तथा गुणा वाच्याः प्रद्युम्नस्य महात्मनः ।
यथा यथा प्रभावत्या मनस्तत्र भवेत् स्थितम् ॥ ४८ ॥

'तुम्हे वहाँ अपने नेत्रों और मुखके द्वारा सब प्रकारसे प्रसन्नता प्रकट करनी चाहिये। महात्मा प्रद्युम्नके गुणोंको उसी-उसी प्रकारसे बताना चाहिये, जिससे प्रभावतीका मन उनमें पूर्णतः अनुरक्त हो जाय ॥ ४७-४८ ॥

वृत्तान्तश्चानुदिवसं प्रदेयो मम सर्वथा ।
द्वारवत्यां च कृष्णस्य भ्रातुर्मम यवीयसः ॥ ४९ ॥

'इन सब बातोंका समाचार तुम्हें प्रतिदिन मुझे और द्वारकामे मेरे छोटे भाई श्रीकृष्णको भी बताना चाहिये ॥४९॥

तावद्यत्नश्च कर्तव्यः प्रद्युम्नो यावदात्मवित् ।
पर्यावर्तयेद् वरारोहां वज्रनाभसुतां विभुः ॥ ५० ॥

'जबतक आत्मज्ञानी वैभवशाली प्रद्युम्न वज्रनाभकी सुन्दरी पुत्री प्रभावतीको अपनी न बना लें तबतक तुम्हारा प्रयत्न चालू रहना चाहिये ॥ ५० ॥

अवध्यास्ते तु देवानां ब्रह्मणो वरदर्पिताः ।
देवपुत्रैर्हि हन्तव्याः प्रद्युम्नप्रमुखैर्युधि ॥ ५१ ॥

'ब्रह्माजीके वरदानसे घमंडमें भरे रहनेवाले वज्रनाभ आदि सारे दैत्य देवताओंके लिये अवध्य हैं। वे युद्धमें प्रद्युम्न आदि देवकुमारोंद्वारा ही मारे जा सकते हैं ॥ ५१ ॥

नटो दत्तवरस्तस्य वेषमास्थाय यादवाः ।
प्रद्युम्नाद्या गमिष्यन्ति वज्रनाभविनाशनाः ॥ ५२ ॥

'मुनियोंका वर प्राप्त करनेवाला जो भद्रनामा नट है, उसीका वेष धारण करके प्रद्युम्न आदि यादव वज्रनाभका विनाश करनेके लिये उसके नगरमें जायेंगे ॥ ५२ ॥

एतच्च सर्वं कर्तव्यमन्यच्च सर्वमेव हि ।
प्राप्तकालं विधातव्यमस्माकं प्रियकाम्यया ॥ ५३ ॥

'ये तथा और भी जो समयोचित कर्तव्य प्राप्त हों, उन सबको हमारा प्रिय करनेकी इच्छासे तुमलोगोंको पूर्ण करना चाहिये ॥ ५३ ॥

प्रवेशस्तत्र देवानां नास्ति हंसाः कथंचन ।
वज्रनाभेप्सिते तत्र प्रदेशे खलु सर्वथा ॥ ५४ ॥

'हंसो ! वहाँ वज्रनाभके अभीष्ट प्रदेशमें देवताओंका किसी तरह भी प्रवेश नहीं हो सकता। यह सर्वथा निश्चित है' ॥ ५४ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वज्रनाभवधे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वज्रनाभवधके प्रसंगमें इक्यानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥


द्विनवतितमोऽध्यायः

हंसोंका वज्रपुरमें निवास, हंसीका प्रभावतीको प्रद्युम्नके प्रति अनुरक्त कराना, प्रभावतीका हंसीसे प्रद्युम्नकी प्राप्ति करानेका अनुरोध, हंसी और वज्रनाभका संवाद, हंसोंके मुँहसे सब समाचार सुनकर श्रीकृष्णका नटवेषमें प्रद्युम्न आदि यादवोंको वज्रपुरमें भेजना

वैशम्पायन उवाच
ते वासववचः श्रुत्वा हंसा वज्रपुरं ययुः ।
पूर्वोचितं हि गमनं तेषां तत्र जनाधिप ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजा जनमेजय ! इन्द्रकी यह बात सुनकर वे हंस वज्रपुरमें गये। वहाँका मार्ग उनके लिये पूर्व-परिचित था ॥ १ ॥

ते दीर्घिकासु रम्यासु निपेतुर्वीर पक्षिणः ।
पद्मोत्पलैरावृतासु काञ्चनैः स्पर्शनक्षमैः ॥ २ ॥

वीर ! वे पक्षी वहाँके रमणीय सरोवरोंमें, जो स्पर्शके योग्य सुवर्णमय कमलोंसे आवृत थे, जाकर बैठे ॥ २ ॥

ते वै नदन्तो मधुरं संस्कृतापूर्वभाषिणः ।
पूर्वमप्यागतास्ते तु विस्मयं जनयन्ति हि ॥ ३ ॥

वे हंस अपूर्व संस्कृत भाषा बोलते और मधुर कलरव करते थे। यद्यपि वे उस नगरमें पहले भी आ चुके थे, तथापि नये आये हुएके समान वहाँके निवासियोंको आश्चर्यमें डाल रहे थे ॥ ३ ॥

अन्तःपुरोपभोग्यासु चेरुर्वापीषु ते नृप ।
दृष्टास्ते वज्रनाभस्य त्रिविष्टपनिवासिनः ॥ ४ ॥

नरेश्वर ! वे अन्तःपुरके उपभोगमें आनेवाली बावडियोंमें चरने लगे। उन स्वर्गवासी हंसोंपर वज्रनाभकी भी दृष्टि पड़ी ॥ ४ ॥

आलपन्तः सुमधुरं धार्तराष्ट्रा जनेश्वर ।
स तानुवाच दैतेयो धार्तराष्ट्रानिदं वचः ॥ ५ ॥

जनेश्वर ! वे हंस अत्यन्त मधुर बोली बोल रहे थे। उन्हें देखकर उस दैत्यने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥

५८६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

त्रिविष्टपे नित्यरता भवन्तश्चारुभाषिणः।
यदैवेहोत्सवोऽस्माकं भवद्भिरवगम्यते ॥ ६ ॥
आगन्तव्यं जालपादाः खमिदं भवतां गृहम्।
विस्रब्धं च प्रवेष्टव्यं त्रिविष्टपनिवासिभिः ॥ ७ ॥

'हंसो ! तुमलोग सदा स्वर्गलोकमें रमते और मनोहर बोली बोलते हो। जब कभी यहाँ हमलोगोंके घर उत्सव हो और तुम्हें इसका पता लग जाय, तब तुम अवश्य यहाँ पधारना। यह तुम्हारा अपना ही घर है। स्वर्गनिवासी हंसोंको यहाँ निर्भय होकर प्रवेश करना चाहिये' ॥ ६-७ ॥

ते तथोक्ताः शकुनयो वज्रनाभेन भारत।
तथेत्युक्त्वा हि विविशुर्दानवेन्द्रनिवेशनम् ॥ ८ ॥

भारत ! वज्रनाभके ऐसा कहनेपर उन पक्षियोंने 'तथास्तु' कहकर उसकी बात मान ली और उस दानवराजके महलमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥

चक्रुः परिचयं ते च देवकार्यव्यपेक्षया।
मानुषालापिनस्ते तु कथाश्चक्रुः पृथग्विधाः ॥ ९ ॥

उन्होंने देवताओंके कार्यको सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ सबसे परिचय प्राप्त किया। वे मनुष्योंकी-सी बोली बोलते और भाँति-भाँतिकी कथाएँ कहते थे ॥ ९ ॥

वंशवृद्धाः काश्यपानां सर्वकल्याणभागिनाम्।
स्त्रियो रेमुर्विशेषेण शृण्वन्त्यः सङ्गताः कथाः ॥ १० ॥

समस्त कल्याणमय पदार्थोंका उपभोग करनेवाले कश्यपवंशी दानवोंकी स्त्रियाँ अपने वंशसे सम्बन्ध रखनेवाली सुसङ्गत कथाएँ सुनती हुई उनमें विशेषरूपसे रम जाती थीं ॥

विचरन्तस्ततो हंसा ददृशुश्चारुहासिनीम्।
प्रभावतीं वरारोहां वज्रनाभसुतां तदा ॥ ११ ॥

तदनन्तर वहाँ विचरते हुए हंसोंने उस समय वज्रनाभकी पुत्री मनोहर मुसकानवाली सुन्दरी प्रभावतीको देखा ॥ ११ ॥

हंसाः परिचितां चक्रुस्तां ततश्चारुहासिनीम्।
सखीं शुचिमुखीं चक्रे हंसीं राजसुता तदा ॥ १२ ॥

फिर उन सभी हंसोंने उस चारुहासिनी राजकुमारीसे परिचय कर लिया। राजकुमारी प्रभावतीने उस समय शुचिमुखी नामवाली हंसीको अपनी सखी बना लिया ॥ १२ ॥

सा तां कदाचित् पप्रच्छ वज्रनाभसुतां सखीम्।
विश्रम्मितां पृथक्सूक्तैराख्यानकशतैर्वराम् ॥ १३ ॥

एक दिनकी बात है, शुचिमुखीने सैकड़ों कथाएँ तथा भाँति-भाँतिकी सुन्दर उक्तियाँ सुनाकर अपनी श्रेष्ठ सखी वज्रनाभकुमारी प्रभावतीके मनमें पूर्ण विश्वास पैदा कर लिया। तत्पश्चात् उससे पूछा—॥ १३ ॥

त्रैलोक्यसुन्दरीं वेद्मि त्वामहं हि प्रभावति।
रूपशीलगुणैर्देवि किञ्चित् त्वां वक्तुमुत्सहे ॥ १४ ॥

'प्रभावती ! मैं तुम्हें त्रिभुवनकी अद्वितीय सुन्दरी मानती हूँ। देवि ! तुम रूप, शील और गुणोंमें श्रेष्ठ हो, इसलिये मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ ॥ १४ ॥

व्यतिक्रामति ते भीरु यौवनं चारुहासिनि।
यदतीतं पुनर्नैति गतं स्रोत इवाम्भसः ॥ १५ ॥

'भीरु ! चारुहासिनि ! तुम्हारी जवानी व्यर्थ बीती जा रही है। जैसे जलका बहता हुआ स्रोत फिर पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार जो अवस्था बीत गयी, वह फिर वापिस नहीं आती है ॥ १५ ॥

कामोपभोगतुल्या हि रतिर्देवि न विद्यते।
स्त्रीणां जगति कल्याणि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १६ ॥

'देवि ! कल्याणि ! संसारमें स्त्रियोंके लिये कामोपभोगके समान दूसरा कोई सुख नहीं है; यह मैं तुमसे सत्य कहती हूँ॥

स्वयंवरे च न्यस्ता त्वं पित्रा सर्वाङ्गशोभने।
न च कांचिद् वरयसे देवासुरकुलोद्भवन् ॥ १७ ॥

'सर्वाङ्गशोभने ! तुम्हारे पिताने तुम्हें स्वयंवरमें उपस्थित किया, परंतु तुम देवताओं तथा असुरोंके कुलमें उत्पन्न हुए किन्हीं योग्य पुरुषका वरण ही नहीं करती हो (इसका क्या कारण है?) ॥ १७ ॥

व्रीडिता यान्ति सुश्रोणि प्रत्याख्यातास्त्वया शुभे।
रूपशौर्यगुणैर्युक्तान् सदृशांस्त्वं कुलस्य हि ॥ १८ ॥
आगतान् नेच्छसे देवि सदृशान् कुलरूपयोः।

'शुभे ! सुश्रोणि ! तुम्हारे इनकार कर देनेपर ब्याहके लिये आये हुए पुरुष लज्जित होकर लौट जाते हैं। देवि ! जो रूप और शौर्य आदि गुणोंसे युक्त हैं तथा तुम्हारे कुलके सर्वथा अनुरूप हैं, ऐसे कुल और रूपमें अपने ही समान पुरुषोंके आनेपर भी तुम उन्हे वरण करना नहीं चाहती (ऐसा क्यों करती हो?) ॥ १८१/२ ॥

इहैष्यति किमर्थं त्वां प्रद्युम्नो रुक्मिणीसुतः ॥ १९ ॥
त्रैलोक्ये यस्य रूपेण सदृशो न कुलेन वा।
गुणैर्वा चारुसर्वाङ्गि शौर्येणाप्यति वा शुभे ॥ २० ॥

'भला रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न यहाँ किसलिये आयेंगे? जिनके रूप और कुलकी समानता करनेवाला त्रिलोकीमें दूसरा कोई नहीं है। शुभे ! सर्वाङ्गसुन्दरी ! वे गुणों अथवा शौर्यमें भी सबसे बढ़कर हैं ॥ १९-२० ॥

देवेषु देवः सुश्रोणि दानवेषु च दानवः।
मानुषेष्वपि धर्मात्मा मनुष्यः स महाबलः ॥ २१ ॥

'सुश्रोणि ! वे महाबली प्रद्युम्न देवताओंमें देवता, दानवोंमे दानव और मनुष्योंमें भी धर्मात्मा मनुष्य है ॥ २१ ॥

यं सदा देवि दृष्ट्वा हि स्रवन्ति जघनानि हि।
आपीनानीव धेनूनां स्रोतांसि सरितामिव ॥ २२ ॥

विष्णुपर्व ] द्विनवतितमोऽध्यायः ५८७


'देवि ! जैसे दूध देनेवाली गौओंके थन और सरिताओंके स्रोत टपकते हैं, उसी तरह उन प्रद्युम्नको देखकर सदा ही स्त्रियोंके जघनप्रदेश आर्द्र हो जाते हैं ॥ २२ ॥

न पूर्णचन्द्रेण मुखं नयने वा कुशेशयैः ।
उत्सहे नोपमातुं हि मृगेन्द्रेणाथ वा गतिम् ॥ २३ ॥

'उनके मुखकी पूर्ण चन्द्रसे, नयनोंकी नीलकमलसे अथवा गति ( चाल ) की सिंहसे मै उपमा नहीं दे सकती (क्योंकि ये सब हीन प्रतीत होते हैं) ॥ २३ ॥

जगतः सारमुद्धृत्य पुत्रः स विहितः शुभे ।
कृत्वाङ्गं वरे साङ्गं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ २४ ॥

'शुभे ! सुन्दरी ! प्रभावशाली भगवान् विष्णुने सारे जगत्‌का सार निकालकर अनङ्गको साङ्ग करके अपने उस पुत्रका निर्माण किया है ॥ २४ ॥

हृतेन शम्बरो बाल्ये येन पापो निवार्वितः ।
मायाश्च सर्वाः सम्प्राप्ता न च शीलं विनाशितम् ॥ २५ ॥

'बाल्यावस्थामें उन्हें शम्बरासुरने हर लिया था; परंतु उन्होंने बड़े होनेपर उस पापीको मार डाला ! उसकी सारी मायाएँ प्राप्त कर लीं; फिर भी किसीके शीलका विनाश नहीं किया ॥ २५ ॥

यान् यान् गुणान् पृथुश्रोणि मनसा कल्पयिष्यसि ।
एष्टव्यांस्त्रिषु लोकेषु प्रद्युम्ने सर्व एव ते ॥ २६ ॥

'पृथुश्रोणि ! तुम मनसे जिन-जिन उत्तम गुणोंकी कल्पना करोगी अथवा तीनों लोकोंमें जो-जो श्रेष्ठ गुण वाञ्छनीय हैं, वे सब-के-सब प्रद्युम्नमें वर्तमान हैं ॥ २६ ॥

रुच्या वह्निप्रतीकाशः क्षमया पृथिवीसमः ।
तेजसा सूर्यसदृशो गाम्भीर्येण हृदोपमः ।
प्रभावती शुचिमुखीं त्वितीहोवाच भामिनी ॥ २७ ॥

'वे कान्तिमें अग्निके समान, क्षमामे पृथ्वीके तुल्य, तेजमें सूर्यके सदृश तथा गम्भीरतामें सागरके समान हैं' यह सुनकर भामिनी प्रभावतीने शुचिमुखीसे इस प्रकार कहा ॥

प्रभावत्युवाच

विष्णुर्मानुषलोकस्थः श्रुतः सुबहुशो मया ।
पितुः कथयतः सौम्ये नारदस्य च धीमतः ॥ २८ ॥

प्रभावती बोली- सौम्ये ! मैंने बुद्धिमान् नारदजी तथा अपने पिताके मुखसे कई बार सुना है कि भगवान् विष्णु इस समय मनुष्यलोकमे अवतीर्ण होकर विराज रहे हैं ॥

शत्रुः किल स दैत्यानां वर्जनीयः सदानघे ।
कुलानि किल दैत्यानां तेन दग्धानि मानिनि ॥ २९ ॥
प्रदीप्तेन रथाङ्गेन शार्ङ्गेण गदया तथा।
शाखानगरदेशेषु वसन्ति किल येऽसुराः ॥ ३० ॥
इत्येते दानवेन्द्रेण संदिश्यन्ते हि तं प्रति ।

पापरहित मानिनि ! शाखानगरके प्रदेशोंमें जो असुर निवास करते हैं, उन्हें मेरे पिता दानवराज वज्रनाभ भगवान् विष्णुके विषयमें इस प्रकार संदेश दिया करते हैं-'विष्णु दैत्योंके शत्रुकी रूपमें प्रसिद्ध हैं, अतः उन्हें सदाके लिये त्याग देना चाहिये। उन्होंने अपने तेजस्वी चक्र, शार्ङ्ग-धनुष तथा कौमोदकी गदाके द्वारा दैत्योंके बहुत-से कुल दग्ध कर डाले हैं' ॥ २९-३० १/२ ॥

मनोरथो हि सर्वासां स्त्रीणामेव शुचिस्मिते ॥ ३१ ॥
भवेद्धि मे प्रतिकुलं श्रेष्ठं पितृकुलादिति ।

पवित्र मुसकानवाली हंसी ! प्रायः सभी स्त्रियोंका ऐसा ही मनोरथ होता है कि मेरा पतिकुल पितृकुलसे श्रेष्ठ हो ॥

यदि नामाभ्युपायः स्यात् तस्येहागमनं प्रति ॥ ३२ ॥
महाननुग्रहो मे स्यात् कुलं स्यात् पावनं च मे ।

यदि प्रद्युम्नके यहाँ आनेके लिये कोई उपाय हो सके तो यह मुझपर तुम्हारा महान् अनुग्रह होगा और मेरा कुल पवित्र हो जायगा ॥ ३२ १/२ ॥

समर्थनां मे पृष्टा त्वं प्रयच्छ शुचिलापिनि ॥ ३३ ॥
प्रद्युम्नः स्याद् यथा भर्ता स मे वृष्णिकुलोद्भवः ।

पवित्र वार्ता करनेवाली हंसी ! मैंने तुमसे कार्यसिद्धिका उपाय पूछा है। वह उपाय तुम मुझे प्रदान करो। वृष्णिवंशा-वतंस प्रद्युम्न जिस प्रकार मेरे पति हो सकें, वैसा यत्न करो ॥

अत्यन्तवैरी दैत्यानामुद्वेजनकरो हरिः ॥ ३४ ॥
असुराणां स्त्रियो वृद्धाः कथयन्त्यो मया श्रुताः ।

मैंने असुरोंकी बड़ी-बूढ़ी स्त्रियोंके मुखसे यह बात सुनी है कि भगवान् विष्णु दैत्योंके अत्यन्त वैरी और उन्हे उद्वेगमे डालनेवाले हैं ॥ ३४ १/२ ॥

प्रद्युम्नस्य तथा जन्म पुरस्तादपि मे श्रुतम् ॥ ३५ ॥
यथा च तेन निहतो बलवान् कालशम्बरः ।

प्रद्युम्नके जन्मका वृत्तान्त मैंने पहले भी सुना है। जिस प्रकार उनके द्वारा बलवान् कालशम्बर मारा गया था, वह प्रसङ्ग भी मेरे सुननेमें आया है ॥ ३५ १/२ ॥

हृदि मे वर्तते नित्यं प्रद्युम्नः खलु सत्समे ॥ ३६ ॥
हेतुः स नास्ति स्यात् तेन यथा मम समागमः ।

साध्वीशिरोमणे ! प्रद्युम्न सदा मेरे हृदयमें विद्यमान रहते हैं; परंतु ऐसी कोई युक्ति या साधन नहीं है, जिससे उनके साथ मेरा समागम हो सके ॥ ३६ १/२ ॥

दासी त्वाहं सख्याहें दूत्ये त्वां च विसर्जये ॥ ३७ ॥
पण्डितासि वद्योपायं मम तस्य च संगमे ।

आदरणीया सखी ! मैं तुम्हारी दासी हूँ और तुम्हें दूतीके कामपर नियुक्त करती हूँ। तुम विदुषी हो। मेरे और प्रद्युम्नके मिलनका कोई उपाय बताओ ॥ ३७ १/२ ॥

५८८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

ततस्तां सान्त्वयित्वा सा प्रहसन्तीदमब्रवीत् ॥ ३८ ॥
तब हंसीने उसे सान्त्वना देकर हँसते हुए कहा ॥ ३८ ॥

शुचिमुख्युवाच
तत्र दूती गमिष्यामि तवाहं चारुहासिनि ।
इमां भक्तिं तवोदारां प्रवक्ष्यामि शुचिस्मिते ॥ ३९ ॥
शुचिमुखी बोली—चारुहासिनि ! शुचिस्मिते ! मैं वहाँ तुम्हारी दूती बनकर जाऊँगी और प्रद्युम्नसे तुम्हारी इस उदार भक्तिका वर्णन करूँगी ॥ ३९ ॥

तथा चैव करिष्यामि यथैष्यति तवान्तिकम् ।
साक्षात्कामेन सुश्रोणि भविष्यसि सकामिनी ॥ ४० ॥
सुश्रोणि ! मैं ऐसा प्रयत्न भी करूँगी, जिससे वे तुम्हारे निकट पधारेंगे और तुम साक्षात् कामसे मिलकर अपनी कामना सफल करोगी ॥ ४० ॥

इति मे भाषितं नित्यं स्मरेथाः शुचिलोचने ।
कथाकुशलतां पित्रे कथयस्यायतेक्षणे ॥ ४१ ॥
मम त्वं तत्र मे देवि हितं सम्यक् प्रपत्स्यसे ।
पवित्र नेत्रोंवाली राजकुमारी ! विशाललोचने ! मेरी इस बातको तुम सदा याद रखना । अपने पिताके सामने बराबर मेरे कथा-कौशलकी चर्चा करती हुई यह कहना कि शुचिमुखी कथा कहनेमें बहुत ही कुशल है । देवि ! वहाँ पिताके निकट तुम सदा मेरे हित-साधनका ध्यान रखना ॥

इत्युक्ता सा तथा चक्रे यत्तत् सा तामथाब्रवीत् ॥ ४२ ॥
दानवेन्द्रश्च तां हंसीं पप्रच्छान्तःपुरे तदा ।
प्रभावत्या समाख्याता कथाकुशलता तव ॥ ४३ ॥
तत्त्वं शुचिमुखि ब्रूहि कथां योग्यतया वरे ।
किं त्वया दृष्टमाश्चर्यं जगत्युत्तमपक्षिणि ॥ ४४ ॥
अदृष्टपूर्वमन्यैर्वा योग्यायोग्यमनिन्दिते ।
शुचिमुखीके ऐसा कहनेपर प्रभावतीने वैसा ही किया, जैसा कि उस (हंसी) ने उससे कहा था । उस समय दानवराज वज्रनाभने अन्तःपुरमें उस हंसीसे पूछा—'शुचिमुखि ! प्रभावतीने बताया है कि तुम कथा कहनेमें बड़ी चतुर हो । अतः उत्तम पक्षिणि ! तुम कोई कथा कहो; क्योंकि योग्यतामें बड़ी हो । बताओ, संसारमें तुमने कौन-सी आश्चर्यकी बात देखी है ? अनिन्दिते ! जिसे दूसरोंने पहले कभी नहीं देखा हो, ऐसी कोई योग्य या अयोग्य आश्चर्यकी बात तुमने देखी हो तो बताओ' ॥ ४२-४४ १/२ ॥

सोवाच वज्रनाभं तु हंसी नरवरोत्तम ॥ ४५ ॥
श्रूयतामित्यथामन्त्र्य दानवेन्द्रं महाद्युतिम् ।
नरेशशिरोमणे ! तब हंसीने महातेजस्वी दानवराज वज्रनाभको सम्बोधित करके कहा—सुनिये—॥ ४५ १/२ ॥

दृष्टा मे शाण्डिली नाम साध्वी दानवसत्तम ।
आश्चर्यं कर्म कुर्वन्ती मेरुपाश्र्वे मनस्विनी ॥ ४६ ॥
'दानवश्रेष्ठ ! मैंने मेरुगिरिके पार्श्वभागमें साध्वी मनस्विनी शाण्डिलीको देखा है; जो वहाँ आश्चर्यजनक कार्य करती हैं ॥ ४६ ॥

सुमनाश्चैव कौशल्या सर्वभूतहिते रता ।
कथंचिद् वरशाण्डिल्याः शैलपुत्र्याः शुभा सखी ॥ ४७ ॥
'समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली कौशल्या सुमनाका भी किसी प्रकार दर्शन किया है, जो शैलपुत्री श्रेष्ठ शाण्डिलीकी शुभ सखी हैं ॥ ४७ ॥

नटश्चैव मया दृष्टो मुनिदत्तवरः शुभः ।
कामरूपी च भोज्यश्च त्रैलोक्ये नित्यसम्मतः ॥ ४८ ॥
'एक नटको भी मैंने देखा है, जिसे मुनियोंने अभीष्ट वर दे रक्खा है । वह शुभलक्षण नट इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला, भोजनीय तथा त्रिभुवनमें सबको सदा ही प्रिय है ॥ ४८ ॥

कुरून् यात्युत्तरान् वीर कालास्रद्वीपमेव च ।
भद्राश्वान् केतुमालांश्च द्वीपानन्यांस्तथानघ ॥ ४९ ॥
'वीर ! वह उत्तर कुरुमें जाता तथा कालास्रद्वीपकी भी यात्रा करता है । अनघ ! वह भद्राश्व, केतुमाल तथा अन्य द्वीपोंमें भी जाया करता है ॥ ४९ ॥

देवगन्धर्वगेयानि नृत्यानि विविधानि च ।
स वेत्ति देवान् नृत्येन विस्मापयति सर्वथा ॥ ५० ॥
'देवता और गन्धर्व ही जिन्हें गाते हैं, उन गीतोंको भी वह गाता है तथा भाँति-भाँतिके नृत्योंको भी जानता है । वह अपने नृत्योंसे देवताओंको भी सर्वथा आश्चर्यचकित कर देता है' ॥ ५० ॥

वज्रनाभ उवाच
श्रुतमेतन्मया हंसि न चिरादिव विस्तरम् ।
चारणानां कथयतां सिद्धानां च महात्मनाम् ॥ ५१ ॥
वज्रनाभ बोला—हंसी ! थोड़े ही दिन हुए मैंने भी महात्मा, सिद्धों और चारणोंके मुखसे यह नटविषयक समाचार विस्तारपूर्वक सुना है ॥ ५१ ॥

कुतूहलं ममाप्यस्ति सर्वथा पक्षिनन्दिनि ।
नटे दत्तवरे तस्मिन् संस्तवस्तु न विद्यते ॥ ५२ ॥
पक्षिनन्दिनि ! मुझे भी उस वरप्राप्त नटको देखनेके लिये सर्वथा उत्कण्ठा हो रही है; परंतु मालूम होता है, मेरी प्रसिद्धि उसके कानोंतक नहीं गयी है ( इसलिये वह अबतक यहाँ नहीं आ सका है) ॥ ५२ ॥

हंस्युवाच
सप्तद्वीपान् विचरति नटः स द्विजोत्तम ।
गुणवन्तं जनं श्रुत्वा गुणकार्यः स सर्वथा ॥ ५३ ॥
तव चेच्छृणुयाद् वीर सङ्गतं गुणविस्तरम् ।
नटं तदागतं विद्धि पुरं तव महासुर ॥ ५४ ॥