भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 605

विष्णुपर्व ] एकनवतितमोऽध्यायः ५८३


वज्रनाभोऽथ दुष्टात्मा वरदानेन दर्पितः ।
पुरस्य चात्मनश्चैव जगद् बाधितुमुद्यतः ॥ १३ ॥
अपनेको तथा अपने नगरको प्राप्त हुए वरदानसे घमंडमें भरा हुआ दुष्टात्मा वज्रनाभ सम्पूर्ण जगत्‌को कष्ट देनेके लिये उद्यत हो गया ॥ १३ ॥

महेन्द्रमब्रवीद् गत्वा देवलोकं विशाम्पते ।
अहमीशितुमिच्छामि त्रैलोक्यं पाकशासन ॥ १४ ॥
प्रजानाथ ! वह देवलोकमें जाकर महेन्द्रसे बोला— 'पाकशासन ! मैं तीनों लोकोंपर शासन करना चाहता हूँ ॥ १४

अथवा मे प्रयच्छस्व युद्धं देवगणेश्वर ।
सामान्यं हि जगत्कृत्स्नं काश्यपानां महात्मनाम् ॥ १५॥
'देवगणेश्वर ! ( या तो मेरे लिये देवलोक खाली कर दो ) अथवा मुझे युद्ध प्रदान करो; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्‌पर सभी महामनस्वी कश्यपपुत्रोंका समान अधिकार है' ॥ १५ ॥

स बृहस्पतिना सार्द्धं मन्त्रयित्वा महेश्वरः ।
वज्रनाभं सुरश्रेष्ठः प्रोवाच कुरुवंशज ॥ १६ ॥
कुरुनन्दन ! तब सुरश्रेष्ठ महेश्वर इन्द्रने वृहस्पतिजीके साथ सलाह करके वज्रनाभसे कहा—॥ १६ ॥

सत्रेपु दीक्षितः सौम्य कश्यपो नः पिता मुनिः ।
तस्मिन् वृत्ते यथा न्यायं तथा स हि करिष्यति ॥ १७ ॥
'सौम्य ! हम सबके पिता कश्यप मुनि यज्ञकी दीक्षा ले चुके हैं । उनका वह यज्ञ पूर्ण हो जानेपर वे जैसा उचित समझेंगे, वैसा हमलोगोंके लिये निर्णय कर देंगे' ॥ १७ ॥

ततः स पितरं गत्वा कश्यपं दानवोऽब्रवीत् ।
यथोक्तं देवराजेन तमुवाचाथ कश्यपः ॥ १८ ॥
तब उस दानवने अपने पिता कश्यपके पास जाकर देवराज इन्द्रने जो कुछ कहा था, सब कह सुनाया । उसकी बात सुनकर कश्यपजीने कहा—॥ १८ ॥

सत्रे वृत्ते करिष्यामि यथा न्याय्यं भविष्यति ।
त्वं तु वज्रपुरे पुत्र वस गच्छ समाहितः ॥ १९ ॥
'वत्स ! यज्ञ समाप्त हो जानेपर जैसा उचित होगा, वैसा करूँगा । तबतक तुम वज्रपुरमें चलकर सावधान होकर रहो' ॥ १९ ॥

एवमुक्ते वज्रनाभः स्वमेव नगरं गतः ।
महेन्द्रोऽपि ययौ देवो द्वारकां द्वारशालिनीम् ॥ २०॥
पिताके ऐसा कहनेपर वज्रनाभ अपने ही नगरको चला गया । उधर महेन्द्रदेव भी सुन्दर द्वारसे सुशोभित होनेवाली द्वारकापुरीको गये ॥ २० ॥

गत्वा चान्तर्हितो देवो वासुदेवमथाब्रवीत् ।
वज्रनाभस्य वृत्तान्तं तमुवाच जनार्दनः ॥ २१ ॥
वहाँ जाकर अदृश्य होकर ही इन्द्रदेवने भगवान् श्रीकृष्णसे वज्रनाभका सारा वृत्तान्त कह सुनाया । तब श्रीकृष्ण उनसे बोले—॥ २१ ॥

शौरेरुपस्थितो देव वाजिमेधो महाक्रतुः ।
तस्मिन् वृत्ते वज्रनाभं पातयिष्यामि वासव ॥ २२ ॥
'देव ! वासव ! मेरे पिताजीका अश्वमेध नामक महान् यज्ञ उपस्थित है । उसके पूर्ण हो जानेपर मैं वज्रनाभको अवश्य मार गिराऊँगा ॥ २२ ॥

तत्रोपायं प्रवेशे तु चिन्तयावः सतां गते ।
नानिच्छया प्रवेशोऽस्ति तत्र वायोरपि प्रभो ॥ २३ ॥
सत्पुरुषोंके आश्रयदाता प्रभो ! उसके नगरमें प्रवेश करनेका क्या उपाय है—यह हम दोनों सोचें; क्योंकि वज्रनाभकी इच्छाके बिना वहाँ वायुका भी प्रवेश नहीं हो सकता' ॥ २३ ॥

ततो गतो देवराजो वासुदेवेन सत्कृतः ।
वाजिमेधे च सम्प्राप्ते वसुदेवस्य भारत ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् श्रीकृष्णके द्वारा सत्कार पाकर देवराज इन्द्र चले गये । भारत ! जब वसुदेवजीका अश्वमेध यज्ञ प्राप्त हुआ ( तब उसमें देवराज इन्द्र भी पधारे । ) ॥ २४ ॥

तस्मिन् यज्ञे वर्तमाने प्रवेशार्थं सुरोत्तमौ ।
चिन्तयामासतुर्वीरौ देवराजाच्युतावुभौ ॥ २५ ॥
जब वह यज्ञ चालू हुआ, उस समय सुरश्रेष्ठ वीर-देवराज-इन्द्र और श्रीकृष्ण दोनों वज्रपुरमें प्रवेश करनेके लिये कोई उपाय सोचने लगे ॥ २५ ॥

तत्र यज्ञे वर्तमाने सुनाट्येन नटस्तदा ।
महर्षींस्तोषयामास भद्रनामेति नामतः ॥ २६ ॥
उस यज्ञमे भद्रनामा नामक एक नटने अपने उत्तम नाट्यके द्वारा महर्षियोंको संतुष्ट किया ॥ २६ ॥

तं वरेण मुनिश्रेष्ठाश्छन्दयामासुरात्मवत् ।
स वव्रे तु नटो भद्रो वरं देवेश्वरोपमः ॥ २७ ॥
देवेन्द्रकृष्णच्छन्देन सरस्वत्या प्रचोदितः ।
प्रणिपत्य मुनिश्रेष्ठानश्वमेधे समागतान् ॥ २८ ॥
तब उन श्रेष्ठ मुनियोंने उसे अपने योग्य वर माँगनेके लिये कहा । तब देवेन्द्र तथा श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार सरस्वतीसे प्रेरित हो अश्वमेध यज्ञमें पधारे हुए मुनिवरोंको प्रणाम करके देवेन्द्रतुल्य भद्रनामक नटने इस प्रकार वर माँगा ॥ २७-२८ ॥

नट उवाच
भोज्यो द्विजानां सर्वेषां भवेयं मुनिसत्तमाः ।
सप्तद्वीपां च पृथिवीं विचरेयमिमामहम् ॥ २९ ॥