भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 606
५८४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

प्रसिद्धाकाशगमनः शक्नुवंश्च विशेषतः।
अवध्यः सर्वभूतानां स्थावरा ये च जङ्गमाः ॥ ३० ॥

नट बोला—मुनिवरो ! मैं समस्त द्विजोंके लिये भोजनीय होऊँ अर्थात् सब द्विज मुझे सादर भोजन करावें। अथवा समस्त ब्राह्मण मेरा अन्न भोजन करें। सातों द्वीपोंसे युक्त इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर मैं विचरण कर सकूँ। आकाशमें चलने-फिरनेकी उत्कृष्ट शक्ति मुझे प्राप्त हो। मैं विशेष शक्तिशाली रहकर स्थावर-जङ्गम सभी प्राणियोंके लिये अवध्य होऊँ ॥ २९-३० ॥

यस्य यस्य च वेषेण प्रविशेयमहं खलु।
मृतस्य जीवतो वापि भाव्येनोत्पादितस्य वा ॥ ३१ ॥
सतूर्यस्तादृशः स्यां वै जरारोगविवर्जितः।
तुष्येयुर्मुनयो नित्यमन्ये च मम सर्वदा ॥ ३२ ॥

जो मर गया है, जीवित है, अथवा जो भविष्यरूपसे मेरे द्वारा तत्काल उत्पन्न किया गया है, ऐसे लोगोंमेंसे जिस-जिसके वेषसे मैं कहीं प्रवेश करना चाहूँ, मैं वाद्योंसहित ठीक वैसा ही हो जाऊँ ! जरा और रोग मुझे छू न सकें। मुझपर ऋषि-मुनि तथा अन्य लोग भी नित्य-निरन्तर संतुष्ट रहें ॥ ३१-३२ ॥

एवमस्त्विति सम्प्रोक्तो ब्राह्मणैर्नृपते नटः।
सप्तद्वीपां वसुमतीं पर्यटत्यमरोपमः ॥ ३३ ॥

नरेश्वर ! तब ब्राह्मणोंने 'एवमस्तु' कहकर उस नटको अभीष्ट वरदान दे दिया। तबसे वह देवोपम शक्तिशाली नट सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीपर विचरण करता रहता है ॥ ३३ ॥

पुराणि दानवेन्द्राणामुत्तरांश्च कुरूंस्तथा।
भद्राश्वांश्च केतुमालांश्च कालाग्नद्वीपमेव च ॥ ३४ ॥

वह दानवेन्द्रोंके नगरोंमें तथा उत्तर-कुरु, भद्राश्व, केतुमाल तथा कालाग्न द्वीपमें घूमा करता था ॥ ३४ ॥

पर्वणीषु तु सर्वासु द्वारकां यदुमण्डिताम्।
आयाति वरदत्तः स लोकवीरो महानटः ॥ ३५ ॥

वह वर पाया हुआ लोकवीर महानट सभी पर्वोपर यादवोंसे अलंकृत द्वारकापुरीमें आया करता था ॥ ३५ ॥

ततो हंसान् धार्तराष्ट्रान् देवलोकनिवासिनः।
उवाच भगवान्छक्रः सान्त्वयित्वा सुरेश्वरः ॥ ३६ ॥

तदनन्तर देवलोकमें निवास करनेवाले हंसोंको, जो धृतराष्ट्री एवं कश्यपके वंशज थे, देवराज इन्द्रने बुलवाया और उन्हें सान्त्वना देकर कहा—॥ ३६ ॥

भवन्तो भ्रातरोऽस्माकं काश्यपा देवपक्षिणः।
विमानवाहा देवानां सुकृतीनां तथैव च ॥ ३७ ॥

'हंसो ! तुम लोकपिता कश्यपजीकी संतति होनेके कारण हमारे भाई हो, देवपक्षी हो तथा देवताओं और पुण्यात्माओं-के विमानवाहक हो ॥ ३७ ॥

देवानानास्ति कर्तव्यं कार्यं शत्रुवधान्वितम्।
तत् कर्तव्यं न मन्त्रश्च भेत्तव्यो वः कथंचन ॥ ३८ ॥

'इस समय देवताओंके सामने शत्रुवध-सम्बन्धी कार्य उपस्थित है, जो हम सबके लिये आवश्यक कर्तव्य है। उस कार्यको तुम्हें पूरा करना है और इस गुप्त मन्त्रको किसी तरह फूटने नहीं देना है ॥ ३८ ॥

न कुर्वतां देवताज्ञामुग्रो दण्डः पतेदपि।
सर्वत्राप्रतिषिद्धं वो गमनं हंससत्तमाः ॥ ३९ ॥

'देवताओंकी इस आज्ञाका पालन न करनेपर तुम्हारे ऊपर भयानक दण्ड भी पड़ सकता है। श्रेष्ठ हंसो ! तुम्हारी सर्वत्र अप्रतिहत गति है ॥ ३९ ॥

गत्वाप्रवेश्यमन्येषां वज्रनाभपुरोत्तमम्।
इतोऽन्तःपुरवापीषु चरध्वमुचितं हि वः ॥ ४० ॥

'वज्रनाभके श्रेष्ठ नगरमें प्रवेश करना दूसरोंके लिये असम्भव है। तुम वहाँ जाकर अन्तःपुरकी बावड़ियोंमें विचरो, क्योंकि यह कार्य तुम्हारे ही योग्य है ॥ ४० ॥

तस्यास्ति कन्यारत्नं हि त्रैलोक्यातिशयं शुभम्।
नाम्ना प्रभावती नाम चन्द्राभेव प्रभावती ॥ ४१ ॥

'वज्रनाभके एक रत्नस्वरूपा कन्या है, जो त्रिलोकीमें अतिशय सुन्दरी है। उसका नाम प्रभावती है। वह ऐसी प्रतीत होती है मानो चन्द्रमाकी आभा ही उसकी प्रभा बनकर प्रकाशित हो रही हो ॥ ४१ ॥

वरदानेन सा लब्धा मात्रा किल वरानना।
हैमवत्या महादेव्याः सकाशादिति नः श्रुतम् ॥ ४२ ॥

'उसकी माताने गिरिराज हिमवान्की पुत्री महादेवी उमासे मिले हुए वरदानके प्रभावसे उस सुन्दर मुखवाली कन्याको प्राप्त किया है, ऐसा हमारे सुननेमें आया है ॥४२॥

स्वयंवरा च सा कन्या वन्धुभिः स्थापिता सती।
आत्मेच्छया पतिं हंसा वरयिष्यति शोभना ॥ ४३ ॥

'हंसो ! अपने बन्धुओंद्वारा सुरक्षित हुई वह सुन्दरी कन्या प्रभावती स्वयंवरा है। स्वयंवरमें अपनी इच्छाके अनुसार पतिका वरण करेगी ॥ ४३ ॥

तद्भवद्भिर्गुणा वाच्याः प्रद्युम्नस्य महात्मनः।
सद्भूताः कुलरूपस्य शीलस्य वयसस्तथा ॥ ४४ ॥

'अतः तुमलोग प्रभावतीके सम्मुख महात्मा प्रद्युम्नके उत्तम कुल, सुन्दर रूप, अच्छे शील-स्वभाव तथा नयी अवस्थाके श्रेष्ठ गुणोंका बखान करो ॥ ४४ ॥

यदा सा रक्तभावा च वज्रनाभसुता सती।
तस्याः सकाशात् संदेशो नयितव्यः समाधिना ॥४५॥
प्रद्युम्नस्य पुनस्तस्मादानयध्वं तथैव च।
स्वबुद्ध्या प्राप्तकालं च संविधेयं हितं मम ॥ ४६ ॥