भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 607

विष्णुपर्व ] द्विनवतितमोऽध्यायः [ ५८५

'वज्रनाभकी वह सती साध्वी पुत्री जब प्रद्युम्नके प्रति हृदयसे अनुरक्त हो जाय, तब एकाग्रचित्त होकर उसका संदेश तुम्हे प्रद्युम्नके पास पहुँचाना चाहिये; फिर वहाँसे तुम लोग उस संदेशका उत्तर लाया करो। साथ ही, अपनी बुद्धिसे भी सोच-विचारकर अवसरके अनुरूप कार्य करके मेरा हित-साधन करो ॥ ४५-४६ ॥

नेत्रवक्त्रप्रसादश्च कर्तव्यस्तत्र सर्वथा ॥ ४७ ॥
तथा तथा गुणा वाच्याः प्रद्युम्नस्य महात्मनः ।
यथा यथा प्रभावत्या मनस्तत्र भवेत् स्थितम् ॥ ४८ ॥

'तुम्हे वहाँ अपने नेत्रों और मुखके द्वारा सब प्रकारसे प्रसन्नता प्रकट करनी चाहिये। महात्मा प्रद्युम्नके गुणोंको उसी-उसी प्रकारसे बताना चाहिये, जिससे प्रभावतीका मन उनमें पूर्णतः अनुरक्त हो जाय ॥ ४७-४८ ॥

वृत्तान्तश्चानुदिवसं प्रदेयो मम सर्वथा ।
द्वारवत्यां च कृष्णस्य भ्रातुर्मम यवीयसः ॥ ४९ ॥

'इन सब बातोंका समाचार तुम्हें प्रतिदिन मुझे और द्वारकामे मेरे छोटे भाई श्रीकृष्णको भी बताना चाहिये ॥४९॥

तावद्यत्नश्च कर्तव्यः प्रद्युम्नो यावदात्मवित् ।
पर्यावर्तयेद् वरारोहां वज्रनाभसुतां विभुः ॥ ५० ॥

'जबतक आत्मज्ञानी वैभवशाली प्रद्युम्न वज्रनाभकी सुन्दरी पुत्री प्रभावतीको अपनी न बना लें तबतक तुम्हारा प्रयत्न चालू रहना चाहिये ॥ ५० ॥

अवध्यास्ते तु देवानां ब्रह्मणो वरदर्पिताः ।
देवपुत्रैर्हि हन्तव्याः प्रद्युम्नप्रमुखैर्युधि ॥ ५१ ॥

'ब्रह्माजीके वरदानसे घमंडमें भरे रहनेवाले वज्रनाभ आदि सारे दैत्य देवताओंके लिये अवध्य हैं। वे युद्धमें प्रद्युम्न आदि देवकुमारोंद्वारा ही मारे जा सकते हैं ॥ ५१ ॥

नटो दत्तवरस्तस्य वेषमास्थाय यादवाः ।
प्रद्युम्नाद्या गमिष्यन्ति वज्रनाभविनाशनाः ॥ ५२ ॥

'मुनियोंका वर प्राप्त करनेवाला जो भद्रनामा नट है, उसीका वेष धारण करके प्रद्युम्न आदि यादव वज्रनाभका विनाश करनेके लिये उसके नगरमें जायेंगे ॥ ५२ ॥

एतच्च सर्वं कर्तव्यमन्यच्च सर्वमेव हि ।
प्राप्तकालं विधातव्यमस्माकं प्रियकाम्यया ॥ ५३ ॥

'ये तथा और भी जो समयोचित कर्तव्य प्राप्त हों, उन सबको हमारा प्रिय करनेकी इच्छासे तुमलोगोंको पूर्ण करना चाहिये ॥ ५३ ॥

प्रवेशस्तत्र देवानां नास्ति हंसाः कथंचन ।
वज्रनाभेप्सिते तत्र प्रदेशे खलु सर्वथा ॥ ५४ ॥

'हंसो ! वहाँ वज्रनाभके अभीष्ट प्रदेशमें देवताओंका किसी तरह भी प्रवेश नहीं हो सकता। यह सर्वथा निश्चित है' ॥ ५४ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वज्रनाभवधे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वज्रनाभवधके प्रसंगमें इक्यानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥


द्विनवतितमोऽध्यायः

हंसोंका वज्रपुरमें निवास, हंसीका प्रभावतीको प्रद्युम्नके प्रति अनुरक्त कराना, प्रभावतीका हंसीसे प्रद्युम्नकी प्राप्ति करानेका अनुरोध, हंसी और वज्रनाभका संवाद, हंसोंके मुँहसे सब समाचार सुनकर श्रीकृष्णका नटवेषमें प्रद्युम्न आदि यादवोंको वज्रपुरमें भेजना

वैशम्पायन उवाच
ते वासववचः श्रुत्वा हंसा वज्रपुरं ययुः ।
पूर्वोचितं हि गमनं तेषां तत्र जनाधिप ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजा जनमेजय ! इन्द्रकी यह बात सुनकर वे हंस वज्रपुरमें गये। वहाँका मार्ग उनके लिये पूर्व-परिचित था ॥ १ ॥

ते दीर्घिकासु रम्यासु निपेतुर्वीर पक्षिणः ।
पद्मोत्पलैरावृतासु काञ्चनैः स्पर्शनक्षमैः ॥ २ ॥

वीर ! वे पक्षी वहाँके रमणीय सरोवरोंमें, जो स्पर्शके योग्य सुवर्णमय कमलोंसे आवृत थे, जाकर बैठे ॥ २ ॥

ते वै नदन्तो मधुरं संस्कृतापूर्वभाषिणः ।
पूर्वमप्यागतास्ते तु विस्मयं जनयन्ति हि ॥ ३ ॥

वे हंस अपूर्व संस्कृत भाषा बोलते और मधुर कलरव करते थे। यद्यपि वे उस नगरमें पहले भी आ चुके थे, तथापि नये आये हुएके समान वहाँके निवासियोंको आश्चर्यमें डाल रहे थे ॥ ३ ॥

अन्तःपुरोपभोग्यासु चेरुर्वापीषु ते नृप ।
दृष्टास्ते वज्रनाभस्य त्रिविष्टपनिवासिनः ॥ ४ ॥

नरेश्वर ! वे अन्तःपुरके उपभोगमें आनेवाली बावडियोंमें चरने लगे। उन स्वर्गवासी हंसोंपर वज्रनाभकी भी दृष्टि पड़ी ॥ ४ ॥

आलपन्तः सुमधुरं धार्तराष्ट्रा जनेश्वर ।
स तानुवाच दैतेयो धार्तराष्ट्रानिदं वचः ॥ ५ ॥

जनेश्वर ! वे हंस अत्यन्त मधुर बोली बोल रहे थे। उन्हें देखकर उस दैत्यने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥

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