विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 608, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५८६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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त्रिविष्टपे नित्यरता भवन्तश्चारुभाषिणः।
यदैवेहोत्सवोऽस्माकं भवद्भिरवगम्यते ॥ ६ ॥
आगन्तव्यं जालपादाः खमिदं भवतां गृहम्।
विस्रब्धं च प्रवेष्टव्यं त्रिविष्टपनिवासिभिः ॥ ७ ॥
'हंसो ! तुमलोग सदा स्वर्गलोकमें रमते और मनोहर बोली बोलते हो। जब कभी यहाँ हमलोगोंके घर उत्सव हो और तुम्हें इसका पता लग जाय, तब तुम अवश्य यहाँ पधारना। यह तुम्हारा अपना ही घर है। स्वर्गनिवासी हंसोंको यहाँ निर्भय होकर प्रवेश करना चाहिये' ॥ ६-७ ॥
ते तथोक्ताः शकुनयो वज्रनाभेन भारत।
तथेत्युक्त्वा हि विविशुर्दानवेन्द्रनिवेशनम् ॥ ८ ॥
भारत ! वज्रनाभके ऐसा कहनेपर उन पक्षियोंने 'तथास्तु' कहकर उसकी बात मान ली और उस दानवराजके महलमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥
चक्रुः परिचयं ते च देवकार्यव्यपेक्षया।
मानुषालापिनस्ते तु कथाश्चक्रुः पृथग्विधाः ॥ ९ ॥
उन्होंने देवताओंके कार्यको सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ सबसे परिचय प्राप्त किया। वे मनुष्योंकी-सी बोली बोलते और भाँति-भाँतिकी कथाएँ कहते थे ॥ ९ ॥
वंशवृद्धाः काश्यपानां सर्वकल्याणभागिनाम्।
स्त्रियो रेमुर्विशेषेण शृण्वन्त्यः सङ्गताः कथाः ॥ १० ॥
समस्त कल्याणमय पदार्थोंका उपभोग करनेवाले कश्यपवंशी दानवोंकी स्त्रियाँ अपने वंशसे सम्बन्ध रखनेवाली सुसङ्गत कथाएँ सुनती हुई उनमें विशेषरूपसे रम जाती थीं ॥
विचरन्तस्ततो हंसा ददृशुश्चारुहासिनीम्।
प्रभावतीं वरारोहां वज्रनाभसुतां तदा ॥ ११ ॥
तदनन्तर वहाँ विचरते हुए हंसोंने उस समय वज्रनाभकी पुत्री मनोहर मुसकानवाली सुन्दरी प्रभावतीको देखा ॥ ११ ॥
हंसाः परिचितां चक्रुस्तां ततश्चारुहासिनीम्।
सखीं शुचिमुखीं चक्रे हंसीं राजसुता तदा ॥ १२ ॥
फिर उन सभी हंसोंने उस चारुहासिनी राजकुमारीसे परिचय कर लिया। राजकुमारी प्रभावतीने उस समय शुचिमुखी नामवाली हंसीको अपनी सखी बना लिया ॥ १२ ॥
सा तां कदाचित् पप्रच्छ वज्रनाभसुतां सखीम्।
विश्रम्मितां पृथक्सूक्तैराख्यानकशतैर्वराम् ॥ १३ ॥
एक दिनकी बात है, शुचिमुखीने सैकड़ों कथाएँ तथा भाँति-भाँतिकी सुन्दर उक्तियाँ सुनाकर अपनी श्रेष्ठ सखी वज्रनाभकुमारी प्रभावतीके मनमें पूर्ण विश्वास पैदा कर लिया। तत्पश्चात् उससे पूछा—॥ १३ ॥
त्रैलोक्यसुन्दरीं वेद्मि त्वामहं हि प्रभावति।
रूपशीलगुणैर्देवि किञ्चित् त्वां वक्तुमुत्सहे ॥ १४ ॥
'प्रभावती ! मैं तुम्हें त्रिभुवनकी अद्वितीय सुन्दरी मानती हूँ। देवि ! तुम रूप, शील और गुणोंमें श्रेष्ठ हो, इसलिये मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ ॥ १४ ॥
व्यतिक्रामति ते भीरु यौवनं चारुहासिनि।
यदतीतं पुनर्नैति गतं स्रोत इवाम्भसः ॥ १५ ॥
'भीरु ! चारुहासिनि ! तुम्हारी जवानी व्यर्थ बीती जा रही है। जैसे जलका बहता हुआ स्रोत फिर पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार जो अवस्था बीत गयी, वह फिर वापिस नहीं आती है ॥ १५ ॥
कामोपभोगतुल्या हि रतिर्देवि न विद्यते।
स्त्रीणां जगति कल्याणि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १६ ॥
'देवि ! कल्याणि ! संसारमें स्त्रियोंके लिये कामोपभोगके समान दूसरा कोई सुख नहीं है; यह मैं तुमसे सत्य कहती हूँ॥
स्वयंवरे च न्यस्ता त्वं पित्रा सर्वाङ्गशोभने।
न च कांचिद् वरयसे देवासुरकुलोद्भवन् ॥ १७ ॥
'सर्वाङ्गशोभने ! तुम्हारे पिताने तुम्हें स्वयंवरमें उपस्थित किया, परंतु तुम देवताओं तथा असुरोंके कुलमें उत्पन्न हुए किन्हीं योग्य पुरुषका वरण ही नहीं करती हो (इसका क्या कारण है?) ॥ १७ ॥
व्रीडिता यान्ति सुश्रोणि प्रत्याख्यातास्त्वया शुभे।
रूपशौर्यगुणैर्युक्तान् सदृशांस्त्वं कुलस्य हि ॥ १८ ॥
आगतान् नेच्छसे देवि सदृशान् कुलरूपयोः।
'शुभे ! सुश्रोणि ! तुम्हारे इनकार कर देनेपर ब्याहके लिये आये हुए पुरुष लज्जित होकर लौट जाते हैं। देवि ! जो रूप और शौर्य आदि गुणोंसे युक्त हैं तथा तुम्हारे कुलके सर्वथा अनुरूप हैं, ऐसे कुल और रूपमें अपने ही समान पुरुषोंके आनेपर भी तुम उन्हे वरण करना नहीं चाहती (ऐसा क्यों करती हो?) ॥ १८१/२ ॥
इहैष्यति किमर्थं त्वां प्रद्युम्नो रुक्मिणीसुतः ॥ १९ ॥
त्रैलोक्ये यस्य रूपेण सदृशो न कुलेन वा।
गुणैर्वा चारुसर्वाङ्गि शौर्येणाप्यति वा शुभे ॥ २० ॥
'भला रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न यहाँ किसलिये आयेंगे? जिनके रूप और कुलकी समानता करनेवाला त्रिलोकीमें दूसरा कोई नहीं है। शुभे ! सर्वाङ्गसुन्दरी ! वे गुणों अथवा शौर्यमें भी सबसे बढ़कर हैं ॥ १९-२० ॥
देवेषु देवः सुश्रोणि दानवेषु च दानवः।
मानुषेष्वपि धर्मात्मा मनुष्यः स महाबलः ॥ २१ ॥
'सुश्रोणि ! वे महाबली प्रद्युम्न देवताओंमें देवता, दानवोंमे दानव और मनुष्योंमें भी धर्मात्मा मनुष्य है ॥ २१ ॥
यं सदा देवि दृष्ट्वा हि स्रवन्ति जघनानि हि।
आपीनानीव धेनूनां स्रोतांसि सरितामिव ॥ २२ ॥