विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
| ५८६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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त्रिविष्टपे नित्यरता भवन्तश्चारुभाषिणः।
यदैवेहोत्सवोऽस्माकं भवद्भिरवगम्यते ॥ ६ ॥
आगन्तव्यं जालपादाः खमिदं भवतां गृहम्।
विस्रब्धं च प्रवेष्टव्यं त्रिविष्टपनिवासिभिः ॥ ७ ॥
'हंसो ! तुमलोग सदा स्वर्गलोकमें रमते और मनोहर बोली बोलते हो। जब कभी यहाँ हमलोगोंके घर उत्सव हो और तुम्हें इसका पता लग जाय, तब तुम अवश्य यहाँ पधारना। यह तुम्हारा अपना ही घर है। स्वर्गनिवासी हंसोंको यहाँ निर्भय होकर प्रवेश करना चाहिये' ॥ ६-७ ॥
ते तथोक्ताः शकुनयो वज्रनाभेन भारत।
तथेत्युक्त्वा हि विविशुर्दानवेन्द्रनिवेशनम् ॥ ८ ॥
भारत ! वज्रनाभके ऐसा कहनेपर उन पक्षियोंने 'तथास्तु' कहकर उसकी बात मान ली और उस दानवराजके महलमें प्रवेश किया ॥ ८ ॥
चक्रुः परिचयं ते च देवकार्यव्यपेक्षया।
मानुषालापिनस्ते तु कथाश्चक्रुः पृथग्विधाः ॥ ९ ॥
उन्होंने देवताओंके कार्यको सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ सबसे परिचय प्राप्त किया। वे मनुष्योंकी-सी बोली बोलते और भाँति-भाँतिकी कथाएँ कहते थे ॥ ९ ॥
वंशवृद्धाः काश्यपानां सर्वकल्याणभागिनाम्।
स्त्रियो रेमुर्विशेषेण शृण्वन्त्यः सङ्गताः कथाः ॥ १० ॥
समस्त कल्याणमय पदार्थोंका उपभोग करनेवाले कश्यपवंशी दानवोंकी स्त्रियाँ अपने वंशसे सम्बन्ध रखनेवाली सुसङ्गत कथाएँ सुनती हुई उनमें विशेषरूपसे रम जाती थीं ॥
विचरन्तस्ततो हंसा ददृशुश्चारुहासिनीम्।
प्रभावतीं वरारोहां वज्रनाभसुतां तदा ॥ ११ ॥
तदनन्तर वहाँ विचरते हुए हंसोंने उस समय वज्रनाभकी पुत्री मनोहर मुसकानवाली सुन्दरी प्रभावतीको देखा ॥ ११ ॥
हंसाः परिचितां चक्रुस्तां ततश्चारुहासिनीम्।
सखीं शुचिमुखीं चक्रे हंसीं राजसुता तदा ॥ १२ ॥
फिर उन सभी हंसोंने उस चारुहासिनी राजकुमारीसे परिचय कर लिया। राजकुमारी प्रभावतीने उस समय शुचिमुखी नामवाली हंसीको अपनी सखी बना लिया ॥ १२ ॥
सा तां कदाचित् पप्रच्छ वज्रनाभसुतां सखीम्।
विश्रम्मितां पृथक्सूक्तैराख्यानकशतैर्वराम् ॥ १३ ॥
एक दिनकी बात है, शुचिमुखीने सैकड़ों कथाएँ तथा भाँति-भाँतिकी सुन्दर उक्तियाँ सुनाकर अपनी श्रेष्ठ सखी वज्रनाभकुमारी प्रभावतीके मनमें पूर्ण विश्वास पैदा कर लिया। तत्पश्चात् उससे पूछा—॥ १३ ॥
त्रैलोक्यसुन्दरीं वेद्मि त्वामहं हि प्रभावति।
रूपशीलगुणैर्देवि किञ्चित् त्वां वक्तुमुत्सहे ॥ १४ ॥
'प्रभावती ! मैं तुम्हें त्रिभुवनकी अद्वितीय सुन्दरी मानती हूँ। देवि ! तुम रूप, शील और गुणोंमें श्रेष्ठ हो, इसलिये मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ ॥ १४ ॥
व्यतिक्रामति ते भीरु यौवनं चारुहासिनि।
यदतीतं पुनर्नैति गतं स्रोत इवाम्भसः ॥ १५ ॥
'भीरु ! चारुहासिनि ! तुम्हारी जवानी व्यर्थ बीती जा रही है। जैसे जलका बहता हुआ स्रोत फिर पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार जो अवस्था बीत गयी, वह फिर वापिस नहीं आती है ॥ १५ ॥
कामोपभोगतुल्या हि रतिर्देवि न विद्यते।
स्त्रीणां जगति कल्याणि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १६ ॥
'देवि ! कल्याणि ! संसारमें स्त्रियोंके लिये कामोपभोगके समान दूसरा कोई सुख नहीं है; यह मैं तुमसे सत्य कहती हूँ॥
स्वयंवरे च न्यस्ता त्वं पित्रा सर्वाङ्गशोभने।
न च कांचिद् वरयसे देवासुरकुलोद्भवन् ॥ १७ ॥
'सर्वाङ्गशोभने ! तुम्हारे पिताने तुम्हें स्वयंवरमें उपस्थित किया, परंतु तुम देवताओं तथा असुरोंके कुलमें उत्पन्न हुए किन्हीं योग्य पुरुषका वरण ही नहीं करती हो (इसका क्या कारण है?) ॥ १७ ॥
व्रीडिता यान्ति सुश्रोणि प्रत्याख्यातास्त्वया शुभे।
रूपशौर्यगुणैर्युक्तान् सदृशांस्त्वं कुलस्य हि ॥ १८ ॥
आगतान् नेच्छसे देवि सदृशान् कुलरूपयोः।
'शुभे ! सुश्रोणि ! तुम्हारे इनकार कर देनेपर ब्याहके लिये आये हुए पुरुष लज्जित होकर लौट जाते हैं। देवि ! जो रूप और शौर्य आदि गुणोंसे युक्त हैं तथा तुम्हारे कुलके सर्वथा अनुरूप हैं, ऐसे कुल और रूपमें अपने ही समान पुरुषोंके आनेपर भी तुम उन्हे वरण करना नहीं चाहती (ऐसा क्यों करती हो?) ॥ १८१/२ ॥
इहैष्यति किमर्थं त्वां प्रद्युम्नो रुक्मिणीसुतः ॥ १९ ॥
त्रैलोक्ये यस्य रूपेण सदृशो न कुलेन वा।
गुणैर्वा चारुसर्वाङ्गि शौर्येणाप्यति वा शुभे ॥ २० ॥
'भला रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न यहाँ किसलिये आयेंगे? जिनके रूप और कुलकी समानता करनेवाला त्रिलोकीमें दूसरा कोई नहीं है। शुभे ! सर्वाङ्गसुन्दरी ! वे गुणों अथवा शौर्यमें भी सबसे बढ़कर हैं ॥ १९-२० ॥
देवेषु देवः सुश्रोणि दानवेषु च दानवः।
मानुषेष्वपि धर्मात्मा मनुष्यः स महाबलः ॥ २१ ॥
'सुश्रोणि ! वे महाबली प्रद्युम्न देवताओंमें देवता, दानवोंमे दानव और मनुष्योंमें भी धर्मात्मा मनुष्य है ॥ २१ ॥
यं सदा देवि दृष्ट्वा हि स्रवन्ति जघनानि हि।
आपीनानीव धेनूनां स्रोतांसि सरितामिव ॥ २२ ॥
विष्णुपर्व ] द्विनवतितमोऽध्यायः ५८७
'देवि ! जैसे दूध देनेवाली गौओंके थन और सरिताओंके स्रोत टपकते हैं, उसी तरह उन प्रद्युम्नको देखकर सदा ही स्त्रियोंके जघनप्रदेश आर्द्र हो जाते हैं ॥ २२ ॥
न पूर्णचन्द्रेण मुखं नयने वा कुशेशयैः ।
उत्सहे नोपमातुं हि मृगेन्द्रेणाथ वा गतिम् ॥ २३ ॥
'उनके मुखकी पूर्ण चन्द्रसे, नयनोंकी नीलकमलसे अथवा गति ( चाल ) की सिंहसे मै उपमा नहीं दे सकती (क्योंकि ये सब हीन प्रतीत होते हैं) ॥ २३ ॥
जगतः सारमुद्धृत्य पुत्रः स विहितः शुभे ।
कृत्वाङ्गं वरे साङ्गं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ २४ ॥
'शुभे ! सुन्दरी ! प्रभावशाली भगवान् विष्णुने सारे जगत्का सार निकालकर अनङ्गको साङ्ग करके अपने उस पुत्रका निर्माण किया है ॥ २४ ॥
हृतेन शम्बरो बाल्ये येन पापो निवार्वितः ।
मायाश्च सर्वाः सम्प्राप्ता न च शीलं विनाशितम् ॥ २५ ॥
'बाल्यावस्थामें उन्हें शम्बरासुरने हर लिया था; परंतु उन्होंने बड़े होनेपर उस पापीको मार डाला ! उसकी सारी मायाएँ प्राप्त कर लीं; फिर भी किसीके शीलका विनाश नहीं किया ॥ २५ ॥
यान् यान् गुणान् पृथुश्रोणि मनसा कल्पयिष्यसि ।
एष्टव्यांस्त्रिषु लोकेषु प्रद्युम्ने सर्व एव ते ॥ २६ ॥
'पृथुश्रोणि ! तुम मनसे जिन-जिन उत्तम गुणोंकी कल्पना करोगी अथवा तीनों लोकोंमें जो-जो श्रेष्ठ गुण वाञ्छनीय हैं, वे सब-के-सब प्रद्युम्नमें वर्तमान हैं ॥ २६ ॥
रुच्या वह्निप्रतीकाशः क्षमया पृथिवीसमः ।
तेजसा सूर्यसदृशो गाम्भीर्येण हृदोपमः ।
प्रभावती शुचिमुखीं त्वितीहोवाच भामिनी ॥ २७ ॥
'वे कान्तिमें अग्निके समान, क्षमामे पृथ्वीके तुल्य, तेजमें सूर्यके सदृश तथा गम्भीरतामें सागरके समान हैं' यह सुनकर भामिनी प्रभावतीने शुचिमुखीसे इस प्रकार कहा ॥
प्रभावत्युवाच
विष्णुर्मानुषलोकस्थः श्रुतः सुबहुशो मया ।
पितुः कथयतः सौम्ये नारदस्य च धीमतः ॥ २८ ॥
प्रभावती बोली- सौम्ये ! मैंने बुद्धिमान् नारदजी तथा अपने पिताके मुखसे कई बार सुना है कि भगवान् विष्णु इस समय मनुष्यलोकमे अवतीर्ण होकर विराज रहे हैं ॥
शत्रुः किल स दैत्यानां वर्जनीयः सदानघे ।
कुलानि किल दैत्यानां तेन दग्धानि मानिनि ॥ २९ ॥
प्रदीप्तेन रथाङ्गेन शार्ङ्गेण गदया तथा।
शाखानगरदेशेषु वसन्ति किल येऽसुराः ॥ ३० ॥
इत्येते दानवेन्द्रेण संदिश्यन्ते हि तं प्रति ।
पापरहित मानिनि ! शाखानगरके प्रदेशोंमें जो असुर निवास करते हैं, उन्हें मेरे पिता दानवराज वज्रनाभ भगवान् विष्णुके विषयमें इस प्रकार संदेश दिया करते हैं-'विष्णु दैत्योंके शत्रुकी रूपमें प्रसिद्ध हैं, अतः उन्हें सदाके लिये त्याग देना चाहिये। उन्होंने अपने तेजस्वी चक्र, शार्ङ्ग-धनुष तथा कौमोदकी गदाके द्वारा दैत्योंके बहुत-से कुल दग्ध कर डाले हैं' ॥ २९-३० १/२ ॥
मनोरथो हि सर्वासां स्त्रीणामेव शुचिस्मिते ॥ ३१ ॥
भवेद्धि मे प्रतिकुलं श्रेष्ठं पितृकुलादिति ।
पवित्र मुसकानवाली हंसी ! प्रायः सभी स्त्रियोंका ऐसा ही मनोरथ होता है कि मेरा पतिकुल पितृकुलसे श्रेष्ठ हो ॥
यदि नामाभ्युपायः स्यात् तस्येहागमनं प्रति ॥ ३२ ॥
महाननुग्रहो मे स्यात् कुलं स्यात् पावनं च मे ।
यदि प्रद्युम्नके यहाँ आनेके लिये कोई उपाय हो सके तो यह मुझपर तुम्हारा महान् अनुग्रह होगा और मेरा कुल पवित्र हो जायगा ॥ ३२ १/२ ॥
समर्थनां मे पृष्टा त्वं प्रयच्छ शुचिलापिनि ॥ ३३ ॥
प्रद्युम्नः स्याद् यथा भर्ता स मे वृष्णिकुलोद्भवः ।
पवित्र वार्ता करनेवाली हंसी ! मैंने तुमसे कार्यसिद्धिका उपाय पूछा है। वह उपाय तुम मुझे प्रदान करो। वृष्णिवंशा-वतंस प्रद्युम्न जिस प्रकार मेरे पति हो सकें, वैसा यत्न करो ॥
अत्यन्तवैरी दैत्यानामुद्वेजनकरो हरिः ॥ ३४ ॥
असुराणां स्त्रियो वृद्धाः कथयन्त्यो मया श्रुताः ।
मैंने असुरोंकी बड़ी-बूढ़ी स्त्रियोंके मुखसे यह बात सुनी है कि भगवान् विष्णु दैत्योंके अत्यन्त वैरी और उन्हे उद्वेगमे डालनेवाले हैं ॥ ३४ १/२ ॥
प्रद्युम्नस्य तथा जन्म पुरस्तादपि मे श्रुतम् ॥ ३५ ॥
यथा च तेन निहतो बलवान् कालशम्बरः ।
प्रद्युम्नके जन्मका वृत्तान्त मैंने पहले भी सुना है। जिस प्रकार उनके द्वारा बलवान् कालशम्बर मारा गया था, वह प्रसङ्ग भी मेरे सुननेमें आया है ॥ ३५ १/२ ॥
हृदि मे वर्तते नित्यं प्रद्युम्नः खलु सत्समे ॥ ३६ ॥
हेतुः स नास्ति स्यात् तेन यथा मम समागमः ।
साध्वीशिरोमणे ! प्रद्युम्न सदा मेरे हृदयमें विद्यमान रहते हैं; परंतु ऐसी कोई युक्ति या साधन नहीं है, जिससे उनके साथ मेरा समागम हो सके ॥ ३६ १/२ ॥
दासी त्वाहं सख्याहें दूत्ये त्वां च विसर्जये ॥ ३७ ॥
पण्डितासि वद्योपायं मम तस्य च संगमे ।
आदरणीया सखी ! मैं तुम्हारी दासी हूँ और तुम्हें दूतीके कामपर नियुक्त करती हूँ। तुम विदुषी हो। मेरे और प्रद्युम्नके मिलनका कोई उपाय बताओ ॥ ३७ १/२ ॥
| ५८८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ततस्तां सान्त्वयित्वा सा प्रहसन्तीदमब्रवीत् ॥ ३८ ॥
तब हंसीने उसे सान्त्वना देकर हँसते हुए कहा ॥ ३८ ॥
शुचिमुख्युवाच
तत्र दूती गमिष्यामि तवाहं चारुहासिनि ।
इमां भक्तिं तवोदारां प्रवक्ष्यामि शुचिस्मिते ॥ ३९ ॥
शुचिमुखी बोली—चारुहासिनि ! शुचिस्मिते ! मैं वहाँ तुम्हारी दूती बनकर जाऊँगी और प्रद्युम्नसे तुम्हारी इस उदार भक्तिका वर्णन करूँगी ॥ ३९ ॥
तथा चैव करिष्यामि यथैष्यति तवान्तिकम् ।
साक्षात्कामेन सुश्रोणि भविष्यसि सकामिनी ॥ ४० ॥
सुश्रोणि ! मैं ऐसा प्रयत्न भी करूँगी, जिससे वे तुम्हारे निकट पधारेंगे और तुम साक्षात् कामसे मिलकर अपनी कामना सफल करोगी ॥ ४० ॥
इति मे भाषितं नित्यं स्मरेथाः शुचिलोचने ।
कथाकुशलतां पित्रे कथयस्यायतेक्षणे ॥ ४१ ॥
मम त्वं तत्र मे देवि हितं सम्यक् प्रपत्स्यसे ।
पवित्र नेत्रोंवाली राजकुमारी ! विशाललोचने ! मेरी इस बातको तुम सदा याद रखना । अपने पिताके सामने बराबर मेरे कथा-कौशलकी चर्चा करती हुई यह कहना कि शुचिमुखी कथा कहनेमें बहुत ही कुशल है । देवि ! वहाँ पिताके निकट तुम सदा मेरे हित-साधनका ध्यान रखना ॥
इत्युक्ता सा तथा चक्रे यत्तत् सा तामथाब्रवीत् ॥ ४२ ॥
दानवेन्द्रश्च तां हंसीं पप्रच्छान्तःपुरे तदा ।
प्रभावत्या समाख्याता कथाकुशलता तव ॥ ४३ ॥
तत्त्वं शुचिमुखि ब्रूहि कथां योग्यतया वरे ।
किं त्वया दृष्टमाश्चर्यं जगत्युत्तमपक्षिणि ॥ ४४ ॥
अदृष्टपूर्वमन्यैर्वा योग्यायोग्यमनिन्दिते ।
शुचिमुखीके ऐसा कहनेपर प्रभावतीने वैसा ही किया, जैसा कि उस (हंसी) ने उससे कहा था । उस समय दानवराज वज्रनाभने अन्तःपुरमें उस हंसीसे पूछा—'शुचिमुखि ! प्रभावतीने बताया है कि तुम कथा कहनेमें बड़ी चतुर हो । अतः उत्तम पक्षिणि ! तुम कोई कथा कहो; क्योंकि योग्यतामें बड़ी हो । बताओ, संसारमें तुमने कौन-सी आश्चर्यकी बात देखी है ? अनिन्दिते ! जिसे दूसरोंने पहले कभी नहीं देखा हो, ऐसी कोई योग्य या अयोग्य आश्चर्यकी बात तुमने देखी हो तो बताओ' ॥ ४२-४४ १/२ ॥
सोवाच वज्रनाभं तु हंसी नरवरोत्तम ॥ ४५ ॥
श्रूयतामित्यथामन्त्र्य दानवेन्द्रं महाद्युतिम् ।
नरेशशिरोमणे ! तब हंसीने महातेजस्वी दानवराज वज्रनाभको सम्बोधित करके कहा—सुनिये—॥ ४५ १/२ ॥
दृष्टा मे शाण्डिली नाम साध्वी दानवसत्तम ।
आश्चर्यं कर्म कुर्वन्ती मेरुपाश्र्वे मनस्विनी ॥ ४६ ॥
'दानवश्रेष्ठ ! मैंने मेरुगिरिके पार्श्वभागमें साध्वी मनस्विनी शाण्डिलीको देखा है; जो वहाँ आश्चर्यजनक कार्य करती हैं ॥ ४६ ॥
सुमनाश्चैव कौशल्या सर्वभूतहिते रता ।
कथंचिद् वरशाण्डिल्याः शैलपुत्र्याः शुभा सखी ॥ ४७ ॥
'समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली कौशल्या सुमनाका भी किसी प्रकार दर्शन किया है, जो शैलपुत्री श्रेष्ठ शाण्डिलीकी शुभ सखी हैं ॥ ४७ ॥
नटश्चैव मया दृष्टो मुनिदत्तवरः शुभः ।
कामरूपी च भोज्यश्च त्रैलोक्ये नित्यसम्मतः ॥ ४८ ॥
'एक नटको भी मैंने देखा है, जिसे मुनियोंने अभीष्ट वर दे रक्खा है । वह शुभलक्षण नट इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला, भोजनीय तथा त्रिभुवनमें सबको सदा ही प्रिय है ॥ ४८ ॥
कुरून् यात्युत्तरान् वीर कालास्रद्वीपमेव च ।
भद्राश्वान् केतुमालांश्च द्वीपानन्यांस्तथानघ ॥ ४९ ॥
'वीर ! वह उत्तर कुरुमें जाता तथा कालास्रद्वीपकी भी यात्रा करता है । अनघ ! वह भद्राश्व, केतुमाल तथा अन्य द्वीपोंमें भी जाया करता है ॥ ४९ ॥
देवगन्धर्वगेयानि नृत्यानि विविधानि च ।
स वेत्ति देवान् नृत्येन विस्मापयति सर्वथा ॥ ५० ॥
'देवता और गन्धर्व ही जिन्हें गाते हैं, उन गीतोंको भी वह गाता है तथा भाँति-भाँतिके नृत्योंको भी जानता है । वह अपने नृत्योंसे देवताओंको भी सर्वथा आश्चर्यचकित कर देता है' ॥ ५० ॥
वज्रनाभ उवाच
श्रुतमेतन्मया हंसि न चिरादिव विस्तरम् ।
चारणानां कथयतां सिद्धानां च महात्मनाम् ॥ ५१ ॥
वज्रनाभ बोला—हंसी ! थोड़े ही दिन हुए मैंने भी महात्मा, सिद्धों और चारणोंके मुखसे यह नटविषयक समाचार विस्तारपूर्वक सुना है ॥ ५१ ॥
कुतूहलं ममाप्यस्ति सर्वथा पक्षिनन्दिनि ।
नटे दत्तवरे तस्मिन् संस्तवस्तु न विद्यते ॥ ५२ ॥
पक्षिनन्दिनि ! मुझे भी उस वरप्राप्त नटको देखनेके लिये सर्वथा उत्कण्ठा हो रही है; परंतु मालूम होता है, मेरी प्रसिद्धि उसके कानोंतक नहीं गयी है ( इसलिये वह अबतक यहाँ नहीं आ सका है) ॥ ५२ ॥
हंस्युवाच
सप्तद्वीपान् विचरति नटः स द्विजोत्तम ।
गुणवन्तं जनं श्रुत्वा गुणकार्यः स सर्वथा ॥ ५३ ॥
तव चेच्छृणुयाद् वीर सङ्गतं गुणविस्तरम् ।
नटं तदागतं विद्धि पुरं तव महासुर ॥ ५४ ॥
विष्णुपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः ५८९
हंसीने कहा—दैत्यप्रवर ! वह नट सातों द्वीपोंमें विचरता है और गुणवान् पुरुषका नाम सुनकर उसके पास जाता है। उसके कार्य सर्वथा गुणयुक्त होते हैं। वीर महासुर ! यदि वह तुम्हारे श्रेष्ठ एवं विस्तृत गुणोंको सुन ले तो उसे अपने नगरमें आया हुआ ही समझो ॥ ५३-५४ ॥
वज्रनाभ उवाच
उपायः सृज्यतां हंसि येनेह स नटः शुभे।
आगच्छेन्मम भद्रं ते विषयं पक्षिनन्दिनि ॥ ५५॥
वज्रनाभ बोला—शुभे ! पक्षिनन्दिनि हंसी ! तुम्हारा भला हो। तुम ऐसा कोई उपाय करो, जिससे वह नट मेरे राज्यमे आ जाय ॥ ५५ ॥
ते हंसा वज्रनाभेन कार्यहेतोर्विसर्जिताः।
देवेन्द्रायाथ कृष्णाय शशंसुः सर्वमेव तत् ॥ ५६॥
वज्रनाभद्वारा अपने कार्यकी सिद्धिके लिये भेजे गये उन हंसोंने देवराज इन्द्र तथा भगवान् श्रीकृष्णसे वह सब समाचार कह सुनाया ॥ ५६ ॥
अधोक्षजेन प्रद्युम्नो नियुक्तस्तत्र कर्मणि।
प्रभावत्याश्च संसर्गे वज्रनाभवधे तथा ॥ ५७॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने प्रद्युम्नको उस कार्यमें नियुक्त किया। उनका काम था प्रभावतीसे मेल-जोल बढ़ाना और वज्रनाभका वध करना ॥ ५७ ॥
दैवीं मायां समाश्रित्य संविधाय हरिर्नटम्।
नटवेषेण भैमानां प्रेषयामास भारत ॥ ५८॥
श्रीहरिने दैवी मायाका आश्रय लेकर प्रद्युम्नको नट बनाकर भेजा । भारत ! उन्होंने नटके वेषमें ही मुख्य-मुख्य यादवोंको वहाँ भेज दिया ॥ ५८ ॥
प्रद्युम्नं नायकं कृत्वा साम्बं कृत्वा विदूषकम्।
पारिपार्श्वे गदं वीरमन्यान् भैमांस्तथैव च ॥ ५९॥
उन्होंने प्रद्युम्नको नायक, साम्बको विदूषक और वीरवर गदको पारिपार्श्वक बनाकर अन्यान्य यादवोंको भी उसी तरह विभिन्न भूमिकाओंमें सजाकर भेजा ॥ ५९ ॥
वारमुख्या नटीः कृत्वा तन्नृत्यसदृशास्तदा।
तथैव भद्रं भद्रस्य सहायांश्च तथाविधान् ॥ ६० ॥
मुख्य-मुख्य वाराङ्गनाओंको नटी बनाकर, जो उस नृत्य, गीत एवं वाद्यके अनुरूप थीं, भेजा। उसी तरह भद्र और उसके सहायकोंको भी तदनुरूप वेषोंमें भेज दिया ॥ ६० ॥
प्रद्युम्नविहितं रम्यं विमानं ते महारथाः।
जग्मुरारुह्य कार्यार्थं देवानामितौजसाम् ॥ ६१॥
वे महारथी वीर प्रद्युम्नके बनाये हुए रमणीय विमानपर आरूढ़ हो महातेजस्वी देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ गये ॥ ६१ ॥
एकैकस्य समा रूपे पुरुषाः पुरुषस्य ते।
स्त्रीणां च सदृशाः सर्वे ते स्त्रैणेनरराधिपाः ॥ ६२॥
वे सभी पुरुष रूपमे एक-एक पुरुषके अनुरूप थे तथा वे सभी राजकुमार अपने रूप-सौन्दर्यद्वारा स्त्रियोंकी भी समानता करते थे ॥ ६२ ॥
ते वज्रनगरस्याथ शाखानगरमुत्तमम्।
जग्मुर्दानवसंकीर्णं सुपुरं नाम नामतः ॥ ६३॥
वे सब-के-सब वज्रपुरके उत्तम शाखानगर सुपुरमें, जो दानवोंसे भरा-पूरा था, गये ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वज्रनाभप्रद्युम्नोत्तरे प्रद्युम्नादिगमने द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वज्रनाभ और प्रद्युम्नकी प्रधानतामें होनेवाले युद्धके प्रसङ्गमें प्रद्युम्न आदिका वज्रपुरको गमनविषयक बानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥
त्रिनवतितमोऽध्यायः
नटवेशधारी यादवोंका सुपुर और वज्रपुरमें सफल अभिनय करके दानवोंको रिझाकर उनसे उपहार पाना तथा प्रद्युम्नका प्रभावतीके घरमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
ततः सुपुरवासीनामसुराणां नराधिप।
ददावाज्ञां वज्रनाभो दीयतां गृहमुत्तमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! तदनन्तर वज्रनाभने सुपुरवासी असुरोंको आज्ञा दी कि 'इन नटोंके लिये उत्तम गृह प्रदान करो ॥ १ ॥
आतिथ्यं क्रियतामेषां बहुरत्नमुपायनम्।
वासांसि सुविचित्राणि सुखाय जनरञ्जनम् ॥ २ ॥
'इन सबका आतिथ्य-सत्कार करो। इन्हें उपहारमे बहुत-से रत्न तथा सुन्दर एवं विचित्र वस्त्र प्रदान करो। साथ ही इन्हें सुख पहुँचानेके लिये ऐसी सामग्री भेंट करो, जो मनुष्यमात्रके मनको प्रसन्न करनेवाली हो' ॥ २ ॥
भर्तुराज्ञां समालभ्य तथा चक्रुश्च सर्वशः।
पूर्वश्रुतो नटः प्राप्तः कौतूहलमजीजनत् ॥ ३ ॥
स्वामीकी आज्ञा पाकर उन असुरोंने सब कुछ वैसा ही किया। पहले जिसके विषयमें सुना गया था, वही नट आया
५९० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
है; इस भावनाने सबके मनमे नयी उत्कण्ठा उत्पन्न कर दी थी ॥ ३ ॥
नटस्याथ ददुर्दैत्याः सत्कारं परया मुदा।
पर्यायार्थे ददुश्चापि रत्नानि सुवहून्यथ ॥ ४ ॥
दैत्योंने भद्र नामक नटको बड़ी प्रसन्नताके साथ उत्तम सत्कार प्रदान किया। उन्होंने वेश-धारणके लिये उसे बहुत-से रत्न दिये ॥ ४ ॥
ततः स ननृते तत्र वरदत्तो नटस्तथा।
सुपुरे पुरवासीनां परं हर्षं समादधत् ॥ ५ ॥
तदनन्तर वर प्राप्त किये हुए उस नटने वहाँ सुपुरमें नृत्य किया और पुरवासियोंके मनमें महान् हर्ष भर दिया ॥ ५ ॥
रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् ।
जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ॥ ६ ॥
उसने रामायण नामक महाकाव्यकी कथावस्तुको लेकर वहाँ एक नाटक किया। उसमें यह दिखाया गया कि राक्षस-राज रावणके वधकी इच्छासे अप्रमेयस्वरूप भगवान् विष्णुका भूतलपर अवतार हुआ ॥ ६ ॥
लोमपादो दशरथ ऋष्यशृङ्गं महामुनिम्।
शान्तामप्यानयामास गणिकाभिः सहानघ ॥ ७ ॥
अनघ ! लोमपादने महामुनि ऋष्यशृङ्गको गणिकाओंके साथ अपने यहाँ बुलवाया; फिर महाराज दशरथने ऋष्य-शृङ्गके साथ उनकी पत्नी शान्ताको भी अपने यहाँ निमन्त्रित किया ॥ ७ ॥
रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्चैव भारत।
ऋष्यशृङ्गश्च शान्ता च तथारूपैर्नटैः कृताः ॥ ८ ॥
भरतनन्दन ! राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, भरत, ऋष्यशृङ्ग तथा शान्ताका वेश उन्हींके जैसे रूपवाले नटोंने धारण किया था ॥ ८ ॥
तत्कालजीविनो वृद्धा दानवा विस्मयं गताः।
आचचक्षुश्च तेषां वै रूपतुल्यत्वमच्युत ॥ ९ ॥
राजन् ! जो रामके समयमे जीवित थे, वे बूढ़े दानव भी उन्हें देखकर आश्चर्यचकित हो गये और कहने लगे, इनका रूप तो ठीक उन्हीं व्यक्तियोंके तुल्य है ॥ ९ ॥
संस्काराभिनयौ तेषां प्रस्तावानां च धारणम् ।
दृष्ट्वा सर्वे प्रवेशं च दानवा विस्मयं गताः ॥ १० ॥
उनके संस्कार ( वेश-धारण ), अभिनय, प्रस्तावों ( क्रिया-प्रसङ्गों ) का धारण तथा प्रवेश ( पात्रोंका प्रथम दर्शन,) देखकर सभी दानव बड़े विस्मयमे पड़ गये थे ॥ १० ॥
ते रक्ता विस्मयं नेदुरसुराः परया मुदा।
उत्थायोत्थाय नाट्यस्य विषयेषु पुनः पुनः ॥ ११ ॥
ददुर्वस्त्राणि तुष्टाश्च ग्रैवेयवलयानि च।
हारान् मनोहरांश्चैव हेमवैडूर्यभूषितान् ॥ १२ ॥
उस नाटकमे अनुरक्त हुए वे असुरगण नाट्य विषयोंमें बारंबार उठ-उठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ आश्चर्ययुक्त कोलाहल करते और संतुष्ट हो नटोंको वस्त्र, गलेका भूषण, कङ्कण, मनोहर हेमवैडूर्यभूषित हार देते थे ॥ ११-१२ ॥
पृथगर्थेषु दत्तेषु लोकैस्ते तुष्टुवुर्नटाः।
असुरांश्च मुनींश्चैव गोत्रैरभिजनैरपि ॥ १३ ॥
लोगोंके इस प्रकार पृथक-पृथक् वस्तुओंकी भेंट देनेपर वे नट बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने उनके गोत्रों और पूर्वजोंका उल्लेख करके उन असुरों और ऋषि-मुनियोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १३ ॥
प्रेषितं वज्रनाभस्य शाखानगरवासिभिः।
नटस्य दिव्यरूपस्य नरेन्द्रागमनं तदा ॥ १४ ॥
नरेन्द्र ! उस समय शाखा-नगरनिवासी असुरोंने वज्रनाभके पास उस दिव्य रूपधारी नटके पधारनेका शुभ समाचार भेजा ॥
पुरा श्रुतार्थो दैत्येन्द्रः प्रेषयामास भारत।
आनीयतां वज्रपुरं नटोऽसाविति हर्षितः ॥ १५ ॥
भारत ! दैत्यराजने पहले ही यह समाचार सुन लिया था। अतः उसने अत्यन्त हर्षित होकर यह संदेश भेजा कि उस नटको वज्रपुरमें ले आया जाय ॥ १५ ॥
दानवेन्द्रवचः श्रुत्वा शाखानगरवासिभिः।
नीता वज्रपुरं रम्यं नटवेषेण यादवाः ॥ १६ ॥
दानवराजका वह आदेश सुनकर शाखानगरनिवासी असुर नटवेशधारी यादवोंको रमणीय वज्रपुरमें ले गये ॥ १६ ॥
आवासश्च ततो दत्तः सुकृतो विश्वकर्मणा।
एष्टव्यं यच्च तत् सर्वं दत्तं शतगुणोत्तरम् ॥ १७ ॥
दैत्यराजने उन्हें ठहरनेके लिये विश्वकर्माका बनाया हुआ सुन्दर भवन प्रदान किया और जिन-जिन वस्तुओंकी इच्छा या आवश्यकता होती है, उन सबको उन्होंने सौ गुना अधिक करके दे दिया ॥ १७ ॥
अथ कालोत्सवं चक्रे वज्रनाभो महासुरः।
कारयामास रम्यं च चमूवाटं प्रहृष्टवान् ॥ १८ ॥
तदनन्तर महान् असुर वज्रनाभने महाकाल नामक रुद्रदेवका उत्सव आरम्भ किया। उसमे उसने बड़े हर्षमे भरकर रमणीय चमूवाट ( सैनिकोंके मनोरञ्जनका स्थान ) बनवाया ॥ १८ ॥
ततस्तान् परिविश्रान्तान् प्रेक्षार्थाय प्रचोदयत् ।
दत्त्वा रत्नानि भूरीणि वज्रनाभो महाबलः ॥ १९ ॥
तत्पश्चात् जब वे नट पूर्ण विश्राम कर चुके, तब महाबली वज्रनाभने उन्हे बहुत-से रत्न देकर नाट्यकलाका प्रदर्शन करनेके लिये आज्ञा दी ॥ १९ ॥
उपविष्टश्च तान् द्रष्टुं सह ज्ञातिभिरात्मवान्।
छन्ने चान्तःपुरं स्थाप्य चक्षुर्हृद्ये नराधिप ॥ २० ॥
विष्णुपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः [ ५९१
नरेश्वर ! अन्तःपुरकी स्त्रियोंको पर्देकी ओटमें जहाँसे वे अपने नेत्रोंद्वारा सब कुछ देख सकती थीं, बिठाकर मनस्वी वज्रनाभ स्वयं भी जाति-भाइयोंके साथ उन नटोंका अभिनय देखनेके लिये बैठा ॥ २० ॥
भैमापि बद्धनेपथ्या नटवेषधरास्तथा।
कार्यार्थं भीमकर्माणो नृत्यार्थमुपचक्रमुः ॥ २१ ॥
भयंकर कर्म करनेवाले वे यादवकुमार भी उपयुक्त शृङ्गार करके नट-वेश धारण किये नृत्यका उपक्रम करने लगे ॥ २१ ॥
ततो घनं ससुषिरं मुरजानकभूषितम्।
तन्त्रीस्वरगणैर्विद्धमानातोद्यमनन्दयन् ॥ २२ ॥
फिर तो घन (झाँझ और करताल आदि), सुषिर (मुरली आदि), मुरज (मृदङ्ग), आनक (ढोल या नगाड़ा) तथा वीणाके स्वरोंसे मिश्रित दूसरे-दूसरे बाजे उन नटोंद्वारा बजाये जाने लगे ॥ २२ ॥
ततस्तु देवगान्धारं छालिक्यं श्रवणामृतम्।
भैमस्त्रियः प्रजगिरे मनःश्रोत्रसुखावहम् ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् यादवकुमारोंके साथ आयी हुई वाराङ्गनाएँ देवगान्धार नामक छालिक्य गान्धर्वका गान करने लगीं, जो कानोंको अमृतके समान मधुर प्रतीत होता था। वह श्रोताके मन और कान दोनोंको सुख देनेवाला था ॥ २३ ॥
आगान्धारग्रामरागं गङ्गावतरणं तथा।
विद्धमासारितं रम्यं जगिरे स्वरसम्पदा ॥ २४ ॥
गान्धार आदि सातों स्वरोंको व्याप्त करके स्थित होनेवाले जो त्रिविध1 ग्राम (कतिपय स्वरोंके समूह), वसन्त आदि राग तथा गङ्गावतरण नामक गीतविशेष हैं, उन्हें रागान्तरसे मिश्रित, व्याप्त तथा रमणीय बनाकर वे अपनी मधुर स्वर-सम्पत्तिके द्वारा गाने लगीं ॥ २४ ॥
लयतालसमं श्रुत्वा गङ्गावतरणं शुभम्।
असुरांस्तोपयामासुरथायोत्थाय भारत ॥ २५ ॥
भारत ! लय और तालके अनुरूप सुन्दर गङ्गावतरणको सुनकर (प्रद्युम्न, गद और साम्ब—ये तीनों बीच-बीचमें) खड़े हो-होकर असुरोंको सन्तोष प्रदान करते थे ॥ २५ ॥
नान्दिं च वादयामासुः प्रद्युम्नो गद एव च।
साम्बश्च वीर्यसम्पन्नः कार्यार्थं नटतां गतः ॥ २६ ॥
कार्यवश नटभावको प्राप्त हुए पराक्रमसम्पन्न प्रद्युम्न, गद और साम्ब नान्दी2 बजाने लगे ॥ २६ ॥
नान्द्यन्ते च तदा श्लोकं गङ्गावतराणाश्रितम्।
रौक्मिणेयस्तदोवाच सम्यक् स्वभिनयान्वितम् ॥ २७॥
उस समय नान्दी (माङ्गलिक पद्यपाठ) के अन्तमें रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने गङ्गावतरणसे सम्बन्ध रखनेवाले श्लोकका उत्तम अभिनयके साथ पाठ किया ॥ २७ ॥
रम्भाभिसारं कौबेरं नाटकं ननृतुस्ततः।
शूरो रावणरूपेण रम्भावेषा मनोवती ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् कुबेरलोकसम्बन्धी रम्भाभिसार नामक नाटकका वे सब लोग अभिनय करने लगे। शूर नामक यादव रावण रूपसे उपस्थित हुए। मनोवती नामक वाराङ्गनाने रम्भाका वेष धारण किया ॥ २८ ॥
नलकूबरस्तु प्रद्युम्नः साम्बस्तस्य विदूषकः।
कैलासो रूपितश्चापि मायया यदुनन्दनैः ॥ २९ ॥
प्रद्युम्न ही नलकूबर बने। साम्ब उनके विदूषक बनकर तदनुरूप कार्य करने लगे। यादवकुमारोंने मायासे वहाँ कैलासको ही मूर्तिमान् कर दिया ॥ २९ ॥
शापञ्च दत्तं क्रुद्धेन रावणस्य दुरात्मनः।
नलकूबरेण च यथा रम्भा चाप्यथ सान्त्विता ॥ ३० ॥
एतत् प्रकरणं वीरा ननृतुर्यदुनन्दनाः।
नारदस्य मुनेः कीर्तिं सर्वज्ञस्य महात्मनः ॥ ३१ ॥
क्रोधमें भरे हुए नलकूबरने जिस प्रकार दुरात्मा रावणको शाप दिया और जिस तरह रम्भाको सान्त्वना प्रदान की, इस प्रकरणका, जिसके द्वारा सर्वज्ञ महात्मा नारद मुनिकी कीर्तिपर प्रकाश पड़ता है, उन वीर यादवकुमारोंने नाटकद्वारा प्रदर्शन किया ॥ ३०-३१ ॥
पादोद्धारेण नृत्येन तथैवाभिनयेन च।
तुष्टुवुर्दानवा वीरा भैमानामिततेजसाम् ॥ ३२ ॥
अत्यन्त तेजस्वी भीमवंशियोंके पाद-विक्षेपपूर्वक किये गये नृत्य और अभिनयसे संतुष्ट हुए दानववीर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ३२ ॥
ते ददुर्वरमुख्यानि रत्नान्याभरणानि च।
हारांस्तरलाच्छिद्रांश्च वैडूर्यमणिभूषितान् ॥ ३३ ॥
उन्होंने अच्छे-अच्छे वस्त्र, रत्नमय आभूषण तथा वर्तुलाकार मणिसे विद्ध एवं वैदूर्यमणिसे विभूषित हार दिये ॥
Footnotes
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१. षड्ज, मध्यम और गान्धार—ये तीन ग्राम हैं। ↩
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२. यहाँ नान्दि शब्द एक वाद्यविशेषका वाचक है। यह चमड़ेके थैलेके समान होता है और उसके मुखपर शिववाहन नन्दीके मुखकी आकृति बनी रहती है, इसीलिये उसे नान्दी कहते हैं। कुछ लोगोंके मतमें बारह पटहों (नगाड़ों) की ध्वनिको ही नान्दि कहते हैं। कहीं-कहीं नान्दिको जगह नान्दी पाठ है। देवताओं और द्विजों आदिकी शुभाशंसा करनेवाली जो पद्य अथवा गीतमयी वाक्यावली है, जो नाटकके पूर्व रंगमें प्रार्थनाके रूपमें पढ़ी जाती है, उसका नाम नान्दी है। उस नान्दीके अन्तमें सूत्रधार नाटककी प्रस्तावना करता है। ↩
५९२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
विमानानि विचित्राणि रथांश्चाकाशगामिनः ।
गजानाकाशगांश्चैव दिव्यनागकुलोद्भवान् ॥ ३४ ॥
विचित्र विमान, आकाशगामी रथ और दिव्य नागोंके कुलमें उत्पन्न हुए आकाशचारी हाथी भी प्रदान किये ॥ ३४ ॥
चन्दनानि च दिव्यानि शीतानि रसवन्ति च ।
गुरूण्यगुरुमुख्यानि गन्धाढ्यानि च भारत ॥ ३५ ॥
चिन्तामणीनुदारांश्च चिन्तिते सर्वकामदान् ।
भरतनन्दन ! उन दानवोंने यादवकुमारोंको दिव्य, शीतल एवं सरस चन्दन, अगरु आदि श्रेष्ठ सुगन्धित पदार्थ तथा चिन्तन करनेमात्रसे सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले उदार चिन्तामणि नामक रत्न भी दिये ॥ ३५१/२ ॥
प्रेक्षासु तासु बह्वीषु ददन्तो दानवास्तथा ॥ ३६ ॥
धनरत्नैर्विरहिताः कृताः पुरुषसत्तम ।
स्त्रियो दानवमुख्यानां तथैव च जनेश्वर ॥ ३७ ॥
पुरुषप्रवर ! नरेश्वर ! वहाँ बहुत बार नाटक देखनेको अवसर मिले । उन सभी अवसरोंपर दानवों तथा प्रधान-प्रधान दानवोंकी स्त्रियोंने इतने उपहार दिये कि वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे रहित हो गये ॥ ३६-३७ ॥
ततो हंसी प्रभावत्याः सखी प्राह प्रभावतीम् ।
गतास्मि द्वारकां रम्यां भैमगुप्तामनिन्दिते ॥ ३८ ॥
तब प्रभावतीकी सखी हंसीने प्रभावतीसे कहा—'अनिन्दिते ! मैं यादवोंद्वारा सुरक्षित रमणीय द्वारकापुरीमें गयी थी ॥ ३८ ॥
प्रद्युम्नश्च मया दृष्टो विविक्ते चारुलोचने ।
भक्तिश्च कथिता तस्य मया तव शुचिस्मिते ॥ ३९ ॥
'चारुलोचने ! वहाँ एकान्तमे मैंने प्रद्युम्नसे भेंट की । शुचिस्मिते ! तुम्हारी प्रद्युम्नके प्रति जो भक्ति है, उसकी भी मैंने उनसे चर्चा की ॥ ३९ ॥
तेन हृष्टेन कालश्च कृतः कमललोचने ।
अद्य प्रदोषसमये त्वया सह समागमे ॥ ४० ॥
'कमललोचने ! मेरी बात सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने आज ही प्रदोषकालमें तुमसे मिलनेका समय निश्चित किया है ॥ ४० ॥
तदद्य रुचिरश्रोणि तव प्रियसमागमः ।
न ह्यात्मवति भाषन्ति मिथ्या भैमकुलोद्भवाः ॥ ४१ ॥
'अतः सुश्रोणि ! आज ही तुम्हारी अपने प्राणवल्लभसे भेंट होगी; क्योंकि यदुकुलमें उत्पन्न हुए पुरुष अपने प्रेमी-जनोंके प्रति कोई मिथ्या संदेश नहीं देते हैं' ॥ ४१ ॥
ततः प्रभावती हृष्टा हंसीं तामिदमब्रवीत् ।
उषितासि ममावासे स्वप्तुमर्हसि सुन्दरि ॥ ४२ ॥
यह सुनकर प्रभावतीको बड़ा हर्ष हुआ । वह उस हंसीसे इस प्रकार बोली—'सुन्दरि ! तुम पहले भी मेरे घरमें रह चुकी हो । उसी तरह आज भी मेरे ही महलमें शयन करो ॥ ४२ ॥
त्वयाहं सहिताऽऽवासे द्रष्टुमिच्छामि कैशविम् ।
निःसाध्वसा भविष्यामि त्वया सह विहङ्गमे ॥ ४३ ॥
'विहङ्गमे ! आज इस घरमें तुम्हारे साथ रहकर ही मैं केशवकुमार प्रद्युम्नका दर्शन करना चाहती हूँ । तुम्हारे साथ होनेसे मैं निर्भय रहूँगी' ॥ ४३ ॥
हंसी तथेति चोवाच सखीं कमललोचनाम् ।
आरुरोह च तद्धर्म्यं प्रभावत्या विहङ्गमा ॥ ४४ ॥
तब आकाशचारिणी हंसीने अपनी कमललोचना सखी प्रभावतीसे कहा—'बहुत अच्छा, आज यहीं सोऊँगी ।' फिर वह प्रभावतीकी अट्टालिकापर आरूढ हुई ॥ ४४ ॥
विश्वकर्मकृते तत्र हर्म्यपृष्ठे प्रभावती ।
संविधानं चकाराशु प्रद्युम्नागमनक्षमम् ॥ ४५ ॥
विश्वकर्माके बनाये हुए प्रासादपृष्ठमें प्रभावतीने शीघ्र ही प्रद्युम्नके आगमनके योग्य सजावट कर दी ॥ ४५ ॥
तस्मिन् कृते संविधाने काममानयितुं ययौ ।
प्रभावतीमनुज्ञाप्य हंसी वायुसमा गतौ ॥ ४६ ॥
वह सजावट हो जानेपर वायुके समान तीव्र वेगसे चलनेवाली हंसी प्रभावतीसे पूछकर प्रद्युम्नको ले आनेके लिये गयी ॥ ४६ ॥
नटवेषधरं कामं गत्वोवाच शुचिस्मिता ।
अद्य भूतः स भगवन् समयो वर्तते निशि ॥ ४७ ॥
पवित्र मुसकानवाली वह हंसी नटवेषधारी प्रद्युम्नके पास जाकर बोली-'भगवन् ! आपने पहलेसे जो समय निश्चित कर रक्खा है; वह आजकी ही रातमें आ रहा है' ॥ ४७ ॥
तथेति प्राह तां कामः सा निवृत्ताथ पक्षिणी ।
अभ्यागता च सा हंसी प्रभावतिमथाब्रवीत् ।
अभ्येति रौक्मिणेयोऽसावाश्वसायतलोचने ॥ ४८ ॥
तब प्रद्युम्नने उससे कहा--'बहुत अच्छा' उनका यह उत्तर सुनकर पक्षिणी लौट गयी । महलमें लौटकर हंसीने प्रभावतीसे कहा--'विशाललोचने ! धीरज धारण करो ! वे रुक्मिणीनन्दन तुम्हारे पास आ रहे हैं' ॥ ४८ ॥
प्रद्युम्नो नीयमानं तु ददर्श माल्यमात्मवान् ।
भ्रमरैरावृतं वीरः सुगन्धमरिंमर्दनः ॥ ४९ ॥
उधर शत्रुमर्दन मनस्वी वीर प्रद्युम्नने देखा कि प्रभावतीके यहाँ सुगन्धित पुष्पमाला ले जायी जा रही है, जिसपर बहुत-से भ्रमर आ बैठे हैं ॥ ४९ ॥
निलिल्ये तत्र माल्ये तु भूत्वा मधूकरस्तदा ।
प्रभावत्या नीयमाने विदितार्थः प्रतापवान् ॥ ५० ॥
विष्णुपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः [ ५९३
फिर तो सर्वज्ञ एवं प्रतापी वीर प्रद्युम्न प्रभावतीके यहाँ ले जायी जानेवाली मालामें भ्रमर होकर छिप गये ॥ ५० ॥
प्रवेशितं च तन्माल्यं स्त्रीभिर्मधुकरायुतम् ।
उपनीतं प्रभावत्यै स्त्रीभिस्तद् भ्रमरावृतम् ॥ ५१ ॥
स्त्रियोंने भ्रमरोंसे आवृत हुई उस मालाको प्रभावतीके महलमें पहुँचा दिया। फिर दूसरी स्त्रियोंने वह भ्रमरावृत माला प्रभावतीके हाथमें दे दी ॥ ५१ ॥
अविदूरे च विन्यस्तं प्रभावत्या जनाधिप ।
भ्रमरास्ते ययुः सौम्य संध्याकाले ह्युपस्थिते ॥ ५२ ॥
नरेश्वर ! प्रभावतीने उसे पास ही रख लिया। सौम्य ! संध्याकाल उपस्थित होनेपर वे भ्रमर चले गये ॥ ५२ ॥
स भैमप्रवरो वीरस्तैः सहायैर्विहीनतः ।
कर्णोत्पले प्रभावत्या निलिल्ये शनकैरिव ॥ ५३ ॥
उन अपने सहायकोंसे बिछुड़कर वीर यदुश्रेष्ठ प्रद्युम्न धीरेसे प्रभावतीके कानमें पहने गये कमलमें छिप गये ॥ ५३॥
ततः प्रभावती हंसीमुवाच वदतां वरा ।
उद्यतं पूर्णचन्द्रं सा समीक्ष्यातिमनोहरम् ॥ ५४ ॥
तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभावतीने अत्यन्त मनोहर पूर्ण चन्द्रको उदित हुआ देख हंसीसे कहा—॥ ५४ ॥
सखि दह्यन्ति मेऽङ्गानि मुखं च परिशुष्यति ।
औत्सुक्यं हृदि चातीव कोऽयं व्याधिरनौषधः ॥ ५५ ॥
'सखी ! मेरे तो सारे अङ्ग जले जा रहे हैं। मुँह सूख रहा है। हृदयमें अत्यन्त उत्कण्ठा बढ़ गयी है। यह कौन-सा रोग लग गया, जिसकी कोई दवा ही नहीं है ? ॥ ५५ ॥
दधद् द्विगुणमौत्सुक्यमसौ पूर्णनिशाकरः ।
नवोदितः शीतरश्मिः सख्यं हरति च प्रियः ॥ ५६ ॥
'वह शीतल किरणोंवाला नवोदित पूर्ण चन्द्र दूनी उत्सुकता बढ़ा रहा है। वह देखनेमें प्रिय लगता है; परंतु मित्रभावका अपहरण कर रहा है—अप्रियवत् बर्ताव करने लगा है ॥ ५६ ॥
न दृष्टपूर्वो हि मया श्रुतमात्रेण काङ्क्षितः ।
अहो धूमयतेऽङ्गानि स्त्रीस्वभावस्य धिक् खलु ॥ ५७ ॥
'अहो ! जिसे मैंने पहले कभी देखा नहीं है, केवल नाम सुनकर उसे चाहने लगी हूँ तो भी वह मेरे सारे अङ्गोंमें आग सुलगा रहा है। मुझे धूमाच्छन्न किये देता है। नारीके इस स्वभावको धिक्कार है ॥ ५७ ॥
कल्पयामि यथाबुद्ध्या यदि नाभ्येति मे प्रियः ।
कुमुद्वतीगतं मार्गं हा गमिष्याम्यकिंचना ॥ ५८ ॥
'जैसा कि मैं बुद्धिसे सोच रही हूँ, यदि मेरे प्रियतम नहीं आये तो मैं अकिञ्चन नारी उसी मागको अपनाऊँगी, जिसपर कुमुद्वती चल चुकी है। अर्थात् प्रियतम पतिके जीते जी ही युवावस्थामें मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा। हा ! यह कितने कष्टकी बात है ? ॥ ५८ ॥
मदनाशीविषेणास्मि हा हा दष्टा मनस्विनी ।
शीतवीर्याः प्रकृत्यैव जगतो ह्लादनाः सुखाः ।
दहन्ति मम गात्राणि किं तु चन्द्रगभस्तयः ॥ ५९ ॥
'हाय ! हाय !! मुझ मनस्विनी नारीको कामदेवरूपी विषधर सर्पने डँस लिया है, अन्यथा शीतलता ही जिनकी शक्ति है, जो स्वभावसे ही जगत्को आह्लाद एवं सुख प्रदान करनेवाली हैं, वे चन्द्रमाकी किरणें मेरे अङ्गोंको क्यो जला रही हैं ? ॥ ५९ ॥
प्रकृत्या शीतलो वायुर्नानापुष्परजोवहः ।
दावाग्निसदृशो मेऽद्य दन्दहीति शुभं तनुम् ॥ ६० ॥
'जो स्वभावसे ही शीतल है और नाना प्रकारके पुष्पोंकी सुगन्धित रज लेकर बहती है, वही वायु आज मेरे लिये दावानलके समान होकर मेरे सुन्दर शरीरको अत्यन्त दग्ध किये देती है ॥ ६० ॥
ततः संकल्पये एव स्थैर्यं कार्यमित्रात्मनः ।
नावतिष्ठति निर्वीर्यं मनः संकल्पधर्षितम् ॥ ६१ ॥
'मैं बारंबार संकल्प कर रही हूँ कि मुझे अपने मनको स्थिर कर लेना चाहिये; परंतु मेरा मन कामसे मथित होकर अत्यन्त निर्बल हो गया है; अतः स्थिर नहीं हो पाता है ॥ ६१ ॥
विमनस्कास्मि मुह्यामि वेपथुर्मे महान् हृदि ।
बम्भ्रमीति च मे दृष्टिर्हा हा यामि ध्रुवं क्षयम् ॥ ६२ ॥
'उन्मनी हुई जा रही हूँ, मुझपर मोह छा रहा है। मेरे हृदयमें महान् कम्पन हो रहा है और मेरी दृष्टि बारंबार घूम रही है। हाय ! हाय ! अब निश्चय ही मैं नष्ट हो जाऊँगी' ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वज्रनाभपुरे प्रद्युम्नगमने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वज्रनाभपुरमें प्रद्युम्नका गमनविषयक तिरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
| ५९४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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चतुर्नवतितमोऽध्यायः
प्रद्युम्न और प्रभावतीका गान्धर्वविवाह एवं समागम; फिर गद और चन्द्रवतीका तथा साम्ब और गुणवतीका गान्धर्वविवाह
वैशम्पायन उवाच
आविष्टेयं मया बाला सर्वथेत्यवगम्य तु।
कार्ष्णिर्हृष्टेन मनसा हंसीमिदमुवाच ह ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने जब यह समझ लिया कि असुरबाला प्रभावतीपर सर्वथा मेरा ( काम का ) आवेश हो गया है, तब वे प्रसन्न मनसे हंसीसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥
दैत्येन्द्रतनयां प्राप्तमवगच्छस्व मामिह।
षट्पदैः सह षट्पादो भूत्वा माल्ये निलीय हि ॥ २ ॥
विधेयोऽस्मि प्रभावत्या यथेष्टं मयि वर्तताम्।
'विहङ्गमे ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मैं भ्रमरोंके साथ भ्रमर बनकर इसी मालामें लुक-छिपकर यहाँ दैत्यराजकुमारी प्रभावतीके पास आ गया हूँ ( तुम इसे मेरे आगमनकी सूचना दो )। मैं प्रभावतीका आज्ञापालक हूँ। वह मेरे प्रति जैसा चाहे बर्ताव कर सकती है' ॥ २॥ ॥
इत्युक्त्वा दर्शयामास सुरूपो रूपमात्मनः ॥ ३ ॥
तद्धर्म्यपृष्ठं प्रभया द्योतितं तस्य धीमतः।
अभिभूता प्रभा चैव राजंश्चन्द्रोद्भवा शुभा ॥ ४ ॥
राजन् ! ऐसा कहकर सुन्दर रूपवाले प्रद्युम्नने उसे अपने रूपका दर्शन कराया। वह प्रासादपृष्ठ प्रज्ञावान् प्रद्युम्नकी प्रभासे प्रकाशित हो उठा । उनकी कान्तिसे चन्द्रमाकी सुन्दर कान्ति भी तिरस्कृत हो गयी ॥ ३-४ ॥
प्रभावत्यास्तु तं दृष्ट्वा ववृधे कामसागरः।
चन्द्रस्येवोदये प्राप्ते पर्वण्यां सरितां पतिः ॥ ५ ॥
प्रद्युम्नको देखते ही प्रभावतीके कामरूपी समुद्रमें ज्वार आ गया; ठीक उसी तरह, जैसे पूर्ण चन्द्रोदयका पर्व प्राप्त होनेपर सरिताओंके स्वामी समुद्रमें बाढ़ आ जाती है ॥ ५ ॥
सलज्जाधोमुखी किञ्चित् किञ्चित् तिर्यगवेक्षिणी।
प्रभावती तदा तस्थौ निश्चलं कमलेक्षणा ॥ ६ ॥
प्रभावतीका मुख लज्जासे कुछ नीचेको झुक गया तो भी वह कुछ-कुछ तिरछी चितवनसे अपने प्राणवल्लभकी ओर देख लेती थी। उस समय कमलनयनी प्रभावती स्थिरभावसे खड़ी थी ॥ ६ ॥
करेणाधःप्रदेशे तां चारूभूषणभूषिताम्।
स्पृष्ट्वोवाच वरारोहां रोमाञ्चिततनुस्ततः ॥ ७ ॥
मनोहर आभूषणोंसे विभूषित हुई सुन्दराङ्गी प्रभावतीके मुखके नीचेके भाग (ठोड़ी) का हाथसे स्पर्श करके प्रद्युम्नका शरीर पुलकित हो गया। वे उससे इस प्रकार बोले—॥ ७ ॥
मनोरथशतैर्लब्धं किं पूर्णेन्दुसमप्रभम्।
अधोमुखं मुखं कृत्वा न मां किञ्चित् प्रभाषसे ॥ ८ ॥
प्रभोपमर्दै मा कार्षीश्चन्दनस्य वरानने।
साध्वसं त्यज्यतां भीरु दासः साध्वनुगृह्यताम् ॥ ९ ॥
'सुमुखि ! तुम्हारा यह पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुख मुझे सैकड़ों मनोरथोंके द्वारा आज प्राप्त हुआ है। तुम इसे नीचेकी ओर करके मुझसे कुछ बोलती क्यों नहीं हो ? तुम अपने मुखचन्द्रकी प्रभाका इस तरह तिरस्कार या लोभ न करो। भीरु ! भय छोड़ो और इस दासपर भलीभाँति अनुग्रह करो ॥ ८-९ ॥
न कालमित्र पश्यामि भीरु भीरुत्वमुत्सृज।
याचाम्येपोऽञ्जलिं कृत्वा प्राप्तकालं निबोध मे ॥ १० ॥
'भीरु ! तुम्हारा यह सज्ज मौनभाव मुझे इस समयके लिये उपयुक्त सा नहीं दिखायी देता। भय त्याग दो। इसके लिये मैं यह हाथ जोड़कर याचना करता हूँ। समयोचित कर्तव्य क्या है—यह मुझसे सुनो ॥ १० ॥
गान्धर्वेण विवाहेन कुरुष्वानुग्रहं मम।
देशकालानुरूपेण रूपेणाप्रतिमा सती ॥ ११ ॥
'संसारमें तुम्हारे रूपकी कहीं तुलना नहीं है। तुम देश-कालके अनुरूप गान्धर्व-विवाह करके मुझपर अनुग्रह करो' ॥
उपस्पृश्य ततो भैमो मणिस्थं जातवेदसम्।
जुहाव समये वीरः पुष्पैर्मन्त्रानुदीरयन् ॥ १२ ॥
तदनन्तर वीर यादव प्रद्युम्नने आचमन करके सूर्यकान्त-मणिमें स्थित अग्निदेवको प्रकट किया और उस समय मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए पुष्पोंद्वारा आहुति दी ॥ १२ ॥
जग्राहार्थ करं तस्या वराभरणभूषितम्।
चक्रे प्रदक्षिणं चैव तं मणिस्थं हुताशनम् ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने प्रभावतीके सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित हाथको अपने हाथमें लिया और सूर्यकान्तमणिमें विराजमान अग्निदेवकी परिक्रमा की ॥ १३ ॥
प्रजज्वाल स तेजस्वी मानयन्नच्युतात्मजम्।
भगवान् जगतः साक्षी शुभस्याथाशुभस्य च ॥ १४ ॥
उस समय सम्पूर्ण जगत्के शुभाशुभके साक्षी तेजस्वी भगवान् अग्निदेव अच्युतकुमार प्रद्युम्नका आदर करते हुए वहाँ प्रज्वलित हो उठे ॥ १४ ॥
विष्णुपर्व ] चतुर्नवतितमोऽध्यायः ५९५
उद्दिश्य दक्षिणां वीरो विप्राणां यदुनन्दनः ।
उवाच हंसीं द्वारस्थां तिष्ठावां रक्ष पक्षिणि ॥ १५ ॥
इसके बाद वीर यदुनन्दनने ब्राह्मणोंके उद्देश्यसे दक्षिणा संकल्प करके द्वारपर खड़ी हुई हंसीसे कहा—'पक्षिणि ! तुम इस भवनके बाहरी द्वारपर खड़ी रहो और हम दोनोंको दूसरोंकी दृष्टि पड़नेसे बचाओ' ॥ १५ ॥
तस्यां प्रणम्य यातायां कामस्तां चारुलोचनाम् ।
प्रगृह्य दक्षिणे हस्ते निनाय शयनोत्तमम् ॥ १६ ॥
यह सुनकर हंसी उन्हें प्रणाम करके चली गयी। तब प्रद्युम्न मनोहर नेत्रोंवाली प्रभावतीका दाहिना हाथ पकड़कर उसे सुन्दर शय्यापर ले गये ॥ १६ ॥
ऊरावेवोपवेश्यैनां सान्त्वयित्वा पुनः पुनः।
चुचुम्ब शनकैर्गण्डं वासयन् मुखमारुतैः ॥ १७ ॥
वहाँ उसे अपनी जाँघपर ही बिठाकर उन्होंने बारंबार सान्त्वना दी और अपने मुखकी सुगन्धित वायुसे उसके कपोलको सुवासित करते हुए धीरेसे उसको चूम लिया ॥ १७॥
ततोऽस्याश्च पपौ वक्त्रपद्मं मधुकरो यथा ।
आलिङ्गिञ्च सुश्रोणीं क्रमेण रतिकोविदः ॥ १८ ॥
तत्पश्चात् जैसे भ्रमर प्रफुल्ल कमलके मकरन्दका पान करता है, उसी प्रकार वे उसके मुखारविन्दका—उसके अधरोंका रस पीने लगे। फिर क्रमशः रति-कला-कुशल प्रद्युम्नने मनोहर नितम्बवाली प्रभावतीका पूर्णरूपसे आलिङ्गन किया ॥ १८ ॥
अरीरमद् रहस्येनां न चोद्वेजितवांस्तदा ।
अपकृष्टं चरत्यर्थं रतिकार्यविशारदः ।
उवास स तया सार्द्धं रमन् कृष्णसुतः प्रभुः ॥ १९ ॥
रतिकला-कोविद एवं सामर्थ्यशाली श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न उसके साथ एकान्तमें रमण करने लगे। वे उसे उद्विग्न नहीं करते थे। कोई क्षुद्र बर्ताव (बलात्कार आदि) भी नहीं करते थे। उसके साथ रमण करते हुए वे रातभर वहीं रहे ॥ १९ ॥
अरुणोदयकाले च ययौ यत्र नटालयम् ।
अकामया प्रभावत्या कथञ्चित्स विसर्जितः ॥ २० ॥
अरुणोदय-कालमें वे वहीं चले गये, जहाँ नटोंका स्थान था। प्रभावती नहीं चाहती थी कि वे एक क्षणके लिये भी उससे अलग हों तथापि किसी तरह उसने उस समय उन्हें विदा किया ॥ २० ॥
तामेव मनसा कान्तां कान्तरूपां समुद्वहन् ।
त उपुर्नटवेषेण कार्यार्थं भैमवंशजाः ॥ २१ ॥
प्रतीक्षन्तस्तदा वाक्यमिन्द्रकेशवयोस्तदा ।
प्रद्युम्न कमनीय रूपवाली उस प्राणवल्लभा प्रभावतीका ही मन-ही-मन चिन्तन करते रहे। वे भीमवंशी यादवकुमार उस समय देवराज इन्द्र और भगवान् श्रीकृष्णके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ नट-वेशमे रहने लगे ॥ २१ १/२ ॥
उद्योगं वज्रनाभस्य त्रैलोक्यविजयं प्रति ॥ २२ ॥
प्रतीक्षन्तो महात्मानो गुह्यसंरक्षणे रताः ।
वे महामनस्वी वीर अपने गूढ़ उद्देश्यको सर्वथा छिपाये रखनेके लिये तत्पर होकर वज्रनाभके त्रिलोकविजय-सम्बन्धी उद्योगकी राह देखते थे ॥ २२ १/२ ॥
कश्यपस्य मुनेः सत्रं यावत् तावन्नराधिप ॥ २३ ॥
देवासुराणां सर्वेषामविरोधो महात्मनाम् ।
त्रैलोक्यविजयार्थाय यततां धर्मचारिणाम् ॥ २४ ॥
नरेश्वर ! जबतक कश्यप मुनिका यज्ञ होता रहा, तबतक त्रैलोक्य-विजयके लिये प्रयत्नशील रहनेवाले समस्त महा-मनस्वी धर्मपरायण देवताओं और असुरोंमें परस्पर कोई विरोध नहीं हुआ ॥ २३-२४ ॥
एवं कालं प्रतीक्षाणां वसतां तत्र धीमताम् ।
सम्प्राप्तः प्रावृषो रम्यः सर्वभूतमनोहरः ॥ २५ ॥
इस तरह समयकी प्रतीक्षा करते हुए वहाँ निवास करने-वाले बुद्धिमान् यादववीरोंके समक्ष वर्षा ऋतु प्राप्त हुई, जो समस्त प्राणियोंके लिये रमणीय एवं मनोहर है ॥ २५ ॥
अहर्निशं च वृत्तान्तं प्रयच्छन्ति मनोजवाः ।
शक्रकेशवयोर्हंसाः कुमाराणां महात्मनाम् ॥ २६ ॥
मनके समान वेगशाली हंस उन महामनस्वी यादव-कुमारोंको प्रतिदिन इन्द्र और श्रीकृष्णका समाचार दिया करते थे ॥ २६ ॥
रेमे सह प्रभावत्या प्रद्युम्नश्चानुरूपया ।
रात्रौ रात्रौ महातेजा धार्तराष्ट्राभिरक्षितः ॥ २७ ॥
प्रत्येक रात्रिको हंसोंसे सुरक्षित हुए महातेजस्वी प्रद्युम्न अपनी मनोऽनुरूप भार्या प्रभावतीके साथ रमण करते थे ॥
तैर्हि वज्रपुरं हंसैर्वसद्भिर्वासवाज्ञया ।
व्याप्तं नृप नटांस्तांश्च न विदुः कालमोहिताः ॥ २८ ॥
नरेश्वर ! इन्द्रकी आज्ञासे वज्रपुरमें निवास करनेवाले हंसोंसे वह सारा नगर व्याप्त हो रहा था; परंतु कालसे मोहित हुए दानव यह नहीं जानते थे कि वास्तवमें वे हंस और वे नट कौन हैं ? ॥ २८ ॥
दिवापि रौक्मिणेयस्तु प्रभावत्या नृपालये ।
तिष्ठत्यन्तर्हितो वीरो हंससंघाभिरक्षितः ॥ २९ ॥
राजन् ! वीर रुक्मिणीकुमार दिनमें भी हंससमुदायसे सुरक्षित हो छिपे रूपसे प्रभावतीके घरमें रहते थे ॥ २९ ॥
माययास्य प्रतिच्छाया दृश्यते हि नटालये ।
५९६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
देहार्धेन तु कौरव्य सिषेवेऽसौ प्रभावतीम् ॥ ३० ॥ कुरुनन्दन ! मायासे उनकी छायामात्र नटोंके स्थानमें दिखायी देती थी। वे अपने आधे शरीरसे प्रभावतीका ही सेवन करते थे ॥ ३० ॥
संनतिं विनयं शीलं लीलां दाक्ष्यमथार्जवम् । स्पृहयन्त्यसुरा दृष्ट्वा विद्वत्तां च महात्मनाम् ॥ ३१ ॥ उन महामनस्वी नटोंकी विनय, प्रणति, शील, लीला, चातुरी, सरलता और विद्वत्ता देखकर असुर सदा ही उन्हें चाहते रहते थे ॥ ३१ ॥
रूपं विलासं गन्धं च मञ्जुभाषामथार्यताम् । तासां यादवनारीणां स्पृहयन्त्यसुरस्त्रियः ॥ ३२ ॥ उन असुरोंकी स्त्रियाँ भी यादवकुमारोंके साथ आयी हुई सुन्दरियोंके रूप, विलास, सुगन्ध, मनोहर बोली और श्रेष्ठ स्वभावकी सदा ही अभिलाषा करती थीं ॥ ३२ ॥
वज्रनाभस्य तु भ्राता सुनाभो नाम विश्रुतः । दुहितृद्वयं च नृपते तस्य रूपगुणान्वितम् ॥ ३३ ॥ वज्रनाभके एक भाई था, जो सुनाभ नामसे विख्यात था। नरेश्वर ! उसके दो पुत्रियाँ थीं, जो सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे युक्त थीं ॥ ३३ ॥
एका चन्द्रवती नाम्ना गुणवत्यथ चापरा । प्रभावत्यालयं ते तु व्रजतः खलु नित्यशः ॥ ३४ ॥ उनमेंसे एकका नाम चन्द्रवती और दूसरीका नाम गुणवती था । वे प्रतिदिन प्रभावतीके महलमें जाया करती थीं ॥ ३४ ॥
ददृशाते तु ते तत्र रतिसक्तां प्रभावतीम् । परिपप्रच्छतुश्चैव विश्रम्भोपगतां सतीम् ॥ ३५ ॥ उन दोनोंने वहाँ प्रभावतीको रतिमें आसक्त देखा । सती-साध्वी प्रभावतीका अपनी इन दोनों बहिनोंपर बड़ा विश्वास था; अतः इन दोनोंने उससे पूछा—( 'बहिन ! तुम किसके साथ क्रीड़ा करती हो ?' ) ॥ ३५ ॥
सोवाच मम विद्यास्ति याधीता काङ्क्षितं पतिम् । रत्यर्थं साऽऽनयत्याशु सौभाग्यं च प्रयच्छति ॥ ३६ ॥ देवं वा दानवं वापि विवशं सद्य एव हि । प्रभावती बोली—'मेरे पास एक विद्या है, जिसका अध्ययन कर लेनेपर वह रतिके लिये शीघ्र ही मनोवाञ्छित पतिको ला देती है और सौभाग्य प्रदान करती है। अभिलषित पुरुष देवता हो या दानव, यह विद्या उसे तत्काल विवश करके अपने पास उसे ला देती है ॥ ३६३ ॥
साहं रमामि कान्तेन देवपुत्रेण धीमता ॥ ३७ ॥ दृश्यतां मत्प्रभावेण प्रद्युम्नः सुप्रियो मम । 'अतः मैं उसी विद्याके प्रभावसे परम बुद्धिमान् देवकुमारको अपना प्राणवल्लभ बनाकर उनके साथ रमण करती हूँ । देखो, मेरे या मेरी विद्याके प्रभावसे प्रद्युम्न मेरे अत्यन्त प्रिय हो गये हैं' ॥ ३७३ ॥
ते दृष्ट्वा विस्मयं याते रूपयौवनसम्पदम् ॥ ३८ ॥ पुनरेवाब्रवीत् ते तु भगिन्यौ चारुहासिनी । प्रभावती वरारोहा कालप्राप्तमिदं वचः ॥ ३९ ॥ उनके रूप और यौवनकी सम्पत्ति देखकर उन दोनों बहनोंको बड़ा विस्मय हुआ । फिर मनोहर हास्यवाली सुन्दरी प्रभावतीने उन दोनों बहनोंसे यह समयोचित बात कही—॥ ३८-३९ ॥
देवा धर्मरता नित्यं दम्भशीला महासुराः । देवास्तपसि रक्ता हि सुखे रक्ता महासुराः ॥ ४० ॥ 'देवता सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं और महान् असुर दम्भी होते हैं। देवता तपस्यामें अनुरक्त होते हैं और महान् असुर सुखमें आसक्त ॥ ४० ॥
देवाः सत्ये रता नित्यमनृते तु महासुराः । धर्मस्तपश्च सत्यं च यत्र तत्र जयो ध्रुवम् ॥ ४१ ॥ 'देवता सदा सत्यमें तत्पर रहते हैं तो महान् असुर असत्यमें । जहाँ धर्म, तप और सत्य होता है, उसी पक्षको युद्धमें निश्चितरूपसे विजय प्राप्त होती है ॥ ४१ ॥
देवपुत्रौ वरयतां पतिविद्यां ददाम्यहम् । उचितौ मत्प्रभावेण सद्य एवोपलप्स्यथः ॥ ४२ ॥ 'अतः तुम दोनों भी दो सुयोग्य देवकुमारोंका वरण कर लो । पतिकी प्राप्ति करानेवाली यह विद्या मैं तुम्हें देती हूँ। तुम मेरे प्रभावसे तत्काल ही अभीष्ट पति प्राप्त कर लोगी' ॥
तां तथेत्यूचतुर्हृष्टे भगिन्यौ चारुलोचनाम् । परिपप्रच्छ भै मं च कार्यं तत् पतिमानिनी ॥ ४३ ॥ तब वे दोनों बहनें अत्यन्त हर्षमें भरकर चारुलोचना प्रभावतीसे बोलीं, 'बहुत अच्छा।' तदनन्तर पतिको आदर देनेवाली प्रभावतीने प्रद्युम्नसे उस कार्यके विषयमें पूछा । ४३ ।
स पितृव्यं गदं वीरं साम्बं चाथाब्रवीत् तदा । रूपान्वितौ सुशीलौ च शूरौ च रणकर्मणि ॥ ४४ ॥ प्रद्युम्नने उस समय अपने चाचा वीरवर गद और भाई साम्बका नाम बताया और कहा—'वे दोनों सुन्दर रूपवाले, सुशील तथा युद्धकर्ममें शूरवीर हैं' ॥ ४४ ॥
प्रभावत्युवाच
परितुष्टेन दत्ता मे विद्या दुर्वाससा पुरा । परितुष्टेन सौभाग्यं सदा कन्यात्वमेव च ॥ ४५ ॥ तब प्रभावती अपनी दोनों बहनोंसे बोली— पूर्वकालमें सेवासे संतुष्ट हुए दुर्वासा मुनिने मुझे यह विद्या
विष्णुपर्व ] पञ्चनवतितमोऽध्यायः ५९७
दी; साथ ही अखण्ड सौभाग्य तथा सदा कन्या-जैसी बनी रहनेका वरदान दिया ॥ ४५ ॥
देवदानवयक्षाणां यं ध्यास्यसि स ते पतिः।
भवितेति मया चैव वीरोऽयमभिकाङ्क्षितः ॥ ४६ ॥
उन्होंने यह भी कहा था कि तुम देवता, दानव तथा यक्षोंमेंसे जिसका चिन्तन करोगी, वही तुम्हारा पति होगा। उनके इस वरदानके अनुसार मैंने उन्हीं वीर प्रद्युम्नको अपना पति बनानेकी इच्छा की ॥ ४६ ॥
गृहीतं तदिमां विद्यां सद्यो वां प्रियसङ्गमः।
ततो जगृहतुर्हृष्टे तां विद्यां भगिनीमुखात् ॥ ४७ ॥
अतः तुम दोनों ही इस विद्याको ग्रहण करो। इससे तुम्हें तत्काल ही प्रियतमका समागम प्राप्त होगा। यह सुनकर हर्षमें भरी हुई उन दोनों बहनोंने बहन प्रभावतीके मुखसे वह विद्या ग्रहण की ॥ ४७ ॥
दध्यतुर्गदसाम्बौ च विद्यामभ्यस्य ते शुभे।
तौ प्रद्युम्नेन सहितौ प्रविष्टौ भैमनन्दनौ ॥ ४८ ॥
उन शुभलक्षणा कन्याओंने विद्याका अभ्यास करके गद और साम्बका ध्यान किया; फिर तो वे दोनों यादवकुमार गद और साम्ब प्रद्युम्नके साथ ही उस महलमें प्रविष्ट हुए ॥
प्रच्छन्नौ मायया वीरौ कार्ष्णिना मायिना नृप।
गान्धर्वेण विवाहेन तावप्यरिबलार्दनौ ॥ ४९ ॥
पाणिं जगृहतुर्वीरौ मन्त्रपूर्वं सतां प्रियौ।
चन्द्रवत्या गदः साम्बो गुणवत्या च कैशविः ॥ ५० ॥
नरेश्वर ! मायावी प्रद्युम्नने अपनी मायासे उन दोनों वीरोंको छिपाकर वहाँ उपस्थित किया था। शत्रुसेनाका संहार करनेवाले उन दोनों वीरोंने भी गान्धर्व विवाहकी विधिसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक उन कन्याओंका पाणिग्रहण किया। वे दोनों ही सत्पुरुषोंके प्रिय थे। चन्द्रवतीके साथ गद और गुणवतीके साथ केशवकुमार साम्बका विवाह हुआ ॥ ४९-५० ॥
रेमिरेऽसुरकन्याभिर्वीरास्ते यदुपुङ्गवाः।
मार्गमाणास्त्वनुज्ञां ते शक्रकेशवयोरुदा ॥ ५१ ॥
इस तरह वे तीनों यदुपुङ्गव वीर उन दिनों इन्द्र और श्रीकृष्णके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए उन असुरकन्याओंके साथ रमण करने लगे ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि प्रभावतीपाणिग्रहणे चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें प्रभावतीका पाणिग्रहणविषयक चौरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
प्रद्युम्नका प्रभावतीसे वर्षाका वर्णन करते हुए उसे अपने कुलका परिचय देना
वैशम्पायन उवाच
नभो नभस्येऽथ निरीक्ष्य मासि
कामस्तदा तोयदवृन्दकीर्णम्।
प्रभावतीं चारुविशालनेत्रा-
मुवाच पूर्णेन्दुनिभाशवक्त्रः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले प्रद्युम्नने भाद्रपद मासमें आकाशको मेघोंकी घटासे आच्छन्न हुआ देख उस समय मनोहर एवं विशाल नेत्रोंवाली प्रभावतीसे कहा—॥ १ ॥
तवाननाभो वरगात्रि चन्द्रो
न दृश्यते सुन्दरि चारुबिम्बः।
त्वत्केशपाशप्रतिमैनिरुद्धो
बलाहकैश्चारुनिरन्तरोरु ॥ २ ॥
'मनोहर एवं परस्पर सटी हुई जाँघोंवाली वराङ्गी ! सुन्दरि ! इस समय सुन्दर बिम्बवाला चन्द्रमा, जो तुम्हारे मुखके समान मनोरम जान पड़ता था, नहीं दिखायी देता है। तुम्हारे इन केशपाशोंके समान काले बादलोंने उसे छिपा दिया है ॥ २ ॥
संदृश्यते सुभ्रु तडिद् घनस्था
त्वं हेमचामीकरणान्वितेव।
मुञ्चन्ति धाराश्च घना नदन्त-
स्त्वद्धारयष्टेः सदृशा वराङ्गि ॥ ३ ॥
'सुन्दर भौंहोंवाली सुन्दरी ! यह जो मेघोंके अङ्कमें विद्युत् दिखायी देती है, वह सोनेके मनोहर आभूषणोंसे भूषित हुई तुम-जैसी ही प्रतीत होती है और ये गरजते हुए मेघ तुम्हारे मौक्तिक हारोके समान जलकी स्वच्छ धाराएँ गिरा रहे हैं ॥ ३ ॥
घनप्रदेशेषु बलाकपङ्क्तय-
स्त्वद्दन्तपङ्क्तिप्रतिमा विभान्ति।
निमग्नपद्मानि सरित्सु सुभ्रु
न भान्ति तोयानि रयाकुलानि ॥ ४ ॥
'सुभ्रु ! आकाशमें जहाँ बादल घिरे हुए हैं, उन प्रदेशोंमें बगुलोंकी पंक्तियाँ तुम्हारे दाँतोंकी श्रेणियोंके समान सुशोभित हो रही हैं। सरिताओंके जलोंमें कमलोंके समूह डूब गये हैं और वे जल महान् वेगसे व्याप्त हैं; अतः उनकी विशेष शोभा नहीं हो रही है ॥ ४ ॥
| ५९८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
अमी घना वायुवशोपयाता
बलाकमालामलचारुदन्ताः ।
अन्योन्यमभ्याहनितुं प्रवृत्ता
वनेषु नागा इव शुक्लदन्ताः ॥ ५ ॥
'ये बादल वायुके अधीन हो रहे हैं। बगुलोंकी पंक्तियाँ उनके निर्मल एवं मनोहर दाँतोंके समान शोभा पाती हैं। ये वनोंमें सफेद दाँतवाले हाथियोंके समान एक-दूसरेसे टक्कर लेनेके लिये उद्यत हैं ॥ ५ ॥
धनुस्त्रिवर्णं वरगात्रि पश्य
कृतं तवापाङ्गमिवाननस्थम् ।
विभूषयन्तं गगनं घनांश्च
प्रहर्षणं कामिजनस्य कान्ते ॥ ६ ॥
'सुन्दर अङ्गोंवाली प्राणवल्लभे ! वह इन्द्र-धनुष देखो, जो तुम्हारे मुखमण्डलमें स्थित नेत्रोंके कोणभाग-सा तिरंगा बना हुआ है। वह आकाश और बादलोंकी शोभा बढ़ाता हुआ कामीजनोंको महान् हर्ष प्रदान करता है ॥ ६ ॥
घनान् नदन्तः प्रतिनर्दमानान्
निरीक्ष्य सुश्रोणि शिखीन् प्रहृष्टान् ।
समादृतानुद्धतपिच्छभारान्
प्रियाभिरामानुपन्त्यमानान् ॥ ७ ॥
'अपनी बोली बोलते हुए मोर बादलोंको गरजते देख अत्यन्त हर्षमें भरकर नृत्य-कलाके प्रति आदर-भाव रखते हुए पंखोंके भारोंको ऊपर उठाकर आस-पास ही नृत्य कर रहे हैं; इस अवस्थामें ये बहुत ही प्रिय एवं मनोहर प्रतीत होते हैं। तुम इनकी ओर दृष्टिपात करो ॥ ७ ॥
हर्म्येषु चान्ये शशिपाण्डुरेषु
ऋदन्ति सुश्रोणि मयूरसंघाः ।
मुहूर्तशोभां चारुरूपां
दत्त्वा पतन्तो वलभीपुटेषु ॥ ८ ॥
'सुश्रोणि ! चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णवाली अट्टालिकाओंपर बैठे हुए दूसरे मयूर-समुदाय वहाँ दो घड़ीके लिये अत्यन्त मनोहर शोभा प्रदान करके छज्जोंपर उड़ते हुए बड़ी शोभा पा रहे हैं ॥ ८ ॥
प्रक्लिन्नपक्षास्तरुमस्तकेषु
मुहूर्तचूडामणितां विधाय ।
प्रयान्ति भूमिं नवशाद्वलाना-
माशङ्कमाना धृतचारुदेहाः ॥ ९ ॥
'मनोहर देह धारण करनेवाले मोर वृक्षोंकी सर्वोच्च शिखाओंपर बैठे हैं। उनकी पाँखें भीग गयी हैं और वे दो घड़ीके लिये उन वृक्षोंके सिरोंपर चूड़ामणिकी-सी शोभाकी सृष्टि करके नयी-नयी घासोंसे ढकी हुई भूमिपर जा रहे हैं। उनके मनमें यह शङ्का है कि ये घासें भूमिसे भिन्न हैं या अभिन्न ॥ ९ ॥
प्रवाति धारान्तरनिःसृतश्च
सुखोऽनिलश्चन्दनपङ्कशीतः ।
कदम्बसर्जार्जुनपुष्पभूतं
समावहन् गन्धमनङ्गबन्धुम् ॥ १० ॥
'जलकी धाराओंके बीचसे निकलकर सुखदायिनी हवा चल रही है, जो चन्दनपङ्कके समान शीतल प्रतीत होती है। यह कदम्ब, सर्ज और अर्जुनके फूलोंकी सुगन्ध लिये आ रही है। वह सुगन्ध कामोद्दीपनमें सहायक हो रही है ॥१०॥
रतिश्रमस्वेदविनाशहेतु-
र्नवोदभारानयने च हेतुः ।
न मारुतः स्याद् यदि चारुगात्रि
न मेघकालो मम वल्लभः स्यात् ॥ ११ ॥
'मनोहर अङ्गोंवाली प्रिये ! यदि इस समय रतिके श्रमसे प्रकट होनेवाले पसीनोंको मिटाने और नूतन जलके भारको खींच लानेमें सहायक यह वायु न चलती होती तो यह वर्षाकाल मुझे अधिक प्यारा न लगता ॥ ११ ॥
एवंविधेषु प्रियसङ्गमेषु
रतावसाने यदुपैति वायुः ।
रतिश्रमस्वेदहरः सुगन्धी
ततः परं किं सुखमस्ति लोके ॥ १२ ॥
'जब इस प्रकार प्रियजनोंके समागम प्राप्त हों, उस अवसरपर रतिक्रीड़ाके अन्तमें जो रतिश्रमजनित स्वेदविन्दुओंको हर लेनेवाली सुगन्धित वायु अपने पास आती है, उससे बढ़कर सुख इस संसारमें दूसरा कौन है ? ॥ १२ ॥
जलाप्लुतानीक्ष्य महानदीनां
सुगात्रि हंसाः पुलिनानि हृष्टाः ।
गताः श्रमं मानसवासलुब्धाः
ससारसाः क्रौञ्चगणानुविद्धाः ॥ १३ ॥
'सुन्दर अङ्गवाली प्राणवल्लभे ! बड़ी-बड़ी नदियोंके तटोंको जलमें निमग्न देख सारस और क्रौञ्चोंसहित हंस मानसरोवरमें निवासके लिये लुब्ध हो बड़े हर्षके साथ वहाँतक जानेका परिश्रम स्वीकार करते हैं ॥ १३ ॥
न भान्ति नद्यो न सरांसि चैव
हतत्विषीवायतचारुनेत्रे ।
गतेषु हंसेष्वथ सारसेषु
रथाङ्कनुह्वायद्वयेनेषु चैव ॥ १४ ॥
'विशाल एवं मनोहर नेत्रवाली प्रिये ! हंसों, सारसों और चक्रवाकोंके चले जानेपर नदी और तालाब श्रीहीन-से प्रतीत होते हैं। उनके बिना न तो नदियाँ अच्छी लगती हैं और न सरोवर ही ॥१४॥
[ विष्णुपर्व ] पञ्चनवतितमोऽध्यायः ५९९
भोगैकदेशेन शुभं शयानं
ध्रुवं जगन्नाथमुपेन्द्रमीशम् ।
निद्राभ्युपेता वरकालतज्ज्ञा
श्रियं प्रणम्योत्तरचारुरूपाम् ॥ १५ ॥
'श्रेष्ठ वर्षाकाल और उसमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुको जाननेवाली योग-निद्रा निश्चय ही लोकोत्तर मनोहर रूप धारण करनेवाली श्रीदेवीको प्रणाम करके शेषके शरीरके एक देशमें सोये हुए मङ्गलमय ईश्वर जगन्नाथ उपेन्द्रके निकट आयी है ॥ १५ ॥
निद्रायमाणे भगवत्युपेन्द्रे
मेघाम्बराक्रान्तनिशाकरोऽद्य ।
पद्मामलाभः कमलायताक्षि
कृष्णस्य वक्त्रानुकृतिं करोति ॥ १६ ॥
'प्रफुल्ल कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली प्रियतमे ! भगवान् उपेन्द्रके योगनिद्राको स्वीकार कर लेनेपर श्वेत कमलके समान अमल कान्तिवाले चन्द्रमा अत्र मेघरूपी अम्बर (वस्त्र) से आच्छादित हो भगवान् श्रीकृष्णके मुखका अनुकरण कर रहे हैं ॥ १६ ॥
कदम्बनीपार्जुनकेतकानां
स्रजो ध्रुवं कृष्णमुपानयन्ति ।
पुष्पाणि चान्यान्यृतवः समस्ताः
कृष्णात् प्रसादानभिकाङ्क्षमाणाः ॥ १७ ॥
'सारी ऋतुएँ भगवान् श्रीकृष्णसे कृपाप्रसाद पानेकी अभिलाषा रखकर निश्चय ही उनकी सेवामें कदम्ब, नीप, अर्जुन और केवड़ोंके गजरे तथा दूसरे-दूसरे पुष्प ले आती हैं ॥ १७ ॥
नागाश्चरन्तो विषदिग्धवक्त्राः
स्पृशन्ति पुष्पाण्यपि पादपान्यान् ।
पेपीयमानान् भ्रमरैर्जनानां
कौतूहलं ते जनयन्त्यतीव ॥ १८ ॥
'जिन सुकुमारतर वृक्षों एवं फूलोंके रस भ्रमर बारंबार पीते हैं, उन्हे विषपूर्ण मुखवाले सर्प स्वच्छन्द विचरते हुए जब छू देते हैं, तब उनके स्पर्शमात्रसे वे कुम्हला जाते हैं। इस प्रकार वे लोगोंको अत्यन्त आश्चर्यमें डाल रहे हैं ॥ १८ ॥
तोयातिभाराम्बुदवृन्दबद्धं
नभः पतिष्यन्तमिवाभिवीक्ष्य ।
निपानगम्भीरमभिन्नवृष्टं
मनोहरं चारुमुखस्तनोरु ॥ १९ ॥
'निपान-सदृश गम्भीर आकाशको जलके भारी भारसे युक्त मेघोंकी घटाद्वारा बँधकर गिरता हुआ-सा देख तुम्हारे मनोहर एवं सुन्दर मुख, स्तन और ऊरु कामोद्रेकवश पसीने-से भर गये हैं ॥ १९ ॥
^१. कुएँके आसपास पशुओकेपानी पीनेके लिये जो छोटा-सा जलकुण्ड बनाया जाता है, उसे 'निपान' कहते हैं ।
बलाकमालाकुलमाल्यदाग्ना
निरीक्ष रम्यं घनवृन्दमेतत् ।
सस्यानि भूमावभिवर्षमाणं
जगद्धितार्थं विमलाङ्गयष्टे ॥ २० ॥
'निर्मल अङ्गयष्टिवाली सुन्दरी ! जो बगुलोंकी पाँतसे परिपूर्ण होकर मानो श्वेत पुष्पहारसे अलंकृत हुआ है, उस रमणीय मेघसमूहकी ओर तो देखो; यह जगत्के हितके लिये पृथ्वीपर मानो अन्नकी वर्षा करता है ॥ २० ॥
जलावलम्बाम्बुदवृन्दकर्षी
घनैर्घनान् योधयतीव वायुः ।
प्रवृत्तचक्रो नृपतिर्वनस्थान्
गजान् गजैः स्वैरिव वीर्यदृप्तान् ॥ २१ ॥
'पानीके आधारभूत मेघसमूहोंको अपने साथ खींच लानेवाला पावससमीर बादलोंसे बादलोंको लड़ाता-सा जान पड़ता है; मानो कोई चक्रवर्ती नरेश बलके मदसे उन्मत्त हुए जंगली हाथियोंको अपने गजराजोंके साथ लड़ा रहा हो ॥ २१ ॥
अभौममम्भो विसृजन्ति मेघाः
पूतं पवित्रं पवनैः सुगन्धि ।
हर्षावहं चातकबर्हिणानां
वराण्डजानां जलदप्रियाणां ॥ २२ ॥
'ये मेघ शुद्ध, पवित्र और सुगन्धित वायुसे सुवासित उस दिव्य जलकी वर्षा करते हैं, जो मेघोंके प्रेमी चातक और मोर आदि श्रेष्ठ पक्षियोंको हर्ष प्रदान करता है ॥ २२ ॥
प्लवंगमः षोडशपक्षशायी
चिरौति गोष्ठः सह कामिनीभिः ।
ऋचो द्विजातिः प्रियसत्यधर्मा
यथा सुशिष्यैः परिवार्यमाणः ॥ २३ ॥
'जो बरसातके पहले सोलह पक्षों (आठ महीनों) तक कहीं बिलमें शयन करता रहता है, वही मेढक बरसातके आठ पक्षोंमें गोष्ठ (गोसमुदाय) की भाँति अपनी स्त्रियोंके साथ आर्तनाद-सा करता है; मानो सत्य और धर्मसे प्रेम रखनेवाला कोई विद्वान् ब्राह्मण अपने अच्छे शिष्योंसे घिरकर वेदकी ऋचाओंका पाठ कर रहा हो ॥ २३ ॥
गुणो महांस्तोयकालजोऽय-
मबुद्धमेघस्तनभीषितानाम् ।
परिष्वजन्तः परिवर्द्धयन्ति
विनापिशय्यासमयं प्रियाणाम् ॥ २४ ॥
'वर्षाकालका यह एक महान् गुण है कि अज्ञात मेघ-
६०० श्रीमद्भागवते खिलभागे [ हरिवंश-
गर्जनाको सहसा सुनकर भयभीत हुई प्रियतमाओंको प्रेमी पुरुष हृदयसे लगाकर शयनकालके बिना भी उनकी काम- वासनाओंको बढ़ा देते हैं ॥ २४ ॥
दोषोऽयमेकः सलिलागमस्य मां प्रत्युदारान्वयवर्णशीले । न दृश्यते यत् तव वक्त्रतुल्यो घनग्रहग्रस्ततनुः शशाङ्कः ॥ २५ ॥
‘उत्तम वंश, सुन्दर वर्ण और अच्छे स्वभाववाली प्रिये ! मुझे अपने लिये वर्षाकालका यही एक दोष प्रतीत होता है कि तुम्हारे मुखके समान शोभा पानेवाला चन्द्रमा मेघरूपी ग्रहसे ग्रस्त होकर (मेघोंकी घटाओंमें छिपकर) दिखायी नहीं देता है ॥ २५ ॥
प्रदृश्यते भीरु यदा शशाङ्को घनान्तरस्थो जगतः प्रदीपः । तदानुपश्यन्ति जनाः प्रहृष्टा बन्धुं प्रवासादिव संनिवृत्तम् ॥ २६ ॥
‘भीरु ! जब जगत्को प्रकाशित करनेवाला चन्द्रमा मेघोंके भीतर दीख जाता है, तब सब लोग परदेशसे लौटे हुए प्रेमी बन्धुकी भाँति उसे बड़े हर्षमें भरकर बारंबार देखने लगते हैं ॥ २६ ॥
विलापसाक्षी प्रियहीनितानां संदृश्यते भीरु यदा शशाङ्कः । नेत्रोत्सवः प्रोषितकामुकानां दृष्ट्वैव कान्तं भवतीत्यवैमि ॥ २७ ॥
‘भीरु ! प्रियवियोगिनी वनिताओंके विलापका साक्षी- भूत चन्द्रमा जब दृष्टिगोचर होता है, तब जिनके पति परदेशमें रहकर लौटे हैं, उन कामिनियोंके नेत्रोंमें अपने प्रियतमका दर्शन करके ही आनन्दोत्सव प्रतीत होता है, ऐसा मैं समझता हूँ ॥ २७ ॥
नेत्रोत्सवः कान्तसमागतानां दावाग्नितुल्यः प्रियहीनितानाम् । तेनैव देहेन वराङ्गनानां चन्द्रोऽपि तावत्प्रियविप्रियश्च ॥ २८ ॥
‘यह नेत्रोत्सव उन्हींको प्रतीत होता है, जिन्हें अपने प्रियतमका संयोग प्राप्त है; प्रियवियोगिनी अवलाओंके लिये तो यह चन्द्रमा दावाग्निके तुल्य दाहक प्रतीत होता है। इस प्रकार चन्द्रमा आह्लादक होनेपर भी संयोग और वियोग-अवस्थाके भेदसे अपने उसी शरीरद्वारा श्रेष्ठ नारियोंको प्रिय और अप्रिय प्रतीत होता है ॥ २८ ॥
विनापि चन्द्रेण पुरे पितुस्ते यतः प्रभा चन्द्रगभस्तिगौरी । गुणागुणांश्चन्द्रमसा न वेद्मि यतस्ततोऽहं प्रशंसयिष्ये ॥ २९ ॥
‘प्रिये ! तुम्हारे पिताके इस नगरमें तो चन्द्रमाके बिना भी चन्द्रकिरणोंके समान गौर प्रकाश छाया रहता है। अतः मुझे यहाँ चन्द्रमाके होने और न होनेके गुण-अवगुणका पता नहीं लगता; इसलिये मैं बारंबार इस बातकी चर्चा करूँगा ॥ २९ ॥
अवाप यो ब्राह्मणराज्यमीड्यो दुरापमन्यैः सुकृतैस्तपोभिः । गायन्ति विप्राः पवमानसंज्ञं समागताः पर्वणि चाप्युदारम् ॥ ३० ॥ पिता बुधस्योत्तरवीर्यकर्मा पुरूरवा यस्य सुतो नृदेवः । प्राणाग्निरीड्योऽग्निमजीजनद् यो नष्टं शमीगर्भभवं भवात्मा ॥ ३१ ॥
‘जो दूसरे लोगोंके लिये पुण्य और तपस्यासे भी दुर्लभ है, उस ब्राह्मणराज्यको जिन्होंने अनायास ही प्राप्त कर लिया, जो स्तवन करनेके योग्य हैं, यज्ञमें एकत्र हुए ब्राह्मण पवमान नामवाले जिन उदार सोमदेवके गुण गाते हैं, वे उन बुधके पिता हैं, जिनके पुत्र लोकोत्तर बल और पराक्रमसे सम्पन्न राजा पुरूरवा हैं। वे प्राणाग्निरूप और स्तुति करनेके योग्य हैं, (ओषधियों और वनस्पतियोंके स्वामी होनेके कारण) उन्होंने नष्ट हुई अग्निको अश्वत्थके उत्पादनद्वारा शमीके गर्भसे प्रकट किया। वे रुद्रस्वरूप हैं ॥ ३०-३१ ॥
तथैव पश्चाच्चकमे महात्मा पुरोर्वंशीमप्सरसां वरिष्ठाम् । पीतः पुरा योऽमृतसर्वदेहो मुनिप्रवीरैर्वरगान्धि घोरैः ॥ ३२ ॥
‘सुन्दर अङ्गोंवाली प्रिये ! तत्पश्चात् इन महात्मा चन्द्र- देवने पूर्वकालमें अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशीकी (पुरूरवारूपसे) कामना की थी। उनका सारा शरीर ही अमृतमय है। पहले कभी घोर स्वभाववाले श्रेष्ठ मुनियोंने उन अमृतमय चन्द्रमाको पी लिया था ॥ ३२ ॥
नृपः कुशाग्रैः पुनरेव यश्च धीमानतोऽग्निर्दिवि पूज्यते च । आयुश्च वंशे नहुषश्च यस्य यो देवराजत्वमवाप वीरः ॥ ३३ ॥
‘उन्हींके वंशज बुद्धिमान् राजा पुरूरवा हुए, जो कुशाग्रोंद्वारा आरम्भ करके अनेकानेक यज्ञोंका सम्पादन कर स्वर्गमें अग्नितुल्य तेजस्वी रूपसे प्रतिष्ठित हो पूजित होते हैं। पुरूरवाके वंशमें आयु हुए, जिनके पुत्र नहुष थे। उन वीर नहुषने देवराजपद प्राप्त कर लिया था ॥ ३३ ॥
विष्णुपर्व ] पञ्चनवतितमोऽध्यायः ६०१ देवातिदेवो भगवान् प्रसूतो न कूटकृद् यस्य नृपोऽस्ति वंशे वंशे हरियंत्र जगत्प्रणेता। न नास्तिको नैष्कृतिकोऽपि वाथ। भौमः प्रवीरः सुरकार्यहेतो- अश्रद्दधानोऽप्यथवा कदर्यः र्यः सुभ्रु दक्षस्य वृतः सुताभिः ॥ ३४ ॥ शौर्येण वा वारिरुहाक्षि हीनः ॥ ३७ ॥ 'देवताओंके लिये भी उत्कृष्ट देवता, जगत्स्रष्टा भगवान् 'कमललोचने ! यदुकुलमें कोई राजा ऐसा नहीं हुआ श्रीहरि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये चन्द्रमाके ही है, जो छल-कपटसे काम लेनेवाला हो । उस कुलमें न तो वंशमें प्रमुख भीमवंशी वीरके रूपमें प्रकट हुए हैं। सुभ्रु ! कोई नास्तिक हुआ है न शठ, न श्रद्धाहीन हुआ है न उन चन्द्रमाको नक्षत्रस्वरूपा दक्षकी कन्याओंने पतिरूपसे कदर्य अथवा शौर्यहीन ही ॥ ३७ ॥ वरण किया है ॥ ३४ ॥ वंशे वधूस्त्वं कम लायताक्षि बभूव राजाथ वसुश्च यस्य श्लाघ्या गुणानामंतिपात्रभूता । वंशे महात्मा शशिवंशदीपः । कुरु प्रणामं शिखराग्रदन्ति यश्चक्रवर्तित्वमवाप वीरः तस्य त्वमीशस्य सतां प्रियस्य ॥ ३८ ॥ स्वैः कर्मभिः शक्रसमप्रभावः ॥ ३५ ॥ 'कमलके समान विशाल नेत्र और शिखरमणिके तुल्य 'चन्द्रमाके ही वंशमे शशिकुल-दीपक वीर एवं महात्मा सुन्दर दाँतोंवाली सुन्दरी ! तुम उसी चन्द्रवंश एवं यदुवंशकी राजा उपरिचर वसु हुए हैं, जो अपने कर्मोंसे चक्रवर्तीपदको वधू हो । तुम सद्गुणोंका अत्यन्त पात्र एवं स्पृहणीय हो । प्राप्त हुए । उनका प्रभाव इन्द्रके समान था ॥ ३५ ॥ तुम सत्पुरुषोंके प्रिय जगदीश्वर श्रीहरिको प्रणाम करो ॥३८॥ यदुश्च राजा शशिवंशमुख्यो नारायणायात्मभवायनाय गोऽवाप महामधिराजभावम् । लोकायनाय त्रिदशायनाय । भोजाः कुले यस्य नराधिपस्य खगेन्द्रकेतोः पुरुषोत्तमाय वीराः प्रसूताः सुरराजतुल्याः ॥ ३६ ॥ कुरु प्रणामं श्वशुराय देवि ॥ ३९ ॥ 'चन्द्रवंशके प्रधान पुरुष राजा यदु हो गये हैं, जो इस 'देवि ! जो स्वयम्भू ब्रह्माजीके आश्रयस्थान हैं, सम्पूर्ण पृथ्वीपर राजाधिराज पदको प्राप्त हुए थे । उन्हीं महाराजके जगत् तथा देवताओंके भी आधार हैं, वे गरुड़ध्वज कुलमे देवराज इन्द्रके तुल्य पराक्रमी भोजवंशी वीर प्रकट पुरुषोत्तम भगवान् नारायण तुम्हारे श्वशुर हैं। तुम उन्हें हुए हैं ॥ ३६ ॥ प्रणाम करो' ॥ ३९ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि प्रद्युम्नभाषणे पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें प्रद्युम्नका भाषणविषयक पञ्चानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥ षण्णवतितमोऽध्यायः कश्यपके मना करनेपर भी वज्रनाभका त्रिलोकविजयके लिये प्रस्थान, श्रीकृष्ण और इन्द्रका प्रद्युम्नको संदेश देना और उनकी संततिके प्रभावका उल्लेख करना, दैत्योंका प्रद्युम्न आदिके पुत्रोंको बंदी बनाना, प्रभावती आदिका पतियोंको तलवार देकर युद्धके लिये भेजना, इन्द्रके द्वारा उनकी सहायता तथा प्रद्युम्नका अद्भुत पराक्रम वैशम्पायन उवाच वज्रनाभोऽपि निर्वृत्ते सत्रे कश्यपमभ्यगात्। सत्रावसाने च मुनेः कश्यपस्यातितेजसः। त्रैलोक्यविजयाकाङ्क्षी तमुवाचाथ कश्यपः ॥ २ ॥ जग्मुर्देवासुराः स्वानि स्थानान्यमितविक्रमाः ॥ १ ॥ यज्ञ पूर्ण होनेपर वज्रनाभ भी त्रिभुवन-विजयकी अभिलाषा लेकर कश्यपजीके पास गया । तब कश्यपजीने वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! अत्यन्त तेजस्वी उससे कहा- ॥ २ ॥ कश्यप मुनिका यज्ञ समाप्त होनेपर अमित पराक्रमी देवता वज्रनाभ निबोध त्वं श्रोतव्यं यदि चेन्मम । और असुर अपने-अपने स्थानको गये ॥ १ ॥ वस वज्रपुरे पुत्र स्वजनेन समावृतः ॥ ३ ॥
६०२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'बेटा वज्रनाभ ! यदि मेरी बात सुनने और माननेयोग्य हो तो ध्यान देकर सुनो। तुम अपने स्वजनोंसे घिरे रहकर वज्रपुरमें ही निवास करो ॥ ३ ॥
तपसाभ्यधिकः शक्रः शक्तश्चैव स्वभावतः।
ब्रह्मण्यश्च कृतज्ञश्च ज्येष्ठः श्रेष्ठतमो गुणैः ॥ ४ ॥
'इन्द्र तपस्यामें तुमसे बढ़े-चढ़े हैं। स्वभावसे ही शक्ति-शाली हैं। ब्राह्मणभक्त, कृतज्ञ, भाइयोंमें ज्येष्ठ और उत्तम गुणोंकी दृष्टिसे श्रेष्ठतम हैं ॥ ४ ॥
राजा कृत्स्नस्य जगतः पात्रभूतः सतां गतिः।
सम्प्राप्तो लोकराज्यं स सर्वभूतहिते रतः ॥ ५ ॥
'वे सम्पूर्ण जगत्के राजा, सुपात्र और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं तथा तीनों लोकोंका राज्य पाकर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ ५ ॥
नैव शक्यस्त्वया जेतुं वज्रनाभ विहन्यसे।
अहिं पदाभ्युत्क्रमन् वै नचिराद् विनशिष्यसि ॥ ६ ॥
'वज्रनाभ ! तुम उन्हें जीत नहीं सकते । जीतनेके प्रयत्नमें स्वयं ही मारे जाओगे । साँपको पैरोंसे ठुकरानेवालेकी भाँति शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे' ॥ ६ ॥
वज्रनाभश्च तद्वाक्यं नाभिनन्दति भारत।
कालपाशपरीताङ्गो मर्तुकाम इवौषधम् ॥ ७ ॥
भारत ! वज्रनाभका सारा शरीर कालके पाशसे बँधा हुआ था। जैसे मरनेवाले रोगीको दवा अच्छी नहीं लगती, उसी प्रकार उसे कश्यपजीकी बात पसंद नहीं आयी ॥ ७ ॥
अभिवाद्य स दुर्बुद्धिः कश्यपं लोकभावनम्।
त्रैलोक्यविजयारम्भे मतिं चक्रे दुरासदः ॥ ८ ॥
अत्यन्त खोटी बुद्धिवाले उस दुर्जय असुरने लोकस्रष्टा कश्यपजीको प्रणाम करके त्रिभुवन-विजयका कार्य आरम्भ करनेका विचार किया ॥ ८ ॥
ज्ञातियोधान् समानीय मित्राणि सुबहूनि च।
प्रतस्थे स्वर्गमेवाग्रे विजिगीषन् विशाम्पते ॥ ९ ॥
प्रजानाथ ! सजातीय बन्धुओं तथा बहुत-से मित्रोंको ही योद्धाओंके रूपमें साथ लेकर उसने विजयकी इच्छासे पहले स्वर्गलोकको प्रस्थान किया ॥ ९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवौ कृष्णेन्द्रौ च महाबलौ।
प्रेषयामासतुर्हंसान् वज्रनाभवधं प्रति ॥ १० ॥
इसी बीचमें महाबली श्रीकृष्ण और इन्द्र दोनों देवताओंने वज्रनाभ-वधके लिये संदेश देकर हंसोंको भेजा ॥ १० ॥
समागतास्तु तच्छ्रुत्वा यदुमुख्या महाबलाः।
मन्त्रयित्वा महात्मानश्चिन्तामापेदिरे तथा ॥ ११ ॥
वज्रपुरमें एकत्र हुए महाबली महामनस्वी प्रमुख यादव वीर हंसोंके मुखसे वह संदेश सुनकर आपसमें सलाह करके इस प्रकार विचार करने लगे ॥ ११ ॥
वज्रनाभोऽद्य हन्तव्यः प्रद्युम्नेनेत्यसंशयम्।
तयोर्दुहितरो भार्या भक्त्या ताः सर्वभावतः॥ १२ ॥
सर्वाः सगर्भास्ताश्चैव किं नु कार्यमनन्तरम्।
प्रातः प्रसवकालश्च तासां नातिचिरादिव ॥ १३ ॥
इसमें संदेह नहीं कि आज प्रद्युम्नके द्वारा वज्रनाभका वध अवश्य होना चाहिये । परंतु वज्रनाभ और उसके भाई दोनोंकी कन्याएँ भक्तिपूर्वक हमलोगोंकी भार्याएँ हो गयी हैं। वे सब-की-सब हर तरहसे हमारा शुभचिन्तन करती हैं। इस समय वे तीनों दानव-कन्याएँ गर्भवती हैं; अतः अब हमें क्या करना चाहिये ? उन तीनोंका प्रसव-काल शीघ्र ही आनेवाला है ॥ १२-१३ ॥
सम्मन्त्रयित्वैतदर्थं हंसानूचुर्महाबलाः।
आख्येयमर्थवत् कृत्स्नं शक्रकेशवयोस्र्तदा ॥ १४ ॥
इस विषयमें भलीभाँति परस्पर विचार करके उन महाबली यादवोंने उस समय हंसोंसे कहा—'तुम्हें भगवान् श्रीकृष्ण और इन्द्रके पास जाकर यहाँकी प्रयोजनयुक्त सारी बातें कहनी चाहिये' ॥ १४ ॥
हंसैर्गत्वा तदाख्यातं देवयोस्तद् यथातथम् ।
ताभ्यां हंसास्तु संदिष्टा न भेतव्यमिति प्रभो ॥ १५ ॥
उत्पत्स्यन्ति गुणैः श्लाघ्याः पुत्रा वः कामरूपिणः।
गर्भस्थाः सर्ववेदांश्च साङ्गान् वेत्स्यन्त्यनिन्दिताः॥ १६ ॥
प्रभो ! तब हंसोंने वहाँ जाकर उन दोनों देवताओंसे वहाँकी सारी बातें यथार्थरूपसे कह सुनायीं । फिर उन दोनोंने हंसोंको यह संदेश दिया कि 'यादवो ! तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिये । तुम्हारे उन स्त्रियोंके गर्भसे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले पुत्र उत्पन्न होंगे; जो अपने उत्तम गुणोंके कारण स्पृहणीय होंगे। वे उत्तम पुत्र गर्भमें रहते समय ही अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर लेंगे ॥
तथा चानागतं सर्वमस्त्राणि विविधानि च।
सद्य एव युवानश्च भविष्यन्ति सुपण्डिताः ॥ १७ ॥
'इसी प्रकार उन्हें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों तथा भविष्यमें होनेवाली सारी बातोंका स्वतः ज्ञान हो जायगा । वे जन्म लेनेपर तत्काल ही तरुण एवं अच्छे पण्डित हो जायेंगे' ॥ १७ ॥
एवमुक्ता गता हंसाः पुनर्वज्रपुरं विभो।
शशंसुश्चैव भैमानां शक्रकेशवभाषितम् ॥ १८ ॥
प्रभो ! उनके ऐसा कहनेपर वे हंस पुनः वज्रपुरको गये । वहाँ उन्होंने यादवकुमारोंसे देवराज इन्द्र और श्रीकृष्णका संदेश कह सुनाया ॥ १८ ॥
विष्णुपर्व ] षण्णवतितमोऽध्यायः ६०३
प्रभावती तदा पुत्रं सुषुवे सदृशं पितुः।
सद्यो यौवनसम्प्राप्तं सर्वज्ञत्वं च भारत ॥ १९ ॥
उस समय प्रभावतीने एक पुत्रको जन्म दिया, जो अपने पिताके समान ही सर्वगुणसम्पन्न था। भारत ! वह तत्काल युवावस्थाको प्राप्त हो गया तथा उसमे सर्वज्ञता भी थी ॥ १९॥
मासमात्रेण सुषुवे देवी चन्द्रवती नृप ।
चन्द्रप्रभमिति ख्यातं तनयं सदृशं पितुः ॥ २० ॥
नरेश्वर ! उसके एक मासके बाद चन्द्रवती देवीने भी एक पुत्र उत्पन्न किया, जो अपने पिताके समान ही सुन्दर एवं शक्तिशाली था। उसका नाम चन्द्रप्रभ था ॥ २० ॥
सद्यश्च यौवनं प्राप्तं सर्वज्ञत्वं च भारत ।
गुणवत्यपि पुत्रं च गुणवन्तमनिन्दिता ॥ २१ ॥
युवानावथ सद्यस्तौ सर्वशास्त्रार्थकोविद्वौ ।
इन्द्रोपेन्द्रप्रसादेन संवृत्तौ युद्धवर्द्धनौ ॥ २२ ॥
भारत ! वह भी तत्काल युवावस्थाको प्राप्त हो गया और उसमें भी सर्वज्ञता थी। तत्पश्चात् साध्वी गुणवतीने भी एक गुणवान् पुत्रको जन्म दिया। वे दोनों बालक तत्काल युवावस्थासे सम्पन्न और सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मज्ञ हो गये। वे दोनों युद्धमें आगे बढ़नेवाले थे। इन्द्र और उपेन्द्रके प्रसादसे उन बालकोंमें ये सद्गुण आये थे ॥ २१-२२ ॥
हर्म्यपृष्ठे वर्द्धमाना दृष्टास्ते यदुनन्दनाः ।
इन्द्रोपेन्द्रेच्छया वीर नान्यथेत्यवधार्यताम् ॥ २३ ॥
वीर ! एक दिन अट्टालिकाकी छतपर घूमते हुए उन वृद्धिशील यादवकुमारोंको दानवोंने देख लिया। इन्द्र और उपेन्द्रकी इच्छासे ही ऐसा हुआ था, अन्यथा नहीं। इस बातको तुम निश्चितरूपसे जान लो ॥ २३ ॥
निवेदिताश्च सम्भ्रान्तैर्दैत्यैराकाशरक्षिभिः ।
वज्रनाभाय वीराय त्रिविष्टपजयैषिणे ॥ २४ ॥
उस समय आकाशकी ओरसे नगरकी रक्षा करनेवाले दैत्योंने बड़ी घबराहटमे पड़कर स्वर्गविजयकी इच्छा रखनेवाले वीर वज्रनाभसे उन बालकोंके विषयमे निवेदन किया ॥
वधाय सर्वे गृह्यन्तां ममैते गृहधर्षकाः ।
इत्युवाचासुरपतिर्वज्रनाभो महासुरः ॥ २५ ॥
यह सुनकर असुरोंके स्वामी महान् असुर वज्रनाभने कहा—'ये बालक मेरे घरको कलङ्कित करनेवाले हैं। इन सबको मार डालनेके लिये कैद कर लो' ॥ २५ ॥
ततः सैन्यं समाज्ञप्तमसुरेन्द्रेण धीमता ।
आवारयामास दिशः सर्वाः कुरुकुलोद्वह ॥ २६ ॥
गृह्यन्तामाशु बध्यन्तामिति वाचस्ततस्ततः ।
उच्चेरुरसुरेन्द्रस्य शासनादरिशासिनः ॥ २७ ॥
कुरुकुलतिलक जनमेजय ! तदनन्तर बुद्धिमान् असुर-राजकी आज्ञासे असुरोंकी सेनाने सम्पूर्ण दिशाओंकी ओरसे आकर उस नगरको घेर लिया। सब ओर इधर-उधर यही बात सुनायी देने लगी—'पकड़ लो, शीघ्र मार डालो।' शत्रुओंको दण्ड देनेवाले असुरराजके आदेशसे समस्त सैनिक ऐसी ही बातें बोल रहे थे ॥ २६-२७ ॥
तच्छ्रुत्वा व्यथितास्तेषां मातरः पुत्रवत्सलाः ।
रुरुदुस्ता रुदन्तीश्च प्रद्युम्नः प्रहसन् ब्रवीत् ॥ २८ ॥
ये बातें सुनकर उन बालकोंकी पुत्रवत्सला माताएँ शोकसे व्यथित होकर रोने लगीं। उस समय उन रोती हुई देवियोंसे प्रद्युम्नने हँसते हुए कहा- ॥ २८ ॥
मा भैष्ट जीवमानेषु स्थितेष्वस्मासु सर्वथा ।
किं नो दैत्याः करिष्यन्ति सर्वथा भद्रमस्तु वः ॥ २९ ॥
'दानवकन्याओ ! तुम डरो मत। तुम्हारा सर्वथा भला हो। जब हम सब प्रकारसे जीते-जागते यहाँ खड़े हैं, तब ये दैत्य हमारा क्या कर लेंगे' ॥ २९ ॥
प्रभावतीमथोवाच प्रद्युम्नो विप्लवां स्थिताम् ।
पिता तव गदापाणिः पितृव्याश्च स्थितास्तत्र ॥ ३० ॥
भ्रातरश्चैव ते देवि ज्ञातयश्च तथापरे ।
एते पूज्याश्च मान्याश्च तवार्थे खलु सर्वथा ॥ ३१ ॥
इसके बाद प्रद्युम्नने व्याकुल होकर खड़ी हुई प्रभावतीसे कहा—'देवि ! तुम्हारे पिता और चाचा हाथमें गदा लेकर खड़े हैं। तुम्हारे भाई और दूसरे कुटुम्बीजन भी युद्धके लिये उपस्थित हैं। ये सब-के-सब तुम्हारे नाते सर्वथा मेरे पूजनीय एवं आदरणीय हैं ॥ ३०-३१ ॥
भगिन्यौ पृच्छ भद्रं ते कालोऽयं खलु दारुणः ।
मरणं सहमानानां युध्यतां विजयो ध्रुवम् ॥ ३२ ॥
'तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपनी दोनों बहनोंसे भी पूछ लो। यह समय बड़ा भयंकर है। जो मरणका कष्ट सहकर युद्ध करते हैं, उनकी विजय अवश्य होती है ॥ ३२॥
दानवेन्द्रादयो ह्येते योत्स्यन्तेऽस्मद्वधैषिणः ।
किमत्र कार्यमस्माभिः सर्वैश्चक्रान्तरस्थितैः ॥ ३३ ॥
'ये दानवराज वज्रनाभ आदि हमारे वधकी इच्छासे युद्ध करेंगे। ऐसी दशामे हमलोगोंको क्या करना चाहिये ? हम सब लोग तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं' ॥ ३३ ॥
प्रभावती रुदन्ती तु प्रद्युम्नमिदमब्रवीत् ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय जानुभ्यां पतिता क्षितौ ॥ ३४ ॥
उस समय प्रभावती रोती हुई घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़ी और मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर प्रद्युम्नसे इस प्रकार बोली— ॥ ३४ ॥
गृहाण शस्त्रमात्मानं रक्ष शत्रुनिबर्हण ।
जीवन् पुत्रांश्च दारांश्च द्रष्टासि यदुनन्दन ॥ ३५ ॥
६०४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
आर्यां श्वश्रू वैदर्भीमनिरुद्धं च मानद । स्मृत्वैतन्मोक्षयात्मानं व्यसनादरिमर्दन ॥ ३६ ॥ 'शत्रुओंका संहार करनेवाले यदुनन्दन ! शस्त्र उठाओ और अपनी रक्षा करो। नरश्रेष्ठ ! मानद ! यदि जीवित रहोगे तो पुत्रों और पत्नियोंको देखोगे। आर्या रुक्मिणी तथा पुत्र अनिरुद्धसे भी मिल सकोगे। शत्रुमर्दन ! यह सब सोच-कर अपने आपको संकटसे मुक्त करो ॥ ३५-३६ ॥
दुर्वाससा वरो दत्तो मुनिना मम धीमता । वैधव्यरहिता हृष्टा जीवपुत्रा भविष्यसि ॥ ३७ ॥ 'बुद्धिमान् दुर्वासा मुनिने मुझे वर दिया है कि तू वैधव्यरहित, प्रसन्न एवं जीवित पुत्रोंकी माता होगी ॥ ३७ ॥
एव मे हृदयाश्वासो भविता न तदन्यथा । सूर्याग्नितेजसो वाक्यं मुनेरिन्द्रानुजात्मज ॥ ३८ ॥ 'इन्द्रानुजकुमार ! यह वर मेरे हृदयको आश्वासन देने-वाला है। यह सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी दुर्वासा मुनिका वचन सत्य होगा, मिथ्या कभी नहीं होगा' ॥ ३८ ॥
इत्युक्त्वाथासिमादाय सूपस्पृष्टा मनस्विनी । प्रददौ रौक्मिणेयाय जयस्वेति वरं वरा ॥ ३९ ॥ ऐसा कहकर श्रेष्ठ मनस्विनी नारी प्रभावतीने एक तलवार लेकर उसे अच्छी तरह साफ किया और रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नके हाथमें दे दिया। साथ ही यह वर दिया कि तुम विजयी होओ ॥ ३९ ॥
स तं जग्राह धर्मात्मा प्रहृष्टेनान्तरात्मना । प्रणम्य शिरसा दत्तं प्रियया भक्तियुक्तया ॥ ४० ॥ अपने प्रति भक्ति रखनेवाली प्रियतमा प्रभावतीके दिये हुए उस खड्गको धर्मात्मा प्रद्युम्नने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और प्रसन्न चित्तसे उसको हाथमें ले लिया ॥ ४० ॥
चन्द्रवत्यपि निस्त्रिंशं गदाय प्रददौ मुदा । तदा गुणवती चैव साम्बायासिं महात्मने ॥ ४१ ॥ इसी प्रकार चन्द्रवतीने भी उस समय गदको प्रसन्नता-पूर्वक खड्ग दिया। तदनन्तर गुणवतीने भी महात्मा साम्बको तलवार भेंट की ॥ ४१ ॥
हंसकेतुमथोवाच प्रद्युम्नः प्रणतं प्रभुः । इहैव साम्बसहितो युध्यस्व सह यादवैः ॥ ४२ ॥ तदनन्तर प्रभावशाली प्रद्युम्नने विनीतभावसे खड़े हुए (अपने सारथि) हंसकेतुसे कहा—'तुम यहीं यादवों तथा साम्बके साथ रहकर असुरोंके साथ युद्ध करो ॥ ४२ ॥
आकाशे दिक्षु सर्वासु योत्स्याम्यहमरिंदम । इत्युक्त्वाय रथं चक्रे मायया मायिनां वरः ॥ ४३ ॥ 'शत्रुदमन ! मैं आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें युद्ध करूँगा।' ऐसा कहकर मायावियोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नने मायासे एक रथका निर्माण किया ॥ ४३ ॥
सहस्रशिरसं नागं कृत्वा सारथिमात्मवान् । अनन्तभोगं कौरव्य सर्वनागोत्तमोत्तमम् ॥ ४४ ॥ स तेन रथमुख्येन हर्षयन् वै प्रभावतीम् । चचारासुरसैन्येषु तृणेष्विव हुताशनः ॥ ४५ ॥ कुरुनन्दन ! मनस्वी प्रद्युम्न अनन्त शरीरवाले, सहस्र मस्तकोंसे युक्त एक नागको, जो समस्त उत्तम नागोंसे भी उत्तम था, अपना सारथि बनाकर उस मुख्य रथके द्वारा प्रभावतीका हर्ष बढ़ाते हुए असुर-सेनाओंमें उसी तरह विचरने लगे, जैसे तिनकोंमें आग फैलती है ॥ ४४-४५ ॥
शरैराशीविषप्रख्यैरर्द्धचन्द्रानुकारिभिः । भेदनैर्गाधनैश्चैव ततर्द दितिसम्भवान् ॥ ४६ ॥ प्रद्युम्न विषधर सर्पोंके समान भयंकर, अर्धचन्द्राकार, भेदन (पतली नोकवाले) तथा गाधन (मोटे अग्रभागवाले) बाणोंद्वारा दैत्योंको पीड़ित करने लगे ॥ ४६ ॥
असुराश्च रणे मत्ताः कार्ष्णिं शस्त्रैरितस्ततः । जघ्नुः कमलपत्राक्षं परं निश्चयमास्थिताः ॥ ४७ ॥ असुर भी उत्तम निश्चयका आश्रय ले रणभूमिमें मतवाले होकर इधर-उधरसे शस्त्रोंद्वारा कमलनयन प्रद्युम्नपर प्रहार करने लगे ॥ ४७ ॥
चिच्छेद बाहून केषांचित्केयूरवलयोज्ज्वलान् । सकुण्डलानि केषांचिच्छिरांस्यपि च चिच्छिदे ॥४८॥ प्रद्युम्नने कितने ही असुरोंकी भुजाएँ काट डालीं, जो केयूर और कङ्कणकी कान्तिसे प्रकाशित हो रही थीं एवं कितनोंके कुण्डलयुक्त मस्तक भी धड़से अलग कर दिये ॥ ४८॥
क्षुरच्छिन्नैः शिरोभिश्च कायैश्च शकलैरपि । असुराणां मही कीर्णा प्रद्युम्नेनातितेजसा ॥ ४९ ॥ अत्यन्त तेजस्वी प्रद्युम्नने क्षुरोंद्वारा कटे हुए असुरोंके मस्तकों, शरीरों और उनके टुकड़ोंसे वहाँकी सारी धरती पाट दी ॥ ४९ ॥
देवेश्वरो देवगणैः सहितः समितिंजयः । ददर्श मुदितो युद्धं भैमानां दितिजैः सह ॥ ५० ॥ युद्धमें विजय पानेवाले देवराज इन्द्र देवताओंके साथ आकाशमें खड़े होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ दैत्यों और यादवोंका युद्ध देख रहे थे ॥ ५० ॥
ये गदं चैव साम्बं च दैत्याः समभिदुद्रुवुः । ते ययुर्निधनं सर्वे यादांसीव महोदधौ ॥ ५१ ॥ जिन दैत्योंने गद और साम्बपर आक्रमण किया, वे सब-के-सब कालके गालमे चले गये; मानो अगणित जलजन्तु महासागरमें निमग्न हो गये हों ॥ ५१ ॥
विष्णुपर्व ] षण्णवतितमोऽध्यायः ६०५
विषमं तु तदा युद्धं दृष्ट्वा देवपतिर्हरिः ।
गदाय प्रेषयामास स्वं रथं हरिवाहनः ॥ ५२ ॥
दिदेश मातलिसुतं यन्तारं च सुवर्चसम् ।
साम्बायैरावणं नागं प्रेषयामास देवेश्वरः ॥ ५३ ॥
उस समय उस युद्धको विषम स्थितिमें देखकर हरिवाहन देवेन्द्रने गदके लिये अपना रथ भेज दिया; साथ ही मातलिका पुत्र सुवर्चाको सारथिके रूपमें दिया । इसके सिवा देवेश्वरने साम्बकी सवारीके लिये अपना ऐरावत हाथी भेज दिया ॥ ५२-५३ ॥
जयन्तं रौक्मिणेयस्य सहायमददाद् विभुः ।
ऐरावणमधिष्ठातुं प्रवरं स नियुक्तवान् ॥ ५४ ॥
इतना ही नहीं, भगवान् इन्द्रने जयन्तको प्रद्युम्नका सहायक बनाकर उन्हें दे दिया और ऐरावतका सञ्चालन करनेके लिये प्रवर नामक ब्राह्मणको नियुक्त किया ॥ ५४ ॥
देवपुत्रद्विजौ वीरावप्रमेयपराक्रमौ ।
अनुज्ञाप्य सुराध्यक्षं ब्रह्माणं लोकभावनम् ॥ ५५ ॥
तं मातलिसुतं चैव गजमैरावणं तदा ।
देवः प्रेषितवाञ्छक्रो विधिज्ञो वरकर्मसु ॥ ५६ ॥
देवकुमार जयन्त और ब्राह्मणकुमार प्रवर—ये दोनों वीर अप्रमेय पराक्रमी थे । श्रेष्ठ कर्मोंमें उसके आवश्यक विधानको जाननेवाले देवेन्द्रने सुराध्यक्ष लोकभावन ब्रह्माजीकी आज्ञा लेकर जयन्त, प्रवर, मातलिसुपुत्र सुवर्चा और अपने ऐरावत हाथीको उस समय वहाँ भेजा था ॥ ५५-५६ ॥
क्षीणमस्य तपो वध्यो यदूनामेष दुर्मतिः ।
प्रवदन्ति तु भूतानि सर्वत्र तु यथेप्सितम् ॥ ५७ ॥
सब प्राणी सर्वत्र अपने इच्छानुसार यही कहते थे कि 'इस वज्रनाभकी तपस्या क्षीण हो चली है । यह दुर्बुद्धि दैत्य अब यादवोंके हाथसे मारा जायगा' ॥ ५७ ॥
प्रद्युम्नश्च जयन्तश्च प्राप्तौ हर्म्यं महाबलौ ।
असुराञ्छरजालैर्घैर्विक्राम्यन्तौ प्रणश्यतुः ॥ ५८ ॥
प्रद्युम्न और जयन्त—ये दोनों महाबली वीर महलकी छतपर आ गये और पराक्रम प्रकट करते हुए अपने बाण-समूहोंद्वारा असुरोंको नष्ट करने लगे ॥ ५८ ॥
गदं कार्ष्णिस्तदोवाच दुर्वार्य्यरणदुर्जयः ।
उपेन्द्रानुज शक्रेण रथोऽयं प्रेषितस्तव ॥ ५९ ॥
उस समय किसीसे भी रोके न जा सकनेवाले रणदुर्जय वीर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने गदसे कहा—'उपेन्द्रके छोटे भैया ! देवराज इन्द्रने आपके लिये यह रथ भेजा है ॥ ५९ ॥
हरियुङ्मातलिसुतो यन्ता चायं महाबलः ।
१. हरे रंगके घोडे इन्द्रके रथको वहन करते हैं, इसलिये उन्हें हरिवाहन कहा गया है ।
प्रवराधिष्ठितश्चायं साम्बस्यैरावणो गजः ॥ ६० ॥
'इसमें हरे रंगके घोड़े जुते हैं और ये मातलिके महाबली पुत्र सुवर्चा इस रथके सारथि हैं तथा यह ऐरावत हाथी, जिसके अधिष्ठाता प्रवर हैं, साम्बकी सवारीमे आया है ॥ ६० ॥
अद्योपहारो रुद्रस्य द्वारकायां महाबलः ।
श्व एष्यति हृषीकेशस्तस्मिन् वृत्तेऽच्युतानुज ॥ ६१ ॥
'चाचाजी ! आज द्वारकामें महादेवजीकी महापूजा है । उसके पूर्ण हो जानेपर मेरे पूज्य पिता महाबली श्रीकृष्ण कल यहाँ पधारेंगे ॥ ६१ ॥
तस्याज्ञया वधिष्यामो वज्रनाभं सबान्धवम् ।
अभ्युत्थानकृतं पापं त्रिविष्टपजयं प्रति ॥ ६२ ॥
'उन्हींकी आज्ञासे स्वर्गलोकको जीतनेके लिये उठे हुए पापी वज्रनाभको उसके बन्धु-बान्धवोंसहित हमलोग मार डालेंगे ॥ ६२ ॥
करिष्यामि विधानं तु नैष शक्तं सुतान्वितम् ।
विजेष्यत्यप्रमादस्तु कर्तव्य इति मे मतिः ॥ ६३ ॥
'मैं ऐसा उपाय करूँगा, जिससे यह दैत्य पुत्रसहित देवराज इन्द्रको पराजित न कर सके; परंतु हमें तनिक भी प्रमाद नहीं करना चाहिये-सावधान रहना चाहिये; ऐसा मेरा विचार है ॥ ६३ ॥
कलत्ररक्षणं कार्यं सर्वोपायैर्नरैर्बुधैः ।
कलत्रधर्षणं लोके मरणादतिरिच्यते ॥ ६४ ॥
'विद्वान् पुरुषोंको सभी उपायोंद्वारा अपनी पत्नियोंकी रक्षा करनी चाहिये । यदि पत्नीका पर-पुरुषके द्वारा तिरस्कार हो जाय तो वह संसारमें मृत्युसे भी बढ़कर (कष्टदायक होता) है' ॥ ६४ ॥
एवं संदिश्य भैर्मः स गदसाम्बौ महाबलः ।
प्रद्युम्नकोट्यः ससृजे मायया दिव्यरूपया ॥ ६५ ॥
गद और साम्बसे ऐसा कहकर महाबली प्रद्युम्नने अपनी दिव्य मायासे करोड़ों प्रद्युम्नोंकी सृष्टि कर डाली ॥ ६५ ॥
तमश्च नाशयामास दैत्यसृष्टं दुरासदम् ।
जहृषे देवराजश्च तं दृष्ट्वा रिपुमर्दनम् ॥ ६६ ॥
तथा दैत्योंने जो दुर्निवार्य अन्धकार उत्पन्न किया था, उसे नष्ट कर दिया । शत्रुमर्दन प्रद्युम्नको ऐसा पराक्रम करते देख देवराज इन्द्रको बड़ा हर्ष हुआ ॥ ६६ ॥
ददृशुः सर्वभूतानि कार्ष्णिं सर्वेषु शत्रुपु ।
अन्तरात्मनि वर्तन्तं क्षेत्रज्ञमिव तं विदुः ॥ ६७ ॥
समस्त प्राणियोंने सभी शत्रुओंके बीचमें श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नको देखा और उन्हे प्रत्येक अन्तरात्मामें विद्यमान क्षेत्रज्ञके समान समझा ॥ ६७ ॥