भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 615, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 615

विष्णुपर्व ] त्रिनवतितमोऽध्यायः [ ५९३


फिर तो सर्वज्ञ एवं प्रतापी वीर प्रद्युम्न प्रभावतीके यहाँ ले जायी जानेवाली मालामें भ्रमर होकर छिप गये ॥ ५० ॥

प्रवेशितं च तन्माल्यं स्त्रीभिर्मधुकरायुतम् ।
उपनीतं प्रभावत्यै स्त्रीभिस्तद् भ्रमरावृतम् ॥ ५१ ॥

स्त्रियोंने भ्रमरोंसे आवृत हुई उस मालाको प्रभावतीके महलमें पहुँचा दिया। फिर दूसरी स्त्रियोंने वह भ्रमरावृत माला प्रभावतीके हाथमें दे दी ॥ ५१ ॥

अविदूरे च विन्यस्तं प्रभावत्या जनाधिप ।
भ्रमरास्ते ययुः सौम्य संध्याकाले ह्युपस्थिते ॥ ५२ ॥

नरेश्वर ! प्रभावतीने उसे पास ही रख लिया। सौम्य ! संध्याकाल उपस्थित होनेपर वे भ्रमर चले गये ॥ ५२ ॥

स भैमप्रवरो वीरस्तैः सहायैर्विहीनतः ।
कर्णोत्पले प्रभावत्या निलिल्ये शनकैरिव ॥ ५३ ॥

उन अपने सहायकोंसे बिछुड़कर वीर यदुश्रेष्ठ प्रद्युम्न धीरेसे प्रभावतीके कानमें पहने गये कमलमें छिप गये ॥ ५३॥

ततः प्रभावती हंसीमुवाच वदतां वरा ।
उद्यतं पूर्णचन्द्रं सा समीक्ष्यातिमनोहरम् ॥ ५४ ॥

तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभावतीने अत्यन्त मनोहर पूर्ण चन्द्रको उदित हुआ देख हंसीसे कहा—॥ ५४ ॥

सखि दह्यन्ति मेऽङ्गानि मुखं च परिशुष्यति ।
औत्सुक्यं हृदि चातीव कोऽयं व्याधिरनौषधः ॥ ५५ ॥

'सखी ! मेरे तो सारे अङ्ग जले जा रहे हैं। मुँह सूख रहा है। हृदयमें अत्यन्त उत्कण्ठा बढ़ गयी है। यह कौन-सा रोग लग गया, जिसकी कोई दवा ही नहीं है ? ॥ ५५ ॥

दधद् द्विगुणमौत्सुक्यमसौ पूर्णनिशाकरः ।
नवोदितः शीतरश्मिः सख्यं हरति च प्रियः ॥ ५६ ॥

'वह शीतल किरणोंवाला नवोदित पूर्ण चन्द्र दूनी उत्सुकता बढ़ा रहा है। वह देखनेमें प्रिय लगता है; परंतु मित्रभावका अपहरण कर रहा है—अप्रियवत् बर्ताव करने लगा है ॥ ५६ ॥

न दृष्टपूर्वो हि मया श्रुतमात्रेण काङ्क्षितः ।
अहो धूमयतेऽङ्गानि स्त्रीस्वभावस्य धिक् खलु ॥ ५७ ॥

'अहो ! जिसे मैंने पहले कभी देखा नहीं है, केवल नाम सुनकर उसे चाहने लगी हूँ तो भी वह मेरे सारे अङ्गोंमें आग सुलगा रहा है। मुझे धूमाच्छन्न किये देता है। नारीके इस स्वभावको धिक्कार है ॥ ५७ ॥

कल्पयामि यथाबुद्ध्या यदि नाभ्येति मे प्रियः ।
कुमुद्वतीगतं मार्गं हा गमिष्याम्यकिंचना ॥ ५८ ॥

'जैसा कि मैं बुद्धिसे सोच रही हूँ, यदि मेरे प्रियतम नहीं आये तो मैं अकिञ्चन नारी उसी मागको अपनाऊँगी, जिसपर कुमुद्वती चल चुकी है। अर्थात् प्रियतम पतिके जीते जी ही युवावस्थामें मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा। हा ! यह कितने कष्टकी बात है ? ॥ ५८ ॥

मदनाशीविषेणास्मि हा हा दष्टा मनस्विनी ।
शीतवीर्याः प्रकृत्यैव जगतो ह्लादनाः सुखाः ।
दहन्ति मम गात्राणि किं तु चन्द्रगभस्तयः ॥ ५९ ॥

'हाय ! हाय !! मुझ मनस्विनी नारीको कामदेवरूपी विषधर सर्पने डँस लिया है, अन्यथा शीतलता ही जिनकी शक्ति है, जो स्वभावसे ही जगत्को आह्लाद एवं सुख प्रदान करनेवाली हैं, वे चन्द्रमाकी किरणें मेरे अङ्गोंको क्यो जला रही हैं ? ॥ ५९ ॥

प्रकृत्या शीतलो वायुर्नानापुष्परजोवहः ।
दावाग्निसदृशो मेऽद्य दन्दहीति शुभं तनुम् ॥ ६० ॥

'जो स्वभावसे ही शीतल है और नाना प्रकारके पुष्पोंकी सुगन्धित रज लेकर बहती है, वही वायु आज मेरे लिये दावानलके समान होकर मेरे सुन्दर शरीरको अत्यन्त दग्ध किये देती है ॥ ६० ॥

ततः संकल्पये एव स्थैर्यं कार्यमित्रात्मनः ।
नावतिष्ठति निर्वीर्यं मनः संकल्पधर्षितम् ॥ ६१ ॥

'मैं बारंबार संकल्प कर रही हूँ कि मुझे अपने मनको स्थिर कर लेना चाहिये; परंतु मेरा मन कामसे मथित होकर अत्यन्त निर्बल हो गया है; अतः स्थिर नहीं हो पाता है ॥ ६१ ॥

विमनस्कास्मि मुह्यामि वेपथुर्मे महान् हृदि ।
बम्भ्रमीति च मे दृष्टिर्हा हा यामि ध्रुवं क्षयम् ॥ ६२ ॥

'उन्मनी हुई जा रही हूँ, मुझपर मोह छा रहा है। मेरे हृदयमें महान् कम्पन हो रहा है और मेरी दृष्टि बारंबार घूम रही है। हाय ! हाय ! अब निश्चय ही मैं नष्ट हो जाऊँगी' ॥ ६२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वज्रनाभपुरे प्रद्युम्नगमने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वज्रनाभपुरमें प्रद्युम्नका गमनविषयक तिरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥

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