भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 616
५९४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

चतुर्नवतितमोऽध्यायः

प्रद्युम्न और प्रभावतीका गान्धर्वविवाह एवं समागम; फिर गद और चन्द्रवतीका तथा साम्ब और गुणवतीका गान्धर्वविवाह

वैशम्पायन उवाच
आविष्टेयं मया बाला सर्वथेत्यवगम्य तु।
कार्ष्णिर्हृष्टेन मनसा हंसीमिदमुवाच ह ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने जब यह समझ लिया कि असुरबाला प्रभावतीपर सर्वथा मेरा ( काम का ) आवेश हो गया है, तब वे प्रसन्न मनसे हंसीसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

दैत्येन्द्रतनयां प्राप्तमवगच्छस्व मामिह।
षट्पदैः सह षट्पादो भूत्वा माल्ये निलीय हि ॥ २ ॥
विधेयोऽस्मि प्रभावत्या यथेष्टं मयि वर्तताम्।

'विहङ्गमे ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मैं भ्रमरोंके साथ भ्रमर बनकर इसी मालामें लुक-छिपकर यहाँ दैत्यराजकुमारी प्रभावतीके पास आ गया हूँ ( तुम इसे मेरे आगमनकी सूचना दो )। मैं प्रभावतीका आज्ञापालक हूँ। वह मेरे प्रति जैसा चाहे बर्ताव कर सकती है' ॥ २॥ ॥

इत्युक्त्वा दर्शयामास सुरूपो रूपमात्मनः ॥ ३ ॥
तद्धर्म्यपृष्ठं प्रभया द्योतितं तस्य धीमतः।
अभिभूता प्रभा चैव राजंश्चन्द्रोद्भवा शुभा ॥ ४ ॥

राजन् ! ऐसा कहकर सुन्दर रूपवाले प्रद्युम्नने उसे अपने रूपका दर्शन कराया। वह प्रासादपृष्ठ प्रज्ञावान् प्रद्युम्नकी प्रभासे प्रकाशित हो उठा । उनकी कान्तिसे चन्द्रमाकी सुन्दर कान्ति भी तिरस्कृत हो गयी ॥ ३-४ ॥

प्रभावत्यास्तु तं दृष्ट्वा ववृधे कामसागरः।
चन्द्रस्येवोदये प्राप्ते पर्वण्यां सरितां पतिः ॥ ५ ॥

प्रद्युम्नको देखते ही प्रभावतीके कामरूपी समुद्रमें ज्वार आ गया; ठीक उसी तरह, जैसे पूर्ण चन्द्रोदयका पर्व प्राप्त होनेपर सरिताओंके स्वामी समुद्रमें बाढ़ आ जाती है ॥ ५ ॥

सलज्जाधोमुखी किञ्चित् किञ्चित् तिर्यगवेक्षिणी।
प्रभावती तदा तस्थौ निश्चलं कमलेक्षणा ॥ ६ ॥

प्रभावतीका मुख लज्जासे कुछ नीचेको झुक गया तो भी वह कुछ-कुछ तिरछी चितवनसे अपने प्राणवल्लभकी ओर देख लेती थी। उस समय कमलनयनी प्रभावती स्थिरभावसे खड़ी थी ॥ ६ ॥

करेणाधःप्रदेशे तां चारूभूषणभूषिताम्।
स्पृष्ट्वोवाच वरारोहां रोमाञ्चिततनुस्ततः ॥ ७ ॥

मनोहर आभूषणोंसे विभूषित हुई सुन्दराङ्गी प्रभावतीके मुखके नीचेके भाग (ठोड़ी) का हाथसे स्पर्श करके प्रद्युम्नका शरीर पुलकित हो गया। वे उससे इस प्रकार बोले—॥ ७ ॥

मनोरथशतैर्लब्धं किं पूर्णेन्दुसमप्रभम्।
अधोमुखं मुखं कृत्वा न मां किञ्चित् प्रभाषसे ॥ ८ ॥
प्रभोपमर्दै मा कार्षीश्चन्दनस्य वरानने।
साध्वसं त्यज्यतां भीरु दासः साध्वनुगृह्यताम् ॥ ९ ॥

'सुमुखि ! तुम्हारा यह पूर्ण चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुख मुझे सैकड़ों मनोरथोंके द्वारा आज प्राप्त हुआ है। तुम इसे नीचेकी ओर करके मुझसे कुछ बोलती क्यों नहीं हो ? तुम अपने मुखचन्द्रकी प्रभाका इस तरह तिरस्कार या लोभ न करो। भीरु ! भय छोड़ो और इस दासपर भलीभाँति अनुग्रह करो ॥ ८-९ ॥

न कालमित्र पश्यामि भीरु भीरुत्वमुत्सृज।
याचाम्येपोऽञ्जलिं कृत्वा प्राप्तकालं निबोध मे ॥ १० ॥

'भीरु ! तुम्हारा यह सज्ज मौनभाव मुझे इस समयके लिये उपयुक्त सा नहीं दिखायी देता। भय त्याग दो। इसके लिये मैं यह हाथ जोड़कर याचना करता हूँ। समयोचित कर्तव्य क्या है—यह मुझसे सुनो ॥ १० ॥

गान्धर्वेण विवाहेन कुरुष्वानुग्रहं मम।
देशकालानुरूपेण रूपेणाप्रतिमा सती ॥ ११ ॥

'संसारमें तुम्हारे रूपकी कहीं तुलना नहीं है। तुम देश-कालके अनुरूप गान्धर्व-विवाह करके मुझपर अनुग्रह करो' ॥

उपस्पृश्य ततो भैमो मणिस्थं जातवेदसम्।
जुहाव समये वीरः पुष्पैर्मन्त्रानुदीरयन् ॥ १२ ॥

तदनन्तर वीर यादव प्रद्युम्नने आचमन करके सूर्यकान्त-मणिमें स्थित अग्निदेवको प्रकट किया और उस समय मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए पुष्पोंद्वारा आहुति दी ॥ १२ ॥

जग्राहार्थ करं तस्या वराभरणभूषितम्।
चक्रे प्रदक्षिणं चैव तं मणिस्थं हुताशनम् ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने प्रभावतीके सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित हाथको अपने हाथमें लिया और सूर्यकान्तमणिमें विराजमान अग्निदेवकी परिक्रमा की ॥ १३ ॥

प्रजज्वाल स तेजस्वी मानयन्नच्युतात्मजम्।
भगवान् जगतः साक्षी शुभस्याथाशुभस्य च ॥ १४ ॥

उस समय सम्पूर्ण जगत्के शुभाशुभके साक्षी तेजस्वी भगवान् अग्निदेव अच्युतकुमार प्रद्युम्नका आदर करते हुए वहाँ प्रज्वलित हो उठे ॥ १४ ॥