भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 617

विष्णुपर्व ] चतुर्नवतितमोऽध्यायः ५९५


उद्दिश्य दक्षिणां वीरो विप्राणां यदुनन्दनः ।
उवाच हंसीं द्वारस्थां तिष्ठावां रक्ष पक्षिणि ॥ १५ ॥

इसके बाद वीर यदुनन्दनने ब्राह्मणोंके उद्देश्यसे दक्षिणा संकल्प करके द्वारपर खड़ी हुई हंसीसे कहा—'पक्षिणि ! तुम इस भवनके बाहरी द्वारपर खड़ी रहो और हम दोनोंको दूसरोंकी दृष्टि पड़नेसे बचाओ' ॥ १५ ॥

तस्यां प्रणम्य यातायां कामस्तां चारुलोचनाम् ।
प्रगृह्य दक्षिणे हस्ते निनाय शयनोत्तमम् ॥ १६ ॥

यह सुनकर हंसी उन्हें प्रणाम करके चली गयी। तब प्रद्युम्न मनोहर नेत्रोंवाली प्रभावतीका दाहिना हाथ पकड़कर उसे सुन्दर शय्यापर ले गये ॥ १६ ॥

ऊरावेवोपवेश्यैनां सान्त्वयित्वा पुनः पुनः।
चुचुम्ब शनकैर्गण्डं वासयन् मुखमारुतैः ॥ १७ ॥

वहाँ उसे अपनी जाँघपर ही बिठाकर उन्होंने बारंबार सान्त्वना दी और अपने मुखकी सुगन्धित वायुसे उसके कपोलको सुवासित करते हुए धीरेसे उसको चूम लिया ॥ १७॥

ततोऽस्याश्च पपौ वक्त्रपद्मं मधुकरो यथा ।
आलिङ्गिञ्च सुश्रोणीं क्रमेण रतिकोविदः ॥ १८ ॥

तत्पश्चात् जैसे भ्रमर प्रफुल्ल कमलके मकरन्दका पान करता है, उसी प्रकार वे उसके मुखारविन्दका—उसके अधरोंका रस पीने लगे। फिर क्रमशः रति-कला-कुशल प्रद्युम्नने मनोहर नितम्बवाली प्रभावतीका पूर्णरूपसे आलिङ्गन किया ॥ १८ ॥

अरीरमद् रहस्येनां न चोद्वेजितवांस्तदा ।
अपकृष्टं चरत्यर्थं रतिकार्यविशारदः ।
उवास स तया सार्द्धं रमन् कृष्णसुतः प्रभुः ॥ १९ ॥

रतिकला-कोविद एवं सामर्थ्यशाली श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न उसके साथ एकान्तमें रमण करने लगे। वे उसे उद्विग्न नहीं करते थे। कोई क्षुद्र बर्ताव (बलात्कार आदि) भी नहीं करते थे। उसके साथ रमण करते हुए वे रातभर वहीं रहे ॥ १९ ॥

अरुणोदयकाले च ययौ यत्र नटालयम् ।
अकामया प्रभावत्या कथञ्चित्स विसर्जितः ॥ २० ॥

अरुणोदय-कालमें वे वहीं चले गये, जहाँ नटोंका स्थान था। प्रभावती नहीं चाहती थी कि वे एक क्षणके लिये भी उससे अलग हों तथापि किसी तरह उसने उस समय उन्हें विदा किया ॥ २० ॥

तामेव मनसा कान्तां कान्तरूपां समुद्वहन् ।
त उपुर्नटवेषेण कार्यार्थं भैमवंशजाः ॥ २१ ॥
प्रतीक्षन्तस्तदा वाक्यमिन्द्रकेशवयोस्तदा ।

प्रद्युम्न कमनीय रूपवाली उस प्राणवल्लभा प्रभावतीका ही मन-ही-मन चिन्तन करते रहे। वे भीमवंशी यादवकुमार उस समय देवराज इन्द्र और भगवान् श्रीकृष्णके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ नट-वेशमे रहने लगे ॥ २१ १/२ ॥

उद्योगं वज्रनाभस्य त्रैलोक्यविजयं प्रति ॥ २२ ॥
प्रतीक्षन्तो महात्मानो गुह्यसंरक्षणे रताः ।

वे महामनस्वी वीर अपने गूढ़ उद्देश्यको सर्वथा छिपाये रखनेके लिये तत्पर होकर वज्रनाभके त्रिलोकविजय-सम्बन्धी उद्योगकी राह देखते थे ॥ २२ १/२ ॥

कश्यपस्य मुनेः सत्रं यावत् तावन्नराधिप ॥ २३ ॥
देवासुराणां सर्वेषामविरोधो महात्मनाम् ।
त्रैलोक्यविजयार्थाय यततां धर्मचारिणाम् ॥ २४ ॥

नरेश्वर ! जबतक कश्यप मुनिका यज्ञ होता रहा, तबतक त्रैलोक्य-विजयके लिये प्रयत्नशील रहनेवाले समस्त महा-मनस्वी धर्मपरायण देवताओं और असुरोंमें परस्पर कोई विरोध नहीं हुआ ॥ २३-२४ ॥

एवं कालं प्रतीक्षाणां वसतां तत्र धीमताम् ।
सम्प्राप्तः प्रावृषो रम्यः सर्वभूतमनोहरः ॥ २५ ॥

इस तरह समयकी प्रतीक्षा करते हुए वहाँ निवास करने-वाले बुद्धिमान् यादववीरोंके समक्ष वर्षा ऋतु प्राप्त हुई, जो समस्त प्राणियोंके लिये रमणीय एवं मनोहर है ॥ २५ ॥

अहर्निशं च वृत्तान्तं प्रयच्छन्ति मनोजवाः ।
शक्रकेशवयोर्हंसाः कुमाराणां महात्मनाम् ॥ २६ ॥

मनके समान वेगशाली हंस उन महामनस्वी यादव-कुमारोंको प्रतिदिन इन्द्र और श्रीकृष्णका समाचार दिया करते थे ॥ २६ ॥

रेमे सह प्रभावत्या प्रद्युम्नश्चानुरूपया ।
रात्रौ रात्रौ महातेजा धार्तराष्ट्राभिरक्षितः ॥ २७ ॥

प्रत्येक रात्रिको हंसोंसे सुरक्षित हुए महातेजस्वी प्रद्युम्न अपनी मनोऽनुरूप भार्या प्रभावतीके साथ रमण करते थे ॥

तैर्हि वज्रपुरं हंसैर्वसद्भिर्वासवाज्ञया ।
व्याप्तं नृप नटांस्तांश्च न विदुः कालमोहिताः ॥ २८ ॥

नरेश्वर ! इन्द्रकी आज्ञासे वज्रपुरमें निवास करनेवाले हंसोंसे वह सारा नगर व्याप्त हो रहा था; परंतु कालसे मोहित हुए दानव यह नहीं जानते थे कि वास्तवमें वे हंस और वे नट कौन हैं ? ॥ २८ ॥

दिवापि रौक्मिणेयस्तु प्रभावत्या नृपालये ।
तिष्ठत्यन्तर्हितो वीरो हंससंघाभिरक्षितः ॥ २९ ॥

राजन् ! वीर रुक्मिणीकुमार दिनमें भी हंससमुदायसे सुरक्षित हो छिपे रूपसे प्रभावतीके घरमें रहते थे ॥ २९ ॥

माययास्य प्रतिच्छाया दृश्यते हि नटालये ।