भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 618

५९६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

देहार्धेन तु कौरव्य सिषेवेऽसौ प्रभावतीम् ॥ ३० ॥ कुरुनन्दन ! मायासे उनकी छायामात्र नटोंके स्थानमें दिखायी देती थी। वे अपने आधे शरीरसे प्रभावतीका ही सेवन करते थे ॥ ३० ॥

संनतिं विनयं शीलं लीलां दाक्ष्यमथार्जवम् । स्पृहयन्त्यसुरा दृष्ट्वा विद्वत्तां च महात्मनाम् ॥ ३१ ॥ उन महामनस्वी नटोंकी विनय, प्रणति, शील, लीला, चातुरी, सरलता और विद्वत्ता देखकर असुर सदा ही उन्हें चाहते रहते थे ॥ ३१ ॥

रूपं विलासं गन्धं च मञ्जुभाषामथार्यताम् । तासां यादवनारीणां स्पृहयन्त्यसुरस्त्रियः ॥ ३२ ॥ उन असुरोंकी स्त्रियाँ भी यादवकुमारोंके साथ आयी हुई सुन्दरियोंके रूप, विलास, सुगन्ध, मनोहर बोली और श्रेष्ठ स्वभावकी सदा ही अभिलाषा करती थीं ॥ ३२ ॥

वज्रनाभस्य तु भ्राता सुनाभो नाम विश्रुतः । दुहितृद्वयं च नृपते तस्य रूपगुणान्वितम् ॥ ३३ ॥ वज्रनाभके एक भाई था, जो सुनाभ नामसे विख्यात था। नरेश्वर ! उसके दो पुत्रियाँ थीं, जो सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे युक्त थीं ॥ ३३ ॥

एका चन्द्रवती नाम्ना गुणवत्यथ चापरा । प्रभावत्यालयं ते तु व्रजतः खलु नित्यशः ॥ ३४ ॥ उनमेंसे एकका नाम चन्द्रवती और दूसरीका नाम गुणवती था । वे प्रतिदिन प्रभावतीके महलमें जाया करती थीं ॥ ३४ ॥

ददृशाते तु ते तत्र रतिसक्तां प्रभावतीम् । परिपप्रच्छतुश्चैव विश्रम्भोपगतां सतीम् ॥ ३५ ॥ उन दोनोंने वहाँ प्रभावतीको रतिमें आसक्त देखा । सती-साध्वी प्रभावतीका अपनी इन दोनों बहिनोंपर बड़ा विश्वास था; अतः इन दोनोंने उससे पूछा—( 'बहिन ! तुम किसके साथ क्रीड़ा करती हो ?' ) ॥ ३५ ॥

सोवाच मम विद्यास्ति याधीता काङ्क्षितं पतिम् । रत्यर्थं साऽऽनयत्याशु सौभाग्यं च प्रयच्छति ॥ ३६ ॥ देवं वा दानवं वापि विवशं सद्य एव हि । प्रभावती बोली—'मेरे पास एक विद्या है, जिसका अध्ययन कर लेनेपर वह रतिके लिये शीघ्र ही मनोवाञ्छित पतिको ला देती है और सौभाग्य प्रदान करती है। अभिलषित पुरुष देवता हो या दानव, यह विद्या उसे तत्काल विवश करके अपने पास उसे ला देती है ॥ ३६३ ॥

साहं रमामि कान्तेन देवपुत्रेण धीमता ॥ ३७ ॥ दृश्यतां मत्प्रभावेण प्रद्युम्नः सुप्रियो मम । 'अतः मैं उसी विद्याके प्रभावसे परम बुद्धिमान् देवकुमारको अपना प्राणवल्लभ बनाकर उनके साथ रमण करती हूँ । देखो, मेरे या मेरी विद्याके प्रभावसे प्रद्युम्न मेरे अत्यन्त प्रिय हो गये हैं' ॥ ३७३ ॥

ते दृष्ट्वा विस्मयं याते रूपयौवनसम्पदम् ॥ ३८ ॥ पुनरेवाब्रवीत् ते तु भगिन्यौ चारुहासिनी । प्रभावती वरारोहा कालप्राप्तमिदं वचः ॥ ३९ ॥ उनके रूप और यौवनकी सम्पत्ति देखकर उन दोनों बहनोंको बड़ा विस्मय हुआ । फिर मनोहर हास्यवाली सुन्दरी प्रभावतीने उन दोनों बहनोंसे यह समयोचित बात कही—॥ ३८-३९ ॥

देवा धर्मरता नित्यं दम्भशीला महासुराः । देवास्तपसि रक्ता हि सुखे रक्ता महासुराः ॥ ४० ॥ 'देवता सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं और महान् असुर दम्भी होते हैं। देवता तपस्यामें अनुरक्त होते हैं और महान् असुर सुखमें आसक्त ॥ ४० ॥

देवाः सत्ये रता नित्यमनृते तु महासुराः । धर्मस्तपश्च सत्यं च यत्र तत्र जयो ध्रुवम् ॥ ४१ ॥ 'देवता सदा सत्यमें तत्पर रहते हैं तो महान् असुर असत्यमें । जहाँ धर्म, तप और सत्य होता है, उसी पक्षको युद्धमें निश्चितरूपसे विजय प्राप्त होती है ॥ ४१ ॥

देवपुत्रौ वरयतां पतिविद्यां ददाम्यहम् । उचितौ मत्प्रभावेण सद्य एवोपलप्स्यथः ॥ ४२ ॥ 'अतः तुम दोनों भी दो सुयोग्य देवकुमारोंका वरण कर लो । पतिकी प्राप्ति करानेवाली यह विद्या मैं तुम्हें देती हूँ। तुम मेरे प्रभावसे तत्काल ही अभीष्ट पति प्राप्त कर लोगी' ॥

तां तथेत्यूचतुर्हृष्टे भगिन्यौ चारुलोचनाम् । परिपप्रच्छ भै मं च कार्यं तत् पतिमानिनी ॥ ४३ ॥ तब वे दोनों बहनें अत्यन्त हर्षमें भरकर चारुलोचना प्रभावतीसे बोलीं, 'बहुत अच्छा।' तदनन्तर पतिको आदर देनेवाली प्रभावतीने प्रद्युम्नसे उस कार्यके विषयमें पूछा । ४३ ।

स पितृव्यं गदं वीरं साम्बं चाथाब्रवीत् तदा । रूपान्वितौ सुशीलौ च शूरौ च रणकर्मणि ॥ ४४ ॥ प्रद्युम्नने उस समय अपने चाचा वीरवर गद और भाई साम्बका नाम बताया और कहा—'वे दोनों सुन्दर रूपवाले, सुशील तथा युद्धकर्ममें शूरवीर हैं' ॥ ४४ ॥

प्रभावत्युवाच

परितुष्टेन दत्ता मे विद्या दुर्वाससा पुरा । परितुष्टेन सौभाग्यं सदा कन्यात्वमेव च ॥ ४५ ॥ तब प्रभावती अपनी दोनों बहनोंसे बोली— पूर्वकालमें सेवासे संतुष्ट हुए दुर्वासा मुनिने मुझे यह विद्या