विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 619, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चनवतितमोऽध्यायः ५९७
दी; साथ ही अखण्ड सौभाग्य तथा सदा कन्या-जैसी बनी रहनेका वरदान दिया ॥ ४५ ॥
देवदानवयक्षाणां यं ध्यास्यसि स ते पतिः।
भवितेति मया चैव वीरोऽयमभिकाङ्क्षितः ॥ ४६ ॥
उन्होंने यह भी कहा था कि तुम देवता, दानव तथा यक्षोंमेंसे जिसका चिन्तन करोगी, वही तुम्हारा पति होगा। उनके इस वरदानके अनुसार मैंने उन्हीं वीर प्रद्युम्नको अपना पति बनानेकी इच्छा की ॥ ४६ ॥
गृहीतं तदिमां विद्यां सद्यो वां प्रियसङ्गमः।
ततो जगृहतुर्हृष्टे तां विद्यां भगिनीमुखात् ॥ ४७ ॥
अतः तुम दोनों ही इस विद्याको ग्रहण करो। इससे तुम्हें तत्काल ही प्रियतमका समागम प्राप्त होगा। यह सुनकर हर्षमें भरी हुई उन दोनों बहनोंने बहन प्रभावतीके मुखसे वह विद्या ग्रहण की ॥ ४७ ॥
दध्यतुर्गदसाम्बौ च विद्यामभ्यस्य ते शुभे।
तौ प्रद्युम्नेन सहितौ प्रविष्टौ भैमनन्दनौ ॥ ४८ ॥
उन शुभलक्षणा कन्याओंने विद्याका अभ्यास करके गद और साम्बका ध्यान किया; फिर तो वे दोनों यादवकुमार गद और साम्ब प्रद्युम्नके साथ ही उस महलमें प्रविष्ट हुए ॥
प्रच्छन्नौ मायया वीरौ कार्ष्णिना मायिना नृप।
गान्धर्वेण विवाहेन तावप्यरिबलार्दनौ ॥ ४९ ॥
पाणिं जगृहतुर्वीरौ मन्त्रपूर्वं सतां प्रियौ।
चन्द्रवत्या गदः साम्बो गुणवत्या च कैशविः ॥ ५० ॥
नरेश्वर ! मायावी प्रद्युम्नने अपनी मायासे उन दोनों वीरोंको छिपाकर वहाँ उपस्थित किया था। शत्रुसेनाका संहार करनेवाले उन दोनों वीरोंने भी गान्धर्व विवाहकी विधिसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक उन कन्याओंका पाणिग्रहण किया। वे दोनों ही सत्पुरुषोंके प्रिय थे। चन्द्रवतीके साथ गद और गुणवतीके साथ केशवकुमार साम्बका विवाह हुआ ॥ ४९-५० ॥
रेमिरेऽसुरकन्याभिर्वीरास्ते यदुपुङ्गवाः।
मार्गमाणास्त्वनुज्ञां ते शक्रकेशवयोरुदा ॥ ५१ ॥
इस तरह वे तीनों यदुपुङ्गव वीर उन दिनों इन्द्र और श्रीकृष्णके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए उन असुरकन्याओंके साथ रमण करने लगे ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि प्रभावतीपाणिग्रहणे चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें प्रभावतीका पाणिग्रहणविषयक चौरानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
प्रद्युम्नका प्रभावतीसे वर्षाका वर्णन करते हुए उसे अपने कुलका परिचय देना
वैशम्पायन उवाच
नभो नभस्येऽथ निरीक्ष्य मासि
कामस्तदा तोयदवृन्दकीर्णम्।
प्रभावतीं चारुविशालनेत्रा-
मुवाच पूर्णेन्दुनिभाशवक्त्रः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले प्रद्युम्नने भाद्रपद मासमें आकाशको मेघोंकी घटासे आच्छन्न हुआ देख उस समय मनोहर एवं विशाल नेत्रोंवाली प्रभावतीसे कहा—॥ १ ॥
तवाननाभो वरगात्रि चन्द्रो
न दृश्यते सुन्दरि चारुबिम्बः।
त्वत्केशपाशप्रतिमैनिरुद्धो
बलाहकैश्चारुनिरन्तरोरु ॥ २ ॥
'मनोहर एवं परस्पर सटी हुई जाँघोंवाली वराङ्गी ! सुन्दरि ! इस समय सुन्दर बिम्बवाला चन्द्रमा, जो तुम्हारे मुखके समान मनोरम जान पड़ता था, नहीं दिखायी देता है। तुम्हारे इन केशपाशोंके समान काले बादलोंने उसे छिपा दिया है ॥ २ ॥
संदृश्यते सुभ्रु तडिद् घनस्था
त्वं हेमचामीकरणान्वितेव।
मुञ्चन्ति धाराश्च घना नदन्त-
स्त्वद्धारयष्टेः सदृशा वराङ्गि ॥ ३ ॥
'सुन्दर भौंहोंवाली सुन्दरी ! यह जो मेघोंके अङ्कमें विद्युत् दिखायी देती है, वह सोनेके मनोहर आभूषणोंसे भूषित हुई तुम-जैसी ही प्रतीत होती है और ये गरजते हुए मेघ तुम्हारे मौक्तिक हारोके समान जलकी स्वच्छ धाराएँ गिरा रहे हैं ॥ ३ ॥
घनप्रदेशेषु बलाकपङ्क्तय-
स्त्वद्दन्तपङ्क्तिप्रतिमा विभान्ति।
निमग्नपद्मानि सरित्सु सुभ्रु
न भान्ति तोयानि रयाकुलानि ॥ ४ ॥
'सुभ्रु ! आकाशमें जहाँ बादल घिरे हुए हैं, उन प्रदेशोंमें बगुलोंकी पंक्तियाँ तुम्हारे दाँतोंकी श्रेणियोंके समान सुशोभित हो रही हैं। सरिताओंके जलोंमें कमलोंके समूह डूब गये हैं और वे जल महान् वेगसे व्याप्त हैं; अतः उनकी विशेष शोभा नहीं हो रही है ॥ ४ ॥