भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 620, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 620
५९८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अमी घना वायुवशोपयाता
बलाकमालामलचारुदन्ताः ।
अन्योन्यमभ्याहनितुं प्रवृत्ता
वनेषु नागा इव शुक्लदन्ताः ॥ ५ ॥

'ये बादल वायुके अधीन हो रहे हैं। बगुलोंकी पंक्तियाँ उनके निर्मल एवं मनोहर दाँतोंके समान शोभा पाती हैं। ये वनोंमें सफेद दाँतवाले हाथियोंके समान एक-दूसरेसे टक्कर लेनेके लिये उद्यत हैं ॥ ५ ॥

धनुस्त्रिवर्णं वरगात्रि पश्य
कृतं तवापाङ्गमिवाननस्थम् ।
विभूषयन्तं गगनं घनांश्च
प्रहर्षणं कामिजनस्य कान्ते ॥ ६ ॥

'सुन्दर अङ्गोंवाली प्राणवल्लभे ! वह इन्द्र-धनुष देखो, जो तुम्हारे मुखमण्डलमें स्थित नेत्रोंके कोणभाग-सा तिरंगा बना हुआ है। वह आकाश और बादलोंकी शोभा बढ़ाता हुआ कामीजनोंको महान् हर्ष प्रदान करता है ॥ ६ ॥

घनान् नदन्तः प्रतिनर्दमानान्
निरीक्ष्य सुश्रोणि शिखीन् प्रहृष्टान् ।
समादृतानुद्धतपिच्छभारान्
प्रियाभिरामानुपन्त्यमानान् ॥ ७ ॥

'अपनी बोली बोलते हुए मोर बादलोंको गरजते देख अत्यन्त हर्षमें भरकर नृत्य-कलाके प्रति आदर-भाव रखते हुए पंखोंके भारोंको ऊपर उठाकर आस-पास ही नृत्य कर रहे हैं; इस अवस्थामें ये बहुत ही प्रिय एवं मनोहर प्रतीत होते हैं। तुम इनकी ओर दृष्टिपात करो ॥ ७ ॥

हर्म्येषु चान्ये शशिपाण्डुरेषु
ऋदन्ति सुश्रोणि मयूरसंघाः ।
मुहूर्तशोभां चारुरूपां
दत्त्वा पतन्तो वलभीपुटेषु ॥ ८ ॥

'सुश्रोणि ! चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णवाली अट्टालिकाओंपर बैठे हुए दूसरे मयूर-समुदाय वहाँ दो घड़ीके लिये अत्यन्त मनोहर शोभा प्रदान करके छज्जोंपर उड़ते हुए बड़ी शोभा पा रहे हैं ॥ ८ ॥

प्रक्लिन्नपक्षास्तरुमस्तकेषु
मुहूर्तचूडामणितां विधाय ।
प्रयान्ति भूमिं नवशाद्वलाना-
माशङ्कमाना धृतचारुदेहाः ॥ ९ ॥

'मनोहर देह धारण करनेवाले मोर वृक्षोंकी सर्वोच्च शिखाओंपर बैठे हैं। उनकी पाँखें भीग गयी हैं और वे दो घड़ीके लिये उन वृक्षोंके सिरोंपर चूड़ामणिकी-सी शोभाकी सृष्टि करके नयी-नयी घासोंसे ढकी हुई भूमिपर जा रहे हैं। उनके मनमें यह शङ्का है कि ये घासें भूमिसे भिन्न हैं या अभिन्न ॥ ९ ॥

प्रवाति धारान्तरनिःसृतश्च
सुखोऽनिलश्चन्दनपङ्कशीतः ।
कदम्बसर्जार्जुनपुष्पभूतं
समावहन् गन्धमनङ्गबन्धुम् ॥ १० ॥

'जलकी धाराओंके बीचसे निकलकर सुखदायिनी हवा चल रही है, जो चन्दनपङ्कके समान शीतल प्रतीत होती है। यह कदम्ब, सर्ज और अर्जुनके फूलोंकी सुगन्ध लिये आ रही है। वह सुगन्ध कामोद्दीपनमें सहायक हो रही है ॥१०॥

रतिश्रमस्वेदविनाशहेतु-
र्नवोदभारानयने च हेतुः ।
न मारुतः स्याद् यदि चारुगात्रि
न मेघकालो मम वल्लभः स्यात् ॥ ११ ॥

'मनोहर अङ्गोंवाली प्रिये ! यदि इस समय रतिके श्रमसे प्रकट होनेवाले पसीनोंको मिटाने और नूतन जलके भारको खींच लानेमें सहायक यह वायु न चलती होती तो यह वर्षाकाल मुझे अधिक प्यारा न लगता ॥ ११ ॥

एवंविधेषु प्रियसङ्गमेषु
रतावसाने यदुपैति वायुः ।
रतिश्रमस्वेदहरः सुगन्धी
ततः परं किं सुखमस्ति लोके ॥ १२ ॥

'जब इस प्रकार प्रियजनोंके समागम प्राप्त हों, उस अवसरपर रतिक्रीड़ाके अन्तमें जो रतिश्रमजनित स्वेदविन्दुओंको हर लेनेवाली सुगन्धित वायु अपने पास आती है, उससे बढ़कर सुख इस संसारमें दूसरा कौन है ? ॥ १२ ॥

जलाप्लुतानीक्ष्य महानदीनां
सुगात्रि हंसाः पुलिनानि हृष्टाः ।
गताः श्रमं मानसवासलुब्धाः
ससारसाः क्रौञ्चगणानुविद्धाः ॥ १३ ॥

'सुन्दर अङ्गवाली प्राणवल्लभे ! बड़ी-बड़ी नदियोंके तटोंको जलमें निमग्न देख सारस और क्रौञ्चोंसहित हंस मानसरोवरमें निवासके लिये लुब्ध हो बड़े हर्षके साथ वहाँतक जानेका परिश्रम स्वीकार करते हैं ॥ १३ ॥

न भान्ति नद्यो न सरांसि चैव
हतत्विषीवायतचारुनेत्रे ।
गतेषु हंसेष्वथ सारसेषु
रथाङ्कनुह्वायद्वयेनेषु चैव ॥ १४ ॥

'विशाल एवं मनोहर नेत्रवाली प्रिये ! हंसों, सारसों और चक्रवाकोंके चले जानेपर नदी और तालाब श्रीहीन-से प्रतीत होते हैं। उनके बिना न तो नदियाँ अच्छी लगती हैं और न सरोवर ही ॥१४॥

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