विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 621, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[ विष्णुपर्व ] पञ्चनवतितमोऽध्यायः ५९९
भोगैकदेशेन शुभं शयानं
ध्रुवं जगन्नाथमुपेन्द्रमीशम् ।
निद्राभ्युपेता वरकालतज्ज्ञा
श्रियं प्रणम्योत्तरचारुरूपाम् ॥ १५ ॥
'श्रेष्ठ वर्षाकाल और उसमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुको जाननेवाली योग-निद्रा निश्चय ही लोकोत्तर मनोहर रूप धारण करनेवाली श्रीदेवीको प्रणाम करके शेषके शरीरके एक देशमें सोये हुए मङ्गलमय ईश्वर जगन्नाथ उपेन्द्रके निकट आयी है ॥ १५ ॥
निद्रायमाणे भगवत्युपेन्द्रे
मेघाम्बराक्रान्तनिशाकरोऽद्य ।
पद्मामलाभः कमलायताक्षि
कृष्णस्य वक्त्रानुकृतिं करोति ॥ १६ ॥
'प्रफुल्ल कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली प्रियतमे ! भगवान् उपेन्द्रके योगनिद्राको स्वीकार कर लेनेपर श्वेत कमलके समान अमल कान्तिवाले चन्द्रमा अत्र मेघरूपी अम्बर (वस्त्र) से आच्छादित हो भगवान् श्रीकृष्णके मुखका अनुकरण कर रहे हैं ॥ १६ ॥
कदम्बनीपार्जुनकेतकानां
स्रजो ध्रुवं कृष्णमुपानयन्ति ।
पुष्पाणि चान्यान्यृतवः समस्ताः
कृष्णात् प्रसादानभिकाङ्क्षमाणाः ॥ १७ ॥
'सारी ऋतुएँ भगवान् श्रीकृष्णसे कृपाप्रसाद पानेकी अभिलाषा रखकर निश्चय ही उनकी सेवामें कदम्ब, नीप, अर्जुन और केवड़ोंके गजरे तथा दूसरे-दूसरे पुष्प ले आती हैं ॥ १७ ॥
नागाश्चरन्तो विषदिग्धवक्त्राः
स्पृशन्ति पुष्पाण्यपि पादपान्यान् ।
पेपीयमानान् भ्रमरैर्जनानां
कौतूहलं ते जनयन्त्यतीव ॥ १८ ॥
'जिन सुकुमारतर वृक्षों एवं फूलोंके रस भ्रमर बारंबार पीते हैं, उन्हे विषपूर्ण मुखवाले सर्प स्वच्छन्द विचरते हुए जब छू देते हैं, तब उनके स्पर्शमात्रसे वे कुम्हला जाते हैं। इस प्रकार वे लोगोंको अत्यन्त आश्चर्यमें डाल रहे हैं ॥ १८ ॥
तोयातिभाराम्बुदवृन्दबद्धं
नभः पतिष्यन्तमिवाभिवीक्ष्य ।
निपानगम्भीरमभिन्नवृष्टं
मनोहरं चारुमुखस्तनोरु ॥ १९ ॥
'निपान-सदृश गम्भीर आकाशको जलके भारी भारसे युक्त मेघोंकी घटाद्वारा बँधकर गिरता हुआ-सा देख तुम्हारे मनोहर एवं सुन्दर मुख, स्तन और ऊरु कामोद्रेकवश पसीने-से भर गये हैं ॥ १९ ॥
^१. कुएँके आसपास पशुओकेपानी पीनेके लिये जो छोटा-सा जलकुण्ड बनाया जाता है, उसे 'निपान' कहते हैं ।
बलाकमालाकुलमाल्यदाग्ना
निरीक्ष रम्यं घनवृन्दमेतत् ।
सस्यानि भूमावभिवर्षमाणं
जगद्धितार्थं विमलाङ्गयष्टे ॥ २० ॥
'निर्मल अङ्गयष्टिवाली सुन्दरी ! जो बगुलोंकी पाँतसे परिपूर्ण होकर मानो श्वेत पुष्पहारसे अलंकृत हुआ है, उस रमणीय मेघसमूहकी ओर तो देखो; यह जगत्के हितके लिये पृथ्वीपर मानो अन्नकी वर्षा करता है ॥ २० ॥
जलावलम्बाम्बुदवृन्दकर्षी
घनैर्घनान् योधयतीव वायुः ।
प्रवृत्तचक्रो नृपतिर्वनस्थान्
गजान् गजैः स्वैरिव वीर्यदृप्तान् ॥ २१ ॥
'पानीके आधारभूत मेघसमूहोंको अपने साथ खींच लानेवाला पावससमीर बादलोंसे बादलोंको लड़ाता-सा जान पड़ता है; मानो कोई चक्रवर्ती नरेश बलके मदसे उन्मत्त हुए जंगली हाथियोंको अपने गजराजोंके साथ लड़ा रहा हो ॥ २१ ॥
अभौममम्भो विसृजन्ति मेघाः
पूतं पवित्रं पवनैः सुगन्धि ।
हर्षावहं चातकबर्हिणानां
वराण्डजानां जलदप्रियाणां ॥ २२ ॥
'ये मेघ शुद्ध, पवित्र और सुगन्धित वायुसे सुवासित उस दिव्य जलकी वर्षा करते हैं, जो मेघोंके प्रेमी चातक और मोर आदि श्रेष्ठ पक्षियोंको हर्ष प्रदान करता है ॥ २२ ॥
प्लवंगमः षोडशपक्षशायी
चिरौति गोष्ठः सह कामिनीभिः ।
ऋचो द्विजातिः प्रियसत्यधर्मा
यथा सुशिष्यैः परिवार्यमाणः ॥ २३ ॥
'जो बरसातके पहले सोलह पक्षों (आठ महीनों) तक कहीं बिलमें शयन करता रहता है, वही मेढक बरसातके आठ पक्षोंमें गोष्ठ (गोसमुदाय) की भाँति अपनी स्त्रियोंके साथ आर्तनाद-सा करता है; मानो सत्य और धर्मसे प्रेम रखनेवाला कोई विद्वान् ब्राह्मण अपने अच्छे शिष्योंसे घिरकर वेदकी ऋचाओंका पाठ कर रहा हो ॥ २३ ॥
गुणो महांस्तोयकालजोऽय-
मबुद्धमेघस्तनभीषितानाम् ।
परिष्वजन्तः परिवर्द्धयन्ति
विनापिशय्यासमयं प्रियाणाम् ॥ २४ ॥
'वर्षाकालका यह एक महान् गुण है कि अज्ञात मेघ-