भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 622

६०० श्रीमद्भागवते खिलभागे [ हरिवंश-

गर्जनाको सहसा सुनकर भयभीत हुई प्रियतमाओंको प्रेमी पुरुष हृदयसे लगाकर शयनकालके बिना भी उनकी काम- वासनाओंको बढ़ा देते हैं ॥ २४ ॥

दोषोऽयमेकः सलिलागमस्य मां प्रत्युदारान्वयवर्णशीले । न दृश्यते यत् तव वक्त्रतुल्यो घनग्रहग्रस्ततनुः शशाङ्कः ॥ २५ ॥

‘उत्तम वंश, सुन्दर वर्ण और अच्छे स्वभाववाली प्रिये ! मुझे अपने लिये वर्षाकालका यही एक दोष प्रतीत होता है कि तुम्हारे मुखके समान शोभा पानेवाला चन्द्रमा मेघरूपी ग्रहसे ग्रस्त होकर (मेघोंकी घटाओंमें छिपकर) दिखायी नहीं देता है ॥ २५ ॥

प्रदृश्यते भीरु यदा शशाङ्को घनान्तरस्थो जगतः प्रदीपः । तदानुपश्यन्ति जनाः प्रहृष्टा बन्धुं प्रवासादिव संनिवृत्तम् ॥ २६ ॥

‘भीरु ! जब जगत्‌को प्रकाशित करनेवाला चन्द्रमा मेघोंके भीतर दीख जाता है, तब सब लोग परदेशसे लौटे हुए प्रेमी बन्धुकी भाँति उसे बड़े हर्षमें भरकर बारंबार देखने लगते हैं ॥ २६ ॥

विलापसाक्षी प्रियहीनितानां संदृश्यते भीरु यदा शशाङ्कः । नेत्रोत्सवः प्रोषितकामुकानां दृष्ट्वैव कान्तं भवतीत्यवैमि ॥ २७ ॥

‘भीरु ! प्रियवियोगिनी वनिताओंके विलापका साक्षी- भूत चन्द्रमा जब दृष्टिगोचर होता है, तब जिनके पति परदेशमें रहकर लौटे हैं, उन कामिनियोंके नेत्रोंमें अपने प्रियतमका दर्शन करके ही आनन्दोत्सव प्रतीत होता है, ऐसा मैं समझता हूँ ॥ २७ ॥

नेत्रोत्सवः कान्तसमागतानां दावाग्नितुल्यः प्रियहीनितानाम् । तेनैव देहेन वराङ्गनानां चन्द्रोऽपि तावत्प्रियविप्रियश्च ॥ २८ ॥

‘यह नेत्रोत्सव उन्हींको प्रतीत होता है, जिन्हें अपने प्रियतमका संयोग प्राप्त है; प्रियवियोगिनी अवलाओंके लिये तो यह चन्द्रमा दावाग्निके तुल्य दाहक प्रतीत होता है। इस प्रकार चन्द्रमा आह्लादक होनेपर भी संयोग और वियोग-अवस्थाके भेदसे अपने उसी शरीरद्वारा श्रेष्ठ नारियोंको प्रिय और अप्रिय प्रतीत होता है ॥ २८ ॥

विनापि चन्द्रेण पुरे पितुस्ते यतः प्रभा चन्द्रगभस्तिगौरी । गुणागुणांश्चन्द्रमसा न वेद्मि यतस्ततोऽहं प्रशंसयिष्ये ॥ २९ ॥

‘प्रिये ! तुम्हारे पिताके इस नगरमें तो चन्द्रमाके बिना भी चन्द्रकिरणोंके समान गौर प्रकाश छाया रहता है। अतः मुझे यहाँ चन्द्रमाके होने और न होनेके गुण-अवगुणका पता नहीं लगता; इसलिये मैं बारंबार इस बातकी चर्चा करूँगा ॥ २९ ॥

अवाप यो ब्राह्मणराज्यमीड्यो दुरापमन्यैः सुकृतैस्तपोभिः । गायन्ति विप्राः पवमानसंज्ञं समागताः पर्वणि चाप्युदारम् ॥ ३० ॥ पिता बुधस्योत्तरवीर्यकर्मा पुरूरवा यस्य सुतो नृदेवः । प्राणाग्निरीड्योऽग्निमजीजनद् यो नष्टं शमीगर्भभवं भवात्मा ॥ ३१ ॥

‘जो दूसरे लोगोंके लिये पुण्य और तपस्यासे भी दुर्लभ है, उस ब्राह्मणराज्यको जिन्होंने अनायास ही प्राप्त कर लिया, जो स्तवन करनेके योग्य हैं, यज्ञमें एकत्र हुए ब्राह्मण पवमान नामवाले जिन उदार सोमदेवके गुण गाते हैं, वे उन बुधके पिता हैं, जिनके पुत्र लोकोत्तर बल और पराक्रमसे सम्पन्न राजा पुरूरवा हैं। वे प्राणाग्निरूप और स्तुति करनेके योग्य हैं, (ओषधियों और वनस्पतियोंके स्वामी होनेके कारण) उन्होंने नष्ट हुई अग्निको अश्वत्थके उत्पादनद्वारा शमीके गर्भसे प्रकट किया। वे रुद्रस्वरूप हैं ॥ ३०-३१ ॥

तथैव पश्चाच्चकमे महात्मा पुरोर्वंशीमप्सरसां वरिष्ठाम् । पीतः पुरा योऽमृतसर्वदेहो मुनिप्रवीरैर्वरगान्धि घोरैः ॥ ३२ ॥

‘सुन्दर अङ्गोंवाली प्रिये ! तत्पश्चात् इन महात्मा चन्द्र- देवने पूर्वकालमें अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशीकी (पुरूरवारूपसे) कामना की थी। उनका सारा शरीर ही अमृतमय है। पहले कभी घोर स्वभाववाले श्रेष्ठ मुनियोंने उन अमृतमय चन्द्रमाको पी लिया था ॥ ३२ ॥

नृपः कुशाग्रैः पुनरेव यश्च धीमानतोऽग्निर्दिवि पूज्यते च । आयुश्च वंशे नहुषश्च यस्य यो देवराजत्वमवाप वीरः ॥ ३३ ॥

‘उन्हींके वंशज बुद्धिमान् राजा पुरूरवा हुए, जो कुशाग्रोंद्वारा आरम्भ करके अनेकानेक यज्ञोंका सम्पादन कर स्वर्गमें अग्नितुल्य तेजस्वी रूपसे प्रतिष्ठित हो पूजित होते हैं। पुरूरवाके वंशमें आयु हुए, जिनके पुत्र नहुष थे। उन वीर नहुषने देवराजपद प्राप्त कर लिया था ॥ ३३ ॥