भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 623

विष्णुपर्व ] पञ्चनवतितमोऽध्यायः ६०१ देवातिदेवो भगवान् प्रसूतो न कूटकृद् यस्य नृपोऽस्ति वंशे वंशे हरियंत्र जगत्प्रणेता। न नास्तिको नैष्कृतिकोऽपि वाथ। भौमः प्रवीरः सुरकार्यहेतो- अश्रद्दधानोऽप्यथवा कदर्यः र्यः सुभ्रु दक्षस्य वृतः सुताभिः ॥ ३४ ॥ शौर्येण वा वारिरुहाक्षि हीनः ॥ ३७ ॥ 'देवताओंके लिये भी उत्कृष्ट देवता, जगत्स्रष्टा भगवान् 'कमललोचने ! यदुकुलमें कोई राजा ऐसा नहीं हुआ श्रीहरि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये चन्द्रमाके ही है, जो छल-कपटसे काम लेनेवाला हो । उस कुलमें न तो वंशमें प्रमुख भीमवंशी वीरके रूपमें प्रकट हुए हैं। सुभ्रु ! कोई नास्तिक हुआ है न शठ, न श्रद्धाहीन हुआ है न उन चन्द्रमाको नक्षत्रस्वरूपा दक्षकी कन्याओंने पतिरूपसे कदर्य अथवा शौर्यहीन ही ॥ ३७ ॥ वरण किया है ॥ ३४ ॥ वंशे वधूस्त्वं कम लायताक्षि बभूव राजाथ वसुश्च यस्य श्लाघ्या गुणानामंतिपात्रभूता । वंशे महात्मा शशिवंशदीपः । कुरु प्रणामं शिखराग्रदन्ति यश्चक्रवर्तित्वमवाप वीरः तस्य त्वमीशस्य सतां प्रियस्य ॥ ३८ ॥ स्वैः कर्मभिः शक्रसमप्रभावः ॥ ३५ ॥ 'कमलके समान विशाल नेत्र और शिखरमणिके तुल्य 'चन्द्रमाके ही वंशमे शशिकुल-दीपक वीर एवं महात्मा सुन्दर दाँतोंवाली सुन्दरी ! तुम उसी चन्द्रवंश एवं यदुवंशकी राजा उपरिचर वसु हुए हैं, जो अपने कर्मोंसे चक्रवर्तीपदको वधू हो । तुम सद्गुणोंका अत्यन्त पात्र एवं स्पृहणीय हो । प्राप्त हुए । उनका प्रभाव इन्द्रके समान था ॥ ३५ ॥ तुम सत्पुरुषोंके प्रिय जगदीश्वर श्रीहरिको प्रणाम करो ॥३८॥ यदुश्च राजा शशिवंशमुख्यो नारायणायात्मभवायनाय गोऽवाप महामधिराजभावम् । लोकायनाय त्रिदशायनाय । भोजाः कुले यस्य नराधिपस्य खगेन्द्रकेतोः पुरुषोत्तमाय वीराः प्रसूताः सुरराजतुल्याः ॥ ३६ ॥ कुरु प्रणामं श्वशुराय देवि ॥ ३९ ॥ 'चन्द्रवंशके प्रधान पुरुष राजा यदु हो गये हैं, जो इस 'देवि ! जो स्वयम्भू ब्रह्माजीके आश्रयस्थान हैं, सम्पूर्ण पृथ्वीपर राजाधिराज पदको प्राप्त हुए थे । उन्हीं महाराजके जगत् तथा देवताओंके भी आधार हैं, वे गरुड़ध्वज कुलमे देवराज इन्द्रके तुल्य पराक्रमी भोजवंशी वीर प्रकट पुरुषोत्तम भगवान् नारायण तुम्हारे श्वशुर हैं। तुम उन्हें हुए हैं ॥ ३६ ॥ प्रणाम करो' ॥ ३९ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि प्रद्युम्नभाषणे पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें प्रद्युम्नका भाषणविषयक पञ्चानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥ षण्णवतितमोऽध्यायः कश्यपके मना करनेपर भी वज्रनाभका त्रिलोकविजयके लिये प्रस्थान, श्रीकृष्ण और इन्द्रका प्रद्युम्नको संदेश देना और उनकी संततिके प्रभावका उल्लेख करना, दैत्योंका प्रद्युम्न आदिके पुत्रोंको बंदी बनाना, प्रभावती आदिका पतियोंको तलवार देकर युद्धके लिये भेजना, इन्द्रके द्वारा उनकी सहायता तथा प्रद्युम्नका अद्भुत पराक्रम वैशम्पायन उवाच वज्रनाभोऽपि निर्वृत्ते सत्रे कश्यपमभ्यगात्। सत्रावसाने च मुनेः कश्यपस्यातितेजसः। त्रैलोक्यविजयाकाङ्क्षी तमुवाचाथ कश्यपः ॥ २ ॥ जग्मुर्देवासुराः स्वानि स्थानान्यमितविक्रमाः ॥ १ ॥ यज्ञ पूर्ण होनेपर वज्रनाभ भी त्रिभुवन-विजयकी अभिलाषा लेकर कश्यपजीके पास गया । तब कश्यपजीने वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! अत्यन्त तेजस्वी उससे कहा- ॥ २ ॥ कश्यप मुनिका यज्ञ समाप्त होनेपर अमित पराक्रमी देवता वज्रनाभ निबोध त्वं श्रोतव्यं यदि चेन्मम । और असुर अपने-अपने स्थानको गये ॥ १ ॥ वस वज्रपुरे पुत्र स्वजनेन समावृतः ॥ ३ ॥