विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 624, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६०२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'बेटा वज्रनाभ ! यदि मेरी बात सुनने और माननेयोग्य हो तो ध्यान देकर सुनो। तुम अपने स्वजनोंसे घिरे रहकर वज्रपुरमें ही निवास करो ॥ ३ ॥
तपसाभ्यधिकः शक्रः शक्तश्चैव स्वभावतः।
ब्रह्मण्यश्च कृतज्ञश्च ज्येष्ठः श्रेष्ठतमो गुणैः ॥ ४ ॥
'इन्द्र तपस्यामें तुमसे बढ़े-चढ़े हैं। स्वभावसे ही शक्ति-शाली हैं। ब्राह्मणभक्त, कृतज्ञ, भाइयोंमें ज्येष्ठ और उत्तम गुणोंकी दृष्टिसे श्रेष्ठतम हैं ॥ ४ ॥
राजा कृत्स्नस्य जगतः पात्रभूतः सतां गतिः।
सम्प्राप्तो लोकराज्यं स सर्वभूतहिते रतः ॥ ५ ॥
'वे सम्पूर्ण जगत्के राजा, सुपात्र और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं तथा तीनों लोकोंका राज्य पाकर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ ५ ॥
नैव शक्यस्त्वया जेतुं वज्रनाभ विहन्यसे।
अहिं पदाभ्युत्क्रमन् वै नचिराद् विनशिष्यसि ॥ ६ ॥
'वज्रनाभ ! तुम उन्हें जीत नहीं सकते । जीतनेके प्रयत्नमें स्वयं ही मारे जाओगे । साँपको पैरोंसे ठुकरानेवालेकी भाँति शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे' ॥ ६ ॥
वज्रनाभश्च तद्वाक्यं नाभिनन्दति भारत।
कालपाशपरीताङ्गो मर्तुकाम इवौषधम् ॥ ७ ॥
भारत ! वज्रनाभका सारा शरीर कालके पाशसे बँधा हुआ था। जैसे मरनेवाले रोगीको दवा अच्छी नहीं लगती, उसी प्रकार उसे कश्यपजीकी बात पसंद नहीं आयी ॥ ७ ॥
अभिवाद्य स दुर्बुद्धिः कश्यपं लोकभावनम्।
त्रैलोक्यविजयारम्भे मतिं चक्रे दुरासदः ॥ ८ ॥
अत्यन्त खोटी बुद्धिवाले उस दुर्जय असुरने लोकस्रष्टा कश्यपजीको प्रणाम करके त्रिभुवन-विजयका कार्य आरम्भ करनेका विचार किया ॥ ८ ॥
ज्ञातियोधान् समानीय मित्राणि सुबहूनि च।
प्रतस्थे स्वर्गमेवाग्रे विजिगीषन् विशाम्पते ॥ ९ ॥
प्रजानाथ ! सजातीय बन्धुओं तथा बहुत-से मित्रोंको ही योद्धाओंके रूपमें साथ लेकर उसने विजयकी इच्छासे पहले स्वर्गलोकको प्रस्थान किया ॥ ९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवौ कृष्णेन्द्रौ च महाबलौ।
प्रेषयामासतुर्हंसान् वज्रनाभवधं प्रति ॥ १० ॥
इसी बीचमें महाबली श्रीकृष्ण और इन्द्र दोनों देवताओंने वज्रनाभ-वधके लिये संदेश देकर हंसोंको भेजा ॥ १० ॥
समागतास्तु तच्छ्रुत्वा यदुमुख्या महाबलाः।
मन्त्रयित्वा महात्मानश्चिन्तामापेदिरे तथा ॥ ११ ॥
वज्रपुरमें एकत्र हुए महाबली महामनस्वी प्रमुख यादव वीर हंसोंके मुखसे वह संदेश सुनकर आपसमें सलाह करके इस प्रकार विचार करने लगे ॥ ११ ॥
वज्रनाभोऽद्य हन्तव्यः प्रद्युम्नेनेत्यसंशयम्।
तयोर्दुहितरो भार्या भक्त्या ताः सर्वभावतः॥ १२ ॥
सर्वाः सगर्भास्ताश्चैव किं नु कार्यमनन्तरम्।
प्रातः प्रसवकालश्च तासां नातिचिरादिव ॥ १३ ॥
इसमें संदेह नहीं कि आज प्रद्युम्नके द्वारा वज्रनाभका वध अवश्य होना चाहिये । परंतु वज्रनाभ और उसके भाई दोनोंकी कन्याएँ भक्तिपूर्वक हमलोगोंकी भार्याएँ हो गयी हैं। वे सब-की-सब हर तरहसे हमारा शुभचिन्तन करती हैं। इस समय वे तीनों दानव-कन्याएँ गर्भवती हैं; अतः अब हमें क्या करना चाहिये ? उन तीनोंका प्रसव-काल शीघ्र ही आनेवाला है ॥ १२-१३ ॥
सम्मन्त्रयित्वैतदर्थं हंसानूचुर्महाबलाः।
आख्येयमर्थवत् कृत्स्नं शक्रकेशवयोस्र्तदा ॥ १४ ॥
इस विषयमें भलीभाँति परस्पर विचार करके उन महाबली यादवोंने उस समय हंसोंसे कहा—'तुम्हें भगवान् श्रीकृष्ण और इन्द्रके पास जाकर यहाँकी प्रयोजनयुक्त सारी बातें कहनी चाहिये' ॥ १४ ॥
हंसैर्गत्वा तदाख्यातं देवयोस्तद् यथातथम् ।
ताभ्यां हंसास्तु संदिष्टा न भेतव्यमिति प्रभो ॥ १५ ॥
उत्पत्स्यन्ति गुणैः श्लाघ्याः पुत्रा वः कामरूपिणः।
गर्भस्थाः सर्ववेदांश्च साङ्गान् वेत्स्यन्त्यनिन्दिताः॥ १६ ॥
प्रभो ! तब हंसोंने वहाँ जाकर उन दोनों देवताओंसे वहाँकी सारी बातें यथार्थरूपसे कह सुनायीं । फिर उन दोनोंने हंसोंको यह संदेश दिया कि 'यादवो ! तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिये । तुम्हारे उन स्त्रियोंके गर्भसे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले पुत्र उत्पन्न होंगे; जो अपने उत्तम गुणोंके कारण स्पृहणीय होंगे। वे उत्तम पुत्र गर्भमें रहते समय ही अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर लेंगे ॥
तथा चानागतं सर्वमस्त्राणि विविधानि च।
सद्य एव युवानश्च भविष्यन्ति सुपण्डिताः ॥ १७ ॥
'इसी प्रकार उन्हें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों तथा भविष्यमें होनेवाली सारी बातोंका स्वतः ज्ञान हो जायगा । वे जन्म लेनेपर तत्काल ही तरुण एवं अच्छे पण्डित हो जायेंगे' ॥ १७ ॥
एवमुक्ता गता हंसाः पुनर्वज्रपुरं विभो।
शशंसुश्चैव भैमानां शक्रकेशवभाषितम् ॥ १८ ॥
प्रभो ! उनके ऐसा कहनेपर वे हंस पुनः वज्रपुरको गये । वहाँ उन्होंने यादवकुमारोंसे देवराज इन्द्र और श्रीकृष्णका संदेश कह सुनाया ॥ १८ ॥