विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 625, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] षण्णवतितमोऽध्यायः ६०३
प्रभावती तदा पुत्रं सुषुवे सदृशं पितुः।
सद्यो यौवनसम्प्राप्तं सर्वज्ञत्वं च भारत ॥ १९ ॥
उस समय प्रभावतीने एक पुत्रको जन्म दिया, जो अपने पिताके समान ही सर्वगुणसम्पन्न था। भारत ! वह तत्काल युवावस्थाको प्राप्त हो गया तथा उसमे सर्वज्ञता भी थी ॥ १९॥
मासमात्रेण सुषुवे देवी चन्द्रवती नृप ।
चन्द्रप्रभमिति ख्यातं तनयं सदृशं पितुः ॥ २० ॥
नरेश्वर ! उसके एक मासके बाद चन्द्रवती देवीने भी एक पुत्र उत्पन्न किया, जो अपने पिताके समान ही सुन्दर एवं शक्तिशाली था। उसका नाम चन्द्रप्रभ था ॥ २० ॥
सद्यश्च यौवनं प्राप्तं सर्वज्ञत्वं च भारत ।
गुणवत्यपि पुत्रं च गुणवन्तमनिन्दिता ॥ २१ ॥
युवानावथ सद्यस्तौ सर्वशास्त्रार्थकोविद्वौ ।
इन्द्रोपेन्द्रप्रसादेन संवृत्तौ युद्धवर्द्धनौ ॥ २२ ॥
भारत ! वह भी तत्काल युवावस्थाको प्राप्त हो गया और उसमें भी सर्वज्ञता थी। तत्पश्चात् साध्वी गुणवतीने भी एक गुणवान् पुत्रको जन्म दिया। वे दोनों बालक तत्काल युवावस्थासे सम्पन्न और सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मज्ञ हो गये। वे दोनों युद्धमें आगे बढ़नेवाले थे। इन्द्र और उपेन्द्रके प्रसादसे उन बालकोंमें ये सद्गुण आये थे ॥ २१-२२ ॥
हर्म्यपृष्ठे वर्द्धमाना दृष्टास्ते यदुनन्दनाः ।
इन्द्रोपेन्द्रेच्छया वीर नान्यथेत्यवधार्यताम् ॥ २३ ॥
वीर ! एक दिन अट्टालिकाकी छतपर घूमते हुए उन वृद्धिशील यादवकुमारोंको दानवोंने देख लिया। इन्द्र और उपेन्द्रकी इच्छासे ही ऐसा हुआ था, अन्यथा नहीं। इस बातको तुम निश्चितरूपसे जान लो ॥ २३ ॥
निवेदिताश्च सम्भ्रान्तैर्दैत्यैराकाशरक्षिभिः ।
वज्रनाभाय वीराय त्रिविष्टपजयैषिणे ॥ २४ ॥
उस समय आकाशकी ओरसे नगरकी रक्षा करनेवाले दैत्योंने बड़ी घबराहटमे पड़कर स्वर्गविजयकी इच्छा रखनेवाले वीर वज्रनाभसे उन बालकोंके विषयमे निवेदन किया ॥
वधाय सर्वे गृह्यन्तां ममैते गृहधर्षकाः ।
इत्युवाचासुरपतिर्वज्रनाभो महासुरः ॥ २५ ॥
यह सुनकर असुरोंके स्वामी महान् असुर वज्रनाभने कहा—'ये बालक मेरे घरको कलङ्कित करनेवाले हैं। इन सबको मार डालनेके लिये कैद कर लो' ॥ २५ ॥
ततः सैन्यं समाज्ञप्तमसुरेन्द्रेण धीमता ।
आवारयामास दिशः सर्वाः कुरुकुलोद्वह ॥ २६ ॥
गृह्यन्तामाशु बध्यन्तामिति वाचस्ततस्ततः ।
उच्चेरुरसुरेन्द्रस्य शासनादरिशासिनः ॥ २७ ॥
कुरुकुलतिलक जनमेजय ! तदनन्तर बुद्धिमान् असुर-राजकी आज्ञासे असुरोंकी सेनाने सम्पूर्ण दिशाओंकी ओरसे आकर उस नगरको घेर लिया। सब ओर इधर-उधर यही बात सुनायी देने लगी—'पकड़ लो, शीघ्र मार डालो।' शत्रुओंको दण्ड देनेवाले असुरराजके आदेशसे समस्त सैनिक ऐसी ही बातें बोल रहे थे ॥ २६-२७ ॥
तच्छ्रुत्वा व्यथितास्तेषां मातरः पुत्रवत्सलाः ।
रुरुदुस्ता रुदन्तीश्च प्रद्युम्नः प्रहसन् ब्रवीत् ॥ २८ ॥
ये बातें सुनकर उन बालकोंकी पुत्रवत्सला माताएँ शोकसे व्यथित होकर रोने लगीं। उस समय उन रोती हुई देवियोंसे प्रद्युम्नने हँसते हुए कहा- ॥ २८ ॥
मा भैष्ट जीवमानेषु स्थितेष्वस्मासु सर्वथा ।
किं नो दैत्याः करिष्यन्ति सर्वथा भद्रमस्तु वः ॥ २९ ॥
'दानवकन्याओ ! तुम डरो मत। तुम्हारा सर्वथा भला हो। जब हम सब प्रकारसे जीते-जागते यहाँ खड़े हैं, तब ये दैत्य हमारा क्या कर लेंगे' ॥ २९ ॥
प्रभावतीमथोवाच प्रद्युम्नो विप्लवां स्थिताम् ।
पिता तव गदापाणिः पितृव्याश्च स्थितास्तत्र ॥ ३० ॥
भ्रातरश्चैव ते देवि ज्ञातयश्च तथापरे ।
एते पूज्याश्च मान्याश्च तवार्थे खलु सर्वथा ॥ ३१ ॥
इसके बाद प्रद्युम्नने व्याकुल होकर खड़ी हुई प्रभावतीसे कहा—'देवि ! तुम्हारे पिता और चाचा हाथमें गदा लेकर खड़े हैं। तुम्हारे भाई और दूसरे कुटुम्बीजन भी युद्धके लिये उपस्थित हैं। ये सब-के-सब तुम्हारे नाते सर्वथा मेरे पूजनीय एवं आदरणीय हैं ॥ ३०-३१ ॥
भगिन्यौ पृच्छ भद्रं ते कालोऽयं खलु दारुणः ।
मरणं सहमानानां युध्यतां विजयो ध्रुवम् ॥ ३२ ॥
'तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपनी दोनों बहनोंसे भी पूछ लो। यह समय बड़ा भयंकर है। जो मरणका कष्ट सहकर युद्ध करते हैं, उनकी विजय अवश्य होती है ॥ ३२॥
दानवेन्द्रादयो ह्येते योत्स्यन्तेऽस्मद्वधैषिणः ।
किमत्र कार्यमस्माभिः सर्वैश्चक्रान्तरस्थितैः ॥ ३३ ॥
'ये दानवराज वज्रनाभ आदि हमारे वधकी इच्छासे युद्ध करेंगे। ऐसी दशामे हमलोगोंको क्या करना चाहिये ? हम सब लोग तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं' ॥ ३३ ॥
प्रभावती रुदन्ती तु प्रद्युम्नमिदमब्रवीत् ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय जानुभ्यां पतिता क्षितौ ॥ ३४ ॥
उस समय प्रभावती रोती हुई घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़ी और मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर प्रद्युम्नसे इस प्रकार बोली— ॥ ३४ ॥
गृहाण शस्त्रमात्मानं रक्ष शत्रुनिबर्हण ।
जीवन् पुत्रांश्च दारांश्च द्रष्टासि यदुनन्दन ॥ ३५ ॥