भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 626

६०४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

आर्यां श्वश्रू वैदर्भीमनिरुद्धं च मानद । स्मृत्वैतन्मोक्षयात्मानं व्यसनादरिमर्दन ॥ ३६ ॥ 'शत्रुओंका संहार करनेवाले यदुनन्दन ! शस्त्र उठाओ और अपनी रक्षा करो। नरश्रेष्ठ ! मानद ! यदि जीवित रहोगे तो पुत्रों और पत्नियोंको देखोगे। आर्या रुक्मिणी तथा पुत्र अनिरुद्धसे भी मिल सकोगे। शत्रुमर्दन ! यह सब सोच-कर अपने आपको संकटसे मुक्त करो ॥ ३५-३६ ॥

दुर्वाससा वरो दत्तो मुनिना मम धीमता । वैधव्यरहिता हृष्टा जीवपुत्रा भविष्यसि ॥ ३७ ॥ 'बुद्धिमान् दुर्वासा मुनिने मुझे वर दिया है कि तू वैधव्यरहित, प्रसन्न एवं जीवित पुत्रोंकी माता होगी ॥ ३७ ॥

एव मे हृदयाश्वासो भविता न तदन्यथा । सूर्याग्नितेजसो वाक्यं मुनेरिन्द्रानुजात्मज ॥ ३८ ॥ 'इन्द्रानुजकुमार ! यह वर मेरे हृदयको आश्वासन देने-वाला है। यह सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी दुर्वासा मुनिका वचन सत्य होगा, मिथ्या कभी नहीं होगा' ॥ ३८ ॥

इत्युक्त्वाथासिमादाय सूपस्पृष्टा मनस्विनी । प्रददौ रौक्मिणेयाय जयस्वेति वरं वरा ॥ ३९ ॥ ऐसा कहकर श्रेष्ठ मनस्विनी नारी प्रभावतीने एक तलवार लेकर उसे अच्छी तरह साफ किया और रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नके हाथमें दे दिया। साथ ही यह वर दिया कि तुम विजयी होओ ॥ ३९ ॥

स तं जग्राह धर्मात्मा प्रहृष्टेनान्तरात्मना । प्रणम्य शिरसा दत्तं प्रियया भक्तियुक्तया ॥ ४० ॥ अपने प्रति भक्ति रखनेवाली प्रियतमा प्रभावतीके दिये हुए उस खड्गको धर्मात्मा प्रद्युम्नने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और प्रसन्न चित्तसे उसको हाथमें ले लिया ॥ ४० ॥

चन्द्रवत्यपि निस्त्रिंशं गदाय प्रददौ मुदा । तदा गुणवती चैव साम्बायासिं महात्मने ॥ ४१ ॥ इसी प्रकार चन्द्रवतीने भी उस समय गदको प्रसन्नता-पूर्वक खड्ग दिया। तदनन्तर गुणवतीने भी महात्मा साम्बको तलवार भेंट की ॥ ४१ ॥

हंसकेतुमथोवाच प्रद्युम्नः प्रणतं प्रभुः । इहैव साम्बसहितो युध्यस्व सह यादवैः ॥ ४२ ॥ तदनन्तर प्रभावशाली प्रद्युम्नने विनीतभावसे खड़े हुए (अपने सारथि) हंसकेतुसे कहा—'तुम यहीं यादवों तथा साम्बके साथ रहकर असुरोंके साथ युद्ध करो ॥ ४२ ॥

आकाशे दिक्षु सर्वासु योत्स्याम्यहमरिंदम । इत्युक्त्वाय रथं चक्रे मायया मायिनां वरः ॥ ४३ ॥ 'शत्रुदमन ! मैं आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें युद्ध करूँगा।' ऐसा कहकर मायावियोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नने मायासे एक रथका निर्माण किया ॥ ४३ ॥

सहस्रशिरसं नागं कृत्वा सारथिमात्मवान् । अनन्तभोगं कौरव्य सर्वनागोत्तमोत्तमम् ॥ ४४ ॥ स तेन रथमुख्येन हर्षयन् वै प्रभावतीम् । चचारासुरसैन्येषु तृणेष्विव हुताशनः ॥ ४५ ॥ कुरुनन्दन ! मनस्वी प्रद्युम्न अनन्त शरीरवाले, सहस्र मस्तकोंसे युक्त एक नागको, जो समस्त उत्तम नागोंसे भी उत्तम था, अपना सारथि बनाकर उस मुख्य रथके द्वारा प्रभावतीका हर्ष बढ़ाते हुए असुर-सेनाओंमें उसी तरह विचरने लगे, जैसे तिनकोंमें आग फैलती है ॥ ४४-४५ ॥

शरैराशीविषप्रख्यैरर्द्धचन्द्रानुकारिभिः । भेदनैर्गाधनैश्चैव ततर्द दितिसम्भवान् ॥ ४६ ॥ प्रद्युम्न विषधर सर्पोंके समान भयंकर, अर्धचन्द्राकार, भेदन (पतली नोकवाले) तथा गाधन (मोटे अग्रभागवाले) बाणोंद्वारा दैत्योंको पीड़ित करने लगे ॥ ४६ ॥

असुराश्च रणे मत्ताः कार्ष्णिं शस्त्रैरितस्ततः । जघ्नुः कमलपत्राक्षं परं निश्चयमास्थिताः ॥ ४७ ॥ असुर भी उत्तम निश्चयका आश्रय ले रणभूमिमें मतवाले होकर इधर-उधरसे शस्त्रोंद्वारा कमलनयन प्रद्युम्नपर प्रहार करने लगे ॥ ४७ ॥

चिच्छेद बाहून केषांचित्केयूरवलयोज्ज्वलान् । सकुण्डलानि केषांचिच्छिरांस्यपि च चिच्छिदे ॥४८॥ प्रद्युम्नने कितने ही असुरोंकी भुजाएँ काट डालीं, जो केयूर और कङ्कणकी कान्तिसे प्रकाशित हो रही थीं एवं कितनोंके कुण्डलयुक्त मस्तक भी धड़से अलग कर दिये ॥ ४८॥

क्षुरच्छिन्नैः शिरोभिश्च कायैश्च शकलैरपि । असुराणां मही कीर्णा प्रद्युम्नेनातितेजसा ॥ ४९ ॥ अत्यन्त तेजस्वी प्रद्युम्नने क्षुरोंद्वारा कटे हुए असुरोंके मस्तकों, शरीरों और उनके टुकड़ोंसे वहाँकी सारी धरती पाट दी ॥ ४९ ॥

देवेश्वरो देवगणैः सहितः समितिंजयः । ददर्श मुदितो युद्धं भैमानां दितिजैः सह ॥ ५० ॥ युद्धमें विजय पानेवाले देवराज इन्द्र देवताओंके साथ आकाशमें खड़े होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ दैत्यों और यादवोंका युद्ध देख रहे थे ॥ ५० ॥

ये गदं चैव साम्बं च दैत्याः समभिदुद्रुवुः । ते ययुर्निधनं सर्वे यादांसीव महोदधौ ॥ ५१ ॥ जिन दैत्योंने गद और साम्बपर आक्रमण किया, वे सब-के-सब कालके गालमे चले गये; मानो अगणित जलजन्तु महासागरमें निमग्न हो गये हों ॥ ५१ ॥