भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 627

विष्णुपर्व ] षण्णवतितमोऽध्यायः ६०५


विषमं तु तदा युद्धं दृष्ट्वा देवपतिर्हरिः ।
गदाय प्रेषयामास स्वं रथं हरिवाहनः ॥ ५२ ॥
दिदेश मातलिसुतं यन्तारं च सुवर्चसम् ।
साम्बायैरावणं नागं प्रेषयामास देवेश्वरः ॥ ५३ ॥

उस समय उस युद्धको विषम स्थितिमें देखकर हरिवाहन देवेन्द्रने गदके लिये अपना रथ भेज दिया; साथ ही मातलिका पुत्र सुवर्चाको सारथिके रूपमें दिया । इसके सिवा देवेश्वरने साम्बकी सवारीके लिये अपना ऐरावत हाथी भेज दिया ॥ ५२-५३ ॥

जयन्तं रौक्मिणेयस्य सहायमददाद् विभुः ।
ऐरावणमधिष्ठातुं प्रवरं स नियुक्तवान् ॥ ५४ ॥

इतना ही नहीं, भगवान् इन्द्रने जयन्तको प्रद्युम्नका सहायक बनाकर उन्हें दे दिया और ऐरावतका सञ्चालन करनेके लिये प्रवर नामक ब्राह्मणको नियुक्त किया ॥ ५४ ॥

देवपुत्रद्विजौ वीरावप्रमेयपराक्रमौ ।
अनुज्ञाप्य सुराध्यक्षं ब्रह्माणं लोकभावनम् ॥ ५५ ॥
तं मातलिसुतं चैव गजमैरावणं तदा ।
देवः प्रेषितवाञ्छक्रो विधिज्ञो वरकर्मसु ॥ ५६ ॥

देवकुमार जयन्त और ब्राह्मणकुमार प्रवर—ये दोनों वीर अप्रमेय पराक्रमी थे । श्रेष्ठ कर्मोंमें उसके आवश्यक विधानको जाननेवाले देवेन्द्रने सुराध्यक्ष लोकभावन ब्रह्माजीकी आज्ञा लेकर जयन्त, प्रवर, मातलिसुपुत्र सुवर्चा और अपने ऐरावत हाथीको उस समय वहाँ भेजा था ॥ ५५-५६ ॥

क्षीणमस्य तपो वध्यो यदूनामेष दुर्मतिः ।
प्रवदन्ति तु भूतानि सर्वत्र तु यथेप्सितम् ॥ ५७ ॥

सब प्राणी सर्वत्र अपने इच्छानुसार यही कहते थे कि 'इस वज्रनाभकी तपस्या क्षीण हो चली है । यह दुर्बुद्धि दैत्य अब यादवोंके हाथसे मारा जायगा' ॥ ५७ ॥

प्रद्युम्नश्च जयन्तश्च प्राप्तौ हर्म्यं महाबलौ ।
असुराञ्छरजालैर्घैर्विक्राम्यन्तौ प्रणश्यतुः ॥ ५८ ॥

प्रद्युम्न और जयन्त—ये दोनों महाबली वीर महलकी छतपर आ गये और पराक्रम प्रकट करते हुए अपने बाण-समूहोंद्वारा असुरोंको नष्ट करने लगे ॥ ५८ ॥

गदं कार्ष्णिस्तदोवाच दुर्वार्य्यरणदुर्जयः ।
उपेन्द्रानुज शक्रेण रथोऽयं प्रेषितस्तव ॥ ५९ ॥

उस समय किसीसे भी रोके न जा सकनेवाले रणदुर्जय वीर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने गदसे कहा—'उपेन्द्रके छोटे भैया ! देवराज इन्द्रने आपके लिये यह रथ भेजा है ॥ ५९ ॥

हरियुङ्मातलिसुतो यन्ता चायं महाबलः ।


१. हरे रंगके घोडे इन्द्रके रथको वहन करते हैं, इसलिये उन्हें हरिवाहन कहा गया है ।

प्रवराधिष्ठितश्चायं साम्बस्यैरावणो गजः ॥ ६० ॥

'इसमें हरे रंगके घोड़े जुते हैं और ये मातलिके महाबली पुत्र सुवर्चा इस रथके सारथि हैं तथा यह ऐरावत हाथी, जिसके अधिष्ठाता प्रवर हैं, साम्बकी सवारीमे आया है ॥ ६० ॥

अद्योपहारो रुद्रस्य द्वारकायां महाबलः ।
श्व एष्यति हृषीकेशस्तस्मिन् वृत्तेऽच्युतानुज ॥ ६१ ॥

'चाचाजी ! आज द्वारकामें महादेवजीकी महापूजा है । उसके पूर्ण हो जानेपर मेरे पूज्य पिता महाबली श्रीकृष्ण कल यहाँ पधारेंगे ॥ ६१ ॥

तस्याज्ञया वधिष्यामो वज्रनाभं सबान्धवम् ।
अभ्युत्थानकृतं पापं त्रिविष्टपजयं प्रति ॥ ६२ ॥

'उन्हींकी आज्ञासे स्वर्गलोकको जीतनेके लिये उठे हुए पापी वज्रनाभको उसके बन्धु-बान्धवोंसहित हमलोग मार डालेंगे ॥ ६२ ॥

करिष्यामि विधानं तु नैष शक्तं सुतान्वितम् ।
विजेष्यत्यप्रमादस्तु कर्तव्य इति मे मतिः ॥ ६३ ॥

'मैं ऐसा उपाय करूँगा, जिससे यह दैत्य पुत्रसहित देवराज इन्द्रको पराजित न कर सके; परंतु हमें तनिक भी प्रमाद नहीं करना चाहिये-सावधान रहना चाहिये; ऐसा मेरा विचार है ॥ ६३ ॥

कलत्ररक्षणं कार्यं सर्वोपायैर्नरैर्बुधैः ।
कलत्रधर्षणं लोके मरणादतिरिच्यते ॥ ६४ ॥

'विद्वान् पुरुषोंको सभी उपायोंद्वारा अपनी पत्नियोंकी रक्षा करनी चाहिये । यदि पत्नीका पर-पुरुषके द्वारा तिरस्कार हो जाय तो वह संसारमें मृत्युसे भी बढ़कर (कष्टदायक होता) है' ॥ ६४ ॥

एवं संदिश्य भैर्मः स गदसाम्बौ महाबलः ।
प्रद्युम्नकोट्यः ससृजे मायया दिव्यरूपया ॥ ६५ ॥

गद और साम्बसे ऐसा कहकर महाबली प्रद्युम्नने अपनी दिव्य मायासे करोड़ों प्रद्युम्नोंकी सृष्टि कर डाली ॥ ६५ ॥

तमश्च नाशयामास दैत्यसृष्टं दुरासदम् ।
जहृषे देवराजश्च तं दृष्ट्वा रिपुमर्दनम् ॥ ६६ ॥

तथा दैत्योंने जो दुर्निवार्य अन्धकार उत्पन्न किया था, उसे नष्ट कर दिया । शत्रुमर्दन प्रद्युम्नको ऐसा पराक्रम करते देख देवराज इन्द्रको बड़ा हर्ष हुआ ॥ ६६ ॥

ददृशुः सर्वभूतानि कार्ष्णिं सर्वेषु शत्रुपु ।
अन्तरात्मनि वर्तन्तं क्षेत्रज्ञमिव तं विदुः ॥ ६७ ॥

समस्त प्राणियोंने सभी शत्रुओंके बीचमें श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नको देखा और उन्हे प्रत्येक अन्तरात्मामें विद्यमान क्षेत्रज्ञके समान समझा ॥ ६७ ॥