विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 628, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६०६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
एवं व्यतीता रजनी रौक्मिणेयस्य युध्यतः । असुराणां त्रिभागश्च निहतश्चातितेजसा ॥ ६८ ॥
इस प्रकार युद्ध करते हुए रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नकी वह सारी रात बीत गयी। उन्होंने अपने अत्यन्त तेजसे असुरोंके तीन हिस्सोंको नष्ट कर दिया ॥ ६८ ॥
यावद् वियोधयामास कार्ष्णिर्दैत्यान् रणाजिरे । संध्योपास्ता जयन्तेन तावद् विष्णुपदीजले ॥ ६९ ॥
अयोध्यज्जयन्तश्च यावद् दैत्यान् महाबलः । तावदाकाशगङ्गायां भैमः संध्यामुपास्तवान् ॥ ७० ॥
श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न समराङ्गणमें जबतक दैत्योंके साथ जूझते रहे, तबतक जयन्तने गङ्गाजीके जलमें संध्योपासना कर ली। फिर महाबली जयन्त आकर जबतक युद्ध करते रहे, तबतक प्रद्युम्नने भी आकाशगङ्गाके जलमें संध्योपासना-का कार्य पूर्ण कर लिया ॥ ६९-७० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि प्रद्युम्नदैत्ययुद्धे षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें प्रद्युम्न और दैत्यका युद्धविषयक छानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥
सप्तनवतितमोऽध्यायः
प्रद्युम्नद्वारा वज्रनाभका वध तथा प्रद्युम्न आदिके पुत्रोंका राज्याभिषेक
वैशम्पायन उवाच जगतश्चक्षुषि ततो मुहूर्ताभ्युदिते रवौ । प्रादुरासीद्धरिर्देवस्ताक्ष्र्येणोरगशत्रुणा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर जब जगत्के नेत्ररूप भगवान् सूर्यके उदित हुए दो घड़ी बीत गयी, तब सर्पशत्रु गरुड़के द्वारा भगवान् श्रीहरि वहाँ प्रकट हुए ॥ १ ॥
हंसवायुमनोभिश्च सुशीघ्रतरगः खगः । तस्थौ वियति शक्रस्य समीपे कुरुनन्दन ॥ २ ॥
कुरुनन्दन ! हंस, वायु और मनसे भी अत्यन्त शीघ्रतर गतिसे गमन करनेवाले पक्षी गरुड़ आकाशमें इन्द्रके समीप खड़े हो गये ॥ २ ॥
समेत्य च यथान्यायं कृष्णो वासवसंनिधौ । पाञ्चजन्यं हरिर्दध्मौ दैत्यानां भयवर्धनम् ॥ ३ ॥
श्रीकृष्णने देवराज इन्द्रके समीप जाकर उनके साथ यथोचित रीतिसे मिलकर अपना पाञ्चजन्य नामक शङ्ख बजाया, जो दैत्योंका भय बढ़ानेवाला था ॥ ३ ॥
तं श्रुत्वाभ्यागतस्तत्र प्रद्युम्नो परवीरहा । वज्रनाभं जहीत्युक्तः केशवेन त्वरेति च ॥ ४ ॥
शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले प्रद्युम्न वह शङ्खध्वनि सुनकर तुरंत वहाँ आये। उस समय श्रीकृष्णने उनसे कहा—'बेटा ! वज्रनाभको मार डालो और इस कार्यमें शीघ्रता करो'॥ ४ ॥
ताक्ष्र्यमारुह्य गच्छेति पुनरेव प्रणोदितः । चकार स तथा वीरः प्रणिपत्य सुरोत्तमौ ॥ ५ ॥
उन्होंने पुनः प्रेरित करते हुए कहा—'गरुड़पर चढ़कर जाओ।' वीर प्रद्युम्नने उन दोनों श्रेष्ठ देवताओंको नमस्कार करके वैसा ही किया ॥ ५ ॥
स मनोरंहसा वीर ताक्ष्र्येणाशु ययौ नृप । अभ्याशं वज्रनाभस्य महाद्वन्द्वस्य भारत ॥ ६ ॥
वीर ! भरतनन्दन ! नरेश्वर ! तब वे मनके समान वेगशाली गरुड़के द्वारा तुरंत ही महान् द्वन्द्वयुद्ध करनेवाले वज्रनाभके निकट जा पहुँचे ॥ ६ ॥
ततस्ताक्ष्र्यगतो वीरस्ततर्ह रणमूर्धनि । वज्रनाभं स्थिरो भूत्वा सर्वास्त्रविद्विनिन्दितः ॥ ७ ॥
सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा निन्दारहित वीर प्रद्युम्न गरुड़पर स्थिर भावसे बैठकर युद्धके मुहानेपर वज्रनाभको पीड़ा देने लगे ॥ ७ ॥
तेन ताक्ष्र्यगतेनैव गदया कृष्णसूनुना । उरस्यभ्याहतो वीरो वज्रनाभो महात्मना ॥ ८ ॥
गरुड़पर बैठे हुए ही महामना श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने वज्रनाभकी छातीमें गदाद्वारा प्रहार किया ॥ ८ ॥
स तेनाभिहतो वीरो दैत्यो मोहवशं गतः । ववमार च भृशं रक्तं वभ्रामैव गतासुवत् ॥ ९ ॥
उनसे आहत होकर वह वीर दैत्य मूर्च्छित हो गया। उसने मुँहसे बहुत-सा रक्त वमन किया। उसे चक्कर आने लगा और वह मृतकंतुल्य हो गया ॥ ९ ॥
आश्वसेत्यथ तं कार्ष्णि्रुवाच रणदुर्जयः । लब्धसंज्ञः स वीरस्तु प्रद्युम्नमिदमब्रवीत् ॥ १० ॥
तब रणदुर्जय श्रीकृष्णकुमारने उससे कहा—'तुम आश्वस्त हो जाओ।' इससे सचेत होकर उस वीरने प्रद्युम्नसे इस प्रकार कहा—॥ १० ॥
साधु यादव वीर्येण श्लाघ्यो मम रिपुर्भवान् । प्रतिप्रहारकालोऽयं स्थिरो भव महाबल ॥ ११ ॥
'बहुत अच्छा, यादव ! तुम शत्रु होते हुए भी पराक्रम...