विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 629, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] सप्तनवतितमोऽध्यायः ६०७
के द्वारा मेरे लिये स्पृहणीय हो। अब यह मेरी ओरसे तुम्हारे प्रहारका उत्तर देनेका अवसर आया है। अतः महाबली वीर ! तुम स्थिर हो जाओ' ॥ ११ ॥
एवमुक्त्वा महानादं मुक्त्वा मेघशतोपमम् ।
गदां मुमोच वेगेन सघण्टां बहुकण्टकाम् ॥ १२ ॥
ऐसा कहकर सैकड़ों मेघोंकी गर्जनाओंके समान महान् सिंहनाद करके बहुत से कण्टकों तथा घण्टोंवाली गदाको उसने वेगपूर्वक चलाया ॥ १२ ॥
तया ललाटेऽभिहतः प्रद्युम्नो गदया नृप ।
उद्वमन् रुधिरं भूरि मुमोह यदुनन्दनः ॥ १३ ॥
नरेश्वर ! उस गदाने प्रद्युम्नके ललाटपर गहरा आघात किया। अतः यदुनन्दन प्रद्युम्न अधिक रक्त वमन करते हुए मूर्च्छित हो गये ॥ १३ ॥
तं दृष्ट्वा भगवान् कृष्णः पाञ्चजन्यं जलोद्भवम् ।
दध्मावाश्वासनकरं पुत्रस्य रिपुनाशनः ॥ १४ ॥
उन्हें अचेत हुआ देख शत्रुनाशन भगवान् श्रीकृष्णने पुत्रको आश्वासन देनेके लिये समुद्रजलसे प्रकट हुए अपने पाञ्चजन्य नामक शङ्खको बजाया ॥ १४ ॥
तं पाञ्चजन्यशब्देन प्रत्याश्वस्तं महाबलम् ।
दृष्ट्वा प्रमुदिता लोका विशेषेणेन्द्रकेशवौ ॥ १५ ॥
पाञ्चजन्यके शब्दसे महाबली प्रद्युम्नको आश्वस्त हुआ देख सब लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। विशेषतः इन्द्र और श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए ॥ १५ ॥
तस्य चक्रं करे यातं कृष्णच्छन्देन भारत ।
क्षुरनेमिसहस्रारं दैत्यसंघकुलान्तकम् ॥ १६ ॥
भारत ! श्रीकृष्णकी इच्छासे उनका चक्र प्रद्युम्नके हाथमें चला गया। उसमें सहस्रों अरे थे और उसके नेमि या प्रान्तभागमे छुरे लगे हुए थे। वह चक्र दैत्यसमूहोंके वंशका विनाश करनेवाला था ॥ १६ ॥
तन्मुमोचाच्युतसुतस्तस्य नाशाय भारत ।
नमस्कृत्वा सुरेन्द्राय कृष्णाय च महात्मने ॥ १७ ॥
भारत ! श्रीकृष्णके पुत्र प्रद्युम्नने देवराज इन्द्र और महात्मा श्रीकृष्णको प्रणाम करके उस दैत्यके विनाशके लिये वह चक्र चला दिया ॥ १७ ॥
वज्रनाभस्य तत्कायादुच्चकर्त शिरस्तदा ।
नारायणसुतोन्मुक्तं दैत्यानामनुपश्यताम् ॥ १८ ॥
श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नके हाथसे छोड़े गये उस चक्रने उस समय समस्त दैत्योंके देखते-देखते वज्रनाभके मस्तकको उसके धड़से काट गिराया ॥ १८ ॥
गदः सुनाभमवधीद् यतमानं रणाजिरे ।
हर्म्यपृष्ठे जिघांसन्तं रणदृप्तं भयानकम् ॥ १९ ॥
महलकी छतपर खड़े हुए गदने अपनेको मार डालनेकी इच्छावाले युद्धोन्मत्त भयानक दैत्य सुनाभका, जो समराङ्गणमें विजयके लिये प्रयत्नशील था, वध कर डाला ॥ १९ ॥
साम्बः समरमध्यस्थानसुरानरिमर्दनः ।
निनाय निशितैर्बाणैः प्रेताधिपपरिग्रहम् ॥ २० ॥
शत्रुमर्दन साम्बने भी समरके मध्यभागमें खड़े हुए असुरोंको अपने पैने बाणोंद्वारा यमराजके घर भेज दिया ॥
निकुम्भोऽपि हते वीरे वज्रनाभे महासुरे ।
जगाम षट्पुरं वीरो नारायणभयार्दितः ॥ २१ ॥
महान् असुर वीर वज्रनाभके मारे जानेपर नारायण (श्रीकृष्ण) के भयसे पीड़ित हुआ वीर निकुम्भ भी षट्पुरको चला गया ॥ २१ ॥
निहते देवरिपौ वज्रनाभे महासुरे ।
अवतीर्णौ महात्मानौ हरी वज्रपुरं तदा ॥ २२ ॥
जब देवद्रोही महान् असुर वज्रनाभका संहार हो गया, तब महात्मा श्रीकृष्ण और इन्द्र दोनों वज्रपुरमें उतरे ॥२२॥
लब्धप्रशमनं चैव चक्रतुः सुरसत्तमौ ।
सान्त्वयामासतुश्चैव बालवृद्धं भयार्दितम् ॥ २३ ॥
उस समय उन दोनों श्रेष्ठ देवताओंने वहाँ प्राप्त हुए दुःख और शोकका शमन किया। वहाँ बालकोंसे लेकर बूढ़े-तक सभी भयसे पीड़ित थे। उन सबको उन्होंने सान्त्वना दी॥
इन्द्रोपेन्द्रौ महात्मानौ मन्त्रयित्वा महाबलौ ।
आयत्यां च तदात्वे च बृहस्पतिमतानुगौ ॥ २४ ॥
वज्रनाभस्य तद् राज्यं चतुर्धा चक्रतुर्नृप ।
नरेश्वर ! उस समय महाबली महात्मा इन्द्र और उपेन्द्रने भविष्य और वर्तमानके विषयमें परस्पर सलाह करके बृहस्पति-के मतका अनुसरण करते हुए वज्रनाभके उस राज्यको चार भागोंमें बाँट दिया ॥ २४ ½ ॥
विजयस्य चतुर्थांशं जयन्ततनयस्य वै ॥ २५ ॥
प्रद्युम्नस्य चतुर्थांशं रौक्मिणेयसुतस्य च ।
चन्द्रप्रभस्य ददतुश्चतुर्थांशं जनेश्वर ॥ २६ ॥
जनेश्वर ! उन्होंने एक चौथाई भाग तो जयन्तके पुत्र विजयको दे दिया, दूसरा प्रद्युम्नके पुत्रको, तीसरा साम्बके पुत्रको दिया और शेष चौथा भाग गदके पुत्र चन्द्रप्रभको अर्पित कर दिया ॥ २५-२६ ॥
कोट्यश्चतस्रो ग्रामाणामधिकास्ता विशाम्पते ।
शाखापुरसहस्रं च स्फीतं वज्रपुरोपमम् ।
चतुर्धा चक्रतुस्तत्र संदृष्टौ शक्रकेशवौ ॥ २७ ॥
प्रजानाथ ! वज्रनागके अधिकारमें चार करोड़से कुछ अधिक ग्राम थे तथा एक हजार शाखानगर थे, जो वज्रपुरके