विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 630, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६०८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे समान ही वैभवशाली थे । हर्षमें भरे हुए इन्द्र और श्रीकृष्ण- ने वहाँकी सभी वस्तुओंके चार भाग कर लिये थे ॥ २७ ॥ कम्बलाजिनवासांसि रत्नानि विविधानि च । चतुर्द्धा चक्रतुर्वीरौ वीर वासवकेशवौ ॥ २८ ॥ 'वीर जनमेजय ! वीर इन्द्र और केशवने वहाँ प्राप्त हुए कम्बल ( कालीन ), मृगचर्म, वस्त्र तथा भाँति-भाँतिके रत्नों- को भी चार भागोंमें बाँट दिया ॥ २८ ॥ ततोऽभिषिक्तास्ते वीरा राजानो वासवाज्ञया । देवदुन्दुभिवाद्येन नृप विष्णुपदीजलैः ॥ २९ ॥ स्वयं शक्रेण देवेन केशवेन च धीमता । ऋषिवंशे महात्मानः शक्रमाधवसन्दनाः ॥ ३० ॥ 'नरेश्वर ! तदनन्तर इन्द्रकी आज्ञासे वे चारों वीर देव- दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ गङ्गाजीके जलसे राजाके पदपर अभिषिक्त हुए । इन्द्र और श्रीकृष्णको आनन्दित करनेवाले उन चारों महात्मा राजकुमारोंको स्वयं इन्द्रदेव तथा बुद्धिमान् श्रीकृष्णने ऋषिसमुदायके निकट अभिषिक्त किया ॥२९-३०॥ विजयस्य प्रसिद्धैव गतिर्विद्यति धीमतः । मातृजेन गुणेनापि माधवानां महात्मनाम् ॥ ३१ ॥ बुद्धिमान् विजयकी आकाशमें चलने-फिरनेकी शक्ति तो प्रसिद्ध ही थी; महामनस्वी यादवकुमार भी अपनी माताओंके गुणसे नियुक्त हो आकाशमें चल-फिर सकते थे ॥ ३१ ॥ अभिषिच्य जयन्तं तु वासवो भगवान् ब्रवीत् । त्वयैते वीर संरक्ष्या राजानः समितिजयाः ॥ ३२ ॥ ऐश्वर्यशाली इन्द्रने उन चारोंका अभिषेक करके जयन्तसे कहा—'वीर ! तुम्हें इन युद्धविजयी राजाओंकी भी रक्षा करनी चाहिये ॥ ३२ ॥ मम वंशकरोऽप्येकः केशवस्य त्रयोऽनघ । अवध्याः सर्वभूतानां भविष्यन्ति ममाज्ञया ॥ ३३ ॥ 'अनघ ! इनमें एक तो मेरे वंशका प्रवर्तक है और तीन श्रीकृष्णके वंशका विस्तार करनेवाले हैं । ये सब मेरी आज्ञासे समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य होंगे ॥ ३३ ॥ गमनागमनं चैव दिवि सिद्धं भविष्यति । त्रिविष्टपं द्वारकां च रम्यां भैमाभिरक्षिताम् ॥ ३४ ॥ 'इनका आकाशमें गमनागमन स्वतः सिद्ध होगा। स्वर्गमें तथा यादवोंद्वारा सुरक्षित रमणीय द्वारकापुरीमें भी ये आते- जाते रहेंगे ॥ ३४ ॥ दिशागजसुतान् नागान् हयांश्चोच्चैःश्रवोऽन्वयान् । इच्छयैषां प्रयच्छस्व रथांस्त्वष्टृकृतानपि ॥ ३५ ॥ 'दिग्गजोंके पुत्र जो हाथी हैं, उच्चैःश्रवाके कुलमें उत्पन्न जो घोड़े हैं तथा विश्वकर्माके बनाये जो रथ हैं, उन सबको इन्हें इच्छानुसार प्रदान करो ॥ ३५ ॥ गजावैरावणसुतौ शत्रुञ्जयरिपुञ्जयौ । प्रयच्छाकाशगौ वीर साम्बस्य च गदस्य च ॥ ३६ ॥ आकाशेन पुरों यातु द्वारकां भैमरक्षिताम् । आयातु च सुतौ द्रष्टुं यथेष्टं भैमनन्दनौ ॥ ३७ ॥ 'वीर ! ऐरावतके पुत्र जो शत्रुञ्जय और रिपुञ्जय नामक आकाशगामी हाथी हैं, उन्हें साम्ब और गदको दे दो; जिससे ये दोनों भीमकुलनन्दन वीर यादवोंद्वारा सुरक्षित रमणीय द्वारकापुरीमें आकाशमार्गसे जा सकें तथा अपने दोनों पुत्रोंको देखनेके लिये यहाँ भी, जब इच्छा हो आ सकें' ॥ ३६-३७ ॥ इति संदिश्य भगवान् देवराजः पुरन्दरः । जगाम भगवान् स्वर्गं द्वारकामपि केशवः ॥ ३८ ॥ ऐसा संदेश देकर ऐश्वर्यशाली देवराज इन्द्र स्वर्गको तथा भगवान् केशव द्वारकापुरीको चले गये ॥ ३८ ॥ षण्मासानुषितास्तत्र गदः प्रद्युम्न एव च । साम्बश्च द्वारकां याता रूढे राज्ये महाबलाः ॥ ३९ ॥ गद, प्रद्युम्न और साम्ब—ये तीनों महाबली वीर वहाँ छह महीने और रह गये । जब वहाँका राज्य सुदृढ हो गया, तब वे द्वारकाको गये ॥ ३९ ॥ अद्यापि तानि राज्यानि मेरोः पार्श्वे तथोत्तरे । तिष्ठन्ति च जगद् यावत् स्थास्यन्त्यमरसंनिभ ॥ ४० ॥ देवोपम वीर जनमेजय ! आज भी मेरुपर्वतके उत्तर पार्श्वमें वे राज्य विद्यमान हैं और जबतक यह संसार रहेगा, तबतक वे बने रहेंगे ॥ ४० ॥ निवृत्ते मौसले युद्धे स्वर्गं यातेषु वृष्णिषु । गदप्रद्युम्नसाम्बास्ते गता वज्रपुरं विभो ॥ ४१ ॥ विभो ! मौसलयुद्ध समाप्त होनेपर जब समस्त वृष्णिवंशी स्वर्गलोकको चले गये, तब गद, प्रद्युम्न और साम्ब वज्रपुरमें गये थे ॥ ४१ ॥ ततः प्रोष्य पुनर्यान्ति स्वर्गं स्वैः कर्मभिः शुभैः । प्रसादेन च कृष्णस्य लोककर्तुर्जनेश्वर ॥ ४२ ॥ जनेश्वर ! वहाँ रहकर लोग लोककर्ता भगवान् श्रीकृष्णके प्रसादसे अपने शुभ कर्मोंद्वारा पुनः स्वर्गलोकमें चले जाते हैं। प्रद्युम्नोत्तरमेतत् ते नृदेव कथितं मया । धन्यं यशस्यमायुष्यं शत्रुनाशनमेव च ॥ ४३ ॥ पुत्रपौत्रा विवर्धन्ते आरोग्यधनसम्पदः । यशो विपुलमाप्नोति द्वैपायनवचो यथा ॥ ४४ ॥ नरदेव ! यह मैंने तुमसे प्रद्युम्नके उत्कर्षका वर्णन किया है। यह धन, यश तथा आयु प्रदान करनेवाला है। इसके पाठसे काम, क्रोध आदि शत्रुओंका नाश भी होता है। पुत्रों और पौत्रोंकी वृद्धि होती है। आरोग्य तथा धन-सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है एवं मनुष्य महान् यशका भागी होता है। जैसा कि द्वैपायन व्यासका कथन है ॥ ४३-४४ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वज्रनाभवधो नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वज्रनाभका वध नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥