भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 631

विष्णुपर्व ] अष्टनवतितमोऽध्यायः ६०९


अष्टनवतितमोऽध्यायः

इन्द्रकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा पुनः परिष्कृत की गयी द्वारकापुरीका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
ददर्शार्थ पुरीं कृष्णो द्वारकां गरुडे स्थितः।
देवसद्मप्रतीकाशां समन्तात् प्रतिनादिताम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! गरुड़पर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने द्वारकापुरीको देखा, जो देवलोकके समान शोभा पा रही थी । वहाँ चारों ओर समुद्रगर्जनाकी प्रतिध्वनि व्याप्त हो रही थी ॥ १ ॥

मणिपर्वतयन्त्राणि तथा क्रीडागृहाणि च ।
उद्यानवनमुख्यानि वलभीश्चत्वराणि च ॥ २ ॥

उस पुरीमें जहाँ-तहाँ मणिमय पर्वत तथा यन्त्र सुशोभित थे । बहुत-से क्रीड़ागृह बने हुए थे । अनेकानेक उद्यान, श्रेष्ठ वन, छज्जे और चबूतरे शोभा दे रहे थे । श्रीकृष्णने इन सबको देखा ॥ २ ॥

सम्प्राप्ते तु तदा कृष्णे पुरीं देवकिनन्दने ।
विश्वकर्माणमाहूय देवराजोऽब्रवीदिदम् ॥ ३ ॥

देवकीनन्दन श्रीकृष्ण जब द्वारकापुरीके समीप पहुँचे, तब देवराज इन्द्रने विश्वकर्माको बुलाकर इस प्रकार कहा—॥ ३ ॥

प्रियमिच्छसि चेत् कर्तुं मह्यं शिल्पवतां वर ।
कृष्णप्रियार्थं भूयस्त्वं प्रकरुष्व मनोहराम् ॥ ४ ॥

‘शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्मन् ! यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये पुनः द्वारकापुरीको पहलेसे भी अधिक मनोहर बना दो ॥ ४ ॥

उद्यानशतसम्बाधां द्वारकां स्वर्गसम्मिताम् ।
कुरुष्व विबुधश्रेष्ठ यथा मम पुरी तथा ॥ ५ ॥

‘विबुधश्रेष्ठ ! जैसी यह मेरी पुरी है, उसी प्रकार तुम द्वारकाको सैकड़ों उद्यानोंसे हरी-भरी तथा स्वर्गतुल्य मनोहारिणी बना दो ॥ ५ ॥

यत्किंचित् त्रिषु लोकेषु रत्नभूतं प्रपश्यसि ।
तेन संयुज्यतां क्षिप्रं पुरी द्वारवती त्वया ॥ ६ ॥

‘तीनों लोकोंमें जो कुछ भी तुम्हे रत्नरूप दिखायी दे, उससे द्वारकापुरीको शीघ्र ही संयुक्त कर दो ॥ ६ ॥

कृष्णो हि सुरकार्येषु सर्वेषु सततोत्थितः ।
संग्रामान् घोररूपांश्च विगाहति महाबलः ॥ ७ ॥

‘क्योंकि महाबली श्रीकृष्ण समस्त देवकार्योंके लिये सदा तैयार रहते हैं और घोर-से-घोर संग्रामोंमे भी प्रवेश कर जाते हैं’ ॥ ७ ॥

तामिन्द्रवचनाद् गत्वा विश्वकर्मा पुरीं ततः ।
अलंचक्रे समन्ताद् वै यथेन्द्रस्यामरावती ॥ ८ ॥

विश्वकर्माने इन्द्रके आदेशसे उस पुरीमे जाकर उसे सब ओरसे उसी प्रकार अलंकृत किया, जैसे देवराजकी अमरावतीपुरी सुसज्जित रहती है ॥ ८ ॥

तां ददर्श दशार्हाणामीश्वरः पक्षिवाहनः ।
विश्वकर्मकृतैर्दिव्यैरभिप्रायैरर्लंकृताम् ॥ ९ ॥

यादवोंके स्वामी गरुड़वाहन श्रीकृष्णने अपनी उस पुरीको विश्वकर्माद्वारा निर्मित दिव्य भावोंसे अलंकृत देखा ॥ ९ ॥

तां तदा द्वारकां दृष्ट्वा प्रभुर्नारायणो विभुः ।
हृष्टः सर्वार्थसम्पन्नः प्रवेष्टुमुपचक्रमे ॥ १० ॥

उस समय उस तरह सजी हुई द्वारकाको देखकर सम्पूर्ण अर्थोंसे सम्पन्न सर्वव्यापी भगवान् नारायणने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमे प्रवेश आरम्भ किया ॥ १० ॥

सोऽपश्यद्वृक्षखण्डांश्च रम्यान् दृष्टिमनोहरान् ।
द्वारकां प्रति दशार्हश्चित्रितां विश्वकर्मणा ॥ ११ ॥

विश्वकर्माद्वारा विचित्र शोभासे सम्पन्न की हुई द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णने बहुत-से रमणीय वृक्षखण्ड देखे, जो दृष्टि और मनको आकृष्ट कर लेते थे ॥ ११ ॥

पद्मखण्डाकुलाभिश्च हंससेवितवारिभिः ।
गङ्गासिन्धुप्रकाशाभिः परिखाभिर्वृतां पुरीम् ॥ १२ ॥

वह पुरी गङ्गा और सिन्धुके समान सुशोभित होनेवाली चौड़ी खाइयोंसे घिरी हुई थी । उनमें कमलोंके समूह भरे हुए थे तथा हंस उनके जलका सेवन करते थे ॥ १२ ॥

प्राकारेणार्कवर्णेन शातकौम्भेन राजता ।
चयमूर्ध्नि निविष्टेन द्यां यथैवाभ्रमालया ॥ १३ ॥

ऊँचे टीलेपर बने हुए सुन्दर सुवर्णमय प्राकार (परकोटे) से, जो सूर्यके सदृश प्रभापुञ्जसे परिपूर्ण था, घिरी हुई द्वारकापुरी घनमालासे घिरे हुए आकाशके समान शोभा पाती थी ॥ १३ ॥

काननैर्नन्दनप्रख्यैस्तथा चैत्ररथोपमैः ।
बभौ चारुपरिक्षिप्ता द्वारका चौरिवाम्बुदैः ॥ १४ ॥

नन्दन और चैत्ररथ नामक वनोंके समान मनोहर काननोंसे भलीभाँति घिरी हुई द्वारकापुरी मेघोंसे घिरे हुए द्युलोककी भाँति सुशोभित हो रही थी ॥ १४ ॥


म० ह० २०—