भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

विष्णुपर्व ] अष्टनवतितमोऽध्यायः ६०९


अष्टनवतितमोऽध्यायः

इन्द्रकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा पुनः परिष्कृत की गयी द्वारकापुरीका वर्णन

वैशम्पायन उवाच
ददर्शार्थ पुरीं कृष्णो द्वारकां गरुडे स्थितः।
देवसद्मप्रतीकाशां समन्तात् प्रतिनादिताम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! गरुड़पर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने द्वारकापुरीको देखा, जो देवलोकके समान शोभा पा रही थी । वहाँ चारों ओर समुद्रगर्जनाकी प्रतिध्वनि व्याप्त हो रही थी ॥ १ ॥

मणिपर्वतयन्त्राणि तथा क्रीडागृहाणि च ।
उद्यानवनमुख्यानि वलभीश्चत्वराणि च ॥ २ ॥

उस पुरीमें जहाँ-तहाँ मणिमय पर्वत तथा यन्त्र सुशोभित थे । बहुत-से क्रीड़ागृह बने हुए थे । अनेकानेक उद्यान, श्रेष्ठ वन, छज्जे और चबूतरे शोभा दे रहे थे । श्रीकृष्णने इन सबको देखा ॥ २ ॥

सम्प्राप्ते तु तदा कृष्णे पुरीं देवकिनन्दने ।
विश्वकर्माणमाहूय देवराजोऽब्रवीदिदम् ॥ ३ ॥

देवकीनन्दन श्रीकृष्ण जब द्वारकापुरीके समीप पहुँचे, तब देवराज इन्द्रने विश्वकर्माको बुलाकर इस प्रकार कहा—॥ ३ ॥

प्रियमिच्छसि चेत् कर्तुं मह्यं शिल्पवतां वर ।
कृष्णप्रियार्थं भूयस्त्वं प्रकरुष्व मनोहराम् ॥ ४ ॥

‘शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्मन् ! यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये पुनः द्वारकापुरीको पहलेसे भी अधिक मनोहर बना दो ॥ ४ ॥

उद्यानशतसम्बाधां द्वारकां स्वर्गसम्मिताम् ।
कुरुष्व विबुधश्रेष्ठ यथा मम पुरी तथा ॥ ५ ॥

‘विबुधश्रेष्ठ ! जैसी यह मेरी पुरी है, उसी प्रकार तुम द्वारकाको सैकड़ों उद्यानोंसे हरी-भरी तथा स्वर्गतुल्य मनोहारिणी बना दो ॥ ५ ॥

यत्किंचित् त्रिषु लोकेषु रत्नभूतं प्रपश्यसि ।
तेन संयुज्यतां क्षिप्रं पुरी द्वारवती त्वया ॥ ६ ॥

‘तीनों लोकोंमें जो कुछ भी तुम्हे रत्नरूप दिखायी दे, उससे द्वारकापुरीको शीघ्र ही संयुक्त कर दो ॥ ६ ॥

कृष्णो हि सुरकार्येषु सर्वेषु सततोत्थितः ।
संग्रामान् घोररूपांश्च विगाहति महाबलः ॥ ७ ॥

‘क्योंकि महाबली श्रीकृष्ण समस्त देवकार्योंके लिये सदा तैयार रहते हैं और घोर-से-घोर संग्रामोंमे भी प्रवेश कर जाते हैं’ ॥ ७ ॥

तामिन्द्रवचनाद् गत्वा विश्वकर्मा पुरीं ततः ।
अलंचक्रे समन्ताद् वै यथेन्द्रस्यामरावती ॥ ८ ॥

विश्वकर्माने इन्द्रके आदेशसे उस पुरीमे जाकर उसे सब ओरसे उसी प्रकार अलंकृत किया, जैसे देवराजकी अमरावतीपुरी सुसज्जित रहती है ॥ ८ ॥

तां ददर्श दशार्हाणामीश्वरः पक्षिवाहनः ।
विश्वकर्मकृतैर्दिव्यैरभिप्रायैरर्लंकृताम् ॥ ९ ॥

यादवोंके स्वामी गरुड़वाहन श्रीकृष्णने अपनी उस पुरीको विश्वकर्माद्वारा निर्मित दिव्य भावोंसे अलंकृत देखा ॥ ९ ॥

तां तदा द्वारकां दृष्ट्वा प्रभुर्नारायणो विभुः ।
हृष्टः सर्वार्थसम्पन्नः प्रवेष्टुमुपचक्रमे ॥ १० ॥

उस समय उस तरह सजी हुई द्वारकाको देखकर सम्पूर्ण अर्थोंसे सम्पन्न सर्वव्यापी भगवान् नारायणने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमे प्रवेश आरम्भ किया ॥ १० ॥

सोऽपश्यद्वृक्षखण्डांश्च रम्यान् दृष्टिमनोहरान् ।
द्वारकां प्रति दशार्हश्चित्रितां विश्वकर्मणा ॥ ११ ॥

विश्वकर्माद्वारा विचित्र शोभासे सम्पन्न की हुई द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णने बहुत-से रमणीय वृक्षखण्ड देखे, जो दृष्टि और मनको आकृष्ट कर लेते थे ॥ ११ ॥

पद्मखण्डाकुलाभिश्च हंससेवितवारिभिः ।
गङ्गासिन्धुप्रकाशाभिः परिखाभिर्वृतां पुरीम् ॥ १२ ॥

वह पुरी गङ्गा और सिन्धुके समान सुशोभित होनेवाली चौड़ी खाइयोंसे घिरी हुई थी । उनमें कमलोंके समूह भरे हुए थे तथा हंस उनके जलका सेवन करते थे ॥ १२ ॥

प्राकारेणार्कवर्णेन शातकौम्भेन राजता ।
चयमूर्ध्नि निविष्टेन द्यां यथैवाभ्रमालया ॥ १३ ॥

ऊँचे टीलेपर बने हुए सुन्दर सुवर्णमय प्राकार (परकोटे) से, जो सूर्यके सदृश प्रभापुञ्जसे परिपूर्ण था, घिरी हुई द्वारकापुरी घनमालासे घिरे हुए आकाशके समान शोभा पाती थी ॥ १३ ॥

काननैर्नन्दनप्रख्यैस्तथा चैत्ररथोपमैः ।
बभौ चारुपरिक्षिप्ता द्वारका चौरिवाम्बुदैः ॥ १४ ॥

नन्दन और चैत्ररथ नामक वनोंके समान मनोहर काननोंसे भलीभाँति घिरी हुई द्वारकापुरी मेघोंसे घिरे हुए द्युलोककी भाँति सुशोभित हो रही थी ॥ १४ ॥


म० ह० २०—

६१० श्रीमद्भागवते खिलभागे [ हरिवंशे

बभौ रैवतकः शैलो रम्यसानुगुहाजिरः । पूर्वस्यां दिशि लक्ष्मीवान् मणिकाञ्चनतोरणः ॥ १५ ॥ द्वारकापुरीकी पूर्व दिशामें शोभासम्पन्न रैवतक पर्वत बड़ा ही मनोहर प्रतीत होता था। उसके शिखर, गुफा और आँगन सभी रमणीय थे। उसके बाहरी फाटक मणि एवं सुवर्णके बने हुए थे ॥ १५ ॥

दक्षिणस्यां लतावेष्टः पञ्चवर्णो विराजते । इन्द्रकेतुप्रतीकाशः पश्चिमां दिशमाश्रितः । सुकक्षो राजतः शैलश्चित्रपुष्पमहावनः ॥ १६ ॥ पुरीके दक्षिण भागमें लतावेष्ट नामक पर्वत शोभा पा रहा था, जो पाँच रंगका होनेके कारण इन्द्रध्वज-सा प्रतीत होता था। पश्चिम दिशामें सुकक्ष नामक रजत पर्वत था, जिसके ऊपर विचित्र पुष्पोंसे अलंकृत महान् वन सुशोभित हो रहा था ॥ १६ ॥

उत्तरां दिशमत्यर्थं विभूषयति वेणुमान् । मन्दराद्रिप्रतीकाशः पाण्डुरः पार्थिवर्षभ ॥ १७ ॥ नृपश्रेष्ठ ! मन्दराचलके समान श्वेत वर्णवाला वेणुमान् पर्वत द्वारकाकी उत्तर दिशाको अत्यन्त शोभासम्पन्न बना रहा था ॥ १७ ॥

चित्रकं पञ्चवर्णं च पाञ्चजन्यं वनं महत् । सर्वर्तुकवनं चैव भाति रैवतकं प्रति ॥ १८ ॥ रैवतक पर्वतके चारों ओर चित्रक, पञ्चवर्ण, विशाल पाञ्चजन्य तथा सर्वर्तुक नामक वन शोभा पा रहे थे ॥ १८ ॥

लतावेष्टितपर्यन्तं मेरुप्रभवनं महत् । भाति भानुवनं चैव पुष्पकं च महद् वनम् ॥ १९ ॥ लतावेष्ट पर्वतके चारों ओर मेरुप्रभ नामक महान् वन, भानुवन तथा पुष्पक नामक विशाल वन शोभा पा रहे थे ॥ १९ ॥

अक्षकैर्बीजकैश्चैव मन्दारैश्चोपशोभितम् । शतावर्तवनं चैव करवीराकरं तथा ॥ २० ॥ भाति चैत्ररथं चैव नन्दनं च वनं महत् । रमणं भावनं चैवं वेणुमन्तं समन्ततः ॥ २१ ॥ सुकक्ष पर्वतके चारों ओर रुद्राक्षोंसे सुशोभित वन, बीजकवन, मन्दार वृक्षोंसे सुशोभित मन्दारवन, शतावर्तवन तथा करवीराकर नामक वन सुशोभित होते थे। वेणुमान् पर्वतके सब ओर चैत्ररथवन, नन्दन नामक महान् वन, रमणवन तथा भावन नामक वन शोभा पाते थे ॥ २०-२१ ॥

वैदूर्यपत्रैर्जलजैस्तदा मन्दाकिनी नदी । भाति पुष्करिणी रम्या पूर्वस्यां दिशि भारत ॥ २२ ॥ भारत ! वहाँ वैदूर्यमणिमय पत्रवाले कमलोंसे सुशोभित मन्दाकिनी नदी पुरीकी पूर्वदिशामें एक रमणीय पुष्करिणीके रूपमें शोभा पाती थी ॥ २२ ॥

सानवो भूषितास्तत्र केशवस्य प्रियैषिभिः । बहुभिर्देवगन्धर्वैश्चोदितैर्विश्वकर्मणा ॥ २३ ॥ विश्वकर्मासे प्रेरित होकर भगवान् केशवका प्रिय चाहनेवाले बहुत-से देवगन्धर्व वहाँके पर्वतीय शिखरोंकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २३ ॥

महानदी द्वारवतीं पञ्चाशद्भिर्महामुखैः । प्रविष्टा पुण्यसलिला भावयन्ती समन्ततः ॥ २४ ॥ पुण्यसलिला महानदी मन्दाकिनी पचास बड़े-बड़े स्रोतों-द्वारा द्वारकावासियोंको प्रसन्न करती हुई सब ओरसे उस पुरीमें प्रविष्ट हुई थी ॥ २४ ॥

अप्रमेयां महोत्सेधामगाधपरिखायुताम् । प्राकारवरसम्पन्नां सुधापाण्डुरलेपनाम् ॥ २५ ॥ द्वारकापुरी कितनी बड़ी है, इसका कोई माप नहीं था। उसकी ऊँचाई भी बहुत अधिक थी। वह अगाध खाइयोंसे घिरी हुई थी। सुन्दर परकोटे उसे शोभासम्पन्न कर रहे थे। उस पुरीकी दीवारोंको चूनेसे लीपकर श्वेत बनाया गया था ॥ २५ ॥

तीक्ष्णयन्त्रशतघ्नीभिर्हेमजालैश्च भूषिताम् । आयसैश्च महाचक्रैर्ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥ २६ ॥ भगवान्‌ने द्वारकापुरीको तीखे यन्त्र, शतघ्नी और सोनेकी जालियोंसे विभूषित देखा। वह लोहेके बड़े-बड़े चक्रोंसे सुरक्षित थी ॥ २६ ॥

अष्टौ रथसहस्राणि नगरे किङ्किणीकिनाम् । समुच्छ्रितपताकानि यथा देवपुरे तथा ॥ २७ ॥ देवताओंके नगरकी भाँति द्वारकापुरीमें क्षुद्रघण्टिकाओंसे युक्त आठ हजार रथ शोभा पाते थे, जिनमें ऊँची उठी हुई पताकाएँ फहरा रही थीं ॥ २७ ॥

अष्टयोजनविस्तीर्णामचलां द्वादशायताम् । द्विगुणोपनिवेशां च ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥ २८ ॥ द्वारकापुरीकी चौड़ाई आठ योजन थी और लंबाई बारह योजन अर्थात् उसका सम्पूर्ण विस्तार छानवे योजन था। उसका उपनिवेश (समीपस्थ प्रदेश) उससे दुगुना अर्थात् एक सौ बानवे योजन विस्तृत था। श्रीकृष्णने उस अविचल द्वारकापुरीका दर्शन किया ॥ २८ ॥

अष्टमार्गमहारथ्यां महाषोडशचत्वराम् । एवंमार्गपरिक्षिप्तां साक्षादुशनसा कृताम् ॥ २९ ॥ उसमें जानेके लिये आठ महामार्ग थे और सोलह बड़े-बड़े चौराहे बने थे। इस प्रकार विभिन्न मार्गोंसे परिक्षिप्त द्वारकापुरी साक्षात् शुक्राचार्यकी नीतिके अनुसार बनायी गयी थी ॥ २९ ॥

विष्णुपर्व ] अष्टनवतितमोऽध्यायः ६११


स्त्रियोऽपि यस्यां युध्येरन् किमु वृष्णिमहारथाः ।
व्यूहानामुत्तमा मार्गाः सप्त चैव महापथाः ॥ ३० ॥
उस पुरीमें रहकर स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकती थीं; फिर साक्षात् वृष्णिवंशी महारथियोंकी तो बात ही क्या ? उसमें व्यूहोंके उत्तम मार्ग हैं। सात बड़ी-बड़ी सड़कें हैं ॥ ३० ॥

तत्र वै विहिताः साक्षाद् विविधा विश्वकर्मणा ।
तस्मिन् पुरवरश्रेष्ठे दाशार्हाणां यशस्विनाम् ॥ ३१ ॥
वेश्मानि जहृषे दृष्ट्वा ततो देवकिनन्दनः ।
काञ्चनैर्मणिसोपानेरुपपेतानि नृहर्षणैः ॥ ३२ ॥
वहाँ साक्षात् विश्वकर्माने उन विविध मार्गोंका निर्माण किया था। नगरोंमें श्रेष्ठ उस द्वारकापुरीमें यशस्वी दशार्ह-वंशियोंके महल देखकर देवकीनन्दन भगवान् कृष्णको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे महल मनुष्योंको हर्ष प्रदान करनेवाली सोने और मणियोंकी सीढ़ियोंसे अलंकृत थे ॥ ३१-३२ ॥

भीमघोषमहाघोषैः प्रासादवरचत्वरैः ।
समुच्छ्रितपताकानि परिप्लुतवनानि च ॥ ३३ ॥
महान् एवं भयंकर घोषों, महलों तथा सुन्दर आँगनोंसे शोभा पानेवाले उन महलोंके ऊपर ऊँची-ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं। उन महलोंके भीतर लगे हुए उद्यानोंके वृक्ष हवासे घूमते रहते थे ॥ ३३ ॥

काञ्चनाग्राणि भास्वन्ति प्रासादशिखराणि च ।
गृहाणि रमणीयानि मेरुकूटनिभानि च ॥ ३४ ॥
उन महलोंके शिखर सोनेके कंगूरों या कलशोंसे सुशोभित हो उद्भासित होते रहते थे। वे गगनचुम्बी रमणीय भवन मेरुपर्वतके शिखरोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ३४ ॥

पाण्डुपाण्डुरशृङ्गैश्च शातकुम्भपरिष्कृतैः ।
रत्नसानुगुहाशृङ्गैरैर्विचित्रैरिव पर्वतैः ॥ ३५ ॥
उन महलोंके शिखर श्वेतसे भी अधिक श्वेत थे। उनमें सोने मढ़े गये थे। वे रत्नमय शिखर, गुफा और चोटियोंवाले विचित्र पर्वतोंके समान शोभा पाते थे ॥ ३५ ॥

पञ्चवर्णैः सुवर्णैश्च पुष्पवृष्टिसमप्रभैः ।
पर्जन्यतुल्यनिर्घोषैर्नानारूपैरिवाद्रिभिः ॥ ३६ ॥
वे गृह पाँच प्रकारके रंगोंसे रँगे गये थे। कितने ही सुनहरे रंगसे सुशोभित थे। कुछ गृहोंकी कान्ति ऐसी जान पड़ती थी, मानो वहाँ फूलोंकी वर्षा हो रही हो। उन महलोंसे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान शब्द प्रकट होते रहते थे। वे बहुरंगे भवन अनेक रूपवाले पर्वतोंके समान जान पड़ते थे ॥ ३६ ॥

दावाग्निज्वलितप्रख्यैर्निर्मितैर्विश्वकर्मणा ।
आलिखद्भिरिवाकाशमतिचन्द्रार्कभास्वरैः ॥ ३७ ॥
विश्वकर्माके बनाये हुए वे तेजस्वी भवन दावानलकी ज्वालाके समान देदीप्यमान होते थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो वे आकाशमें सुनहरी रेखा खींच रहे हों। उनका प्रकाश चन्द्रमा और सूर्यसे भी बढ़कर था ॥ ३७ ॥

तैर्दशार्हर्महाभागैर्गर्भभासे तद्वनद्रुमैः ।
वासुदेवेन्द्रपर्जन्यैर्गृहमेघैरलंstate->रलंकृता ॥ ३८ ॥
ददृशे द्वारका चारुमेघैरिव संवृता ।
उन चित्रक आदि वर्णोंके वृक्षों तथा दशार्हवंशी महाभाग वीरों एवं गृहरूपी मेघोंसे अलंकृत द्वारकापुरी अत्यन्त शोभा पाती थी और मनोहर घनमालाओंसे घिरे हुए आकाशकी भाँति दिखायी देती थी। भगवान् श्रीकृष्ण ही वहाँ इन्द्र एवं पर्जन्यके रूपमें शोभा पाते थे ॥ ३८ १/२ ॥

साक्षाद् भगवतो वेश्म विहितं विश्वकर्मणा ॥ ३९ ॥
ददृशे वासुदेवस्य चतुर्योजनमायतम् ।
तावदेव च विस्तीर्णमप्रमेयमहाधनम् ॥ ४० ॥
विश्वकर्माका बनाया हुआ साक्षात् भगवान् वासुदेवका भवन चार योजन लंबा और उतना ही चौड़ा दिखायी देता था। उसमें कितना महान् धन लगा था, इसका अनुमान लगाना असम्भव है ॥ ३९-४० ॥

प्रासादवरसम्पन्नं युक्तं जगति पर्वतैः ।
यच्चकार महाभागस्त्वष्टा वासवनोदितः ॥ ४१ ॥
उस विशाल भवनके भीतर अनेकानेक सुन्दर महल और अट्टालिकाएँ बनी थीं। वह प्रासाद जगत्‌के सभी पर्वतीय दृश्योंसे युक्त था। अथवा उसमें जगत्‌के सुप्रसिद्ध पर्वत क्रीड़ाके लिये कृत्रिम रूपसे बनाये गये थे। महाभाग विश्वकर्माने इन्द्रसे प्रेरित होकर उसका निर्माण किया था ॥ ४१ ॥

प्रासादं चैव हेमाभं सर्वभूतमनोहरम् ॥ ४२ ॥
मेरोरिव गिरेः शृङ्गमुच्छ्रितं काञ्चनं महत् ।
रुक्मिण्याः प्रवरं वासं विहितं विश्वकर्मणा ॥ ४३ ॥
वह सुवर्णमय प्रासाद समस्त प्राणियोंके लिये मनोहर था। उसके ऊँचे शिखरपर सुवर्ण मढ़ा गया था; जिससे वह मेरु पर्वतके उत्तुङ्ग शृङ्गकी शोभा धारण करता था। विश्वकर्माने उस श्रेष्ठ प्रासादको महारानी रुक्मिणीके रहनेके लिये बनाया था ॥ ४२-४३ ॥

सत्यभामा पुनर्वेश्म यदावसत् पाण्डुरम् ।
विचित्रमणिसोपानं तद् विदुर्भोगवानिति ॥ ४४ ॥
विमलादित्यवर्णाभिः पताकाभिरलंकृतम् ।
सत्यभामा जिस भवनमें निवास करती थीं, वह श्वेत वर्णका था। उसमें विचित्र मणियोंके सोपान बनाये गये थे। उसे सब प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न समझा जाता था। निर्मल सूर्यके समान तेजस्विनी पताकाएँ उस मनोरम प्रासादकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ ४४ १/२ ॥

६१२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंश

व्यक्तसंजवनोद्देशो यश्चतुर्दिङ्महाध्वजः ॥ ४५ ॥
स च प्रासादमुख्योऽथ जाम्बवत्या विभूषितः ।
प्रभयाभ्यभवत् सर्वांस्तानन्यो भास्करोयथा ॥ ४६ ॥
जिसके बाहर-भीतरका प्रदेश प्रतिक्षण अभिनव रूप-सौन्दर्यसे युक्त प्रतीत होता था और जिसमें चारों ओर बड़ी-बड़ी ध्वजाएँ फहरा रही थीं। उस मुख्य प्रासादको जाम्बवतीदेवी सुशोभित करती थीं, वह दूसरे सूर्यकी भाँति अन्य सब प्रासादोंको अपनी प्रभासे तिरस्कृत कर रहा था ॥ ४५-४६ ॥

उद्यद्भास्करवर्णाभस्तयोरन्तरमाश्रितः ।
विश्वकर्मकृतो दिव्यः कैलासशिखरोपमः ॥ ४७ ॥
उसकी कान्ति उदयकालके सूर्यकी प्रभाके समान थी । वह रुक्मिणी और सत्यभामाके प्रासादोंके बीचमें बना था । विश्वकर्माद्वारा बनाया गया वह दिव्य प्रासाद कैलास-शिखरके समान शोभा पाता था ॥ ४७ ॥

जाम्बूनद इवादीप्तः प्रदीप्तज्वलनो यथा ।
सागरप्रतिमोऽतिष्ठन्मेरुरित्यभिविश्रुतः ॥ ४८ ॥
तस्मिन् गान्धारराजस्य दुहिता कुलशालिनी ।
गान्धारी भरतश्रेष्ठ केशवेन निवेशिता ॥ ४९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! जो जाम्बूनद सुवर्ण तथा प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान था, विशालतामें जिसकी समुद्रसे उपमा दी जाती थी, जो मेरुके नामसे विख्यात होकर खड़ा था, उस महान् प्रासादमें गान्धार-राजकी कुलीन कन्या नाग्नजिती सत्या अथवा गान्धारीको भगवान् श्रीकृष्णने ठहराया था ॥ ४८-४९ ॥

पद्मकूल इति ख्यातं पद्मवर्णं महाप्रभम् ।
सुभीमाया महाकूटं वेश्मातिरुचिरप्रभम् ॥ ५० ॥
पद्मकूल नामसे विख्यात, पद्मके समान वर्णवाला, अत्यन्त प्रकाशमान, महान् शिखरके समान ऊँचा और अत्यन्त रुचिर प्रभासे प्रकाशित जो भवन था, वह सुभीमा देवीका निवास-स्थान बना था ॥ ५० ॥

सूर्यप्रभस्तु प्रासादः सर्वकामगुणैर्युतः ।
लक्ष्मणाया नृपश्रेष्ठ निर्दिष्टः शार्ङ्गधन्वना ॥ ५१ ॥
नृपश्रेष्ठ ! जो प्रासाद समस्त मनोवाञ्छित गुणोंसे युक्त तथा सूर्यके समान प्रकाशमान था, उसे शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णने लक्ष्मणाका आवास निश्चित किया था ॥ ५१ ॥

वैडूर्यमणिवर्णाभः प्रासादो हरितप्रभः ।
यं विदुः सर्वभूतानि परमित्येव भारत ॥ ५२ ॥
वासं तं मित्रविन्दाया देवर्षिगणपूजितम् ।
महिष्या वासुदेवस्य भूषणं तेषु वेश्मसु ॥ ५३ ॥
भारत ! जो हरितकान्तिसे प्रकाशित तथा वैदूर्यमणि-की-सी आभासे उद्भासित था, जिसे समस्त प्राणी सबसे उत्तम समझते थे, वह प्रासाद वासुदेवकी पटरानी मित्रविन्दाका निवास था । देवता तथा ऋषियोंके समुदाय भी उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे । वह उन सभी भवनोंमें भूषण-रूप था ॥ ५२-५३ ॥

यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र विहितो विश्वकर्मणा ।
अतीव रम्यरम्योऽसौ धिष्ठितः पर्वतो यथा ॥ ५४ ॥
सुवार्ताया निवासः स प्रशस्तः सर्वदैवतैः ।
महिष्या वासुदेवस्य केतुमानिति विश्रुतः ॥ ५५ ॥
द्वारकामें विश्वकर्माद्वारा बनाया गया जो प्रमुख प्रासाद था, जो अत्यन्त रमणीयमें भी रमणीय प्रतीत होता था और पर्वतके समान खड़ा था, वह श्रीकृष्णमहिषी सुवार्ताका निवास भवन था । सम्पूर्ण देवता उसकी प्रशंसा करते थे । वह केतुमान् नामसे विख्यात था ॥ ५४-५५ ॥

यस्तु प्रासादमुख्यो वै यं त्वष्टा विदधे स्वयम् ।
योजनायतविष्कम्भः सर्वरत्नमयः शुभः ॥ ५६ ॥
स श्रीमान् विरजा नाम व्यराजत् तत्र सुप्रभः ।
उपस्थानगृहं यत्र केशवस्य महात्मनः ॥ ५७ ॥
जो सभी प्रासादोंमें श्रेष्ठ था, जिसे साक्षात् विश्वकर्मा-ने बनाया था, जिसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजन थी, जो सभी रत्नोंद्वारा निर्मित एवं शुभ-स्वरूप था, वह उत्तम प्रभासे युक्त कान्तिमान् प्रासाद वहाँ 'विरजा' नामसे विख्यात होकर बड़ी शोभा पा रहा था। उसीमें महात्मा केशवका उपस्थान-गृह था ॥ ५६-५७ ॥

तस्मिन् सुविहिताः सर्वे रुक्मदण्डाः पताकिनः ।
सदने वासुदेवस्य मार्गसंजवनध्वजाः ॥ ५८ ॥
रत्नजालानि दिव्यानि तत्रैव च निवेशिताः ।
आहृत्य यद्विसिंहेन वैजयन्तोऽचलो महान् ॥ ५९ ॥
वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके उस सुन्दर सदनमें जो मार्गका ज्ञान करानेवाले ध्वज लगे थे, उन सबके दण्ड सुवर्णमय बनाये गये थे तथा उनपर पताकाएँ फहराती रहती थीं । यदुसिंह श्रीकृष्णने वहाँ दिव्य रत्नोंके समूह संचित किये थे तथा वैजयन्त नामक महान् पर्वत वहाँ लाकर स्थापित किया था ॥

हंसकूटस्य यच्छृङ्गमिन्रद्युम्नस्रः प्रति ।
षष्टितालसमुत्सेधमर्धयोजनमायतम् ॥ ६० ॥
इन्द्रद्युम्न सरोवरके पास हंसकूट पर्वतका जो शिखर था, वह साठ ताड़के बराबर ऊँचा और आधा योजन चौड़ा था ॥

सकिन्नरमहानागं तदप्यमिततेजसा ।
पश्यतां सर्वभूतानामानीयत लोकविश्रुतम् ॥ ६१ ॥
अमित तेजस्वी विश्वकर्मा समस्त प्राणियोंके देखते-देखते उस विश्वविख्यात पर्वतशिखरको किन्नर और बड़े-बड़े नागों-सहित वहाँ ले आये थे ॥ ६१ ॥

विष्णुपर्व ] अष्टानवतितमोऽध्यायः [ ६१३


आदित्यपथगं यत् तु मेरोः शिखरमुत्तमम् ।
जाम्बूनदमयं दिव्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ६२ ॥
तदप्युत्पाट्य कृष्णार्थमानीयत विश्वकर्मणा ।
भ्राजमानमतीवाग्र्यं सर्वौषधिसमन्वितम् ॥ ६३ ॥

मेरुपर्वतका उत्तम शिखर जो सूर्यके मार्गतक पहुँचा हुआ है तथा स्वरूपसे जाम्बूनदमय, दिव्य एवं त्रिभुवन-विख्यात है, उसे भी श्रीकृष्णके लिये विश्वकर्मा उखाड़ लाये थे। वह सब प्रकारकी ओषधियोंसे अलंकृत, प्रकाशमान तथा अत्यन्त उत्तम था ॥ ६२-६३ ॥

तदिन्द्रवचनात् त्वष्टा कार्यहेतोः समानयत् ।
पारिजातश्च तत्रैव केशवेनाहृतः स्वयम् ॥ ६४ ॥

विश्वकर्मा इन्द्रके कहनेसे कार्यवश उसे वहाँ ले आये थे। वहीं साक्षात् श्रीकृष्ण पारिजातका वृक्ष भी ले आये थे ॥ ६४ ॥

नीयमाने तु तत्रासीद् युद्धमद्भुतकर्मणः ।
कृष्णस्य येऽभ्यरक्षंस्तु देवाः पादपमुत्तमम् ॥ ६५ ॥

पारिजातके लाये जाते समय अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णका उन देवताओके साथ घोर युद्ध हुआ, जो उस उत्तम वृक्षकी रक्षा कर रहे थे ॥ ६५ ॥

पुण्डरीकशतेर्जुष्टं विमानैश्च हिरण्मयैः ।
विहिता वासुदेवार्थं रत्नपुष्पफलद्रुमाः ॥ ६६ ॥

वह वृक्ष सैकड़ों कमलोंसे पूजित तथा सुवर्णमय विमानोंसे सेवित एवं सुरक्षित था। विश्वकर्माने श्रीकृष्णके लिये रत्नमय फूल और फल देनेवाले वृक्षोंका निर्माण किया था ॥ ६६ ॥

पद्मषण्डजलोपेता रत्नसौगन्धिकोत्पलाः ।
मणिहेमप्लवाकीर्णाः पुष्करिण्यः सरांसि च ॥ ६७ ॥

उन्होंने बहुत-सी पोखरियों और सरोवर भी बनाये थे, जिनके जल कमलसमूहोंसे सुशोभित थे, उनमें रत्नमय सौगन्धिक कमल खिले हुए थे। मणि एवं सुवर्णसे जटिल नौकाएँ उनमे सब ओर व्याप्त थीं ॥ ६७ ॥

तासां परमकूलानि शोभयन्ति महाद्रुमाः ।
शालास्तालाः कदम्बाश्च शतशाखाश्च रौहिणाः ॥ ६८ ॥
ये च हैमवता वृक्षा ये च मेरुमहास्तथा ।
आहृत्य यदुसिंहार्थं विहिता विश्वकर्मणा ॥ ६९ ॥

उन पुष्करिणियोंके उत्तम तटोंको बड़े-बड़े वृक्ष सुशोभित करते थे। शाल, ताल, कदम्ब, सैकड़ों शाखाओवाले वटवृक्ष तथा जो हिमालय और मेरुपर्वतपर होनेवाले वृक्ष हैं, उन सबको विश्वकर्माने वहाँसे लाकर यदुसिंह श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये द्वारकामें स्थापित कर दिया था ॥ ६८-६९ ॥

रक्तपीतारुणश्यामाः श्वेतपुष्पाश्च पादपाः ।
सर्वर्तुफलसम्पन्नास्तेषु काननसन्धिषु ॥ ७० ॥

वे वृक्ष लाल, पीले, अरुण और श्याम रंगके थे, उनके फूल श्वेत वर्णके थे। वहाँ वन-उपवनोंकी संधियोमे जो वृक्ष लगे थे, वे सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न थे ॥ ७० ॥

समकूलजलोपेताः शान्तशर्करवालुकाः ।
तस्मिन् पुरवरे नद्यः प्रसन्नसलिला ह्रदाः ॥ ७१ ॥

उस श्रेष्ठ नगरमे जो नदियाँ थीं, वे समान तट और जलसे सुशोभित थीं, उनके कंकड़ और बालू नीचे बैठ गये थे, वहाँ जो हृद (कुण्ड या जलाशय) थे, उनका जल बहुत स्वच्छ था ॥ ७१ ॥

पुष्पाकुलजलोपेता नानाद्रुमलताकुलाः ।
अपराश्चाभवन् नद्यो हेमशर्करवालुकाः ॥ ७२ ॥

वहाँ जो दूसरी नदियाँ थीं, उनके बालू और कंकड़ सुवर्णमय थे तथा वे पुष्पवासित जलसे भरी हुई थीं। उनके तटोंपर नाना प्रकारके वृक्ष और लताएँ फैली हुई थीं ॥ ७२ ॥

मत्तबर्हणसंघैश्च कोकिलैश्च सदामदैः ।
वभूवुः परमोपेतास्तस्यां पुर्यां च पादपाः ॥ ७३ ॥

उस पुरीमें जो जो वृक्ष थे, वे मदमत्त मयूरों तथा सदा मत्तवाले बने रहनेवाले कोकिलोंसे परम शोभायमान थे ॥ ७३ ॥

तत्रैव गजयूथानि पुरे गोमहिषास्तथा ।
निवासश्च कृतस्तत्र वराहमृगपक्षिभिः ॥ ७४ ॥

उस द्वारकापुरीमें ही हाथियोके यूथ और गाय-भैंसोंके झुंड भी रहते थे। वराहों, मृगों और पक्षियोने भी वहाँ अपना निवास बना रक्खा था ॥ ७४ ॥

पुर्यां तस्यां तु रम्यायां प्राकारो वै हिरण्मयः ।
व्यक्तः किष्कुशतोत्सेधो विहितो विश्वकर्मणा ॥ ७५ ॥

उस रमणीय पुरीका परकोटा स्पष्ट ही सोनेका बना हुआ था। विश्वकर्माने उसे सौ हाथ ऊँचा बनाया था ॥ ७५ ॥

अतीव रम्यः सोऽथासीद् वेष्टितः पर्वतो यथा ।
ते च ते च महाशैलाः सरितश्च सरांसि च ।
परिक्षिप्तानि भौमेन वनान्युपवनानि च ॥ ७६ ॥

वह परकोटा बहुत ही सुन्दर एवं रमणीय था और घेरा बने हुए पर्वतके समान जान पड़ता था। विश्वकर्माने उस परकोटेके द्वारा पूर्वोक्त बड़े-बड़े पर्वतों, सरिताओं, सरोवरों, वनों और उपवनोंको भी घेर रखा था ॥ ७६ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि द्वारकाविशेषनिर्माणं नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें द्वारकाका विशेषरूपसे निर्माण-विषयक अठानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥

६१४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


नवनवतितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका द्वारका तथा अन्तःपुरमें प्रवेश और मणिपर्वत एवं पारिजातको यथोचित स्थानमें स्थापित करना

वैशम्पायन उवाच
एवमालोकयानः स द्वारकां वृषभेक्षणः।
अपश्यत् स्वगृहं कृष्णः प्रासादशतशोभितम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्णने इस प्रकार द्वारकाका निरीक्षण करते हुए अपने आवास-स्थानको देखा, जो सैकड़ों प्रासादोंसे सुशोभित था ॥ १ ॥

मणिस्तम्भसहस्राणामयुतैर्विवृतं शतैः।
तोरणैर्ज्वलनप्रख्यैर्मणिविद्रुमराजतैः ॥ २ ॥

उसमें मणियोंके बने हुए लाखों-करोड़ों खंभे लगे थे, जिनकी प्रभासे वहाँका सब कुछ सुस्पष्ट दिखायी देता था। वहाँके बाहरी फाटक मणि-मूँगे एवं चाँदीके बने हुए थे और प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित होते थे ॥ २ ॥

तत्र तत्र प्रभासद्भिर्विचित्रकाञ्चनवेदिकैः ।
प्रासादस्तत्र सुमहान् कृष्णोपस्थानिकोऽभवत् ॥ ३ ॥

जहाँ-तहाँ प्रकाशित होनेवाले उन फाटकोंमें सोनेकी विचित्र वेदिकाएँ बनी हुई थीं। उन सबसे उद्दीप्त दिखायी देनेवाला श्रीकृष्णका वह महान् प्रासाद उनका उपस्थान-गृह था ॥ ३ ॥

स्फाटिकस्तम्भविवृतो विस्तीर्णः सर्वकाञ्चनः।
पद्माकुलजलोपेता रक्तसौगन्धिकोत्पलाः ॥ ४ ॥

उसमें स्फटिकमणिके खंभे लगे हुए थे, जिनसे वह प्रासाद प्रकाशित होता था। उसका विस्तार बहुत बड़ा था। वहाँकी सभी वस्तुएँ सोनेकी बनी हुई थीं; वहाँकी वावडियों-का जल कमलोंसे आच्छादित था; उनमें लाल रंगके सौगन्धिक कमल खिले हुए थे ॥ ४ ॥

मणिहेमनिभाश्चित्रा रत्नसोपानभूषिताः ।
मत्तबर्हिणजुष्टाश्च कोकिलैश्च सदामदैः ॥ ५ ॥
बभूवुः परमोपेता वाप्यश्च विकचोत्पलाः ।

वे वावडियाँ मणि और सुवर्णके समान विचित्र शोभासे सम्पन्न दिखायी देती थीं; रत्नमयी सीढ़ियोंसे अलंकृत थीं; मतवाले मोर और सदा मदमत्त रहनेवाले कोकिल उनका सेवन करते थे; विकसित कमलोंसे आच्छादित होनेके कारण वे उत्तम शोभासे सम्पन्न हो रही थीं ॥ ५½ ॥

विश्वकर्मकृतः शैलः प्राकारस्तस्य वेश्मनः ॥ ६ ॥
व्यक्तकिष्कुशतोत्सेधः परिखापरिवेष्टितः ।
तद् गृहं वृष्णिसिंहस्य निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ ७ ॥

श्रीकृष्णके उस भवनका परकोटा विश्वकर्माने प्रस्तरसे बनाया था। उसकी ऊँचाई सौ हाथकी थी और वह खाइयोंसे घिरा हुआ था। वृष्णिवंशके सिंह श्रीकृष्णके उस भवनका निर्माण साक्षात् विश्वकर्माने किया था ॥ ६-७ ॥

महेन्द्रसदृशं वेश्म समन्तादर्धयोजनम् ।
ततस्तं पाण्डुरं शौरिर्मूर्ध्नि तिष्ठन् गरुत्मतः ॥ ८ ॥
प्रीतः शङ्खमुपाध्मासीद् द्विषतां रोमहर्षणम् ।
तस्य शङ्खस्य शब्देन सागरश्चक्षुभे भृशम् ।
ररास च नभः कृत्स्नं तच्चित्रमभवत् तदा ॥ ९ ॥

सब ओरसे आधा योजन विस्तृत वह श्रीकृष्णका महल देवराज इन्द्रके भवन-सा मनोहर था। तदनन्तर गरुड़के ऊपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन प्रसन्न होकर श्वेतवर्णवाले अपने उस पाञ्चजन्य शङ्खको बजाया, जो शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उस शङ्खके शब्दसे समुद्र विक्षुब्ध हो उठा तथा सम्पूर्ण आकाश-मण्डल गूँजने लगा; उस समय वहाँ यह अद्भुत बात हुई ॥ ८-९ ॥

पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं संश्रुत्य कुकुरान्धकाः ।
विशोकाः समपद्यन्त गरुडस्य च दर्शनात् ॥ १० ॥

पाञ्चजन्यका गम्भीर घोष सुनकर और गरुड़का दर्शन पाकर कुकुर तथा अन्धकवंशी यादव शोकरहित हो गये ॥

शङ्खचक्रगदापाणिं गरुडोपरि स्थितम् ।
दृष्ट्वा जहृषिरे पौरा भास्करोपमतेजसम् ॥ ११ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा आदि आयुध सुशोभित थे। वे गरुड़के ऊपर बैठे थे। उनका तेज भगवान् भास्करके समान था। उन्हें देखकर समस्त पुरवासियोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ ११ ॥

ततस्तूर्यप्रणादश्च भेरीणां च महास्वनाः ।
जज्ञिरे सिंहनादाश्च सर्वेषां पुरवासिनाम् ॥ १२ ॥

तदनन्तर तूरही और भेरियाँ बज उठीं, उनकी आवाज बहुत दूरतक फैल गयी; फिर समस्त पुरवासी भी सिंह-नाद कर उठे ॥ १२ ॥

ततस्ते सर्वदाशार्हाः सर्वे च कुकुरान्धकाः ।
प्रीयमाणाः समाजग्मुरालोक्य मधुसूदनम् ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् सभी दशार्हवंशी यादव तथा कुकुर और अन्धकवंशके सब लोग भगवान् मधुसूदनका दर्शन करके बड़े प्रसन्न हुए और सभी उनकी अगवानीके लिये आ गये ॥ १३ ॥

विष्णुपर्व ] नवनवतितमोऽध्यायः ६१५


वासुदेवं पुरस्कृत्य शङ्खतूर्यरवैः सह।
उग्रसेनो ययौ राजा वसुदेवनिवेशनम्॥ १४॥
राजा उग्रसेन भगवान् वासुदेवको आगे करके शङ्ख और तूर्य आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ वसुदेवके महलतक उन्हें पहुँचानेके लिये गये॥ १४॥

आनन्दिनी पर्यचरत् स्वेषु वेश्मसु देवकी।
रोहिणी च यशोदा च आहुकस्य च याः स्त्रियः॥ १५॥
वहाँ आनन्दमें डूबी हुई देवकी, रोहिणी, यशोदा तथा उग्रसेनकी रानियोंने अपने-अपने भवनोंमें भगवान् श्रीकृष्णका विशेष सत्कार किया॥ १५॥

ततः कृष्णः सुपर्णेन स्वं निवेशनमभ्यगात्।
अचार च यथोद्देशमीश्वरानुचरो हरिः॥ १६॥
तदनन्तर श्रीकृष्ण गरुड़के द्वारा अपने महलमें गये। इन्द्र आदि ऐश्वर्यशाली देवता जिनके अनुचर हैं, वे श्रीहरि अपने अभीष्ट स्थानपर जा पहुँचे॥ १६॥

अवतीर्य गृहद्वारि कृष्णस्तु यदुनन्दनः।
यथार्हं पूजयामास यादवान् यादवर्षभः॥ १७॥
घरके मुख्य द्वारपर उतरकर यादवशिरोमणि यदुनन्दन श्रीकृष्णने उन यादवोंका यथायोग्य सत्कार किया॥ १७॥

रामाहुकगदाक्रूरप्रद्युम्नादिभिरर्चितः।
प्रविवेश गृहं शौरिरादाय मणिपर्वतम्॥ १८॥
तं च शक्रस्य दयितं पारिजातं महाद्रुमम्।
प्रवेशयामास गृहं प्रद्युम्नो रुक्मिणीसुतः॥ १९॥
बलराम, उग्रसेन, गद, अक्रूर और प्रद्युम्न आदिसे सम्मानित हो श्रीकृष्णने अपने गृहमें प्रवेश किया। उस समय रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नने मणिपर्वत तथा इन्द्रके प्रिय महान् वृक्ष पारिजातको लेकर भगवान्‌के महलमें पहुँचा दिया॥ १८-१९॥

तेऽन्योन्यं ददृशुर्वीरा देहबन्धानमानुषान्।
पारिजातप्रभावेण ततो मुमुदिरे जनाः॥ २०॥
द्वारकावासी वीरोंने वहाँ पारिजात वृक्षके प्रभावसे एक दूसरेके देह-सम्बन्धको अमानुष (दिव्य) देखा, इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ॥ २०॥

तैः स्तूयमानो गोविन्दः प्रहृष्टैर्यादवर्षभैः।
प्रविवेश गृहं श्रीमान् विहितं विश्वकर्मणा॥ २१॥
गोविन्दकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति सुनते हुए वे श्रीमान् भगवान् विश्वकर्माके बनाये हुए उस गृहमें प्रविष्ट हुए॥ २१॥

ततोऽन्तःपुरमघ्ये तं सशृङ्गमणिपर्वतम्।
न्यवेशयदमेयात्मा वृष्णिभिः सहितोऽच्युतः॥ २२॥
तं च दिव्यं द्रुमश्रेष्ठं पारिजातममित्रजित्।
अर्च्यमर्चितमव्यग्रमिष्टे देशे न्यवेशयत्॥ २३॥
तदनन्तर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न शत्रुविजयी भगवान् अच्युतने वृष्णिवंशियोंको साथ लेकर शिखरसहित मणिपर्वतको अन्तःपुरमें रक्खा तथा उस दिव्य, पूज्य एवं पूजित वृक्षप्रवर पारिजातको भी शान्तभावसे अभीष्ट स्थानमें स्थापित कर दिया॥ २२-२३॥

अनुज्ञाप्य ततो ज्ञातीन् केशवः परवीरहा।
ताः स्त्रियः पूजयामास संहृता नरकेण याः॥ २४॥
तत्पश्चात् शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले केशवने समस्त भाई-बन्धुओंकी आज्ञा ले उन सब स्त्रियोंका समादर किया, जो नरकासुरद्वारा हरकर लायी गयी थीं॥ २४॥

वस्त्रैराभरणैर्दिव्यैर्दासीभिर्धनसंचयैः।
हारैश्चन्द्रांशुसंकाशैर्मणिभिश्च महाप्रभैः॥ २५॥
दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण, दासीगण, धनकी राशि, चन्द्रकिरणोंके समान श्वेत हीरकहार तथा महान् प्रभापुञ्जसे प्रकाशित मणियोंद्वारा श्रीहरिने उनका सत्कार किया॥ २५॥

पूर्वमभ्यर्चिताश्चैव वसुदेवेन ताः स्त्रियः।
देवक्या सह रोहिण्यां रेवत्या चाहुकेन च॥ २६॥
उनसे भी पहले वसुदेवजी, देवकी, रोहिणी, रेवती तथा उग्रसेनने भी उन सबका समादर किया था॥ २६॥

सत्यभामोत्सन्ना स्त्रीणां सौभाग्येनाभवत् तदा।
कुटुम्बस्येश्वरी त्वासीद् रुक्मिणी भीष्मकात्मजा॥ २७॥
उस समय सौभाग्यकी दृष्टिसे सत्यभामा सभी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ मानी गयी; परंतु कुटुम्बकी स्वामिनी तो भीष्मकनन्दिनी महारानी रुक्मिणी ही थीं॥ २७॥

तासां यथार्हमर्ह्याणि प्रासादशिखराणि च।
आदिदेश गृहान् कृष्णः पारिबर्हाश्च पुष्कलान्॥ २८॥
श्रीकृष्णने उन सब रानियोंको यथायोग्य महल, अटारी, प्रासादशिखर, गृह तथा बहुत-से उपहार अर्पित किये॥ २८॥


इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि द्वारकाप्रवेशनं नाम नवनवतितमोऽध्यायः॥ ९९॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें द्वारकाप्रवेशविषयक निन्यानवेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९९॥

६१६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

शततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका समस्त यादवोंसे मिलकर उन्हें सम्मानित करनेके लिये सभामें बुलाना

वैशम्पायन उवाच

ततः सम्पूज्य गरुडं वासुदेवोऽनुमान्य च।
सखिवच्चोपगृह्यैनमनुजज्ञे गृहं प्रति ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर भगवान् वासुदेवने गरुड़की पूजा और समादर करके उन्हें एक मित्रकी भाँति अपनाकर घर लौटनेकी आज्ञा दी ॥ १ ॥

सोऽनुज्ञातो हि सत्कृत्य प्रणम्य च जनार्दनम्।
ऊर्ध्वमाचक्रमे पक्षी यथेष्टं गगनेचरः ॥ २ ॥

आकाशचारी पक्षी गरुड़ सत्कारपूर्वक जानेकी आज्ञा पाकर भगवान् जनार्दनको प्रणाम करके अपनी इच्छाके अनुसार ऊपरको उड़े ॥ २ ॥

स पक्षवातसंक्षुब्धं समुद्रं मकरालयम्।
कृत्वा वेगेन महता ययौ पूर्वमहोदधिम् ॥ ३ ॥

वे अपने पंखोंकी हवासे मकरालय समुद्रको विक्षुब्ध करके बड़े वेगसे पूर्ववर्ती महासागरकी ओर चले ॥ ३ ॥

कृत्यकाले उपस्थास्य इत्युक्त्वा गरुडे गते।
कृष्णो ददर्श पितरं वृद्धमानकदुन्दुभिम् ॥ ४ ॥

'आवश्यकताके समय मैं पुनः उपस्थित हो जाऊँगा' ऐसा कहकर जब गरुड़ चले गये, तब श्रीकृष्णने अपने बूढ़े पिता आनकदुन्दुभि (वसुदेव) का दर्शन किया ॥ ४ ॥

उग्रसेनं च राजानं बलदेवं च सात्यकिम्।
काश्यं सान्दीपनिं चैव ब्रह्मगार्ग्यं तथैव च ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् वे राजा उग्रसेन, भाई बलदेव, सात्यकि, काश्यदेशमें उत्पन्न हुए गुरु सान्दीपनि तथा ब्रह्मगार्ग्यसे भी मिले ॥ ५ ॥

अन्यांश्च वृद्धान्वृष्णीनां तांश्च भोजान्धकांस्तथा।
रत्नप्रवेकैर्दाशार्हान् वीर्यलब्धैस्तथाऽर्चयत् ॥ ६ ॥

फिर दूसरे-दूसरे बड़े-बूढ़े वृष्णिवंशियों, भोजों और अन्धकोंसे भी उन्होंने भेंट की । तत्पश्चात् अपने पराक्रमद्वारा प्राप्त हुए रत्नसमूहोंसे उन्होंने समस्त यादवोंका सत्कार किया ॥ ६ ॥

हता ब्रह्मद्विषः सर्वे जयन्त्यन्धकवृष्णयः।
रणात् प्रतिनिवृत्तोऽयमक्षतो मधुसूदनः ॥ ७ ॥

समस्त ब्रह्मद्रोही असुर मारे गये। अन्धक और वृष्णिवंशके वीरोंकी विजय हुई तथा ये भगवान् मधुसूदन युद्धसे सकुशल लौट आये, इनके शरीरपर कहीं कोई चोट नहीं आयी है ॥ ७ ॥

इति चत्वररथ्यासु द्वारवत्यां सुपूजितः।
चाक्रिको घोषयामास पुरुषो मृष्टकुण्डलः ॥ ८ ॥

इस प्रकार विशुद्ध सोनेके कुण्डलोंसे अलंकृत तथा राजाज्ञा घोषित करनेवाला चाक्रिक पुरुष भलीभाँति सम्मानित हो द्वारकाके चौराहों और सड़कोंपर राजघोषणा सुनाने लगा ॥ ८ ॥

ततः सान्दीपनिं पूर्वमभिगम्य जनार्दनः।
ववन्दे वृष्णिनृपतिमाहुकं विनयान्वितः ॥ ९ ॥

तत्पश्चात् विनयशील जनार्दनने पहले गुरु सान्दीपनि के पास जा उनके चरण छूकर फिर वृष्णिवंशी नरेश राजा उग्रसेनको प्रणाम किया ॥ ९ ॥

तथाश्रुपरिपूर्णाक्षमन्दानन्दागतचेतसम् ।
ववन्दे सह रामेण पितरं वासवानुजः ॥ १० ॥

इसके बाद इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ जाकर पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय पिता वसुदेवके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू भर आये और उनका हृदय आनन्दके समुद्रमें निमग्न हो गया ॥ १० ॥

उपगम्य तथा शेषान् सत्कृत्य च यथार्हतः।
सर्वेषां नाम जग्राह दाशार्हाणामधोक्षजः ॥ ११ ॥

फिर शेष यादवोंके पास जाकर उनका यथायोग्य सत्कार करके भगवान् श्रीकृष्णने सभी दशार्हवंशियोंके नाम लेकर उन्हें बुलाया ॥ ११ ॥

ततः सर्वाणि दिव्यानि सर्वरत्नमयानि च।
आसनाग्र्याणि विविशुरुपेन्द्रप्रमुखास्तदा ॥ १२ ॥

तब श्रीकृष्ण आदि सब यादव उस समय उन सभी सर्वरत्नमय दिव्य एवं श्रेष्ठ आसनोंपर बैठे ॥ १२ ॥

ततस्तद्धनमक्षय्यं किङ्करैर्यत्समाहृतम्।
तत्सभामानयामासुः पुरुषाः कृष्णशासनात् ॥ १३ ॥

तदनन्तर किङ्कर नामक राक्षस जिसे ले आये थे, उस अक्षय धनको श्रीकृष्णकी आज्ञासे सेवकगण सभामें ले आये ॥ १३ ॥

ततः सम्मानयामास दाशार्हांश्च यदूत्तमः।
सर्वान् दुन्दुभिशब्देन पूजयिष्यञ्जनार्दनः ॥ १४ ॥

इसके बाद यदुकुलतिलक जनार्दनने समस्त दाशार्होंका दुन्दुभिनावके द्वारा पूजन करते हुए उन सबका सम्मान किया ॥ १४ ॥

तामासनवतीं रम्यां मणिविद्रुमतोरणाम्।
सभां सर्वदशार्हास्ते विविशुः कृष्णशासनात् ॥ १५ ॥

श्रीकृष्णकी आज्ञासे वे समस्त यादव उस रमणीय सभामें प्रविष्ट हुए, जिसमें सदस्योंके बैठनेके लिये आसन सजाये गये

विष्णुपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः [ ६१७

थे तथा जिसके बाहरी दरवाजे मणि और मूँगोंके बने हुए थे॥ १५ ॥

ततः पुरुषसिंहैर्या यदुभिः सर्वतो वृता।
सर्वार्थगुणसम्पन्ना सा सभा भरतर्षभ।
शुशुभेऽभ्यधिकं शुभ्रा सिंहैर्गिरिगुहा यथा॥ १६॥

भरतभूषण ! वह शुभ सभा सब ओरसे पुरुषसिंह यादवोंद्वारा भरी हुई एवं सभी पदार्थों और गुणोंसे सम्पन्न थी। जैसे सिंहोंसे पर्वतकी गुफा सुशोभित होती है, उसी प्रकार उन यादवोंसे उस सभाकी अधिकाधिक शोभा हो रही थी॥ १६॥

रामेण सह गोविन्दः काञ्चनं महदासनम्।
उग्रसेनं पुरस्कृत्य भोजवृष्णिपुरस्कृतः॥ १७॥

राजा उग्रसेन तथा भोज और वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषोंको अपने आगे रखकर बलरामसहित भगवान् श्रीकृष्ण सुवर्णके बने हुए विशाल सिंहासनपर आसीन थे॥ १७॥

तत्रोपविष्टांस्तान् वीरान् यथाप्रीति यथावयः।
सभाभाष्य यदुश्रेष्ठानुवाच पुरुषोत्तमः ॥ १८॥

वहाँ बैठे हुए उन यदुश्रेष्ठ वीरोंको उनकी अवस्था और प्रीतिका अनुसार सम्बोधित करके पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण उनसे इस प्रकार बोले ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि सभाप्रवेशनं नाम शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें सभाप्रवेशविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०० ॥


एकाधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा यादवोंका सत्कार तथा नारदजीका यादवोंकी सभामें श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन करना

श्रीकृष्ण उवाच
भवतां पुण्यकीर्तीनां तपोबलसमाधिभिः ।
अपध्यानाच्च पापान्मा भौमः स नरको हतः ॥ १ ॥

श्रीकृष्णने कहा—यादवो ! आप सब लोग पवित्र कीर्तिवाले हैं, आपकी तपस्या, बल और एकाग्रतासे तथा आपके द्वारा किये गये अनिष्टचिन्तनसे भूमिपुत्र पापात्मा नरकासुर मारा गया ॥ १ ॥

मोक्षितं बन्धनाद् गुप्तं कन्यान्तःपुरमुत्तमम् ।
मणिपर्वतमुत्पाट्य शिखरं चैतदाहृतम् ॥ २ ॥

उसके यहाँ जो सुरक्षित कन्याओंका उत्तम अन्तःपुर था, उसे मैंने बन्धनसे मुक्त किया तथा मणिपर्वतके इस शिखरको उखाड़कर भी मैं यहाँ साथ लेता आया हूँ ॥ २॥

अयं धनौघः सुमहान् किङ्करैर्गृहतो मम।
ईशा भवन्तो द्रव्यस्य तानुक्त्वा विरराम ह ॥ ३ ॥

किङ्कर नामक राक्षसों ने जिसे मेरे यहाँ पहुँचाया है, वही यह महान् धनराशि आपलोगोंके समक्ष है। आप सभी इस धनके स्वामी हैं। उनसे ऐसा कहकर भगवान् चुप हो गये ॥ ३ ॥

तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य भोजवृष्ण्यन्धका वचः ।
जहृषुर्हृष्टरोमाणः पूजयन्तो जनार्दनम् ॥ ४ ॥
ऊचुश्चैनं नृवीरास्ते कृताञ्जलिपुटास्ततः।

भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर भोज, वृष्णि और अन्धक-वंशके लोग हर्षमें भर गये । उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे नरवीर भगवान् श्रीकृष्णकी प्रशंसा करते हुए उनसे हाथ जोड़कर बोले—॥ ४॥

नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि देवकिनन्दने ॥ ५ ॥
यत्कृत्वा दुष्करं कर्म देवैरपि दुरासदम्।
लालयेः स्वजनान् भोगै रत्नैश्र्व स्वयमर्जितैः ॥ ६ ॥

'महाबाहो ! आप देवकीनन्दनमें ऐसी उदारताका होना आश्चर्यकी बात नहीं है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है ऐसा दुष्कर कर्म करके आप अपने ही द्वारा उपार्जित रत्नों और भोगोंसे हम स्वजनोंका लालन करते हैं' ॥ ५-६ ॥

ततः सर्वदशार्हाणामाहुकस्य च याः स्त्रियः ।
प्रीयमाणाः समाजग्मुर्वासुदेवदिदृक्षया ॥ ७ ॥

तदनन्तर सब दशार्हकुलकी स्त्रियाँ तथा राजा उग्रसेनकी रानियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान् वासुदेवको देखनेके लिये आयीं ॥ ७ ॥

देवकीसप्तमा देव्यो रोहिणी च शुभानना।
ददृशुः कृष्णमासीनं रामं चैव महाभुजम् ॥ ८ ॥

वसुदेवकी सहदेवा आदि सात देवियाँ, जिनमे सातवीं देवकी थीं और सुन्दर मुखवाली रोहिणी देवी इन सबने वहाँ सिंहासनपर बैठे हुए श्रीकृष्ण तथा महाबाहु बलरामका दर्शन किया ॥ ८ ॥

तौ तु पूर्वमतिक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च ।
अभिवादयतां देवीं देवकीं रामकेशवौ ॥ ९ ॥

बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाइयोंने पहले औरोंको छोड़कर रोहिणीको प्रणाम करनेके अनन्तर देवी देवकीका अभिवादन किया ॥ ९ ॥


१. सहदेवा, शान्तिदेवा, श्रोदेवा, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी और देवकी—ये सात देवककी पुत्रियाँ थीं, जो क्रमशः वसुदेवको ही बिवाही गयी थीं ।

६१८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभेऽम्बिका।
अदितिर्देवमातेव मित्रेण वरुणेन च ॥ १०॥
माता देवकी वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले उन दोनों पुत्रोंके साथ उसी प्रकार शोभा पाने लगी, जैसे मित्र और वरुणके साथ देवमाता अदिति सुशोभित होती हैं ॥ १०॥

ततः प्राप्ता नराग्र्यौ तु तस्याः सा दुहिता तदा।
एकानंशेति यामाहुर्नरा वै कामरूपिणीम् ॥ ११॥
उसी समय उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंके पास यशोदाजीकी वह पुत्री आ पहुँची, जिसे लोग इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एकानंशा कहते हैं ॥ ११॥

तथा क्षणमुहूर्ताभ्यां यथा जज्ञे सुरेश्वरः।
यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तमः ॥ १२॥
जिसके दिये हुए संकेत और मुहूर्तके अनुसार देवेश्वर श्रीहरिका प्रादुर्भाव हुआ था और जिसके ही कारण पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सेवकोंसहित कंसका वध कर डाला था ॥

सा कन्या ववृधे तत्र वृष्णिसद्मनि पूजिता।
पुत्रवत् पाल्यमाना वै वसुदेवाज्ञया तदा ॥ १३॥
वह कन्या वृष्णिवंशियोंके घरमें बड़े आदर-सत्कारके साथ पल रही थी। भगवान् वसुदेवकी आज्ञासे उस समय उसका पुत्रकी भाँति पालन किया जाता था ॥ १३॥

एकानंशेति यामाहुरुत्पन्नां मानवा भुवि।
योगकन्यां दुराधर्षां रक्षार्थं केशवस्य ह ॥ १४॥
श्रीकृष्णकी रक्षाके लिये भूतलपर उत्पन्न हुई उस दुर्धर्ष योगकन्याको मनुष्य एकानंशा कहते हैं ॥ १४॥

यां वै सर्वे सुमनसः पूजयन्ति स्म यादवाः।
देववद् दिव्यपुरुषः कृष्णः संरक्षितो यया ॥ १५॥
समस्त यादव प्रसन्न चित्तसे उस देवीकी पूजा करते हैं, जिसने देवतुल्य दिव्य पुरुष श्रीकृष्णकी रक्षा की थी ॥१५॥

तां च तत्रोपसंगम्य प्रियामिव सखीं स्वसाम्।
दक्षिणेन कराग्रेण परिजग्राह माधवः ॥ १६॥
वहाँ अपनी प्रिय सखीकी भाँति उस बहिनसे मिलकर श्रीकृष्णने दाहिने हाथसे उसका हाथ अपने हाथमें ले लिया ॥

तथैव रामोऽतिबलः सम्परिष्वज्य भामिनीम्।
मूर्द्ध्र्युपाघ्राय सव्येन प्रतिजग्राह पाणिना ॥ १७॥
उसी प्रकार अत्यन्त बलशाली बलरामजीने उस भामिनी बहिनको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघा और बायें हाथसे उसका हाथ पकड़ लिया ॥ १७ ॥

ददृशुस्ताः स्त्रियो मध्ये भगिनीं रामकृष्णयोः।
रुक्मपद्मव्यग्रकरां श्रियं पद्मालयामिव ॥ १८॥
बलराम और श्रीकृष्णके बीचमें खड़ी हुई उनकी उस बहिनको सभी स्त्रियोंने देखा। वह सुवर्णमय कमल हाथमें लिये हुए कमलालया लक्ष्मीकी भाँति सुशोभित होती थी ॥

तथाक्षतमहावृष्ट्या पुष्पैश्च विविधैः शुभैः।
अवकीर्य च लाजैस्ताः स्त्रियो जग्मुर्यथालयम् ॥ १९॥
वे स्त्रियाँ अक्षतोंकी बड़ी भारी वर्षा करके नाना प्रकारके माङ्गलिक पुष्प और खील बिखेर कर अपने अपने घरको चली गयीं ॥ १९ ॥

ततस्ते यादवाः सर्वे पूजयन्तो जनार्दनम्।
उपोपविविशुः प्रीताः प्रशंसन्तोऽद्भुतं कृतम् ॥ २०॥
तदनन्तर वे समस्त यादव श्रीकृष्णकी पूजा तथा उनके अद्भुत कर्मकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक उनके पास बैठ गये ॥ २० ॥

पूज्यमानो महाबाहुः पौराणां रतिवर्धनः।
विरराज महाकीर्तिर्देवैरिव स तैः सह ॥ २१॥
महान् कीर्तिशाली महाबाहु श्रीकृष्ण पुरवासियोंका प्रेम बढ़ाते हुए उनसे पूजित हो देवताओंके साथ इन्द्रकी भाँति उन सबके साथ विशेष शोभा पाने लगे ॥ २१ ॥

समासीनेषु सर्वेषु यादवेषु जनार्दनम्।
नियोगात् त्रिदशेन्द्रस्य नारदोऽभ्यागमत् सभाम् ॥ २२॥
जब समस्त यादव बैठ गये, उस समय इन्द्रकी आज्ञासे देवर्षि नारदजी उस सभामें श्रीकृष्णके पास आये ॥ २२ ॥

सोऽथ सम्पूजितः पूज्यः शूरैस्तैर्यदुपुङ्गवैः।
करं संस्पृश्य स हरेर्निवेश परमासने ॥ २३॥
पूज्य देवर्षि नारद उन यादवशिरोमणि शूर-वीरोंसे भलीभाँति पूजित हो भगवान् श्रीकृष्णका हाथ पकड़कर उत्तम आसनपर विराजमान हुए ॥ २३ ॥

सुखोपविष्टस्तान् वृष्णीनुपविष्टानुवाच ह।
सम्प्राप्तं शक्रवचनाज्जानीध्वं मां नरर्षभाः ॥ २४॥
स्वयं सुखपूर्वक बैठ जानेपर वहाँ बैठे हुए उन वृष्णिवंशियोंसे वे इस प्रकार बोले—'नरश्रेष्ठ यादवो! तुम यह समझ लो, मैं इन्द्रकी आज्ञासे यहाँ आया हूँ ॥ २४ ॥

शृणुध्वं राजशार्दूलाः कृष्णस्यास्य पराक्रमम्।
यानि कर्माणि कृतवान् बाल्यात्प्रभृति केशवः ॥ २५॥
'राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी वीरो ! श्रीकृष्णने बचपनसे लेकर अबतक जो-जो कर्म किये हैं, उनके उस पराक्रमका वर्णन सुनो ॥ २५ ॥

उग्रसेनसुतः कंसः सर्वान् निर्मथ्य यादवान्।
राज्यं जग्राह दुर्बुद्धिर्बद्ध्वा पितरमाहुकम् ॥ २६॥
'उग्रसेनके दुर्बुद्धि पुत्र कंसने अपने पिताको कैद करके

विष्णुपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः ६१९


समस्त यादवोंको रौंदकर मथुराका राज्य अपने अधिकारमें कर लिया था॥ २६॥

समाश्रित्य जरासंधं श्वशुरं कुलपांसनः।
भोजवृष्ण्यन्धकान् सर्वानवमन्यत दुर्मतिः॥ २७॥

'खोटी बुद्धिवाला वह कुलाङ्गार अपने श्वशुर जरासंधका आश्रय ले भोज, वृष्णि और अन्धक वंशके सब लोगोंका अपमान करता था॥ २७॥

ज्ञातिकार्यं चिकीर्षंस्तु वसुदेवः प्रतापवान्।
उग्रसेनस्य रक्षार्थं स्वपुत्रं पर्य्यरक्षत ॥ २८॥

'उस समय भाई-बन्धुओंका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे और उग्रसेनकी रक्षा करनेके लिये प्रतापी वसुदेवने अपने पुत्र श्रीकृष्णकी कंससे रक्षा की॥ २८॥

स गोपैः सह धर्मात्मा मथुरोपवने स्थितः।
अत्यद्भुतानि कर्माणि कृतवान् मधुसूदनः ॥ २९॥

'वसुदेवका वह पुत्र यह धर्मात्मा मधुसूदन ही हैं, जो मथुराके निकटवर्ती वनमे गोपोंके साथ रहे हैं और वहाँ इन्होंने बड़े अद्भुत कर्म किये हैं॥ २९॥

प्रत्यक्षं शूरसेनानां श्रूयते महदद्भुतम्।
उत्त्तानेन शयानेन शकटान्तरचारिणा ॥ ३०॥
राक्षसी निहता रौद्रा शकुनीवेषधारिणी।
पूतना नाम घोरा सा महाकाया महाबला ॥ ३१॥

'वहाँ इनके विषयमें एक बड़ी अद्भुत बात सुनी जाती है, जिसे शूरसेनवासियोंने प्रत्यक्ष देखा है। ये बाल्यावस्थामें छकड़ेके नीचे एक खाटपर उत्तान सोये थे। उस समय वहाँ पक्षीका वेश धारण करके रहनेवाली एक महाबलशालिनी विशालकाया घोर एवं भयानक राक्षसी पूतना इनके द्वारा मारी गयी॥ ३०-३१॥

विषदिग्धं स्तनं रौद्रं प्रयच्छन्ती जनार्दने।
ददृशुर्निहतां तां ते राक्षसीं वनगोचराः ॥ ३२॥

'वह जनार्दन श्रीकृष्णको अपना विषसे लिप्त भयानक स्तन पिलाना चाहती थी। वहाँ इनके द्वारा मारी गयी उस राक्षसीको वनवासी गोपोंने प्रत्यक्ष देखा था ॥ ३२॥

पुनर्जातोऽयमित्याहुरुक्तस्तस्मादधोक्षजः ।
अत्यद्भुतमिदं चासीद् यच्छिशुः पुरुषोत्तमः ॥ ३३॥
पादाङ्गुष्ठेन शकटं क्रीडमानो व्यलोडयत्।

'उस समय वे कहने लगे, इस बालकका पुनर्जन्म हुआ है—इसने अक्ष (गाड़ी) के अधः (नीचे) फिर जन्म पाया है। उनके ऐसा कहनेसे ये बालकृष्ण अधोक्षज नामसे प्रसिद्ध हुए। यह भी बड़ी अद्भुत बात हुई कि शैशवावस्थामे खेलते हुए इन पुरुषोत्तमने पैरके अँगूठेसे धक्का देकर छकड़ेको उलट दिया ॥ ३३$\frac{१}{२}$ ॥

दाम्ना चोलूखले बद्धो विप्रकुर्वन् कुमारकम् ॥ ३४॥
बभञ्जार्जुनवृक्षौ द्वौ ख्यातो दामोदरस्तदा ।

'कुमारावस्थाकी लीला करते हुए इन्हें एक दिन मैयाने रस्सीसे ओखलीमें बाँध दिया। उसी अवस्थामें उस ओखलीको घसीटते हुए इन्होंने दो अर्जुन वृक्षोंको तोड़ डाला, उस समय दाम (रस्सी) से उदरमे बँधनेके कारण यह दामोदर नामसे विख्यात हुए ॥ ३४$\frac{१}{२}$ ॥

कालियश्च महानागो दुराधर्षो महाबलः ॥ ३५॥
क्रीडता वासुदेवेन निर्जितो यमुनाह्रदे।

'यमुनाजीके कुण्डमें निवास करनेवाले दुर्धर्ष एवं महाबली महानाग कालियको इन भगवान् वासुदेवने खेल-खेलमें ही पराजित कर दिया ॥ ३५$\frac{१}{२}$ ॥

अक्रूरस्य समक्षं च यन्नागभवने विभुः ॥ ३६॥
पूज्यमानं तदा नागैर्दिव्यं वपुरधारयत्।

'इन भगवान् श्रीहरिने उस दिन अक्रूरकी आँखोंके सामने नागभवनमें नागोंद्वारा पूजित होनेवाले अपने दिव्य रूपको धारण किया था ॥ ३६$\frac{१}{२}$ ॥

शीतवातादिता गाश्च दृष्ट्वा कृष्णेन धीमता ॥ ३७॥
धृतो गोवर्धनः शैलः सप्तरात्रं महात्मना।
शिशुना वासुदेवेन गवां त्राणार्थमिच्छताम् ॥ ३८॥

'बुद्धिमान् वसुदेवपुत्र महात्मा श्रीकृष्ण सरदी और हवासे गौओंको कष्ट पाते देख अपनी रक्षा चाहनेवाली उन गौओंके प्राण बचानेके लिये बाल्यावस्थामें ही लगातार सात रातोंतक गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठाये रहे ॥ ३७-३८॥

तथोक्षदुष्टोऽतिबलो महाकायो नरान्तकृत्।
गोपतिर्वासुदेवेन हतोऽरिष्टो महासुरः ॥ ३९॥

'उसी प्रकार मनुष्योंका अन्त करनेवाला एक अत्यन्त बलशाली, महाकाय, महान् असुर अरिष्ट, जो साँड़के रूपमें रहता था और साँड़ोंमे सबसे अधिक दुष्ट था, भगवान् वासुदेवके हाथसे मारा गया ॥ ३९॥

धेनुकः स महाकायो दानवः सुमहाबलः।
निहतो वासुदेवेन गवां त्राणाय दुर्मतिः ॥ ४०॥

'वह महाबली और विशालकाय दानव दुर्बुद्धि धेनुक भी गौओंकी रक्षाके लिये ही वसुदेवनन्दन बलरामके हाथसे मारा गया ॥ ४०॥

सुनामानममित्रघ्नः सर्वसैन्यपुरस्कृतम्।
वृकैर्विद्रावयामास ग्रहीतुं समुपस्थितम् ॥ ४१॥

'शत्रुओंका नाश करनेवाले श्रीकृष्णने समस्त सेनाओंके साथ आये हुए सुनामाको, जो इन्हें कैद करनेके लिये उपस्थित हुआ था, भेड़ियोंद्वारा मार भगाया ॥ ४१॥

६२० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


रौहिणेयेन संगम्य वने विचरता पुनः।
गोपवेषधरेणैव कंसस्य भयमाहितम् ॥ ४२ ॥

'एक समय रोहिणीनन्दन बलरामजीके साथ मिलकर वनमें विचरते हुए गोपवेशधारी श्रीकृष्णने पुनः एक महाबली दैत्यका वध करके कंसको भयभीत कर दिया ॥ ४२ ॥

तथा व्रजगतः शौरिर्दृष्ट्वा युद्धबलं हयम्।
प्रग्रहं भोजराजस्य जघान पुरुषोत्तमः ॥ ४३ ॥

'व्रजमें रहते हुए वसुदेवनन्दन पुरुषोत्तम श्रीहरिने भोजराज कंसके परिचारक अश्वरूपधारी दैत्यको, जिसका युद्ध ही बल था, अपने सामने उपस्थित देख मार डाला ॥ ४३ ॥

प्रलम्बश्च महाकायो रौहिणेयेन धीमता ।
दानवो मुष्टिनैकेन कंसामात्यो निपातितः ॥ ४४ ॥

'बुद्धिमान् रोहिणीनन्दन बलरामने कंसके मन्त्री महाकाय दानव प्रलम्बको एक ही मुक्केसे मार गिराया ॥ ४४ ॥

एतौ हि वसुदेवस्य पुत्रौ सुरसुतोपमौ ।
ववृधाते महावीर्यौ ब्रह्मगार्ग्येण संस्कृतौ ॥ ४५ ॥

'व्रजमें वसुदेवके ये दोनों महापराक्रमी पुत्र जो देवकुमारोंके समान तेजस्वी थे, ब्रह्मगार्ग्यके द्वारा क्षत्रियोचित संस्कारोंसे सम्पन्न हो दिनोंदिन बढ़ते रहे ॥ ४५ ॥

जन्मप्रभृति चाप्येतौ गार्ग्येण परमर्षिणा ।
याथातथ्येन विज्ञाप्य संस्कारं प्रतिपादितौ ॥ ४६ ॥

'महर्षि गार्ग्यने जन्मसे ही लेकर इन दोनोंके सभी संस्कार समय-समयपर स्वयं ही सूचित करके यथार्थरूपसे सम्पन्न किये हैं ॥ ४६ ॥

यदा त्विमौ नरश्रेष्ठौ स्थितौ यौवनसम्मुखे ।
सिंहशावाविवोदीर्णौ मत्तौ हैमवतौ यथा ॥ ४७ ॥

'जब ये नरश्रेष्ठ यौवनके सामने उपस्थित हुए, तब दो उद्धत सिंहशावकों तथा हिमालयके दो मतवाले हाथियोंके समान सुशोभित होने लगे ॥ ४७ ॥

ततो मनांसि गोपीनां हरमाणौ महाबलौ ।
आस्तां गोष्ठवरौ वीरौ देवपुत्रोपमद्युती ॥ ४८ ॥

'फिर तो देवपुत्रोंके समान कान्तिमान् ये दोनों महाबली वीर गोपियोंके चित्त चुराते हुए व्रजके प्रमुख व्यक्ति हो गये ॥ ४८ ॥

एतौ जये वा युद्धे वा क्रीडासु विविधासु च ।
नन्दगोपस्य गोपाला न शेकुः प्रसमीक्षितुम् ॥ ४९ ॥

'विजयमें, युद्धमें अथवा भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाओंमें व्रजके दूसरे-दूसरे ग्वाले नन्दगोपके इन दोनों पुत्रोंकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते थे (समता करना तो दूरकी बात है) ॥ ४९ ॥

व्यूढोरस्कौ महाबाहू शालस्कन्धाविवोद्गतौ।
श्रुत्वासौ व्यथितः कंसो मन्त्रिभिः सहितोऽभवत् ५०

'इनकी छाती चौड़ी है, भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं तथा ये साखूके तनेकी भाँति मोटे और ऊँचे कदके हैं, यह सुनकर कंस अपने मन्त्रियोंसहित व्यथित हो उठा था ॥ ५० ॥

नाशकच्च यदा कंसो ग्रहीतुं बलकेशवौ ।
निजग्राह ततः क्रोधाद् वसुदेवं सबान्धवम् ॥ ५१ ॥
सहोग्रसेनेन तदा चोरवद् गाढबन्धनम् ।
कालं महान्तमनयत् कृच्छ्रमानकदुन्दुभिः ॥ ५२ ॥

'जब बलराम और श्रीकृष्णको कंस किसी तरह पकड़ न सका, तब क्रोधमें आकर उसने उग्रसेन और बन्धु-बान्धवों-सहित वसुदेवको कैद कर लिया और चोरकी भाँति उन्हें सुदृढ़ बन्धनमें डाल दिया। उन दिनों वसुदेवजीने दीर्घकाल-तक बड़े भारी कष्टका सामना किया ॥ ५१-५२ ॥

कंसस्तु पितरं बद्ध्वा शूरसेनाञ्छशास ह।
जरासंधं समाश्रित्य तथैवाहुतिभीमकौ ॥ ५३ ॥

'पिताको कैद करके कंस जरासंध, आहुति और भीष्मकका सहारा ले शूरसेन देशका शासन करने लगा ५३॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य मथुरायां महोत्सवम् ।
पिनाकिनं समुद्दिश्य चक्रे कंसो नराधिपः ॥ ५४ ॥

'किसी समय मथुरामें राजा कंसने पिनाकधारी भगवान् शङ्करकी प्रसन्नताके लिये एक बड़ा भारी उत्सव किया ॥ ५४ ॥

तत्र मल्लाः समाजग्मुर्नानादेश्या विशांपते।
नर्तना गायनाश्चैव कुशला नृत्यकर्मसु ॥ ५५ ॥

'प्रजानाथ उग्रसेन ! उस उत्सवमें अनेक देशोंके मल्ल तथा नृत्यकर्ममें कुशल बहुत-से नर्तक और गायक आये थे ॥ ५५ ॥

ततः कंसो महातेजा रङ्गवाटं महाधनम् ।
कुशलैः कारयामास शिल्पिभिः साधुनिष्ठितैः ॥ ५६ ॥

'उस समय महातेजस्वी कंसने शिल्पकर्ममें कुशल अच्छे-अच्छे शिल्पियोंद्वारा एक रङ्गशाला बनवायी, जिसमें बहुत धन खर्च किया गया था ॥ ५६ ॥

तत्र मञ्चसहस्राणि पौरजानपदैर्जनैः ।
समाकीर्णानि दृश्यन्ते ज्योतींषि गगने यथा ॥ ५७ ॥

'वहाँ हजारों मञ्च रखे गये थे, जो नगर और जनपदके लोगोंसे भरे-पूरे दिखायी देते थे। वे आकाशमें फैले हुए नक्षत्रोंके समान दृष्टिगोचर होते थे ॥ ५७ ॥

भोजराजः श्रिया जुष्टं रङ्गवाटं महर्द्धिमत् ।
आरुरोह ततः कंसो विमानं सुकृती यथा ॥ ५८ ॥

'तदनन्तर भोजराज कंस अनुपम शोभासे युक्त बहुमूल्य रङ्गमञ्चपर आरूढ़ हुआ, मानो कोई पुण्यात्मा पुरुष विमानपर चढ़ा हो ॥ ५८ ॥

विष्णुपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः ६२१

रङ्गद्वारे गजं मत्तं प्रभूतायुधकल्पितम्।
शूरैरधिष्ठितं कंसः स्थापयामास वीर्यवान् ॥ ५९ ॥
'पराक्रमी कंसने रङ्गशालाके द्वारपर शूरवीर महावतोंसे युक्त एक मतवाले हाथीको खड़ा करा रखा था, जो बहुसंख्यक अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित था ॥ ५९ ॥

यदा हि स महातेजा रामकृष्णौ समागतौ ।
शुश्राव पुरुषव्याघ्रौ सूर्याचन्द्रमसाविव ॥ ६० ॥
तदाप्रभृति यत्नोऽभूद् रक्षां प्रति नराधिप ।
न च शिश्ये सुखं रात्रौ रामकृष्णौ विचिन्तयन् ॥ ६१॥
'नरेश्वर ! महातेजस्वी कंसने जब सुना कि सूर्य और चन्द्रमाके समान दोनों भाई पुरुषसिंह बलराम और श्रीकृष्ण मथुरामें आ गये हैं, तबसे वह अपनी रक्षाके लिये विशेष प्रयत्नशील हो गया। बलराम और श्रीकृष्णका ही चिन्तन करता हुआ वह रातमे सुखकी नींद सो न सका ॥ ६०-६१॥

श्रुत्वा तु रामः कृष्णश्च तं समाजमनुत्तमम् ।
उभौ विविशतुर्वीरौ शार्दूलौ गोव्रजं यथा ॥ ६२ ॥
'बलराम और श्रीकृष्ण दोनों वीर उस परम उत्तम समाज (उत्सव) का समाचार सुनकर उस रङ्गशालामें उसी प्रकार प्रवेश करने लगे, जैसे दो व्याघ्र गौओंके व्रजमें घुस रहे हों ॥ ६२ ॥

ततः प्रवेशे संरुद्धौ रक्षिभिः पुरुषर्षभौ ।
हत्वा कुवलयापीडं ससादिनमरिंदमौ ।
अवमृद्य दुराधर्षौ रङ्गं विविशतुस्तदा ॥ ६३ ॥
'उसमें प्रवेश करते समय रक्षकोंने उन दोनों पुरुषप्रवर बन्धुओंको रोक दिया, तब उन दोनों दुर्जय शत्रुदमन बन्धुओंने सवारोंसहित कुवलयापीड़ हाथीको मारकर मिट्टीमें मिला दिया, फिर वे रङ्गशालामें घुस गये ॥ ६३ ॥

चाणूरान्ध्रौ विनिष्पिष्य केशवेन बलेन च ।
औग्रसेनिः सुदुष्टात्मा सानुजो विनिपातितः ॥ ६४ ॥
'श्रीकृष्ण और बलरामने चाणूर तथा आन्ध्रका कचूमर निकालकर उग्रसेनके दुष्टात्मा पुत्र कंसको भाइयोंसहित मार गिराया ॥ ६४ ॥

यत् कृतं यदुसिंहेन देवैरपि सुदुष्करम् ।
कर्म तत् केशवादन्यः कर्तुमर्हति कः पुमान् ॥ ६५ ॥
'जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुष्कर है, ऐसा जो-जो कर्म यदुकुलसिंह श्रीकृष्णने किया, उसे इनके सिवा दूसरा कौन पुरुष कर सकता है ॥ ६५ ॥

यद्धि नाधिगतं पूर्वैः प्रह्लादबलिशम्बरैः ।
तदिदं प्रापितं वित्तं शौरिणा भवतां कृते ॥ ६६ ॥
'पहलेके प्रह्लाद, बलि और शम्बर आदि नरेशोंने जिसे नहीं पाया था, वही यह अनन्त धन श्रीकृष्णने तुमलोगोंके लिये यहाँ ला दिया है ॥ ६६ ॥

एतेन मुरुमाक्रम्य दैत्यं पञ्चजनं तथा ।
निष्क्रम्य शैलसंघातान्निसुन्दः सगणो हतः ॥ ६७ ॥
'इन्होंने मुरु तथा पञ्चजन नामक दैत्यपर आक्रमण करके शैलसमूहोंको पारकर निसुन्द नामक दैत्यको उसके गणोंसहित मार डाला ॥ ६७ ॥

नरकश्च हतो भौमः कुण्डले चाहृते शुभे ।
प्राप्तं च दिवि देवेषु केशवेन महद्यशः ॥ ६८ ॥
'भूमिपुत्र नरकको भी मौतके घाट उतार दिया । उसके यहाँ अदितिके जो दोनों सुन्दर कुण्डल थे, उनको वापिस ले लिया। इस प्रकार केशवने देवलोक तथा देवताओंमें महान् यश प्राप्त किया ॥ ६८ ॥

वीतशोकभयाबाधाः कृष्णबाहुबलाश्रयाः ।
यजध्वं विविधैर्यज्ञैर्यदावा वीतमत्सराः ॥ ६९ ॥
'यादवो ! अब तुमलोग श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय ले शोक, भय और बाधाओंसे रहित हो ईर्ष्या-द्वेषका त्याग करके नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करो ॥ ६९ ॥

देवानां सुमहत् कार्यं कृतं कृष्णेन धीमता ।
प्रियमावेदयाम्येष भवतां भद्रमस्तु वः ॥ ७० ॥
'बुद्धिमान् श्रीकृष्णने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया है। मैं तुमलोगोंको यह प्रिय निवेदन करता हूँ, तुम सब लोगोंका भला हो ॥ ७० ॥

यदिष्टं वो यदुश्रेष्ठाः कर्तास्मि तदतन्द्रितः ।
भवतामस्मि यूयं च मम युष्मास्वहं स्थितः ॥ ७१ ॥
'यदुवरो ! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह कार्य मैं आलस्य-रहित होकर करूँगा। मैं तुम्हारा हूँ और तुम मेरे। मैं तुममें ही स्थित हूँ ॥ ७१ ॥

इति सम्बोधयन् कृष्णमब्रवीत् पाकशासनः ।
स मां प्रैषीत् सुरश्रेष्ठः प्रीतस्तुष्टास्तथा वयम् ॥ ७२ ॥
'इस प्रकार तुम सबको श्रीकृष्णकी महिमा समझाते हुए पाकशासन इन्द्रने उपर्युक्त बातें कही हैं। उन्हीं सुरश्रेष्ठने प्रसन्न होकर मुझे यहाँ भेजा है। इससे हम भी संतुष्ट हुए हैं ॥७२॥

यत्र धीः श्रीः स्थिता तत्र यत्र श्रीस्तत्र संनतिः ।
संनतिर्धीस्तथा श्रीश्च नित्यं कृष्णे महात्मनि ॥ ७३ ॥
'जहाँ बुद्धि है, वहाँ श्री विद्यमान है। जहाँ श्री है, वहाँ संनति (विनय) है। महात्मा श्रीकृष्णमें विनय, बुद्धि और श्री-ये तीनों नित्य विद्यमान हैं' ॥ ७३ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नारदवाक्यं नामैकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नारदजीका वाक्यविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥

६२२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

द्व्यधिकशततमोऽध्यायः

नारदजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णके अद्भुत कर्मोंका वर्णन

नारद उवाच

सादिता मौरवाः पाशा निसुन्दनरकौ हतौ।
कृतः क्षेम्यः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं—यादवो ! भगवान् श्रीकृष्णने मुर दैत्यके पाश काट डाले, निसुन्द और नरकासुरको मार डाला तथा प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सब लोगोंके लिये क्षेममय-निष्कण्टक बना दिया ॥ १ ॥

शौरिणा पृथिवीपालास्त्रासिताः स्पर्द्धिनो रणे।
धनुषश्च निनादेन पाञ्चजन्यस्वनेन च ॥ २ ॥

शूरनन्दन श्रीकृष्णने अपने धनुषकी टंकार और पाञ्चजन्य शङ्खके हुंकारसे उन समस्त भूपालोंको आतङ्कित कर दिया, जो युद्धमें उनके साथ स्पर्धा रखते थे ॥ २ ॥

मेघप्रख्यै रथानीकैर्दाक्षिणात्यैः सुरक्षितम्।
रुक्मिणं युधि निर्जित्य महाबलपराक्रमम् ॥ ३ ॥
रुक्मिणीमाजहाराशु केशवो वृष्णपुङ्गवः॥ ३ ॥
ततः पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा।
उवाह महिषीं भोज्यां शङ्खचक्रगदासिभृत् ॥ ४ ॥

मेघोंकी घटाके समान छायी हुई दक्षिणदेशीय रथ-सेनाओंसे सुरक्षित तथा महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न रुक्मीको युद्धमे पराजित करके इन वृष्णिकुलतिलक केशवने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले एवं सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा रुक्मिणीको शीघ्र हर लिया। इस प्रकार शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले श्रीकृष्णने भोजकुल-नन्दिनी रुक्मिणीके साथ विवाह किया और उन्हें अपनी पटरानी बनाया ॥ ३-४ ॥

जारूध्यामाहृतिः क्राथः शिशुपालश्च निर्जितः।
वक्रश्च सह सैन्येन शतधन्वाथ निर्जितः ॥ ५ ॥

जारूथी नगरीमें आहूति, क्राथ एवं शिशुपालको परास्त किया, सेनासहित दन्तवक्त्र और शतधन्वाको भी हरा दिया ॥ ५ ॥

इन्द्रद्युम्नो हतः कोपाद् यवनश्च कशेरुमान्।
हतः सौभपतिः श्रीमाञ्छाल्वश्च दृढधन्वना ॥ ६ ॥

इन्होंने इन्द्रद्युम्न, कालयवन एवं कशेरुमान्‌का भी क्रोधपूर्वक वध किया है तथा हाथमें सुदृढ़ धनुष धारण करके सौभविमानके स्वामी श्रीमान् राजा शाल्वको भी मार डाला है ॥ ६ ॥

पर्वतानां सहस्रं च चक्रेण पुरुषोत्तमः।
विकीर्य पुण्डरीकाक्षो द्युमत्सेनं व्यपोथयत् ॥ ७ ॥

इन कमलनयन पुरुषोत्तमने चक्रद्वारा सहस्रों पर्वतोंको टूक-टूक करके बिखेर दिया और द्युमत्सेनको मार गिराया ॥ ७ ॥

महेन्द्रशिखरे चैव निमेषान्तरचारिणौ।
जग्राह पुरुषव्याघ्रो वरुणस्याभितश्चरौ ॥ ८ ॥
इरावत्यां महाभोजावग्निसूर्यसमौ युधि।
गोपतिस्तालकेतुश्च निहतौ शार्ङ्गधन्वना ॥ ९ ॥

जो युद्धमें अग्नि और सूर्यके समान पराक्रमी थे और वरुण देवताके उभय-पार्श्वमे विचरण करते थे, जिनमें पलक मारते-मारते एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँच जानेकी शक्ति थी, वे गोपति और तालकेतु नामक महाभोज महेन्द्र पर्वतके शिखरपर पुरुषसिंह श्रीकृष्णद्वारा पकड़े गये और उन शार्ङ्गधन्वाके हाथसे इरावती नदीके तटपर मारे गये ॥ ८-९ ॥

अक्षप्रपतने चैव डिम्भो हंसश्च दानवौ।
उभौ तावपि कृष्णेन सानुगौ विनिपातितौ ॥ १० ॥

इन्हीं श्रीकृष्णने डिम्भ और हंस नामक दोनों दानवोंको अक्षप्रपतन नामक स्थानमे सेवकोंसहित मार गिराया ॥ १० ॥

दग्धा वाराणसी चैव केशवेन महात्मना।
सराष्ट्रः सानुबन्धश्च काशीनामधिपो हतः ॥ ११ ॥

महात्मा केशवने वाराणसी नगरी जला दी तथा राष्ट्रके लोगों और सगे-सम्बन्धियोंसहित काशिराजको कालके गालमें भेज दिया ॥ ११ ॥

विजित्य च यमं संख्ये शरैः संनतपर्वभिः।
अथैन्द्रसेनिरानीतः कृष्णेनाद्भुतकर्मणा ॥ १२ ॥

इन अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णने युद्धमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा यमराजको जीतकर वहाँसे इन्द्रसेनके पुत्रको वापस लौटाया था ॥ १२ ॥

सहितः सर्वयादोभिः सागरेषु महाबलः।
प्राप्य लोहितकूटं च कृष्णेन वरुणो जितः ॥ १३ ॥

इन्हीं श्रीकृष्णने समुद्रोंमें तथा लोहित शिखरपर जाकर समस्त जलजन्तुओंसहित महाबली वरुणको भी जीता था ॥ १३ ॥

महेन्द्रभवने जातो देवैर्गुप्तो महात्मभिः।
अचिन्तयित्वा देवेन्द्रं पारिजातद्रुमो हृतः ॥ १४ ॥

जो महेन्द्रभवनमें उत्पन्न होकर सदा महामनस्वी देवताओंद्वारा सुरक्षित रखा गया था, उस पारिजात नामक वृक्षको इन श्रीकृष्णने देवराजकी परवा न करके हर लिया ॥ १४ ॥

विष्णुपर्व ] द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ६२३


पाण्ड्यं पौण्ड्रं कलिङ्गं च मात्स्यं चैव जनार्दनः।
जघान सहितान् सर्वान् वङ्गराजं तथैव च ॥ १५ ॥

इन जनार्दनने एक साथ आये हुए पाण्ड्य, पौण्ड्र, कलिङ्ग, मत्स्य तथा वङ्ग देशके समस्त राजाओंको युद्धमे मार डाला था ॥ १५ ॥

एष चैकशतं हत्वा रणे राज्ञां महात्मनाम् ।
गान्धारीमावहद् वीरो महिषीं प्रियदर्शनाम् ॥ १६ ॥

इन वीर श्रीकृष्णने रणभूमिमे एक सौ महामना नरेशोंका वध करके अपनी परम सुन्दरी पटरानी गान्धारीसे विवाह किया था ॥ १६ ॥

तथा गाण्डीवधन्वानं क्रीडन्तं मधुसूदनः ।
जिगाय भरतश्रेष्ठं कुन्त्याः प्रमुखतो विभुः ॥ १७ ॥

गाण्डीव धनुष लेकर युद्धकी क्रीडा करते हुए भरतश्रेष्ठ अर्जुनको इन भगवान् मधुसूदनने कुन्तीके सामने ही जीत लिया (अथवा सहायता देकर उन्हें विजयी बना दिया) ॥ १७ ॥

द्रोणं द्रौणिं कृपं कर्णं भीष्मं चैव सुयोधनम् ।
चक्राङ्गुयानैः प्रहवणे जिगाय पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥

इन पुरुषोत्तमने (अर्जुनद्वारा) रथयुद्धमे द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, भीष्म और दुर्योधनको परास्त कर दिया ॥ १८ ॥

वभ्रोश्च प्रियमन्विच्छञ्छङ्खचक्रगदासिभृत् ।
सौवीरराजस्य सुतां प्रसह्य हृतवान् प्रभुः ॥ १९ ॥

वभ्रुका प्रिय चाहते हुए शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले भगवान् केशवने सौवीरराजकी पुत्रीको बलपूर्वक हर लिया था ॥ १९ ॥

पर्यस्तां पृथिवीं कृत्स्नां साश्वां सरथकुञ्जराम् ।
वैणुदारिकृते यत्नाज्जिगाय पुरुषोत्तमः ॥ २० ॥

इन पुरुषोत्तमने वैणुदारिके लिये घोड़े, रथ और हाथियोसहित सारी पृथ्वोको, जो अस्त-व्यस्त हो गयी थी, यत्नपूर्वक जीत लिया ॥ २० ॥

अवाप्य तपसो वीर्यं बलमोजश्च माधवः ।
पूर्वदेहे जहारायं बलेस्त्रिभुवनं हरिः ॥ २१ ॥

इन भगवान् माधवने पूर्व शरीरमे वामनरूप होकर तपस्याका बल, वीर्य और ओज पाकर राजा बलिसे त्रिलोकीका राज्य छीन लिया था ॥ २१ ॥

वज्राशनिगदाखङ्गैस्त्रासयद्भिश्च दानवैः।
यस्य नाधिगतो मृत्युः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ २२ ॥

वज्र, अशनि, गदा और खड्गके प्रहारसे त्रास देते हुए दानव प्राग्ज्योतिषपुरमें प्रयत्न करनेपर भी इन्हे मार न सके ॥ २२ ॥

अभिभूतश्च कृष्णेन सगणः सुमहाबलः ।
बलेः पुत्रो महावीर्यो बाणो द्रविणवत्तरः ॥ २३ ॥

महाबली महापराक्रमी तथा अत्यन्त वैभवशाली बलिपुत्र बाणासुरको भी श्रीकृष्णने पराजित कर दिया था ॥ २३ ॥

पीठं तथा महाबाहुः कंसामात्यं जनार्दनः ।
पैठिकं चासिलोमानं निजघान महाबलः ॥ २४ ॥

इन महाबली महाबाहु जनार्दनने कंसके मन्त्री पीठ, पैठिक और असिलोमाको भी मौतके घाट उतार दिया ॥ २४ ॥

जम्भमैरावणं चापि विरूपं च महायशाः ।
जघान पुरुषव्याघ्रो दैत्यं मानुषरूपिणम् ॥ २५ ॥

महायशस्वी पुरुषसिंह श्रीकृष्णने मानवरूपधारी जम्भ, अहिरावण और विरूप नामक दैत्यको कालके गालमें भेज दिया ॥ २५ ॥

तथा नागपतिं तोये कालीयं च महौजसम् ।
निर्जित्य पुण्डरीकाक्षः प्रेषयामास सागरम् ॥ २६ ॥

इसी तरह कमलनयन केशवने यमुनाजीके जलमें रहनेवाले महाबली नागराज कालियको जीतकर समुद्रमें भेज दिया ॥ २६ ॥

संजीवयामास मृतं पुत्रं सान्दीपनेस्तथा ।
निर्जित्य पुरुषव्याघ्रो यमं वैवस्वतं हरिः ॥ २७ ॥

इन्हीं पुरुषसिंह श्रीहरिने वैवस्वत यमको जीतकर सान्दीपिनिके मरे हुए पुत्रको पुनः जीवनदान दिया था ॥ २७ ॥

एवमेष महाबाहुः शास्ता तेषां दुरात्मनाम् ।
देवांश्च ब्राह्मणांश्चैव ये द्विषन्ति सदा नृप ॥ २८ ॥

नरेश्वर ! इस प्रकार यह महाबाहु श्रीकृष्ण उन दुरात्माओंको दण्ड देनेवाले हैं, जो देवताओं और ब्राह्मणोंसे सदा द्वेष रखते हैं ॥ २८ ॥

निहत्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले ।
देवमातुर्ददौ चैव प्रीत्यर्थं वज्रपाणिनः ॥ २९ ॥

इन्होने वज्रपाणि इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर देवमाता अदितिको उनके दोनों मणिमय कुण्डल लाकर दे दिये ॥ २९ ॥

एवं सदैव दैत्यानां सुराणां च महायशाः ।
भयाभयकरः कृष्णः सर्वलोककरो विभुः ॥ ३० ॥

इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा, सर्वव्यापी, महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण सदा ही दुराचारी दैत्योंको भय और धर्मात्मा देवताओंको अभय प्रदान करते हैं ॥ ३० ॥

संस्थाप्य धर्मान् मर्त्येषु यज्ञैरिष्ट्वाऽऽप्तदक्षिणैः ।
कृत्वा देयार्थममितं स्वस्थानं प्रतिपत्स्यते ॥ ३१ ॥

६२४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

ये मनुष्योंमें धर्मकी स्थापना करके पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए देवताओंके असंख्य कार्य सिद्ध करनेके अनन्तर अपने परमधामको पधारेंगे ॥ ३१ ॥

कृष्णो भोगवतीं रम्यामृषिकान्तां महायशाः ।
द्वारकामात्मसात्कृत्वा समुद्रं गमयिष्यति ॥ ३२ ॥
महायशस्वी श्रीकृष्ण भोग-वैभवसे सम्पन्न रमणीय तथा ऋषियोंके लिये कमनीय द्वारकापुरीको अपने अधीन करके अन्ततोगत्वा इसे समुद्रमें डुबो देंगे ॥ ३२ ॥

बहुरत्नसमाकीर्णां चैत्ययूपशताङ्किताम् ।
द्वारकां वरुणावासं प्रवेश्यति सकाननाम् ॥ ३३ ॥
जो बहुसंख्यक रत्नोंसे व्याप्त तथा सैकड़ों चैत्यों और यूपोंसे चिह्नित है, वन-उपवनसहित उस द्वारकापुरीको वरुणालयमें निमग्न कर देंगे ॥ ३३ ॥

तां सूर्यसदनप्रख्यां मतज्ञः शार्ङ्गधन्वनः ।
विसृष्टां वासुदेवेन सागरः प्लावयिष्यति ॥ ३४ ॥
शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णके मतको जाननेवाला समुद्र इन भगवान् वासुदेवके द्वारा छोड़ी हुई सूर्यलोक-तुल्य तेजस्विनी द्वारकाको अपने जलमें विलीन कर लेगा ॥ ३४ ॥

सुरासुरमनुष्येषु नासीन्न भविता क्वचित् ।
य इमामावसेत् कश्चिदन्यो वै मधुसूदनात् ॥ ३५ ॥
देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें इन भगवान् मधुसूदनके सिवा दूसरा कोई ऐसा न तो हुआ है और न कभी होगा ही, जो इनके द्वारा छोड़ी गयी इस द्वारकापुरीमें निवास कर सके ॥ ३५ ॥

एवमेष दशार्हाणां विधाय विधिमुत्तमम् ।
विष्णुर्नारायणः सोमः सूर्यश्च भविता स्वयं ॥ ३६ ॥
इस प्रकार दशार्हवंशी यादवोंके लिये उत्तम विधिक विधान करके ये सर्वव्यापी नारायण देव स्वयं ही चन्द्रमा और सूर्यरूपसे प्रकाशित होंगे ॥ ३६ ॥

अप्रमेयस्त्वचिन्त्यश्च यथा कामचरो वशी ।
मोदत्येष सदा भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ॥ ३७ ॥
ये अप्रमेय, अचिन्त्य, इच्छानुसार विचरनेवाले और सबको वशमें रखनेवाले हैं। जैसे बालक खिलौनोंसे प्रसन्न होता है, उसी प्रकार ये समस्त प्राणियोंके साथ क्रीडा करते हुए आनन्दमग्न होते हैं ॥ ३७ ॥

न प्रमातुं महाबाहुः शक्योऽयं मधुसूदनः ।
परं ह्यपरमेतस्माद् विश्वरूपान्न विद्यते ॥ ३८ ॥
इन महाबाहु मधुसूदनको सीमित प्रमाणोंद्वारा मापा नहीं जा सकता । यह पर और अपररूप जगत् इन विश्वरूप परमेश्वरसे भिन्न नहीं है ॥ ३८ ॥

श्रुतोऽयमेष शतशस्तथा शतसहस्रशः ।
अन्तो हि कर्मणामस्य दृष्टपूर्वो न केनचित् ॥ ३९ ॥
ये ही सैकड़ों और लाखों बार सुने गये हैं। किसीने पहले कभी इनके कर्मोंका अन्त नहीं देखा है ॥ ३९ ॥

एवमेतानि कर्माणि शिशुमध्यगतस्तदा ।
कृतवान् पुण्डरीकाक्षः संकर्षणसहायवान् ॥ ४० ॥
इस तरह बालकोंके बीचमें रहकर संकर्षणसहित कमलनयन श्रीकृष्णने ये पूर्वोक्त कर्म किये थे ॥ ४० ॥

इत्युवाच पुरा व्यासस्तपोवीर्येण चक्षुषा ।
महायोगी महाबुद्धिः सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ ४१ ॥
पूर्वकल्पके महायोगी, महाबुद्धिमान् और सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले व्यासने अपनी तपोबलसे सम्पन्न दृष्टिद्वारा देखकर यह सब कुछ बताया था ॥ ४१ ॥

वैशम्पायन उवाच
इति संस्तुय गोविन्दं महेन्द्रवचनान्मुनिः ।
यदुभिः पूजितः सर्वैर्नारदस्त्रिदिवं ययौ ॥ ४२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार देवराज इन्द्रके आदेशसे भगवान् गोविन्दकी स्तुति करके नारद मुनि समस्त यादवोंसे पूजित हो स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४२ ॥

ततस्तद् वसु गोविन्दो दिदेशान्धकवृष्णिषु ।
यथार्हं पुण्डरीकाक्षो विधिवन्मधुसूदनः ॥ ४३ ॥
तदनन्तर कमलनयन मधुसूदन भगवान् गोविन्दने समस्त अन्धक और वृष्णिवंशके लोगोंको विधिपूर्वक वह सारा धन यथोचितरूपसे बाँट दिया ॥ ४३ ॥

यादवाश्च धनं प्राप्य विधिवद् भूरिदक्षिणैः ।
यज्ञैरिष्ट्वा महात्मानो द्वारकामावसन् पुरीम् ॥ ४४ ॥
उस धनको पाकर महामनस्वी यादव प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान करते हुए द्वारकापुरीमें निवास करने लगे ॥ ४४ ॥


इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नारदवाक्यं नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नारदजीका वाक्यविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०२ ॥

विष्णुपर्व ] त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ६२५


त्र्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णकी संततिका वर्णन तथा वृष्णिवंशका उपसंहार

जनमेजय उवाच
बहूनां स्त्रीसहस्राणामष्टौ भार्याः प्रकीर्तिताः।
तासामपत्यान्यष्टानां भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १ ॥

**जनमेजयने पूछा—**भगवन् ! भगवान् श्रीकृष्णकी कई हजार रानियोंमेंसे आठको प्रमुख बताया गया है। उन आठोंकी संतानें कौन-कौन-सी थीं ? यह आप मुझे बताइये ॥

वैशम्पायन उवाच
अष्टौ महिष्यः पुत्रिण्य इति प्राधान्यतः स्मृताः।
सर्वा वीरप्रजाश्चैव तास्वपत्यानि मे शृणु ॥ २ ॥

**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन् ! प्रधानतः आठों पटरानियाँ पुत्रवती थीं, ऐसा माना गया है। उनकी सभी संतानें वीर थीं। उन रानियोंके जो-जो संतानें हुईं, मैं बताता हूँ, सुनो ॥ २ ॥

रुक्मिणी सत्यभामा च देवी नाग्नजिती तथा।
सुदत्ता च तथा शैव्या लक्ष्मणा चारुहासिनी ॥ ३ ॥
मित्रविन्दा च कालिन्दी जाम्बवत्यथ पौरवी।
सुभीमा च तथा माद्री रुक्मिणीतनयाञ्छृणु ॥ ४ ॥

रुक्मिणी, सत्यभामा, देवी नाग्नजिती (सत्या), शिविदेशकी राजकुमारी सुदत्ता, मनोहर हासवाली लक्ष्मणा, मित्रविन्दा, कालिन्दी, जाम्बवती, पौरवी और मद्रदेश-की राजकुमारी सुभीमा—ये श्रीकृष्णकी मुख्य रानियाँ थीं। इनमेंसे रुक्मिणीके पुत्रोंका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ३-४ ॥

प्रद्युम्नः प्रथमं जज्ञे शम्बरान्तकरः शुभः।
द्वितीयश्चारुदेष्णश्च वृष्णिसिंहो महारथः ॥ ५ ॥

रुक्मिणीके गर्भसे पहले शुभलक्षणसम्पन्न प्रद्युम्नका जन्म हुआ, जिन्होंने आगे चलकर शम्बरासुरका वध किया था। उनके दूसरे पुत्र चारुदेष्ण थे, जो वृष्णिवंशमे सिंहके समान पराक्रमी और महारथी वीर थे ॥ ५ ॥

चारुभद्रश्चारुगर्भः सुदेष्णो द्रुम एव च।
सुषेणश्चारुगुप्तश्च चारुविन्दश्च वीर्यवान् ॥ ६ ॥
चारुबाहुः कनीयांश्च कन्या चारुमती तथा।

तीसरे चारुभद्र, चौथे चारुगर्भ, पाँचवें सुदेष्ण और छठे द्रुम थे, सातवें सुषेण, आठवें चारुगुप्त, नवें पराक्रमी चारुविन्द और दसवें चारुबाहु थे। चारुबाहु सबसे छोटे थे। इनके सिवा रुक्मिणीके एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी, जिसका नाम चारुमती था ॥ ६½ ॥

जज्ञिरे सत्यभामायां भानुर्भीमरथः क्षुपः ॥ ७ ॥
रोहितो दीप्तिमांश्चैव ताम्रजाक्षो जलान्तकः।
भानुर्भीमलिका चैव ताम्रपर्णी जलन्धमा ॥ ८ ॥
चतस्रो जज्ञिरे तेषां स्वसारो गरुडध्वजात्।

सत्यभामाके गर्भसे भानु, भीमरथ, क्षुप, रोहित, दीप्तिमान्, ताम्रजाक्ष और जलान्तक—ये आठ पुत्र उत्पन्न हुए। भगवान् गरुड़ध्वजसे इनकी चार बहिनें उत्पन्न हुईं थीं, जिनके नाम थे—भानु, भीमलिका, ताम्रपर्णी और जलन्धमा ॥ ७-८½ ॥

जाम्बवत्याः सुतो जज्ञे साम्बः समितिशोभनः ॥ ९ ॥
मित्रवान् मित्रविन्दश्च मित्रवत्यपि चाङ्गना।
मित्रबाहुः सुनीथश्च नाग्नजित्याः प्रजाः शृणु ॥ १० ॥

जाम्बवतीके ज्येष्ठ पुत्र साम्ब उत्पन्न हुए, जो युद्धमें बड़ी शोभा पाते थे। इनके सिवा मित्रवान्, मित्रविन्द, मित्रबाहु और सुनीथ—ये चार पुत्र और थे। जाम्बवतीके मित्रवती नामवाली एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी। अब नाग्नजितीकी संतानोंका वर्णन सुनो ॥ ९-१० ॥

भद्रकारो भद्रविन्दः कन्या भद्रवती तथा।
सुदत्तायां तु शैव्यायां संग्रामजिदजायत ॥ ११ ॥
सत्यजित् सेनजिच्चैव तथा शूरः सपत्नजित्।

नाग्नजितीके भद्रकार और भद्रविन्द नामक दो पुत्र हुए थे तथा भद्रवती नामवाली एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी। शिविदेशकी राजकुमारी सुदत्ताके गर्भसे संग्रामजित्, सत्यजित्, सेनजित् और शूरवीर सपत्नजित्—इन चार पुत्रोंका जन्म हुआ था ॥ ११½ ॥

सुभीमायाः सुतो माद्रया वृकाश्वो वृकनिर्वृतिः ॥ १२ ॥
कुमारो वृकदीप्तिश्च लक्ष्मणायाः प्रजाः शृणु।

माद्री सुभीमाके वृकाश्व, वृकनिर्वृत्ति तथा कुमार वृकदीप्ति—ये तीन पुत्र थे। अब लक्ष्मणाकी संतानोंका परिचय सुनो ॥ १२½ ॥

गात्रवान् गात्रगुप्तश्च गात्रविन्दश्च वीर्यवान् ॥१३॥
जज्ञिरे गात्रवत्या च भगिन्याऽनुजया सह।

गात्रवान्, गात्रगुप्त तथा पराक्रमी गात्रविन्द—ये तीन पुत्र लक्ष्मणाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे, साथ ही इनकी छोटी बहिन गात्रवतीका भी जन्म हुआ था ॥ १३½ ॥

अश्रुतश्च सुतो जज्ञे कालिन्द्याः श्रुतसम्मतः ॥ १४ ॥
अश्रुतं श्रुतसेनायै प्रददौ मधुसूदनः।

कालिन्दीके दो पुत्र हुए—अश्रुत और श्रुतसम्मत। मधुसूदनने अश्रुत नामक पुत्रको श्रुतसेना नामवाली पत्नीकी गोदमें दे दिया ॥ १४½ ॥

६२६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तं प्रदाय हृषीकेशस्तां भार्या मुदितोऽब्रवीत् ॥ १५ ॥
एष वामुभयोरस्तु दायादः शाश्वतीः समाः ।
उसे देकर भगवान् श्रीकृष्ण बड़े प्रसन्न हुए और अपनी उस पत्नीसे बोले—'यह सदाके लिये तुम दोनोंका पुत्र रहे' ॥ १५३ ॥

बृहत्यां तु गदं प्राहुः शैब्यायामङ्गदं सुतम् ॥ १६ ॥
उत्पन्नं कुमुदं चैव श्वेतं श्वेता तथाङ्गना ।
श्रीकृष्णकी बृहती नामवाली पत्नीके गर्भसे गदकी उत्पत्ति बतायी जाती है। शैव्याके गर्भसे अङ्गद, कुमुद और श्वेत नामक पुत्रकी उत्पत्ति कही गयी है। शैव्याके श्वेता नामवाली एक कन्या भी थी ॥ १६३ ॥

अगावहः सुमित्रश्च शुचिश्चित्ररथस्तथा ॥ १७ ॥
चित्रसेनः सुदेवायांश्चित्रा चित्रवती तथा ।
सुदेवाके गर्भसे अगावह, सुमित्र, शुचि, चित्ररथ तथा चित्रसेन ये—पाँच पुत्र और चित्रा तथा चित्रवती—ये दो कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं ॥ १७३ ॥

वनस्तम्बश्च जज्ञाते सुतः स्तम्बवनश्च ह ॥ १८ ॥
निवासनोऽवनस्तम्भः कन्या स्तम्बवती तथा ।
उपसन्नश्च शङ्कुश्च वज्रांशुः क्षिप्र एव च ॥ १९ ॥
कौशिक्यां सुतसोमायां यौधिष्ठिर्यां युधिष्ठिरः ।
कपाली गरुडश्चैव जज्ञाते चित्रयोधिनौ ॥ २० ॥
वनस्तम्ब, स्तम्बवन, निवासन तथा अवनस्तम्भ—ये चार पुत्र और स्तम्बवती नामवाली कन्या—इन सबकी उत्पत्ति कौशिकीके गर्भसे हुई थी । उपसन्न, शङ्कु, वज्रांशु और क्षिप्र—ये चार पुत्र सुतसोमाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे । यौधिष्ठिरीके गर्भसे युधिष्ठिर नामक पुत्रका जन्म हुआ था । इसके सिवा दो पुत्र और उत्पन्न हुए थे—कपाली तथा गरुड । ये दोनों ही विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले थे ॥ १८-२० ॥

एवमादीनि पुत्राणां सहस्राणि निबोध मे ।
दशायुतं समाख्याता वासुदेवस्य ते सुताः ॥ २१ ॥
अयुतानि तथा चाष्टौ शूरा रणविशारदाः ।
जनार्दनस्य प्रसवः कीर्तितोऽयं तथा मया ॥ २२ ॥
ये तथा इसी तरह और भी सहस्रों पुत्र श्रीकृष्णसे उत्पन्न हुए थे । इस बातको तुम मेरे द्वारा जान लो । भगवान् वासुदेवके वे पुत्र एक लाख अस्सी हजार बताये गये हैं । वे सब के सब रण-कर्म-विशारद तथा शूरवीर थे । इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् जनार्दनकी संततिका वर्णन किया है ॥ २१-२२ ॥

प्रद्युम्नस्य सुतो जज्ञे वैदर्भ्यां राजसत्तम ।
अनिरुद्धो रणेऽरुद्धो जज्ञे स मृगकेतनः ॥ २३ ॥
नृपश्रेष्ठ ! प्रद्युम्नके विदर्भराजकुमारी रुक्मवतीके गर्भसे अनिरुद्ध नामक पुत्रका जन्म हुआ, जिसकी गतिको युद्धमें कोई रोक नहीं सकता था । अनिरुद्धकी ध्वजापर मृगका चिह्न था ॥ २३ ॥

रेवत्यां बलदेवस्य जज्ञाते निशठोल्मुकौ ।
भ्रातरौ देवसंकाशावुभौ पुरुषसत्तमौ ॥ २४ ॥
बलदेवजीके रेवतीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम थे निशठ और उल्मुक । ये दोनों भाई देवताओंके समान तेजस्वी तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे ॥ २४ ॥

सुतनुश्च सुतारा च शौरेरास्तां परिग्रहः ।
पौण्ड्रकः कपिलश्चैव वसुदेवस्य तौ सुतौ ॥ २५ ॥
वसुदेवके दो पत्नियाँ और थीं—सुतनु तथा सुतारा । इन दोनोंके गर्भसे वसुदेवके दो पुत्र हुए—पौण्ड्रक तथा कपिल ॥ २५ ॥

तारायां कपिलो जज्ञे पौण्ड्रश्च सुतनोः सुतः ।
तयोर्नृपोऽभवत् पौण्ड्रः कपिलश्च वनं ययौ ॥ २६ ॥
इनमेंसे कपिल तो सुताराके गर्भसे उत्पन्न हुआ था और पौण्ड्रक सुतनुका पुत्र था । उन दोनों भाइयोंमेंसे पौण्ड्रक तो राजा हुआ और कपिल वनको चला गया ॥२६॥

तुर्या सम्भवद् वीरो वसुदेवान्महाबलः ।
जरा नाम निषादानां प्रभुः सर्वधनुष्मताम् ॥ २७ ॥
वसुदेवसे उनकी चतुर्थ वर्णवाली भार्यासे एक महाबली वीरका जन्म हुआ था, जिसका नाम था जरा । वह समस्त धनुर्धर निषादोंका स्वामी था ॥ २७ ॥

काश्या सुपाश्र्वं तनयं लेभे साम्बाद् रगस्विनम्।
सानुर्जज्ञेऽनिरुद्धस्य वज्रः सानोरजायत ॥ २८ ॥
काश्याने साम्बसे सुपाश्र्व नामक पुत्र प्राप्त किया, जो महान् वेगशाली था । अनिरुद्धके सानु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । सानुसे वज्रका जन्म हुआ ॥ २८ ॥

वज्राज्जज्ञे प्रतिरथः सुचारुस्तस्य चात्मजः ।
अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात् ॥ २९ ॥
वज्रसे प्रतिरथ उत्पन्न हुआ । प्रतिरथके पुत्रका नाम सुचारु था । वृष्णिके छोटे पुत्र अनमित्रसे शिनिका जन्म हुआ ॥ २९ ॥

शिनेस्तु सत्यवाग् जज्ञे सत्यकश्च महारथः ।
सत्यकस्यात्मजः शूरो युयुधानस्त्वजायत ॥ ३० ॥
शिनिसे महारथी सत्यवादी सत्यक उत्पन्न हुए । सत्यकसे उनके शूरवीर पुत्र युयुधान ( सात्यकि ) का जन्म हुआ ॥ ३० ॥

असङ्गो युयुधानस्य मणिरस्तस्याभवत् सुतः ।

विष्णुपर्व ] चतुरधिकशततमोऽध्यायः ६२७ मणेर्युगन्धरः पुत्र इति वंशः समाप्यते ॥ ३१॥ हुआ । मणिके पुत्रका नाम युगन्धर था। इस प्रकार यहाँ युयुधानका पुत्र असङ्ग और असङ्गका पुत्र मणि वंशका वर्णन समाप्त किया जाता है ॥ ३१ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वृष्णिवंशानुकीर्तने त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वृष्णिवंशका वर्णनविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥ चतुरधिकशततमोऽध्यायः प्रद्युम्नका जन्म, शम्बरासुरद्वारा प्रद्युम्नका सूतिकागृहसे अपहरण, प्रद्युम्न- मायावती-संवाद और प्रद्युम्नका शम्बरासुरके सौ पुत्रोंके साथ युद्ध जनमेजय उवाच लिये उस महान् असुरने मायासे उस बालकको हर लिया य एष भवता पूर्वं शम्बरघ्नेत्युदाहृतः । और उसे दोनों हाथोंसे ऊपर उठाये हुए वह अपने नगरमें प्रद्युम्नः स कथं जघ्ने शम्बरं तद् ब्रवीहि मे ॥ १ ॥ ले गया ॥ ५ ॥ अनपत्या तु तस्यासीद् भार्या रूपगुणान्विता । जनमेजयने पूछा—मुने ! आपने पहले जो यह नाम्ना मायावती नाम मायेव शुभदर्शना ॥ ६ ॥ बताया है कि प्रद्युम्नने शम्बरासुरका वध किया था, उस- उसकी रूप और गुणसे युक्त एक भार्या थी, जिसके के विषयमें मैं यह जानना चाहता हूँ कि प्रद्युम्नने किस कोई संतान नहीं थी । उसका नाम था मायावती, जो प्रकार शम्बरासुरका वध किया था, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥ मायाके समान ही सुन्दर दिखायी देती थी ॥ ६ ॥ वैशम्पायन उवाच ददौ तं वासुदेवस्य पुत्रं पुत्रमित्रात्मजम् । रुक्मिण्यां वासुदेवस्य लक्ष्म्यां कामो धृतव्रतः । तस्या महिष्या मायिन्या दानवः कालचोदितः ॥ ७ ॥ शम्बराान्तकरो जज्ञे प्रद्युम्नः कामदर्शनः । उस कालप्रेरित दानवने भगवान् श्रीकृष्णके उस पुत्रको सनत्कुमार इति यः पुराणे परिगीयते ॥ २ ॥ अपने पुत्रके समान मानकर अपनी उस मायावती भार्याके वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! भगवान् वासुदेवके हाथमें दे दिया ॥ ७ ॥ लक्ष्मीरूपा रुक्मिणीके गर्भसे उत्तम व्रतधारी कामदेव ही मायावती तु तं दृष्ट्वा सम्प्रहृष्टतनूरुहा । प्रद्युम्नरूपसे उत्पन्न हुए, जो कामदेवके समान ही मनोहर हर्षेण महता युक्ता पुनः पुनरुदैक्षत ॥ ८ ॥ दिखायी देते थे । उन्होंने ही शम्बरासुरका विनाश किया था। उस बालकको देखते ही मायावतीके शरीरमें हर्षजनित किन्हीं-किन्हींके मतमें जो पुराणमें सनत्कुमार कहे जाते हैं, रोमाञ्च हो आया । वह बड़े हर्षके साथ बारंबार उसकी वे ही प्रद्युम्नरूपसे प्रकट हुए थे ॥ २ ॥ ओर देखने लगी ॥ ८ ॥ तं सप्तरात्रे सम्पूर्णे निशीथे सूतिकागृहात् । अथ तस्या निरीक्षन्त्याः स्मृतिः प्रादुर्बभूव ह । जहार कृष्णस्य सुतं शिशुं वै कालशम्बरः ॥ ३ ॥ अयं स मम कान्तोऽभूत् स्मृत्वैवं चान्वचिन्तयत् ॥ ९॥ प्रद्युम्नके जन्मके पश्चात् सात रात पूर्ण हो जानेपर बालकका निरीक्षण करती हुई मायावतीके हृदयमें कालरूपी शम्बरासुरने श्रीकृष्णके उस शिशु पुत्रको आधी पूर्वकालकी स्मृति जाग उठी । 'यही तो पूर्वकालमें मेरे रातके समय सूतिकागृहसे हर लिया ॥ ३ ॥ प्रियतम पति थे' यह स्मरण करके वह इस प्रकार सोचने विदितं तस्य कृष्णस्य देवमायानुवर्तिनः । लगी—॥ ९ ॥ ततो न निगृहीतः स दानवो युद्धदुर्मदः ॥ ४ ॥ अयं स नाथो भर्ता मे यस्यार्थेऽहं दिवानिशम् । देवमायाका अनुसरण करनेवाले श्रीकृष्णको भविष्यमें चिन्ताशोकार्णवे मग्ना न विन्दामि रतिं क्वचित् ॥ १० ॥ होनेवाली सारी बातें विदित थीं, इसलिये उन्होंने उस 'ये वे ही मेरे स्वामी एवं भर्ता हैं, जिनके लिये मैं रणदुर्मद दानवको उस समय बंदी नहीं बनाया ॥ ४ ॥ दिन-रात चिन्ता और शोकके समुद्रमें डूबी रहकर कभी कहीं स मृत्युना परीतायुर्मायया संजहार तम् । भी चैन नहीं पाती हूँ ॥ १० ॥ दोर्भ्यामुत्क्षिप्य नगरं स्वं निनाय महासुरः ॥ ५ ॥ अयं भगवता पूर्वं देवदेवेन शूलिना । मृत्युने उसकी आयुपर अधिकार कर लिया था, इस खेदितेन कृतोऽनङ्गो दृष्टो जात्यन्तरे मया ॥ ११ ॥

६२८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

'प्राचीन कालमें इनके द्वारा खेदमें डाले जानेपर देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शङ्करने इन्हें अनङ्ग बना दिया था (इनके शरीरको जलाकर भस्म कर दिया था)। आज दूसरे जन्ममें इनका मुझे दर्शन हुआ है॥ ११॥

कथमस्य स्तनं दास्ये मातृभावेन जानती।
भर्तुर्भार्थ्या त्वहं भूत्वा वक्ष्ये वा पुत्र इत्युत॥ १२॥

'जब मैं इस रहस्यको जानती हूँ, तब मातृभावसे इनके मुखमें अपना स्तन कैसे दूँगी। ये मेरे पति हैं, मैं इनकी पत्नी होकर इन्हें पुत्र कैसे कहूँगी'॥ १२॥

एवं संचिन्त्य मनसा धात्र्यास्तं सा समर्पयत्।
रसायनप्रयोगैश्च शीघ्रमेव व्यवर्धयत्॥ १३॥

मन-ही-मन ऐसा सोचकर मायावतीने बालक प्रद्युम्नको एक धायके हाथमें सौंप दिया तथा रसायनके प्रयोगोंसे उन्हें शीघ्र ही बड़ा कर दिया॥ १३॥

धात्र्याः सकाशात् स च तां शृण्वन् रुक्मिणिनन्दनः।
मायावतीमविज्ञानान्मेने स्वामेव मातरम्॥ १४॥

रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न धायसे मायावतीकी प्रशंसा सुनकर उसे अनजानमें अपनी ही माता मानने लगे॥ १४॥

सा च तं वर्द्धयामास कार्ष्णिं कमललोचनम्।
मायाश्वास्मै ददौ सर्वा दानवीः काममोहिता॥ १५॥

मायावतीने कमलनयन श्रीकृष्ण-कुमारको जब बड़ा कर लिया, तब उनके प्रति कामभावसे मोहित होकर उन्हें समस्त दानवी मायाओंकी शिक्षा दे दी॥ १५॥

स यदा यौवनस्थस्तु प्रद्युम्नः कामदर्शनः।
चिकीर्षितज्ञो नारीणां सर्वास्त्रविधिपारगः॥ १६॥

प्रद्युम्न जब युवावस्थामें स्थित हुए, तब साक्षात् कामदेवके समान दिखायी देने लगे। वे स्त्रियोंके मनोभावोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण अस्त्रोंके प्रयोगमें पारंगत थे॥ १६॥

तं सा मायावती कान्तं कामयामास कामिनी।
इङ्गितैश्चापि वीक्षन्ती प्रालोभयत सस्मिता।
प्रसञ्जन्तीं तु तां देवीं बभाषे चारुहासिनीम्॥ १७॥

उस समय मायावतीने कामवती नारीकी भाँति अपने उस प्रियतम पतिकी कामना की। वह मुसकराती हुई देखने और अपने हाव-भावोंसे उन्हें लुभाने लगी। उस मनोहर हासवाली देवी मायावतीको अपने प्रति आसक्त होती देख वे इस प्रकार बोले॥ १७॥

प्रद्युम्न उवाच
मातृभावं व्यतिक्रम्य किमेवं वर्तसेऽन्यथा।
अहो दुःस्वभावासि स्त्रीत्वे चपलमानसा॥ १८॥

प्रद्युम्नने कहा—अरी! तू मातृ-भावका उल्लङ्घन करके इस तरह विपरीत बर्ताव कैसे कर रही है? अहो! तू दुःशीला जान पड़ती है। तेरा चित्त अपने स्त्रीत्वको लेकर चञ्चल हो उठा है॥ १८॥

या पुत्रभावमुत्सृज्य मयि लोभात् प्रवर्तसे।
न तु तेऽहं सुतः सौम्ये कोऽयं शीलविपर्ययः॥ १९॥

तभी तो तू मेरे प्रति पुत्रभावका परित्याग करके कामलोभसे प्रेरित हो विपरीत बर्ताव कर रही है। इससे तो जान पड़ता है, मैं तेरा पुत्र नहीं हूँ। सौम्ये! तेरे शील-स्वभावमें यह उलट-फेर कैसा?॥ १९॥

तत्त्वमिच्छाम्यहं देवि कथितं को न्वयं विधिः।
विद्युत्सम्पातचपलः स्वभावः खलु योषिताम्॥ २०॥
या नरेषु प्रसज्जन्ते नगाग्रेषु घना इव।

देवि! मैं यथार्थ बात जानना चाहता हूँ, तू ठीक-ठीक बता दे कि तेरा यह व्यवहार कैसा है? निश्चय ही नारियोंका स्वभाव विद्युतपातके समान चपल होता है। जैसे बादल पर्वत-शिखरोंसे सक्त होते हैं, उसी तरह काममोहित स्त्रियाँ सभी पुरुषोंपर आसक्त हो जाती हैं॥ २० १/२॥

यदि तेऽहं सुतः सौम्ये यदि वा नात्मजः शुभे॥ २१॥
कथितं तत्त्वमिच्छामि किमिदं ते चिकीर्षितम्।

सौम्ये! शुभे! यदि मैं तेरा पुत्र होऊँ तो वह बता दे, अथवा यदि तेरा पुत्र न भी होऊँ तो वह भी बता दे। मैं तेरे मुखसे यथार्थ बात सुनना चाहता हूँ। तू यह क्या करना चाहती है॥ २१ १/२॥

एवमुक्ता तु सा भीरुः कामेन व्यथितेन्द्रिया॥ २२॥
प्रियं प्रोवाच वचनं विविक्ते केशवात्मजम्।
न त्वं मम सुतः कान्त नापि ते शम्बरः पिता॥ २३॥

उनके इस प्रकार पूछनेपर भीरूहृदया मायावती, जिसकी सारी इन्द्रियाँ कामसे व्यथित हो उठी थीं, एकान्तमें अपने प्रियतम केशवकुमारसे इस प्रकार बोली—'प्राणवल्लभ! तुम मेरे पुत्र नहीं हो और शम्बरासुर भी तुम्हारा पिता नहीं है॥ २२-२३॥

रूपवानसि विक्रान्तस्त्वं जात्या वृष्णिनन्दन।
पुत्रस्त्वं वासुदेवस्य रुक्मिण्यानन्दवर्धनः॥ २४॥

'वृष्णिकुलनन्दन! तुम जन्मसे ही रूपवान् और पराक्रमी हो। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके पुत्र हो और माता रुक्मिणीका आनन्द बढ़ानेवाले उनके लाड़ले लाल हो॥ २४॥

दिवसे सप्तमे बालो जातमात्रोऽपवाहितः।
सूतिकागारमध्यात् त्वं शिशुरुत्तानशायितः॥ २५॥
मम भर्त्ता हतोऽसि त्वं बलवीर्यप्रवर्तिना।
पितुस्ते वासुदेवस्य धर्षयित्वा गृहं महत्॥ २६॥

'तुम्हारे जन्मके सातवें दिन जब कि तुम बालशिशुके रूपमे शय्यापर उत्तान सुलाये गये थे, मेरा भरण-पोषण करने-