विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 639, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः [ ६१७
थे तथा जिसके बाहरी दरवाजे मणि और मूँगोंके बने हुए थे॥ १५ ॥
ततः पुरुषसिंहैर्या यदुभिः सर्वतो वृता।
सर्वार्थगुणसम्पन्ना सा सभा भरतर्षभ।
शुशुभेऽभ्यधिकं शुभ्रा सिंहैर्गिरिगुहा यथा॥ १६॥
भरतभूषण ! वह शुभ सभा सब ओरसे पुरुषसिंह यादवोंद्वारा भरी हुई एवं सभी पदार्थों और गुणोंसे सम्पन्न थी। जैसे सिंहोंसे पर्वतकी गुफा सुशोभित होती है, उसी प्रकार उन यादवोंसे उस सभाकी अधिकाधिक शोभा हो रही थी॥ १६॥
रामेण सह गोविन्दः काञ्चनं महदासनम्।
उग्रसेनं पुरस्कृत्य भोजवृष्णिपुरस्कृतः॥ १७॥
राजा उग्रसेन तथा भोज और वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषोंको अपने आगे रखकर बलरामसहित भगवान् श्रीकृष्ण सुवर्णके बने हुए विशाल सिंहासनपर आसीन थे॥ १७॥
तत्रोपविष्टांस्तान् वीरान् यथाप्रीति यथावयः।
सभाभाष्य यदुश्रेष्ठानुवाच पुरुषोत्तमः ॥ १८॥
वहाँ बैठे हुए उन यदुश्रेष्ठ वीरोंको उनकी अवस्था और प्रीतिका अनुसार सम्बोधित करके पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण उनसे इस प्रकार बोले ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि सभाप्रवेशनं नाम शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें सभाप्रवेशविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०० ॥
एकाधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा यादवोंका सत्कार तथा नारदजीका यादवोंकी सभामें श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन करना
श्रीकृष्ण उवाच
भवतां पुण्यकीर्तीनां तपोबलसमाधिभिः ।
अपध्यानाच्च पापान्मा भौमः स नरको हतः ॥ १ ॥
श्रीकृष्णने कहा—यादवो ! आप सब लोग पवित्र कीर्तिवाले हैं, आपकी तपस्या, बल और एकाग्रतासे तथा आपके द्वारा किये गये अनिष्टचिन्तनसे भूमिपुत्र पापात्मा नरकासुर मारा गया ॥ १ ॥
मोक्षितं बन्धनाद् गुप्तं कन्यान्तःपुरमुत्तमम् ।
मणिपर्वतमुत्पाट्य शिखरं चैतदाहृतम् ॥ २ ॥
उसके यहाँ जो सुरक्षित कन्याओंका उत्तम अन्तःपुर था, उसे मैंने बन्धनसे मुक्त किया तथा मणिपर्वतके इस शिखरको उखाड़कर भी मैं यहाँ साथ लेता आया हूँ ॥ २॥
अयं धनौघः सुमहान् किङ्करैर्गृहतो मम।
ईशा भवन्तो द्रव्यस्य तानुक्त्वा विरराम ह ॥ ३ ॥
किङ्कर नामक राक्षसों ने जिसे मेरे यहाँ पहुँचाया है, वही यह महान् धनराशि आपलोगोंके समक्ष है। आप सभी इस धनके स्वामी हैं। उनसे ऐसा कहकर भगवान् चुप हो गये ॥ ३ ॥
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य भोजवृष्ण्यन्धका वचः ।
जहृषुर्हृष्टरोमाणः पूजयन्तो जनार्दनम् ॥ ४ ॥
ऊचुश्चैनं नृवीरास्ते कृताञ्जलिपुटास्ततः।
भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर भोज, वृष्णि और अन्धक-वंशके लोग हर्षमें भर गये । उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे नरवीर भगवान् श्रीकृष्णकी प्रशंसा करते हुए उनसे हाथ जोड़कर बोले—॥ ४॥
नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि देवकिनन्दने ॥ ५ ॥
यत्कृत्वा दुष्करं कर्म देवैरपि दुरासदम्।
लालयेः स्वजनान् भोगै रत्नैश्र्व स्वयमर्जितैः ॥ ६ ॥
'महाबाहो ! आप देवकीनन्दनमें ऐसी उदारताका होना आश्चर्यकी बात नहीं है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है ऐसा दुष्कर कर्म करके आप अपने ही द्वारा उपार्जित रत्नों और भोगोंसे हम स्वजनोंका लालन करते हैं' ॥ ५-६ ॥
ततः सर्वदशार्हाणामाहुकस्य च याः स्त्रियः ।
प्रीयमाणाः समाजग्मुर्वासुदेवदिदृक्षया ॥ ७ ॥
तदनन्तर सब दशार्हकुलकी स्त्रियाँ तथा राजा उग्रसेनकी रानियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान् वासुदेवको देखनेके लिये आयीं ॥ ७ ॥
देवकीसप्तमा देव्यो रोहिणी च शुभानना।
ददृशुः कृष्णमासीनं रामं चैव महाभुजम् ॥ ८ ॥
वसुदेवकी सहदेवा आदि सात देवियाँ, जिनमे सातवीं देवकी थीं और सुन्दर मुखवाली रोहिणी देवी इन सबने वहाँ सिंहासनपर बैठे हुए श्रीकृष्ण तथा महाबाहु बलरामका दर्शन किया ॥ ८ ॥
तौ तु पूर्वमतिक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च ।
अभिवादयतां देवीं देवकीं रामकेशवौ ॥ ९ ॥
बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाइयोंने पहले औरोंको छोड़कर रोहिणीको प्रणाम करनेके अनन्तर देवी देवकीका अभिवादन किया ॥ ९ ॥
१. सहदेवा, शान्तिदेवा, श्रोदेवा, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी और देवकी—ये सात देवककी पुत्रियाँ थीं, जो क्रमशः वसुदेवको ही बिवाही गयी थीं ।