विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
विष्णुपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः [ ६१७
थे तथा जिसके बाहरी दरवाजे मणि और मूँगोंके बने हुए थे॥ १५ ॥
ततः पुरुषसिंहैर्या यदुभिः सर्वतो वृता।
सर्वार्थगुणसम्पन्ना सा सभा भरतर्षभ।
शुशुभेऽभ्यधिकं शुभ्रा सिंहैर्गिरिगुहा यथा॥ १६॥
भरतभूषण ! वह शुभ सभा सब ओरसे पुरुषसिंह यादवोंद्वारा भरी हुई एवं सभी पदार्थों और गुणोंसे सम्पन्न थी। जैसे सिंहोंसे पर्वतकी गुफा सुशोभित होती है, उसी प्रकार उन यादवोंसे उस सभाकी अधिकाधिक शोभा हो रही थी॥ १६॥
रामेण सह गोविन्दः काञ्चनं महदासनम्।
उग्रसेनं पुरस्कृत्य भोजवृष्णिपुरस्कृतः॥ १७॥
राजा उग्रसेन तथा भोज और वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषोंको अपने आगे रखकर बलरामसहित भगवान् श्रीकृष्ण सुवर्णके बने हुए विशाल सिंहासनपर आसीन थे॥ १७॥
तत्रोपविष्टांस्तान् वीरान् यथाप्रीति यथावयः।
सभाभाष्य यदुश्रेष्ठानुवाच पुरुषोत्तमः ॥ १८॥
वहाँ बैठे हुए उन यदुश्रेष्ठ वीरोंको उनकी अवस्था और प्रीतिका अनुसार सम्बोधित करके पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण उनसे इस प्रकार बोले ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि सभाप्रवेशनं नाम शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें सभाप्रवेशविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०० ॥
एकाधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा यादवोंका सत्कार तथा नारदजीका यादवोंकी सभामें श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन करना
श्रीकृष्ण उवाच
भवतां पुण्यकीर्तीनां तपोबलसमाधिभिः ।
अपध्यानाच्च पापान्मा भौमः स नरको हतः ॥ १ ॥
श्रीकृष्णने कहा—यादवो ! आप सब लोग पवित्र कीर्तिवाले हैं, आपकी तपस्या, बल और एकाग्रतासे तथा आपके द्वारा किये गये अनिष्टचिन्तनसे भूमिपुत्र पापात्मा नरकासुर मारा गया ॥ १ ॥
मोक्षितं बन्धनाद् गुप्तं कन्यान्तःपुरमुत्तमम् ।
मणिपर्वतमुत्पाट्य शिखरं चैतदाहृतम् ॥ २ ॥
उसके यहाँ जो सुरक्षित कन्याओंका उत्तम अन्तःपुर था, उसे मैंने बन्धनसे मुक्त किया तथा मणिपर्वतके इस शिखरको उखाड़कर भी मैं यहाँ साथ लेता आया हूँ ॥ २॥
अयं धनौघः सुमहान् किङ्करैर्गृहतो मम।
ईशा भवन्तो द्रव्यस्य तानुक्त्वा विरराम ह ॥ ३ ॥
किङ्कर नामक राक्षसों ने जिसे मेरे यहाँ पहुँचाया है, वही यह महान् धनराशि आपलोगोंके समक्ष है। आप सभी इस धनके स्वामी हैं। उनसे ऐसा कहकर भगवान् चुप हो गये ॥ ३ ॥
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य भोजवृष्ण्यन्धका वचः ।
जहृषुर्हृष्टरोमाणः पूजयन्तो जनार्दनम् ॥ ४ ॥
ऊचुश्चैनं नृवीरास्ते कृताञ्जलिपुटास्ततः।
भगवान् वासुदेवका यह वचन सुनकर भोज, वृष्णि और अन्धक-वंशके लोग हर्षमें भर गये । उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे नरवीर भगवान् श्रीकृष्णकी प्रशंसा करते हुए उनसे हाथ जोड़कर बोले—॥ ४॥
नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि देवकिनन्दने ॥ ५ ॥
यत्कृत्वा दुष्करं कर्म देवैरपि दुरासदम्।
लालयेः स्वजनान् भोगै रत्नैश्र्व स्वयमर्जितैः ॥ ६ ॥
'महाबाहो ! आप देवकीनन्दनमें ऐसी उदारताका होना आश्चर्यकी बात नहीं है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है ऐसा दुष्कर कर्म करके आप अपने ही द्वारा उपार्जित रत्नों और भोगोंसे हम स्वजनोंका लालन करते हैं' ॥ ५-६ ॥
ततः सर्वदशार्हाणामाहुकस्य च याः स्त्रियः ।
प्रीयमाणाः समाजग्मुर्वासुदेवदिदृक्षया ॥ ७ ॥
तदनन्तर सब दशार्हकुलकी स्त्रियाँ तथा राजा उग्रसेनकी रानियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान् वासुदेवको देखनेके लिये आयीं ॥ ७ ॥
देवकीसप्तमा देव्यो रोहिणी च शुभानना।
ददृशुः कृष्णमासीनं रामं चैव महाभुजम् ॥ ८ ॥
वसुदेवकी सहदेवा आदि सात देवियाँ, जिनमे सातवीं देवकी थीं और सुन्दर मुखवाली रोहिणी देवी इन सबने वहाँ सिंहासनपर बैठे हुए श्रीकृष्ण तथा महाबाहु बलरामका दर्शन किया ॥ ८ ॥
तौ तु पूर्वमतिक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च ।
अभिवादयतां देवीं देवकीं रामकेशवौ ॥ ९ ॥
बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाइयोंने पहले औरोंको छोड़कर रोहिणीको प्रणाम करनेके अनन्तर देवी देवकीका अभिवादन किया ॥ ९ ॥
१. सहदेवा, शान्तिदेवा, श्रोदेवा, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी और देवकी—ये सात देवककी पुत्रियाँ थीं, जो क्रमशः वसुदेवको ही बिवाही गयी थीं ।
६१८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभेऽम्बिका।
अदितिर्देवमातेव मित्रेण वरुणेन च ॥ १०॥
माता देवकी वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले उन दोनों पुत्रोंके साथ उसी प्रकार शोभा पाने लगी, जैसे मित्र और वरुणके साथ देवमाता अदिति सुशोभित होती हैं ॥ १०॥
ततः प्राप्ता नराग्र्यौ तु तस्याः सा दुहिता तदा।
एकानंशेति यामाहुर्नरा वै कामरूपिणीम् ॥ ११॥
उसी समय उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंके पास यशोदाजीकी वह पुत्री आ पहुँची, जिसे लोग इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एकानंशा कहते हैं ॥ ११॥
तथा क्षणमुहूर्ताभ्यां यथा जज्ञे सुरेश्वरः।
यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तमः ॥ १२॥
जिसके दिये हुए संकेत और मुहूर्तके अनुसार देवेश्वर श्रीहरिका प्रादुर्भाव हुआ था और जिसके ही कारण पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सेवकोंसहित कंसका वध कर डाला था ॥
सा कन्या ववृधे तत्र वृष्णिसद्मनि पूजिता।
पुत्रवत् पाल्यमाना वै वसुदेवाज्ञया तदा ॥ १३॥
वह कन्या वृष्णिवंशियोंके घरमें बड़े आदर-सत्कारके साथ पल रही थी। भगवान् वसुदेवकी आज्ञासे उस समय उसका पुत्रकी भाँति पालन किया जाता था ॥ १३॥
एकानंशेति यामाहुरुत्पन्नां मानवा भुवि।
योगकन्यां दुराधर्षां रक्षार्थं केशवस्य ह ॥ १४॥
श्रीकृष्णकी रक्षाके लिये भूतलपर उत्पन्न हुई उस दुर्धर्ष योगकन्याको मनुष्य एकानंशा कहते हैं ॥ १४॥
यां वै सर्वे सुमनसः पूजयन्ति स्म यादवाः।
देववद् दिव्यपुरुषः कृष्णः संरक्षितो यया ॥ १५॥
समस्त यादव प्रसन्न चित्तसे उस देवीकी पूजा करते हैं, जिसने देवतुल्य दिव्य पुरुष श्रीकृष्णकी रक्षा की थी ॥१५॥
तां च तत्रोपसंगम्य प्रियामिव सखीं स्वसाम्।
दक्षिणेन कराग्रेण परिजग्राह माधवः ॥ १६॥
वहाँ अपनी प्रिय सखीकी भाँति उस बहिनसे मिलकर श्रीकृष्णने दाहिने हाथसे उसका हाथ अपने हाथमें ले लिया ॥
तथैव रामोऽतिबलः सम्परिष्वज्य भामिनीम्।
मूर्द्ध्र्युपाघ्राय सव्येन प्रतिजग्राह पाणिना ॥ १७॥
उसी प्रकार अत्यन्त बलशाली बलरामजीने उस भामिनी बहिनको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघा और बायें हाथसे उसका हाथ पकड़ लिया ॥ १७ ॥
ददृशुस्ताः स्त्रियो मध्ये भगिनीं रामकृष्णयोः।
रुक्मपद्मव्यग्रकरां श्रियं पद्मालयामिव ॥ १८॥
बलराम और श्रीकृष्णके बीचमें खड़ी हुई उनकी उस बहिनको सभी स्त्रियोंने देखा। वह सुवर्णमय कमल हाथमें लिये हुए कमलालया लक्ष्मीकी भाँति सुशोभित होती थी ॥
तथाक्षतमहावृष्ट्या पुष्पैश्च विविधैः शुभैः।
अवकीर्य च लाजैस्ताः स्त्रियो जग्मुर्यथालयम् ॥ १९॥
वे स्त्रियाँ अक्षतोंकी बड़ी भारी वर्षा करके नाना प्रकारके माङ्गलिक पुष्प और खील बिखेर कर अपने अपने घरको चली गयीं ॥ १९ ॥
ततस्ते यादवाः सर्वे पूजयन्तो जनार्दनम्।
उपोपविविशुः प्रीताः प्रशंसन्तोऽद्भुतं कृतम् ॥ २०॥
तदनन्तर वे समस्त यादव श्रीकृष्णकी पूजा तथा उनके अद्भुत कर्मकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक उनके पास बैठ गये ॥ २० ॥
पूज्यमानो महाबाहुः पौराणां रतिवर्धनः।
विरराज महाकीर्तिर्देवैरिव स तैः सह ॥ २१॥
महान् कीर्तिशाली महाबाहु श्रीकृष्ण पुरवासियोंका प्रेम बढ़ाते हुए उनसे पूजित हो देवताओंके साथ इन्द्रकी भाँति उन सबके साथ विशेष शोभा पाने लगे ॥ २१ ॥
समासीनेषु सर्वेषु यादवेषु जनार्दनम्।
नियोगात् त्रिदशेन्द्रस्य नारदोऽभ्यागमत् सभाम् ॥ २२॥
जब समस्त यादव बैठ गये, उस समय इन्द्रकी आज्ञासे देवर्षि नारदजी उस सभामें श्रीकृष्णके पास आये ॥ २२ ॥
सोऽथ सम्पूजितः पूज्यः शूरैस्तैर्यदुपुङ्गवैः।
करं संस्पृश्य स हरेर्निवेश परमासने ॥ २३॥
पूज्य देवर्षि नारद उन यादवशिरोमणि शूर-वीरोंसे भलीभाँति पूजित हो भगवान् श्रीकृष्णका हाथ पकड़कर उत्तम आसनपर विराजमान हुए ॥ २३ ॥
सुखोपविष्टस्तान् वृष्णीनुपविष्टानुवाच ह।
सम्प्राप्तं शक्रवचनाज्जानीध्वं मां नरर्षभाः ॥ २४॥
स्वयं सुखपूर्वक बैठ जानेपर वहाँ बैठे हुए उन वृष्णिवंशियोंसे वे इस प्रकार बोले—'नरश्रेष्ठ यादवो! तुम यह समझ लो, मैं इन्द्रकी आज्ञासे यहाँ आया हूँ ॥ २४ ॥
शृणुध्वं राजशार्दूलाः कृष्णस्यास्य पराक्रमम्।
यानि कर्माणि कृतवान् बाल्यात्प्रभृति केशवः ॥ २५॥
'राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी वीरो ! श्रीकृष्णने बचपनसे लेकर अबतक जो-जो कर्म किये हैं, उनके उस पराक्रमका वर्णन सुनो ॥ २५ ॥
उग्रसेनसुतः कंसः सर्वान् निर्मथ्य यादवान्।
राज्यं जग्राह दुर्बुद्धिर्बद्ध्वा पितरमाहुकम् ॥ २६॥
'उग्रसेनके दुर्बुद्धि पुत्र कंसने अपने पिताको कैद करके
विष्णुपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः ६१९
समस्त यादवोंको रौंदकर मथुराका राज्य अपने अधिकारमें कर लिया था॥ २६॥
समाश्रित्य जरासंधं श्वशुरं कुलपांसनः।
भोजवृष्ण्यन्धकान् सर्वानवमन्यत दुर्मतिः॥ २७॥
'खोटी बुद्धिवाला वह कुलाङ्गार अपने श्वशुर जरासंधका आश्रय ले भोज, वृष्णि और अन्धक वंशके सब लोगोंका अपमान करता था॥ २७॥
ज्ञातिकार्यं चिकीर्षंस्तु वसुदेवः प्रतापवान्।
उग्रसेनस्य रक्षार्थं स्वपुत्रं पर्य्यरक्षत ॥ २८॥
'उस समय भाई-बन्धुओंका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे और उग्रसेनकी रक्षा करनेके लिये प्रतापी वसुदेवने अपने पुत्र श्रीकृष्णकी कंससे रक्षा की॥ २८॥
स गोपैः सह धर्मात्मा मथुरोपवने स्थितः।
अत्यद्भुतानि कर्माणि कृतवान् मधुसूदनः ॥ २९॥
'वसुदेवका वह पुत्र यह धर्मात्मा मधुसूदन ही हैं, जो मथुराके निकटवर्ती वनमे गोपोंके साथ रहे हैं और वहाँ इन्होंने बड़े अद्भुत कर्म किये हैं॥ २९॥
प्रत्यक्षं शूरसेनानां श्रूयते महदद्भुतम्।
उत्त्तानेन शयानेन शकटान्तरचारिणा ॥ ३०॥
राक्षसी निहता रौद्रा शकुनीवेषधारिणी।
पूतना नाम घोरा सा महाकाया महाबला ॥ ३१॥
'वहाँ इनके विषयमें एक बड़ी अद्भुत बात सुनी जाती है, जिसे शूरसेनवासियोंने प्रत्यक्ष देखा है। ये बाल्यावस्थामें छकड़ेके नीचे एक खाटपर उत्तान सोये थे। उस समय वहाँ पक्षीका वेश धारण करके रहनेवाली एक महाबलशालिनी विशालकाया घोर एवं भयानक राक्षसी पूतना इनके द्वारा मारी गयी॥ ३०-३१॥
विषदिग्धं स्तनं रौद्रं प्रयच्छन्ती जनार्दने।
ददृशुर्निहतां तां ते राक्षसीं वनगोचराः ॥ ३२॥
'वह जनार्दन श्रीकृष्णको अपना विषसे लिप्त भयानक स्तन पिलाना चाहती थी। वहाँ इनके द्वारा मारी गयी उस राक्षसीको वनवासी गोपोंने प्रत्यक्ष देखा था ॥ ३२॥
पुनर्जातोऽयमित्याहुरुक्तस्तस्मादधोक्षजः ।
अत्यद्भुतमिदं चासीद् यच्छिशुः पुरुषोत्तमः ॥ ३३॥
पादाङ्गुष्ठेन शकटं क्रीडमानो व्यलोडयत्।
'उस समय वे कहने लगे, इस बालकका पुनर्जन्म हुआ है—इसने अक्ष (गाड़ी) के अधः (नीचे) फिर जन्म पाया है। उनके ऐसा कहनेसे ये बालकृष्ण अधोक्षज नामसे प्रसिद्ध हुए। यह भी बड़ी अद्भुत बात हुई कि शैशवावस्थामे खेलते हुए इन पुरुषोत्तमने पैरके अँगूठेसे धक्का देकर छकड़ेको उलट दिया ॥ ३३$\frac{१}{२}$ ॥
दाम्ना चोलूखले बद्धो विप्रकुर्वन् कुमारकम् ॥ ३४॥
बभञ्जार्जुनवृक्षौ द्वौ ख्यातो दामोदरस्तदा ।
'कुमारावस्थाकी लीला करते हुए इन्हें एक दिन मैयाने रस्सीसे ओखलीमें बाँध दिया। उसी अवस्थामें उस ओखलीको घसीटते हुए इन्होंने दो अर्जुन वृक्षोंको तोड़ डाला, उस समय दाम (रस्सी) से उदरमे बँधनेके कारण यह दामोदर नामसे विख्यात हुए ॥ ३४$\frac{१}{२}$ ॥
कालियश्च महानागो दुराधर्षो महाबलः ॥ ३५॥
क्रीडता वासुदेवेन निर्जितो यमुनाह्रदे।
'यमुनाजीके कुण्डमें निवास करनेवाले दुर्धर्ष एवं महाबली महानाग कालियको इन भगवान् वासुदेवने खेल-खेलमें ही पराजित कर दिया ॥ ३५$\frac{१}{२}$ ॥
अक्रूरस्य समक्षं च यन्नागभवने विभुः ॥ ३६॥
पूज्यमानं तदा नागैर्दिव्यं वपुरधारयत्।
'इन भगवान् श्रीहरिने उस दिन अक्रूरकी आँखोंके सामने नागभवनमें नागोंद्वारा पूजित होनेवाले अपने दिव्य रूपको धारण किया था ॥ ३६$\frac{१}{२}$ ॥
शीतवातादिता गाश्च दृष्ट्वा कृष्णेन धीमता ॥ ३७॥
धृतो गोवर्धनः शैलः सप्तरात्रं महात्मना।
शिशुना वासुदेवेन गवां त्राणार्थमिच्छताम् ॥ ३८॥
'बुद्धिमान् वसुदेवपुत्र महात्मा श्रीकृष्ण सरदी और हवासे गौओंको कष्ट पाते देख अपनी रक्षा चाहनेवाली उन गौओंके प्राण बचानेके लिये बाल्यावस्थामें ही लगातार सात रातोंतक गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठाये रहे ॥ ३७-३८॥
तथोक्षदुष्टोऽतिबलो महाकायो नरान्तकृत्।
गोपतिर्वासुदेवेन हतोऽरिष्टो महासुरः ॥ ३९॥
'उसी प्रकार मनुष्योंका अन्त करनेवाला एक अत्यन्त बलशाली, महाकाय, महान् असुर अरिष्ट, जो साँड़के रूपमें रहता था और साँड़ोंमे सबसे अधिक दुष्ट था, भगवान् वासुदेवके हाथसे मारा गया ॥ ३९॥
धेनुकः स महाकायो दानवः सुमहाबलः।
निहतो वासुदेवेन गवां त्राणाय दुर्मतिः ॥ ४०॥
'वह महाबली और विशालकाय दानव दुर्बुद्धि धेनुक भी गौओंकी रक्षाके लिये ही वसुदेवनन्दन बलरामके हाथसे मारा गया ॥ ४०॥
सुनामानममित्रघ्नः सर्वसैन्यपुरस्कृतम्।
वृकैर्विद्रावयामास ग्रहीतुं समुपस्थितम् ॥ ४१॥
'शत्रुओंका नाश करनेवाले श्रीकृष्णने समस्त सेनाओंके साथ आये हुए सुनामाको, जो इन्हें कैद करनेके लिये उपस्थित हुआ था, भेड़ियोंद्वारा मार भगाया ॥ ४१॥
६२० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
रौहिणेयेन संगम्य वने विचरता पुनः।
गोपवेषधरेणैव कंसस्य भयमाहितम् ॥ ४२ ॥
'एक समय रोहिणीनन्दन बलरामजीके साथ मिलकर वनमें विचरते हुए गोपवेशधारी श्रीकृष्णने पुनः एक महाबली दैत्यका वध करके कंसको भयभीत कर दिया ॥ ४२ ॥
तथा व्रजगतः शौरिर्दृष्ट्वा युद्धबलं हयम्।
प्रग्रहं भोजराजस्य जघान पुरुषोत्तमः ॥ ४३ ॥
'व्रजमें रहते हुए वसुदेवनन्दन पुरुषोत्तम श्रीहरिने भोजराज कंसके परिचारक अश्वरूपधारी दैत्यको, जिसका युद्ध ही बल था, अपने सामने उपस्थित देख मार डाला ॥ ४३ ॥
प्रलम्बश्च महाकायो रौहिणेयेन धीमता ।
दानवो मुष्टिनैकेन कंसामात्यो निपातितः ॥ ४४ ॥
'बुद्धिमान् रोहिणीनन्दन बलरामने कंसके मन्त्री महाकाय दानव प्रलम्बको एक ही मुक्केसे मार गिराया ॥ ४४ ॥
एतौ हि वसुदेवस्य पुत्रौ सुरसुतोपमौ ।
ववृधाते महावीर्यौ ब्रह्मगार्ग्येण संस्कृतौ ॥ ४५ ॥
'व्रजमें वसुदेवके ये दोनों महापराक्रमी पुत्र जो देवकुमारोंके समान तेजस्वी थे, ब्रह्मगार्ग्यके द्वारा क्षत्रियोचित संस्कारोंसे सम्पन्न हो दिनोंदिन बढ़ते रहे ॥ ४५ ॥
जन्मप्रभृति चाप्येतौ गार्ग्येण परमर्षिणा ।
याथातथ्येन विज्ञाप्य संस्कारं प्रतिपादितौ ॥ ४६ ॥
'महर्षि गार्ग्यने जन्मसे ही लेकर इन दोनोंके सभी संस्कार समय-समयपर स्वयं ही सूचित करके यथार्थरूपसे सम्पन्न किये हैं ॥ ४६ ॥
यदा त्विमौ नरश्रेष्ठौ स्थितौ यौवनसम्मुखे ।
सिंहशावाविवोदीर्णौ मत्तौ हैमवतौ यथा ॥ ४७ ॥
'जब ये नरश्रेष्ठ यौवनके सामने उपस्थित हुए, तब दो उद्धत सिंहशावकों तथा हिमालयके दो मतवाले हाथियोंके समान सुशोभित होने लगे ॥ ४७ ॥
ततो मनांसि गोपीनां हरमाणौ महाबलौ ।
आस्तां गोष्ठवरौ वीरौ देवपुत्रोपमद्युती ॥ ४८ ॥
'फिर तो देवपुत्रोंके समान कान्तिमान् ये दोनों महाबली वीर गोपियोंके चित्त चुराते हुए व्रजके प्रमुख व्यक्ति हो गये ॥ ४८ ॥
एतौ जये वा युद्धे वा क्रीडासु विविधासु च ।
नन्दगोपस्य गोपाला न शेकुः प्रसमीक्षितुम् ॥ ४९ ॥
'विजयमें, युद्धमें अथवा भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाओंमें व्रजके दूसरे-दूसरे ग्वाले नन्दगोपके इन दोनों पुत्रोंकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते थे (समता करना तो दूरकी बात है) ॥ ४९ ॥
व्यूढोरस्कौ महाबाहू शालस्कन्धाविवोद्गतौ।
श्रुत्वासौ व्यथितः कंसो मन्त्रिभिः सहितोऽभवत् ५०
'इनकी छाती चौड़ी है, भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं तथा ये साखूके तनेकी भाँति मोटे और ऊँचे कदके हैं, यह सुनकर कंस अपने मन्त्रियोंसहित व्यथित हो उठा था ॥ ५० ॥
नाशकच्च यदा कंसो ग्रहीतुं बलकेशवौ ।
निजग्राह ततः क्रोधाद् वसुदेवं सबान्धवम् ॥ ५१ ॥
सहोग्रसेनेन तदा चोरवद् गाढबन्धनम् ।
कालं महान्तमनयत् कृच्छ्रमानकदुन्दुभिः ॥ ५२ ॥
'जब बलराम और श्रीकृष्णको कंस किसी तरह पकड़ न सका, तब क्रोधमें आकर उसने उग्रसेन और बन्धु-बान्धवों-सहित वसुदेवको कैद कर लिया और चोरकी भाँति उन्हें सुदृढ़ बन्धनमें डाल दिया। उन दिनों वसुदेवजीने दीर्घकाल-तक बड़े भारी कष्टका सामना किया ॥ ५१-५२ ॥
कंसस्तु पितरं बद्ध्वा शूरसेनाञ्छशास ह।
जरासंधं समाश्रित्य तथैवाहुतिभीमकौ ॥ ५३ ॥
'पिताको कैद करके कंस जरासंध, आहुति और भीष्मकका सहारा ले शूरसेन देशका शासन करने लगा ५३॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य मथुरायां महोत्सवम् ।
पिनाकिनं समुद्दिश्य चक्रे कंसो नराधिपः ॥ ५४ ॥
'किसी समय मथुरामें राजा कंसने पिनाकधारी भगवान् शङ्करकी प्रसन्नताके लिये एक बड़ा भारी उत्सव किया ॥ ५४ ॥
तत्र मल्लाः समाजग्मुर्नानादेश्या विशांपते।
नर्तना गायनाश्चैव कुशला नृत्यकर्मसु ॥ ५५ ॥
'प्रजानाथ उग्रसेन ! उस उत्सवमें अनेक देशोंके मल्ल तथा नृत्यकर्ममें कुशल बहुत-से नर्तक और गायक आये थे ॥ ५५ ॥
ततः कंसो महातेजा रङ्गवाटं महाधनम् ।
कुशलैः कारयामास शिल्पिभिः साधुनिष्ठितैः ॥ ५६ ॥
'उस समय महातेजस्वी कंसने शिल्पकर्ममें कुशल अच्छे-अच्छे शिल्पियोंद्वारा एक रङ्गशाला बनवायी, जिसमें बहुत धन खर्च किया गया था ॥ ५६ ॥
तत्र मञ्चसहस्राणि पौरजानपदैर्जनैः ।
समाकीर्णानि दृश्यन्ते ज्योतींषि गगने यथा ॥ ५७ ॥
'वहाँ हजारों मञ्च रखे गये थे, जो नगर और जनपदके लोगोंसे भरे-पूरे दिखायी देते थे। वे आकाशमें फैले हुए नक्षत्रोंके समान दृष्टिगोचर होते थे ॥ ५७ ॥
भोजराजः श्रिया जुष्टं रङ्गवाटं महर्द्धिमत् ।
आरुरोह ततः कंसो विमानं सुकृती यथा ॥ ५८ ॥
'तदनन्तर भोजराज कंस अनुपम शोभासे युक्त बहुमूल्य रङ्गमञ्चपर आरूढ़ हुआ, मानो कोई पुण्यात्मा पुरुष विमानपर चढ़ा हो ॥ ५८ ॥
विष्णुपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः ६२१
रङ्गद्वारे गजं मत्तं प्रभूतायुधकल्पितम्।
शूरैरधिष्ठितं कंसः स्थापयामास वीर्यवान् ॥ ५९ ॥
'पराक्रमी कंसने रङ्गशालाके द्वारपर शूरवीर महावतोंसे युक्त एक मतवाले हाथीको खड़ा करा रखा था, जो बहुसंख्यक अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित था ॥ ५९ ॥
यदा हि स महातेजा रामकृष्णौ समागतौ ।
शुश्राव पुरुषव्याघ्रौ सूर्याचन्द्रमसाविव ॥ ६० ॥
तदाप्रभृति यत्नोऽभूद् रक्षां प्रति नराधिप ।
न च शिश्ये सुखं रात्रौ रामकृष्णौ विचिन्तयन् ॥ ६१॥
'नरेश्वर ! महातेजस्वी कंसने जब सुना कि सूर्य और चन्द्रमाके समान दोनों भाई पुरुषसिंह बलराम और श्रीकृष्ण मथुरामें आ गये हैं, तबसे वह अपनी रक्षाके लिये विशेष प्रयत्नशील हो गया। बलराम और श्रीकृष्णका ही चिन्तन करता हुआ वह रातमे सुखकी नींद सो न सका ॥ ६०-६१॥
श्रुत्वा तु रामः कृष्णश्च तं समाजमनुत्तमम् ।
उभौ विविशतुर्वीरौ शार्दूलौ गोव्रजं यथा ॥ ६२ ॥
'बलराम और श्रीकृष्ण दोनों वीर उस परम उत्तम समाज (उत्सव) का समाचार सुनकर उस रङ्गशालामें उसी प्रकार प्रवेश करने लगे, जैसे दो व्याघ्र गौओंके व्रजमें घुस रहे हों ॥ ६२ ॥
ततः प्रवेशे संरुद्धौ रक्षिभिः पुरुषर्षभौ ।
हत्वा कुवलयापीडं ससादिनमरिंदमौ ।
अवमृद्य दुराधर्षौ रङ्गं विविशतुस्तदा ॥ ६३ ॥
'उसमें प्रवेश करते समय रक्षकोंने उन दोनों पुरुषप्रवर बन्धुओंको रोक दिया, तब उन दोनों दुर्जय शत्रुदमन बन्धुओंने सवारोंसहित कुवलयापीड़ हाथीको मारकर मिट्टीमें मिला दिया, फिर वे रङ्गशालामें घुस गये ॥ ६३ ॥
चाणूरान्ध्रौ विनिष्पिष्य केशवेन बलेन च ।
औग्रसेनिः सुदुष्टात्मा सानुजो विनिपातितः ॥ ६४ ॥
'श्रीकृष्ण और बलरामने चाणूर तथा आन्ध्रका कचूमर निकालकर उग्रसेनके दुष्टात्मा पुत्र कंसको भाइयोंसहित मार गिराया ॥ ६४ ॥
यत् कृतं यदुसिंहेन देवैरपि सुदुष्करम् ।
कर्म तत् केशवादन्यः कर्तुमर्हति कः पुमान् ॥ ६५ ॥
'जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुष्कर है, ऐसा जो-जो कर्म यदुकुलसिंह श्रीकृष्णने किया, उसे इनके सिवा दूसरा कौन पुरुष कर सकता है ॥ ६५ ॥
यद्धि नाधिगतं पूर्वैः प्रह्लादबलिशम्बरैः ।
तदिदं प्रापितं वित्तं शौरिणा भवतां कृते ॥ ६६ ॥
'पहलेके प्रह्लाद, बलि और शम्बर आदि नरेशोंने जिसे नहीं पाया था, वही यह अनन्त धन श्रीकृष्णने तुमलोगोंके लिये यहाँ ला दिया है ॥ ६६ ॥
एतेन मुरुमाक्रम्य दैत्यं पञ्चजनं तथा ।
निष्क्रम्य शैलसंघातान्निसुन्दः सगणो हतः ॥ ६७ ॥
'इन्होंने मुरु तथा पञ्चजन नामक दैत्यपर आक्रमण करके शैलसमूहोंको पारकर निसुन्द नामक दैत्यको उसके गणोंसहित मार डाला ॥ ६७ ॥
नरकश्च हतो भौमः कुण्डले चाहृते शुभे ।
प्राप्तं च दिवि देवेषु केशवेन महद्यशः ॥ ६८ ॥
'भूमिपुत्र नरकको भी मौतके घाट उतार दिया । उसके यहाँ अदितिके जो दोनों सुन्दर कुण्डल थे, उनको वापिस ले लिया। इस प्रकार केशवने देवलोक तथा देवताओंमें महान् यश प्राप्त किया ॥ ६८ ॥
वीतशोकभयाबाधाः कृष्णबाहुबलाश्रयाः ।
यजध्वं विविधैर्यज्ञैर्यदावा वीतमत्सराः ॥ ६९ ॥
'यादवो ! अब तुमलोग श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय ले शोक, भय और बाधाओंसे रहित हो ईर्ष्या-द्वेषका त्याग करके नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करो ॥ ६९ ॥
देवानां सुमहत् कार्यं कृतं कृष्णेन धीमता ।
प्रियमावेदयाम्येष भवतां भद्रमस्तु वः ॥ ७० ॥
'बुद्धिमान् श्रीकृष्णने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया है। मैं तुमलोगोंको यह प्रिय निवेदन करता हूँ, तुम सब लोगोंका भला हो ॥ ७० ॥
यदिष्टं वो यदुश्रेष्ठाः कर्तास्मि तदतन्द्रितः ।
भवतामस्मि यूयं च मम युष्मास्वहं स्थितः ॥ ७१ ॥
'यदुवरो ! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह कार्य मैं आलस्य-रहित होकर करूँगा। मैं तुम्हारा हूँ और तुम मेरे। मैं तुममें ही स्थित हूँ ॥ ७१ ॥
इति सम्बोधयन् कृष्णमब्रवीत् पाकशासनः ।
स मां प्रैषीत् सुरश्रेष्ठः प्रीतस्तुष्टास्तथा वयम् ॥ ७२ ॥
'इस प्रकार तुम सबको श्रीकृष्णकी महिमा समझाते हुए पाकशासन इन्द्रने उपर्युक्त बातें कही हैं। उन्हीं सुरश्रेष्ठने प्रसन्न होकर मुझे यहाँ भेजा है। इससे हम भी संतुष्ट हुए हैं ॥७२॥
यत्र धीः श्रीः स्थिता तत्र यत्र श्रीस्तत्र संनतिः ।
संनतिर्धीस्तथा श्रीश्च नित्यं कृष्णे महात्मनि ॥ ७३ ॥
'जहाँ बुद्धि है, वहाँ श्री विद्यमान है। जहाँ श्री है, वहाँ संनति (विनय) है। महात्मा श्रीकृष्णमें विनय, बुद्धि और श्री-ये तीनों नित्य विद्यमान हैं' ॥ ७३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नारदवाक्यं नामैकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नारदजीका वाक्यविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥
६२२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
द्व्यधिकशततमोऽध्यायः
नारदजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णके अद्भुत कर्मोंका वर्णन
नारद उवाच
सादिता मौरवाः पाशा निसुन्दनरकौ हतौ।
कृतः क्षेम्यः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं—यादवो ! भगवान् श्रीकृष्णने मुर दैत्यके पाश काट डाले, निसुन्द और नरकासुरको मार डाला तथा प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सब लोगोंके लिये क्षेममय-निष्कण्टक बना दिया ॥ १ ॥
शौरिणा पृथिवीपालास्त्रासिताः स्पर्द्धिनो रणे।
धनुषश्च निनादेन पाञ्चजन्यस्वनेन च ॥ २ ॥
शूरनन्दन श्रीकृष्णने अपने धनुषकी टंकार और पाञ्चजन्य शङ्खके हुंकारसे उन समस्त भूपालोंको आतङ्कित कर दिया, जो युद्धमें उनके साथ स्पर्धा रखते थे ॥ २ ॥
मेघप्रख्यै रथानीकैर्दाक्षिणात्यैः सुरक्षितम्।
रुक्मिणं युधि निर्जित्य महाबलपराक्रमम् ॥ ३ ॥
रुक्मिणीमाजहाराशु केशवो वृष्णपुङ्गवः॥ ३ ॥
ततः पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा।
उवाह महिषीं भोज्यां शङ्खचक्रगदासिभृत् ॥ ४ ॥
मेघोंकी घटाके समान छायी हुई दक्षिणदेशीय रथ-सेनाओंसे सुरक्षित तथा महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न रुक्मीको युद्धमे पराजित करके इन वृष्णिकुलतिलक केशवने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले एवं सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा रुक्मिणीको शीघ्र हर लिया। इस प्रकार शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले श्रीकृष्णने भोजकुल-नन्दिनी रुक्मिणीके साथ विवाह किया और उन्हें अपनी पटरानी बनाया ॥ ३-४ ॥
जारूध्यामाहृतिः क्राथः शिशुपालश्च निर्जितः।
वक्रश्च सह सैन्येन शतधन्वाथ निर्जितः ॥ ५ ॥
जारूथी नगरीमें आहूति, क्राथ एवं शिशुपालको परास्त किया, सेनासहित दन्तवक्त्र और शतधन्वाको भी हरा दिया ॥ ५ ॥
इन्द्रद्युम्नो हतः कोपाद् यवनश्च कशेरुमान्।
हतः सौभपतिः श्रीमाञ्छाल्वश्च दृढधन्वना ॥ ६ ॥
इन्होंने इन्द्रद्युम्न, कालयवन एवं कशेरुमान्का भी क्रोधपूर्वक वध किया है तथा हाथमें सुदृढ़ धनुष धारण करके सौभविमानके स्वामी श्रीमान् राजा शाल्वको भी मार डाला है ॥ ६ ॥
पर्वतानां सहस्रं च चक्रेण पुरुषोत्तमः।
विकीर्य पुण्डरीकाक्षो द्युमत्सेनं व्यपोथयत् ॥ ७ ॥
इन कमलनयन पुरुषोत्तमने चक्रद्वारा सहस्रों पर्वतोंको टूक-टूक करके बिखेर दिया और द्युमत्सेनको मार गिराया ॥ ७ ॥
महेन्द्रशिखरे चैव निमेषान्तरचारिणौ।
जग्राह पुरुषव्याघ्रो वरुणस्याभितश्चरौ ॥ ८ ॥
इरावत्यां महाभोजावग्निसूर्यसमौ युधि।
गोपतिस्तालकेतुश्च निहतौ शार्ङ्गधन्वना ॥ ९ ॥
जो युद्धमें अग्नि और सूर्यके समान पराक्रमी थे और वरुण देवताके उभय-पार्श्वमे विचरण करते थे, जिनमें पलक मारते-मारते एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँच जानेकी शक्ति थी, वे गोपति और तालकेतु नामक महाभोज महेन्द्र पर्वतके शिखरपर पुरुषसिंह श्रीकृष्णद्वारा पकड़े गये और उन शार्ङ्गधन्वाके हाथसे इरावती नदीके तटपर मारे गये ॥ ८-९ ॥
अक्षप्रपतने चैव डिम्भो हंसश्च दानवौ।
उभौ तावपि कृष्णेन सानुगौ विनिपातितौ ॥ १० ॥
इन्हीं श्रीकृष्णने डिम्भ और हंस नामक दोनों दानवोंको अक्षप्रपतन नामक स्थानमे सेवकोंसहित मार गिराया ॥ १० ॥
दग्धा वाराणसी चैव केशवेन महात्मना।
सराष्ट्रः सानुबन्धश्च काशीनामधिपो हतः ॥ ११ ॥
महात्मा केशवने वाराणसी नगरी जला दी तथा राष्ट्रके लोगों और सगे-सम्बन्धियोंसहित काशिराजको कालके गालमें भेज दिया ॥ ११ ॥
विजित्य च यमं संख्ये शरैः संनतपर्वभिः।
अथैन्द्रसेनिरानीतः कृष्णेनाद्भुतकर्मणा ॥ १२ ॥
इन अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णने युद्धमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा यमराजको जीतकर वहाँसे इन्द्रसेनके पुत्रको वापस लौटाया था ॥ १२ ॥
सहितः सर्वयादोभिः सागरेषु महाबलः।
प्राप्य लोहितकूटं च कृष्णेन वरुणो जितः ॥ १३ ॥
इन्हीं श्रीकृष्णने समुद्रोंमें तथा लोहित शिखरपर जाकर समस्त जलजन्तुओंसहित महाबली वरुणको भी जीता था ॥ १३ ॥
महेन्द्रभवने जातो देवैर्गुप्तो महात्मभिः।
अचिन्तयित्वा देवेन्द्रं पारिजातद्रुमो हृतः ॥ १४ ॥
जो महेन्द्रभवनमें उत्पन्न होकर सदा महामनस्वी देवताओंद्वारा सुरक्षित रखा गया था, उस पारिजात नामक वृक्षको इन श्रीकृष्णने देवराजकी परवा न करके हर लिया ॥ १४ ॥
विष्णुपर्व ] द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ६२३
पाण्ड्यं पौण्ड्रं कलिङ्गं च मात्स्यं चैव जनार्दनः।
जघान सहितान् सर्वान् वङ्गराजं तथैव च ॥ १५ ॥
इन जनार्दनने एक साथ आये हुए पाण्ड्य, पौण्ड्र, कलिङ्ग, मत्स्य तथा वङ्ग देशके समस्त राजाओंको युद्धमे मार डाला था ॥ १५ ॥
एष चैकशतं हत्वा रणे राज्ञां महात्मनाम् ।
गान्धारीमावहद् वीरो महिषीं प्रियदर्शनाम् ॥ १६ ॥
इन वीर श्रीकृष्णने रणभूमिमे एक सौ महामना नरेशोंका वध करके अपनी परम सुन्दरी पटरानी गान्धारीसे विवाह किया था ॥ १६ ॥
तथा गाण्डीवधन्वानं क्रीडन्तं मधुसूदनः ।
जिगाय भरतश्रेष्ठं कुन्त्याः प्रमुखतो विभुः ॥ १७ ॥
गाण्डीव धनुष लेकर युद्धकी क्रीडा करते हुए भरतश्रेष्ठ अर्जुनको इन भगवान् मधुसूदनने कुन्तीके सामने ही जीत लिया (अथवा सहायता देकर उन्हें विजयी बना दिया) ॥ १७ ॥
द्रोणं द्रौणिं कृपं कर्णं भीष्मं चैव सुयोधनम् ।
चक्राङ्गुयानैः प्रहवणे जिगाय पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
इन पुरुषोत्तमने (अर्जुनद्वारा) रथयुद्धमे द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, भीष्म और दुर्योधनको परास्त कर दिया ॥ १८ ॥
वभ्रोश्च प्रियमन्विच्छञ्छङ्खचक्रगदासिभृत् ।
सौवीरराजस्य सुतां प्रसह्य हृतवान् प्रभुः ॥ १९ ॥
वभ्रुका प्रिय चाहते हुए शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले भगवान् केशवने सौवीरराजकी पुत्रीको बलपूर्वक हर लिया था ॥ १९ ॥
पर्यस्तां पृथिवीं कृत्स्नां साश्वां सरथकुञ्जराम् ।
वैणुदारिकृते यत्नाज्जिगाय पुरुषोत्तमः ॥ २० ॥
इन पुरुषोत्तमने वैणुदारिके लिये घोड़े, रथ और हाथियोसहित सारी पृथ्वोको, जो अस्त-व्यस्त हो गयी थी, यत्नपूर्वक जीत लिया ॥ २० ॥
अवाप्य तपसो वीर्यं बलमोजश्च माधवः ।
पूर्वदेहे जहारायं बलेस्त्रिभुवनं हरिः ॥ २१ ॥
इन भगवान् माधवने पूर्व शरीरमे वामनरूप होकर तपस्याका बल, वीर्य और ओज पाकर राजा बलिसे त्रिलोकीका राज्य छीन लिया था ॥ २१ ॥
वज्राशनिगदाखङ्गैस्त्रासयद्भिश्च दानवैः।
यस्य नाधिगतो मृत्युः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ २२ ॥
वज्र, अशनि, गदा और खड्गके प्रहारसे त्रास देते हुए दानव प्राग्ज्योतिषपुरमें प्रयत्न करनेपर भी इन्हे मार न सके ॥ २२ ॥
अभिभूतश्च कृष्णेन सगणः सुमहाबलः ।
बलेः पुत्रो महावीर्यो बाणो द्रविणवत्तरः ॥ २३ ॥
महाबली महापराक्रमी तथा अत्यन्त वैभवशाली बलिपुत्र बाणासुरको भी श्रीकृष्णने पराजित कर दिया था ॥ २३ ॥
पीठं तथा महाबाहुः कंसामात्यं जनार्दनः ।
पैठिकं चासिलोमानं निजघान महाबलः ॥ २४ ॥
इन महाबली महाबाहु जनार्दनने कंसके मन्त्री पीठ, पैठिक और असिलोमाको भी मौतके घाट उतार दिया ॥ २४ ॥
जम्भमैरावणं चापि विरूपं च महायशाः ।
जघान पुरुषव्याघ्रो दैत्यं मानुषरूपिणम् ॥ २५ ॥
महायशस्वी पुरुषसिंह श्रीकृष्णने मानवरूपधारी जम्भ, अहिरावण और विरूप नामक दैत्यको कालके गालमें भेज दिया ॥ २५ ॥
तथा नागपतिं तोये कालीयं च महौजसम् ।
निर्जित्य पुण्डरीकाक्षः प्रेषयामास सागरम् ॥ २६ ॥
इसी तरह कमलनयन केशवने यमुनाजीके जलमें रहनेवाले महाबली नागराज कालियको जीतकर समुद्रमें भेज दिया ॥ २६ ॥
संजीवयामास मृतं पुत्रं सान्दीपनेस्तथा ।
निर्जित्य पुरुषव्याघ्रो यमं वैवस्वतं हरिः ॥ २७ ॥
इन्हीं पुरुषसिंह श्रीहरिने वैवस्वत यमको जीतकर सान्दीपिनिके मरे हुए पुत्रको पुनः जीवनदान दिया था ॥ २७ ॥
एवमेष महाबाहुः शास्ता तेषां दुरात्मनाम् ।
देवांश्च ब्राह्मणांश्चैव ये द्विषन्ति सदा नृप ॥ २८ ॥
नरेश्वर ! इस प्रकार यह महाबाहु श्रीकृष्ण उन दुरात्माओंको दण्ड देनेवाले हैं, जो देवताओं और ब्राह्मणोंसे सदा द्वेष रखते हैं ॥ २८ ॥
निहत्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले ।
देवमातुर्ददौ चैव प्रीत्यर्थं वज्रपाणिनः ॥ २९ ॥
इन्होने वज्रपाणि इन्द्रकी प्रसन्नताके लिये भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर देवमाता अदितिको उनके दोनों मणिमय कुण्डल लाकर दे दिये ॥ २९ ॥
एवं सदैव दैत्यानां सुराणां च महायशाः ।
भयाभयकरः कृष्णः सर्वलोककरो विभुः ॥ ३० ॥
इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा, सर्वव्यापी, महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण सदा ही दुराचारी दैत्योंको भय और धर्मात्मा देवताओंको अभय प्रदान करते हैं ॥ ३० ॥
संस्थाप्य धर्मान् मर्त्येषु यज्ञैरिष्ट्वाऽऽप्तदक्षिणैः ।
कृत्वा देयार्थममितं स्वस्थानं प्रतिपत्स्यते ॥ ३१ ॥
| ६२४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
ये मनुष्योंमें धर्मकी स्थापना करके पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए देवताओंके असंख्य कार्य सिद्ध करनेके अनन्तर अपने परमधामको पधारेंगे ॥ ३१ ॥
कृष्णो भोगवतीं रम्यामृषिकान्तां महायशाः ।
द्वारकामात्मसात्कृत्वा समुद्रं गमयिष्यति ॥ ३२ ॥
महायशस्वी श्रीकृष्ण भोग-वैभवसे सम्पन्न रमणीय तथा ऋषियोंके लिये कमनीय द्वारकापुरीको अपने अधीन करके अन्ततोगत्वा इसे समुद्रमें डुबो देंगे ॥ ३२ ॥
बहुरत्नसमाकीर्णां चैत्ययूपशताङ्किताम् ।
द्वारकां वरुणावासं प्रवेश्यति सकाननाम् ॥ ३३ ॥
जो बहुसंख्यक रत्नोंसे व्याप्त तथा सैकड़ों चैत्यों और यूपोंसे चिह्नित है, वन-उपवनसहित उस द्वारकापुरीको वरुणालयमें निमग्न कर देंगे ॥ ३३ ॥
तां सूर्यसदनप्रख्यां मतज्ञः शार्ङ्गधन्वनः ।
विसृष्टां वासुदेवेन सागरः प्लावयिष्यति ॥ ३४ ॥
शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णके मतको जाननेवाला समुद्र इन भगवान् वासुदेवके द्वारा छोड़ी हुई सूर्यलोक-तुल्य तेजस्विनी द्वारकाको अपने जलमें विलीन कर लेगा ॥ ३४ ॥
सुरासुरमनुष्येषु नासीन्न भविता क्वचित् ।
य इमामावसेत् कश्चिदन्यो वै मधुसूदनात् ॥ ३५ ॥
देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें इन भगवान् मधुसूदनके सिवा दूसरा कोई ऐसा न तो हुआ है और न कभी होगा ही, जो इनके द्वारा छोड़ी गयी इस द्वारकापुरीमें निवास कर सके ॥ ३५ ॥
एवमेष दशार्हाणां विधाय विधिमुत्तमम् ।
विष्णुर्नारायणः सोमः सूर्यश्च भविता स्वयं ॥ ३६ ॥
इस प्रकार दशार्हवंशी यादवोंके लिये उत्तम विधिक विधान करके ये सर्वव्यापी नारायण देव स्वयं ही चन्द्रमा और सूर्यरूपसे प्रकाशित होंगे ॥ ३६ ॥
अप्रमेयस्त्वचिन्त्यश्च यथा कामचरो वशी ।
मोदत्येष सदा भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ॥ ३७ ॥
ये अप्रमेय, अचिन्त्य, इच्छानुसार विचरनेवाले और सबको वशमें रखनेवाले हैं। जैसे बालक खिलौनोंसे प्रसन्न होता है, उसी प्रकार ये समस्त प्राणियोंके साथ क्रीडा करते हुए आनन्दमग्न होते हैं ॥ ३७ ॥
न प्रमातुं महाबाहुः शक्योऽयं मधुसूदनः ।
परं ह्यपरमेतस्माद् विश्वरूपान्न विद्यते ॥ ३८ ॥
इन महाबाहु मधुसूदनको सीमित प्रमाणोंद्वारा मापा नहीं जा सकता । यह पर और अपररूप जगत् इन विश्वरूप परमेश्वरसे भिन्न नहीं है ॥ ३८ ॥
श्रुतोऽयमेष शतशस्तथा शतसहस्रशः ।
अन्तो हि कर्मणामस्य दृष्टपूर्वो न केनचित् ॥ ३९ ॥
ये ही सैकड़ों और लाखों बार सुने गये हैं। किसीने पहले कभी इनके कर्मोंका अन्त नहीं देखा है ॥ ३९ ॥
एवमेतानि कर्माणि शिशुमध्यगतस्तदा ।
कृतवान् पुण्डरीकाक्षः संकर्षणसहायवान् ॥ ४० ॥
इस तरह बालकोंके बीचमें रहकर संकर्षणसहित कमलनयन श्रीकृष्णने ये पूर्वोक्त कर्म किये थे ॥ ४० ॥
इत्युवाच पुरा व्यासस्तपोवीर्येण चक्षुषा ।
महायोगी महाबुद्धिः सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ ४१ ॥
पूर्वकल्पके महायोगी, महाबुद्धिमान् और सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले व्यासने अपनी तपोबलसे सम्पन्न दृष्टिद्वारा देखकर यह सब कुछ बताया था ॥ ४१ ॥
वैशम्पायन उवाच
इति संस्तुय गोविन्दं महेन्द्रवचनान्मुनिः ।
यदुभिः पूजितः सर्वैर्नारदस्त्रिदिवं ययौ ॥ ४२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार देवराज इन्द्रके आदेशसे भगवान् गोविन्दकी स्तुति करके नारद मुनि समस्त यादवोंसे पूजित हो स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४२ ॥
ततस्तद् वसु गोविन्दो दिदेशान्धकवृष्णिषु ।
यथार्हं पुण्डरीकाक्षो विधिवन्मधुसूदनः ॥ ४३ ॥
तदनन्तर कमलनयन मधुसूदन भगवान् गोविन्दने समस्त अन्धक और वृष्णिवंशके लोगोंको विधिपूर्वक वह सारा धन यथोचितरूपसे बाँट दिया ॥ ४३ ॥
यादवाश्च धनं प्राप्य विधिवद् भूरिदक्षिणैः ।
यज्ञैरिष्ट्वा महात्मानो द्वारकामावसन् पुरीम् ॥ ४४ ॥
उस धनको पाकर महामनस्वी यादव प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान करते हुए द्वारकापुरीमें निवास करने लगे ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नारदवाक्यं नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नारदजीका वाक्यविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०२ ॥
विष्णुपर्व ] त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ६२५
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी संततिका वर्णन तथा वृष्णिवंशका उपसंहार
जनमेजय उवाच
बहूनां स्त्रीसहस्राणामष्टौ भार्याः प्रकीर्तिताः।
तासामपत्यान्यष्टानां भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**भगवन् ! भगवान् श्रीकृष्णकी कई हजार रानियोंमेंसे आठको प्रमुख बताया गया है। उन आठोंकी संतानें कौन-कौन-सी थीं ? यह आप मुझे बताइये ॥
वैशम्पायन उवाच
अष्टौ महिष्यः पुत्रिण्य इति प्राधान्यतः स्मृताः।
सर्वा वीरप्रजाश्चैव तास्वपत्यानि मे शृणु ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन् ! प्रधानतः आठों पटरानियाँ पुत्रवती थीं, ऐसा माना गया है। उनकी सभी संतानें वीर थीं। उन रानियोंके जो-जो संतानें हुईं, मैं बताता हूँ, सुनो ॥ २ ॥
रुक्मिणी सत्यभामा च देवी नाग्नजिती तथा।
सुदत्ता च तथा शैव्या लक्ष्मणा चारुहासिनी ॥ ३ ॥
मित्रविन्दा च कालिन्दी जाम्बवत्यथ पौरवी।
सुभीमा च तथा माद्री रुक्मिणीतनयाञ्छृणु ॥ ४ ॥
रुक्मिणी, सत्यभामा, देवी नाग्नजिती (सत्या), शिविदेशकी राजकुमारी सुदत्ता, मनोहर हासवाली लक्ष्मणा, मित्रविन्दा, कालिन्दी, जाम्बवती, पौरवी और मद्रदेश-की राजकुमारी सुभीमा—ये श्रीकृष्णकी मुख्य रानियाँ थीं। इनमेंसे रुक्मिणीके पुत्रोंका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ३-४ ॥
प्रद्युम्नः प्रथमं जज्ञे शम्बरान्तकरः शुभः।
द्वितीयश्चारुदेष्णश्च वृष्णिसिंहो महारथः ॥ ५ ॥
रुक्मिणीके गर्भसे पहले शुभलक्षणसम्पन्न प्रद्युम्नका जन्म हुआ, जिन्होंने आगे चलकर शम्बरासुरका वध किया था। उनके दूसरे पुत्र चारुदेष्ण थे, जो वृष्णिवंशमे सिंहके समान पराक्रमी और महारथी वीर थे ॥ ५ ॥
चारुभद्रश्चारुगर्भः सुदेष्णो द्रुम एव च।
सुषेणश्चारुगुप्तश्च चारुविन्दश्च वीर्यवान् ॥ ६ ॥
चारुबाहुः कनीयांश्च कन्या चारुमती तथा।
तीसरे चारुभद्र, चौथे चारुगर्भ, पाँचवें सुदेष्ण और छठे द्रुम थे, सातवें सुषेण, आठवें चारुगुप्त, नवें पराक्रमी चारुविन्द और दसवें चारुबाहु थे। चारुबाहु सबसे छोटे थे। इनके सिवा रुक्मिणीके एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी, जिसका नाम चारुमती था ॥ ६½ ॥
जज्ञिरे सत्यभामायां भानुर्भीमरथः क्षुपः ॥ ७ ॥
रोहितो दीप्तिमांश्चैव ताम्रजाक्षो जलान्तकः।
भानुर्भीमलिका चैव ताम्रपर्णी जलन्धमा ॥ ८ ॥
चतस्रो जज्ञिरे तेषां स्वसारो गरुडध्वजात्।
सत्यभामाके गर्भसे भानु, भीमरथ, क्षुप, रोहित, दीप्तिमान्, ताम्रजाक्ष और जलान्तक—ये आठ पुत्र उत्पन्न हुए। भगवान् गरुड़ध्वजसे इनकी चार बहिनें उत्पन्न हुईं थीं, जिनके नाम थे—भानु, भीमलिका, ताम्रपर्णी और जलन्धमा ॥ ७-८½ ॥
जाम्बवत्याः सुतो जज्ञे साम्बः समितिशोभनः ॥ ९ ॥
मित्रवान् मित्रविन्दश्च मित्रवत्यपि चाङ्गना।
मित्रबाहुः सुनीथश्च नाग्नजित्याः प्रजाः शृणु ॥ १० ॥
जाम्बवतीके ज्येष्ठ पुत्र साम्ब उत्पन्न हुए, जो युद्धमें बड़ी शोभा पाते थे। इनके सिवा मित्रवान्, मित्रविन्द, मित्रबाहु और सुनीथ—ये चार पुत्र और थे। जाम्बवतीके मित्रवती नामवाली एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी। अब नाग्नजितीकी संतानोंका वर्णन सुनो ॥ ९-१० ॥
भद्रकारो भद्रविन्दः कन्या भद्रवती तथा।
सुदत्तायां तु शैव्यायां संग्रामजिदजायत ॥ ११ ॥
सत्यजित् सेनजिच्चैव तथा शूरः सपत्नजित्।
नाग्नजितीके भद्रकार और भद्रविन्द नामक दो पुत्र हुए थे तथा भद्रवती नामवाली एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी। शिविदेशकी राजकुमारी सुदत्ताके गर्भसे संग्रामजित्, सत्यजित्, सेनजित् और शूरवीर सपत्नजित्—इन चार पुत्रोंका जन्म हुआ था ॥ ११½ ॥
सुभीमायाः सुतो माद्रया वृकाश्वो वृकनिर्वृतिः ॥ १२ ॥
कुमारो वृकदीप्तिश्च लक्ष्मणायाः प्रजाः शृणु।
माद्री सुभीमाके वृकाश्व, वृकनिर्वृत्ति तथा कुमार वृकदीप्ति—ये तीन पुत्र थे। अब लक्ष्मणाकी संतानोंका परिचय सुनो ॥ १२½ ॥
गात्रवान् गात्रगुप्तश्च गात्रविन्दश्च वीर्यवान् ॥१३॥
जज्ञिरे गात्रवत्या च भगिन्याऽनुजया सह।
गात्रवान्, गात्रगुप्त तथा पराक्रमी गात्रविन्द—ये तीन पुत्र लक्ष्मणाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे, साथ ही इनकी छोटी बहिन गात्रवतीका भी जन्म हुआ था ॥ १३½ ॥
अश्रुतश्च सुतो जज्ञे कालिन्द्याः श्रुतसम्मतः ॥ १४ ॥
अश्रुतं श्रुतसेनायै प्रददौ मधुसूदनः।
कालिन्दीके दो पुत्र हुए—अश्रुत और श्रुतसम्मत। मधुसूदनने अश्रुत नामक पुत्रको श्रुतसेना नामवाली पत्नीकी गोदमें दे दिया ॥ १४½ ॥
| ६२६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
तं प्रदाय हृषीकेशस्तां भार्या मुदितोऽब्रवीत् ॥ १५ ॥
एष वामुभयोरस्तु दायादः शाश्वतीः समाः ।
उसे देकर भगवान् श्रीकृष्ण बड़े प्रसन्न हुए और अपनी उस पत्नीसे बोले—'यह सदाके लिये तुम दोनोंका पुत्र रहे' ॥ १५३ ॥
बृहत्यां तु गदं प्राहुः शैब्यायामङ्गदं सुतम् ॥ १६ ॥
उत्पन्नं कुमुदं चैव श्वेतं श्वेता तथाङ्गना ।
श्रीकृष्णकी बृहती नामवाली पत्नीके गर्भसे गदकी उत्पत्ति बतायी जाती है। शैव्याके गर्भसे अङ्गद, कुमुद और श्वेत नामक पुत्रकी उत्पत्ति कही गयी है। शैव्याके श्वेता नामवाली एक कन्या भी थी ॥ १६३ ॥
अगावहः सुमित्रश्च शुचिश्चित्ररथस्तथा ॥ १७ ॥
चित्रसेनः सुदेवायांश्चित्रा चित्रवती तथा ।
सुदेवाके गर्भसे अगावह, सुमित्र, शुचि, चित्ररथ तथा चित्रसेन ये—पाँच पुत्र और चित्रा तथा चित्रवती—ये दो कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं ॥ १७३ ॥
वनस्तम्बश्च जज्ञाते सुतः स्तम्बवनश्च ह ॥ १८ ॥
निवासनोऽवनस्तम्भः कन्या स्तम्बवती तथा ।
उपसन्नश्च शङ्कुश्च वज्रांशुः क्षिप्र एव च ॥ १९ ॥
कौशिक्यां सुतसोमायां यौधिष्ठिर्यां युधिष्ठिरः ।
कपाली गरुडश्चैव जज्ञाते चित्रयोधिनौ ॥ २० ॥
वनस्तम्ब, स्तम्बवन, निवासन तथा अवनस्तम्भ—ये चार पुत्र और स्तम्बवती नामवाली कन्या—इन सबकी उत्पत्ति कौशिकीके गर्भसे हुई थी । उपसन्न, शङ्कु, वज्रांशु और क्षिप्र—ये चार पुत्र सुतसोमाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे । यौधिष्ठिरीके गर्भसे युधिष्ठिर नामक पुत्रका जन्म हुआ था । इसके सिवा दो पुत्र और उत्पन्न हुए थे—कपाली तथा गरुड । ये दोनों ही विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले थे ॥ १८-२० ॥
एवमादीनि पुत्राणां सहस्राणि निबोध मे ।
दशायुतं समाख्याता वासुदेवस्य ते सुताः ॥ २१ ॥
अयुतानि तथा चाष्टौ शूरा रणविशारदाः ।
जनार्दनस्य प्रसवः कीर्तितोऽयं तथा मया ॥ २२ ॥
ये तथा इसी तरह और भी सहस्रों पुत्र श्रीकृष्णसे उत्पन्न हुए थे । इस बातको तुम मेरे द्वारा जान लो । भगवान् वासुदेवके वे पुत्र एक लाख अस्सी हजार बताये गये हैं । वे सब के सब रण-कर्म-विशारद तथा शूरवीर थे । इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् जनार्दनकी संततिका वर्णन किया है ॥ २१-२२ ॥
प्रद्युम्नस्य सुतो जज्ञे वैदर्भ्यां राजसत्तम ।
अनिरुद्धो रणेऽरुद्धो जज्ञे स मृगकेतनः ॥ २३ ॥
नृपश्रेष्ठ ! प्रद्युम्नके विदर्भराजकुमारी रुक्मवतीके गर्भसे अनिरुद्ध नामक पुत्रका जन्म हुआ, जिसकी गतिको युद्धमें कोई रोक नहीं सकता था । अनिरुद्धकी ध्वजापर मृगका चिह्न था ॥ २३ ॥
रेवत्यां बलदेवस्य जज्ञाते निशठोल्मुकौ ।
भ्रातरौ देवसंकाशावुभौ पुरुषसत्तमौ ॥ २४ ॥
बलदेवजीके रेवतीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम थे निशठ और उल्मुक । ये दोनों भाई देवताओंके समान तेजस्वी तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे ॥ २४ ॥
सुतनुश्च सुतारा च शौरेरास्तां परिग्रहः ।
पौण्ड्रकः कपिलश्चैव वसुदेवस्य तौ सुतौ ॥ २५ ॥
वसुदेवके दो पत्नियाँ और थीं—सुतनु तथा सुतारा । इन दोनोंके गर्भसे वसुदेवके दो पुत्र हुए—पौण्ड्रक तथा कपिल ॥ २५ ॥
तारायां कपिलो जज्ञे पौण्ड्रश्च सुतनोः सुतः ।
तयोर्नृपोऽभवत् पौण्ड्रः कपिलश्च वनं ययौ ॥ २६ ॥
इनमेंसे कपिल तो सुताराके गर्भसे उत्पन्न हुआ था और पौण्ड्रक सुतनुका पुत्र था । उन दोनों भाइयोंमेंसे पौण्ड्रक तो राजा हुआ और कपिल वनको चला गया ॥२६॥
तुर्या सम्भवद् वीरो वसुदेवान्महाबलः ।
जरा नाम निषादानां प्रभुः सर्वधनुष्मताम् ॥ २७ ॥
वसुदेवसे उनकी चतुर्थ वर्णवाली भार्यासे एक महाबली वीरका जन्म हुआ था, जिसका नाम था जरा । वह समस्त धनुर्धर निषादोंका स्वामी था ॥ २७ ॥
काश्या सुपाश्र्वं तनयं लेभे साम्बाद् रगस्विनम्।
सानुर्जज्ञेऽनिरुद्धस्य वज्रः सानोरजायत ॥ २८ ॥
काश्याने साम्बसे सुपाश्र्व नामक पुत्र प्राप्त किया, जो महान् वेगशाली था । अनिरुद्धके सानु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । सानुसे वज्रका जन्म हुआ ॥ २८ ॥
वज्राज्जज्ञे प्रतिरथः सुचारुस्तस्य चात्मजः ।
अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात् ॥ २९ ॥
वज्रसे प्रतिरथ उत्पन्न हुआ । प्रतिरथके पुत्रका नाम सुचारु था । वृष्णिके छोटे पुत्र अनमित्रसे शिनिका जन्म हुआ ॥ २९ ॥
शिनेस्तु सत्यवाग् जज्ञे सत्यकश्च महारथः ।
सत्यकस्यात्मजः शूरो युयुधानस्त्वजायत ॥ ३० ॥
शिनिसे महारथी सत्यवादी सत्यक उत्पन्न हुए । सत्यकसे उनके शूरवीर पुत्र युयुधान ( सात्यकि ) का जन्म हुआ ॥ ३० ॥
असङ्गो युयुधानस्य मणिरस्तस्याभवत् सुतः ।
विष्णुपर्व ] चतुरधिकशततमोऽध्यायः ६२७ मणेर्युगन्धरः पुत्र इति वंशः समाप्यते ॥ ३१॥ हुआ । मणिके पुत्रका नाम युगन्धर था। इस प्रकार यहाँ युयुधानका पुत्र असङ्ग और असङ्गका पुत्र मणि वंशका वर्णन समाप्त किया जाता है ॥ ३१ ॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वृष्णिवंशानुकीर्तने त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वृष्णिवंशका वर्णनविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥ चतुरधिकशततमोऽध्यायः प्रद्युम्नका जन्म, शम्बरासुरद्वारा प्रद्युम्नका सूतिकागृहसे अपहरण, प्रद्युम्न- मायावती-संवाद और प्रद्युम्नका शम्बरासुरके सौ पुत्रोंके साथ युद्ध जनमेजय उवाच लिये उस महान् असुरने मायासे उस बालकको हर लिया य एष भवता पूर्वं शम्बरघ्नेत्युदाहृतः । और उसे दोनों हाथोंसे ऊपर उठाये हुए वह अपने नगरमें प्रद्युम्नः स कथं जघ्ने शम्बरं तद् ब्रवीहि मे ॥ १ ॥ ले गया ॥ ५ ॥ अनपत्या तु तस्यासीद् भार्या रूपगुणान्विता । जनमेजयने पूछा—मुने ! आपने पहले जो यह नाम्ना मायावती नाम मायेव शुभदर्शना ॥ ६ ॥ बताया है कि प्रद्युम्नने शम्बरासुरका वध किया था, उस- उसकी रूप और गुणसे युक्त एक भार्या थी, जिसके के विषयमें मैं यह जानना चाहता हूँ कि प्रद्युम्नने किस कोई संतान नहीं थी । उसका नाम था मायावती, जो प्रकार शम्बरासुरका वध किया था, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥ मायाके समान ही सुन्दर दिखायी देती थी ॥ ६ ॥ वैशम्पायन उवाच ददौ तं वासुदेवस्य पुत्रं पुत्रमित्रात्मजम् । रुक्मिण्यां वासुदेवस्य लक्ष्म्यां कामो धृतव्रतः । तस्या महिष्या मायिन्या दानवः कालचोदितः ॥ ७ ॥ शम्बराान्तकरो जज्ञे प्रद्युम्नः कामदर्शनः । उस कालप्रेरित दानवने भगवान् श्रीकृष्णके उस पुत्रको सनत्कुमार इति यः पुराणे परिगीयते ॥ २ ॥ अपने पुत्रके समान मानकर अपनी उस मायावती भार्याके वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! भगवान् वासुदेवके हाथमें दे दिया ॥ ७ ॥ लक्ष्मीरूपा रुक्मिणीके गर्भसे उत्तम व्रतधारी कामदेव ही मायावती तु तं दृष्ट्वा सम्प्रहृष्टतनूरुहा । प्रद्युम्नरूपसे उत्पन्न हुए, जो कामदेवके समान ही मनोहर हर्षेण महता युक्ता पुनः पुनरुदैक्षत ॥ ८ ॥ दिखायी देते थे । उन्होंने ही शम्बरासुरका विनाश किया था। उस बालकको देखते ही मायावतीके शरीरमें हर्षजनित किन्हीं-किन्हींके मतमें जो पुराणमें सनत्कुमार कहे जाते हैं, रोमाञ्च हो आया । वह बड़े हर्षके साथ बारंबार उसकी वे ही प्रद्युम्नरूपसे प्रकट हुए थे ॥ २ ॥ ओर देखने लगी ॥ ८ ॥ तं सप्तरात्रे सम्पूर्णे निशीथे सूतिकागृहात् । अथ तस्या निरीक्षन्त्याः स्मृतिः प्रादुर्बभूव ह । जहार कृष्णस्य सुतं शिशुं वै कालशम्बरः ॥ ३ ॥ अयं स मम कान्तोऽभूत् स्मृत्वैवं चान्वचिन्तयत् ॥ ९॥ प्रद्युम्नके जन्मके पश्चात् सात रात पूर्ण हो जानेपर बालकका निरीक्षण करती हुई मायावतीके हृदयमें कालरूपी शम्बरासुरने श्रीकृष्णके उस शिशु पुत्रको आधी पूर्वकालकी स्मृति जाग उठी । 'यही तो पूर्वकालमें मेरे रातके समय सूतिकागृहसे हर लिया ॥ ३ ॥ प्रियतम पति थे' यह स्मरण करके वह इस प्रकार सोचने विदितं तस्य कृष्णस्य देवमायानुवर्तिनः । लगी—॥ ९ ॥ ततो न निगृहीतः स दानवो युद्धदुर्मदः ॥ ४ ॥ अयं स नाथो भर्ता मे यस्यार्थेऽहं दिवानिशम् । देवमायाका अनुसरण करनेवाले श्रीकृष्णको भविष्यमें चिन्ताशोकार्णवे मग्ना न विन्दामि रतिं क्वचित् ॥ १० ॥ होनेवाली सारी बातें विदित थीं, इसलिये उन्होंने उस 'ये वे ही मेरे स्वामी एवं भर्ता हैं, जिनके लिये मैं रणदुर्मद दानवको उस समय बंदी नहीं बनाया ॥ ४ ॥ दिन-रात चिन्ता और शोकके समुद्रमें डूबी रहकर कभी कहीं स मृत्युना परीतायुर्मायया संजहार तम् । भी चैन नहीं पाती हूँ ॥ १० ॥ दोर्भ्यामुत्क्षिप्य नगरं स्वं निनाय महासुरः ॥ ५ ॥ अयं भगवता पूर्वं देवदेवेन शूलिना । मृत्युने उसकी आयुपर अधिकार कर लिया था, इस खेदितेन कृतोऽनङ्गो दृष्टो जात्यन्तरे मया ॥ ११ ॥
| ६२८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
'प्राचीन कालमें इनके द्वारा खेदमें डाले जानेपर देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शङ्करने इन्हें अनङ्ग बना दिया था (इनके शरीरको जलाकर भस्म कर दिया था)। आज दूसरे जन्ममें इनका मुझे दर्शन हुआ है॥ ११॥
कथमस्य स्तनं दास्ये मातृभावेन जानती।
भर्तुर्भार्थ्या त्वहं भूत्वा वक्ष्ये वा पुत्र इत्युत॥ १२॥
'जब मैं इस रहस्यको जानती हूँ, तब मातृभावसे इनके मुखमें अपना स्तन कैसे दूँगी। ये मेरे पति हैं, मैं इनकी पत्नी होकर इन्हें पुत्र कैसे कहूँगी'॥ १२॥
एवं संचिन्त्य मनसा धात्र्यास्तं सा समर्पयत्।
रसायनप्रयोगैश्च शीघ्रमेव व्यवर्धयत्॥ १३॥
मन-ही-मन ऐसा सोचकर मायावतीने बालक प्रद्युम्नको एक धायके हाथमें सौंप दिया तथा रसायनके प्रयोगोंसे उन्हें शीघ्र ही बड़ा कर दिया॥ १३॥
धात्र्याः सकाशात् स च तां शृण्वन् रुक्मिणिनन्दनः।
मायावतीमविज्ञानान्मेने स्वामेव मातरम्॥ १४॥
रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न धायसे मायावतीकी प्रशंसा सुनकर उसे अनजानमें अपनी ही माता मानने लगे॥ १४॥
सा च तं वर्द्धयामास कार्ष्णिं कमललोचनम्।
मायाश्वास्मै ददौ सर्वा दानवीः काममोहिता॥ १५॥
मायावतीने कमलनयन श्रीकृष्ण-कुमारको जब बड़ा कर लिया, तब उनके प्रति कामभावसे मोहित होकर उन्हें समस्त दानवी मायाओंकी शिक्षा दे दी॥ १५॥
स यदा यौवनस्थस्तु प्रद्युम्नः कामदर्शनः।
चिकीर्षितज्ञो नारीणां सर्वास्त्रविधिपारगः॥ १६॥
प्रद्युम्न जब युवावस्थामें स्थित हुए, तब साक्षात् कामदेवके समान दिखायी देने लगे। वे स्त्रियोंके मनोभावोंके ज्ञाता और सम्पूर्ण अस्त्रोंके प्रयोगमें पारंगत थे॥ १६॥
तं सा मायावती कान्तं कामयामास कामिनी।
इङ्गितैश्चापि वीक्षन्ती प्रालोभयत सस्मिता।
प्रसञ्जन्तीं तु तां देवीं बभाषे चारुहासिनीम्॥ १७॥
उस समय मायावतीने कामवती नारीकी भाँति अपने उस प्रियतम पतिकी कामना की। वह मुसकराती हुई देखने और अपने हाव-भावोंसे उन्हें लुभाने लगी। उस मनोहर हासवाली देवी मायावतीको अपने प्रति आसक्त होती देख वे इस प्रकार बोले॥ १७॥
प्रद्युम्न उवाच
मातृभावं व्यतिक्रम्य किमेवं वर्तसेऽन्यथा।
अहो दुःस्वभावासि स्त्रीत्वे चपलमानसा॥ १८॥
प्रद्युम्नने कहा—अरी! तू मातृ-भावका उल्लङ्घन करके इस तरह विपरीत बर्ताव कैसे कर रही है? अहो! तू दुःशीला जान पड़ती है। तेरा चित्त अपने स्त्रीत्वको लेकर चञ्चल हो उठा है॥ १८॥
या पुत्रभावमुत्सृज्य मयि लोभात् प्रवर्तसे।
न तु तेऽहं सुतः सौम्ये कोऽयं शीलविपर्ययः॥ १९॥
तभी तो तू मेरे प्रति पुत्रभावका परित्याग करके कामलोभसे प्रेरित हो विपरीत बर्ताव कर रही है। इससे तो जान पड़ता है, मैं तेरा पुत्र नहीं हूँ। सौम्ये! तेरे शील-स्वभावमें यह उलट-फेर कैसा?॥ १९॥
तत्त्वमिच्छाम्यहं देवि कथितं को न्वयं विधिः।
विद्युत्सम्पातचपलः स्वभावः खलु योषिताम्॥ २०॥
या नरेषु प्रसज्जन्ते नगाग्रेषु घना इव।
देवि! मैं यथार्थ बात जानना चाहता हूँ, तू ठीक-ठीक बता दे कि तेरा यह व्यवहार कैसा है? निश्चय ही नारियोंका स्वभाव विद्युतपातके समान चपल होता है। जैसे बादल पर्वत-शिखरोंसे सक्त होते हैं, उसी तरह काममोहित स्त्रियाँ सभी पुरुषोंपर आसक्त हो जाती हैं॥ २० १/२॥
यदि तेऽहं सुतः सौम्ये यदि वा नात्मजः शुभे॥ २१॥
कथितं तत्त्वमिच्छामि किमिदं ते चिकीर्षितम्।
सौम्ये! शुभे! यदि मैं तेरा पुत्र होऊँ तो वह बता दे, अथवा यदि तेरा पुत्र न भी होऊँ तो वह भी बता दे। मैं तेरे मुखसे यथार्थ बात सुनना चाहता हूँ। तू यह क्या करना चाहती है॥ २१ १/२॥
एवमुक्ता तु सा भीरुः कामेन व्यथितेन्द्रिया॥ २२॥
प्रियं प्रोवाच वचनं विविक्ते केशवात्मजम्।
न त्वं मम सुतः कान्त नापि ते शम्बरः पिता॥ २३॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर भीरूहृदया मायावती, जिसकी सारी इन्द्रियाँ कामसे व्यथित हो उठी थीं, एकान्तमें अपने प्रियतम केशवकुमारसे इस प्रकार बोली—'प्राणवल्लभ! तुम मेरे पुत्र नहीं हो और शम्बरासुर भी तुम्हारा पिता नहीं है॥ २२-२३॥
रूपवानसि विक्रान्तस्त्वं जात्या वृष्णिनन्दन।
पुत्रस्त्वं वासुदेवस्य रुक्मिण्यानन्दवर्धनः॥ २४॥
'वृष्णिकुलनन्दन! तुम जन्मसे ही रूपवान् और पराक्रमी हो। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके पुत्र हो और माता रुक्मिणीका आनन्द बढ़ानेवाले उनके लाड़ले लाल हो॥ २४॥
दिवसे सप्तमे बालो जातमात्रोऽपवाहितः।
सूतिकागारमध्यात् त्वं शिशुरुत्तानशायितः॥ २५॥
मम भर्त्ता हतोऽसि त्वं बलवीर्यप्रवर्तिना।
पितुस्ते वासुदेवस्य धर्षयित्वा गृहं महत्॥ २६॥
'तुम्हारे जन्मके सातवें दिन जब कि तुम बालशिशुके रूपमे शय्यापर उत्तान सुलाये गये थे, मेरा भरण-पोषण करने-
विष्णुपर्व ] चतुरधिकशततमोऽध्यायः ६२९
वाले तथा बल और पराक्रमपूर्वक किसी कार्यमें प्रवृत्त होनेवाले शम्बरासुरने तुम्हारे पिता भगवान् वासुदेवके विशाल गृहको तिरस्कृत करके सूतिकागारके भीतरसे तुम्हारा अपहरण कर लिया ॥ २५-२६ ॥
पाकशासनकल्पस्य हृतस्त्वं शम्बरेण ह।
सा च ते करुणं माता त्वां बालमनुशोचती ॥ २७ ॥
अत्यर्थं तप्यते वीर विवत्सा सौरभी यथा।
'तुम इन्द्रके समान तेजस्वी पिताके पुत्र हो, तो भी शम्बरासुरने तुम्हें हर लिया। वीर! तुम्हारी माता रुक्मिणी भी तुम-जैसे बालकके लिये निरन्तर शोकमग्न रहकर करुण विलाप करती और अत्यन्त संतप्त होती हैं, ठीक उसी तरह जैसे अपने बछड़ेसे बिछुड़ी हुई गाय उसके लिये क्रन्दन करती रहती है ॥ २७$\frac{१}{२}$॥
सोऽपि शक्रादपि महान् पिता ते गरुडध्वजः ॥ २८ ॥
इह त्वां नाभिनाजानाति बालमेवापवाहितम् ।
'तुम्हारे पिता भगवान् गरुडध्वज इन्द्रसे भी महान् हैं, किंतु उन्हें भी इस बातका पता नहीं है कि तुम बाल्यावस्थामें ही यहाँ हर लाये गये हो ॥ २८$\frac{१}{२}$॥
कान्त वृष्णिकुमारस्त्वं न हि त्वं शम्बरात्मजः ॥ २९ ॥
वीर नैवंविधान् पुत्रान् दानवा जनयन्ति हि।
'प्रियतम ! तुम वृष्णिकुलके कुमार हो, शम्बरके पुत्र नहीं। वीर ! दानव तुम-जैसे पुत्रोंको जन्म नहीं देते ॥ २९$\frac{१}{२}$॥
अतोऽहं कामयामि त्वां न हि त्वं जनितो मया ॥ ३० ॥
रूपं ते सौम्य पश्यन्ती सीदामि हृदि दुर्बला ।
'सौम्य ! इसीलिये मै तुम्हें चाहती हूँ, क्योंकि मैने तुम्हें उत्पन्न नहीं किया है। मैं दुर्बल अबला तुम्हारे मनोहर रूपका दर्शन करके मन-ही-मन कामसे संतत हो रही हूँ ॥ ३०$\frac{१}{२}$॥
यन्मे व्यवसितं कान्त यत् तु मे हृदि वर्तते ॥ ३१ ॥
तन्मे मनसि वार्ष्णेय प्रतिसंधातुमर्हसि ।
'प्राणवल्लभ ! वृष्णिनन्दन ! मैंने जो कुछ करनेका निश्चय किया है, मेरे हृदयमें जो भाव है, उसे तुम मेरे मनोमन्दिरमें निवास करके पूर्ण करो ॥ ३१$\frac{१}{२}$ ॥
एष ते कथितः सर्वः सद्भावस्त्वयि यो मम ॥ ३२ ॥
यथा न मम पुत्रस्त्वं न पुत्रः शम्बरस्य च।
'तुम्हारे प्रति मेरे हृदयमे जो सद्भाव था, यह सब मैंने तुम्हे बता दिया, न तो तुम मेरे पुत्र हो और न शम्बरासुरके ही' ॥ ३२$\frac{१}{२}$ ॥
श्रुत्वैवमखिलं सर्वं मायावत्या प्रभाषितम् ॥ ३३ ॥
चक्रायुधात्मजः क्रुद्धः शम्बरं स समाह्वयत् ।
सर्वमायास्रविच्छोऽसौनाम विधाव्य चात्मनः ॥ ३४ ॥
मायावतीकी कही हुई यह सारी बात सुनकर भगवान् चक्रपाणिके पुत्र प्रद्युम्न कुपित हो उठे। वे समस्त मायाओंके ज्ञाता थे, उन्होंने अपना नाम सुनाकर शम्बरासुरको युद्धके लिये ललकारनेका निश्चय किया ॥३३-३४॥
अहो दानवदुष्टात्मा केशवस्यात्मजं शिशुम् ।
हरते निर्भयश्चैव भयमद्य करोम्यहम् ॥ ३५॥
वे मन-ही-मन कहने लगे, 'अहो ! इस दुष्टात्मा दानव ने केशवके शिशु पुत्रका अपहरण किया है, तो भी यह निर्भय बना बैठा है और मैं आज इससे भय मान रहा हूँ ॥ ३५ ॥
कथं वै क्रोधमागच्छेद् वध्यते वा कथं मया ।
प्रथमं किं करिष्यामि येन कुप्यति मन्दधीः ॥ ३६ ॥
'अब यह किस प्रकार मेरे ऊपर कुपित होगा और कैसे मेरे द्वारा इसका वध किया जायगा ? मैं पहले क्या करूँ, जिससे यह मन्दबुद्धि दानव मुझपर कुपित हो ? ॥ ३६ ॥
अस्ति चास्य ध्वजं चित्रं सिंहकेतुविभूषितम् ।
तोरणं गृहमासाद्य उच्छ्रितं मेरुशृङ्गवत् ॥ ३७॥
'इसके यहाँ एक विचित्र ध्वज है, जो सिंहके चिह्नसे युक्त पताकाद्वारा विभूषित है। वह ध्वज बाहरी फाटकपर लगा है और मेरु पर्वतके शिखरके समान ऊँचा जान पड़ता है ॥ ३७ ॥
एतदुन्मथ्य पातिष्ये भल्लेन निशितेन वै ।
ध्वजच्छेदं विदित्वाथ शम्बरो निष्क्रमिष्यति ॥ ३८ ॥
'आज मैं अपने तीखे भल्लसे इसको काट गिराऊँगा। अपने ध्वजको खण्डित हुआ जानकर शम्बरासुर युद्धके लिये निकलेगा ॥ ३८ ॥
ततो युद्धेन हत्त्वाऽऽजौ गन्तास्मि द्वारकां प्रति ।
इत्युक्त्वा सज्यमाचक्रे सशरं चापमोजसा ॥ ३९ ॥
'तब मैं युद्धके द्वारा समराङ्गणमे इसका वध करके द्वारका-पुरीको जाऊँगा।' मन-ही-मन ऐसा कहकर प्रद्युम्नने वलपूर्वक धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और उसपर बाणका संधान किया ॥
विच्छेद ध्वजरत्नं तु शम्बरस्य महाभुजः !
तच्छ्रुत्वा तु ध्वजच्छेदं प्रद्युम्नेन महात्मना ॥ ४० ॥
क्रुद्धस्त्वाज्ञापयामास पुत्रान् वै कालशम्बरः।
जिघांसध्वं महावीरा रौक्मिणेयं त्वरान्विताः ॥ ४१ ॥
नैवं वै द्रष्टुमिच्छामि मम विप्रियकारकम् ।
उस बाणके द्वारा महाबाहु प्रद्युम्नने शम्बरासुरके ध्वज-रत्नको काट डाला। महात्मा प्रद्युम्नके द्वारा ध्वजके खण्डित होनेका समाचार सुनकर कुपित हुए कालशम्बरने अपने पुत्रोंको आज्ञा दी, 'महावीरो ! इस रुक्मिणीपुत्रको तुरंत
६३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
मार डालनेकी चेष्टा करो। इसने मेरा अप्रिय किया है, अब मैं इस तरह इसे जीवित देखना नहीं चाहता' ॥ ४०-४१॥
श्रुत्वा तु शम्बराद्वाक्यं सुतास्ते शम्बरस्य ह ॥ ४२ ॥
संनद्धा निर्ययुर्हृष्टाः प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया।
शम्बरका यह आदेश सुनकर उसके पुत्र कवच आदिसे सुसज्जित हो प्रद्युम्नके वधकी इच्छासे हर्षपूर्वक निकले ॥४२॥
चित्रसेनोऽतिसेनश्च विष्वक्सेनो गदस्तथा ॥ ४३ ॥
श्रुतसेनः सुषेणस्तु सोमसेनो मनस्तथा।
सेनानी सैन्यहन्ता च सेनाहा सैनिकस्तथा ॥ ४४ ॥
सेनस्कन्धोऽतिसेनश्च सेनको जनकः सुतः।
सकालो विकलः शान्तः स शातान्तकरोऽशुचिः॥४५॥
कुम्भकेतुः सुदंष्ट्रश्च केशिरित्येवमादयः।
चित्रसेन, अतिसेन, विष्वक्सेन, गद, श्रुतसेन, सुषेण, सोमसेन, मन, सेनानी, सैन्यहन्ता, सेनाहा, सैनिक, सेनस्कन्ध, अतिसेन, सेनक, जनक, सुत, सकाल, विकल, शान्त, शातान्तकर, अशुचि, कुम्भकेतु, सुदंष्ट्र और केशि आदि उनके नाम थे ॥ ४३-४५॥
चक्रतोमरशूलानि पट्टिशानि परश्वधान् ॥ ४६ ॥
गृहीत्वा निर्ययुर्हृष्टा मन्युना परमाप्लुताः।
आह्वयंतस्तममित्रं वै तस्थुः संग्राममूर्धनि ॥ ४७ ॥
वे सब-के-सब हर्ष और उत्साहसे परिपूर्ण हो प्रद्युम्नके प्रति क्रोधसे भरकर चक्र, तोमर, शूल, पट्टिश और फरसे लिये निकले और अपने उस शत्रुको ललकारते हुए युद्धके मुहानेपर खड़े हो गये ॥ ४६-४७ ॥
प्रद्युम्नस्तु महाबाहु रथमारुह्य सत्वरम्।
निर्ययौ चापमादाय संग्रामाभिमुखस्तदा ॥ ४८ ॥
उस समय महाबाहु प्रद्युम्न तुरंत ही रथपर आरूढ़ हो धनुष लेकर युद्धक्षेत्रकी ओर चल दिये ॥ ४८ ॥
ततः प्रवृत्तं युद्धं तु तुमुलं लोमहर्षणम्।
शम्बरस्य तु पुत्राणां केशवस्य च सूनुना ॥ ४९ ॥
तदनन्तर शम्बरासुरके पुत्रोंका केशवकुमारके साथ भयंकर एवं रोमाञ्चकारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ४९ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः समहोरगचारणाः।
देवराजं पुरस्कृत्य विमानाग्रेषु धिष्ठिताः ॥ ५० ॥
फिर तो सब देवता, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग और चारण देवराज इन्द्रको आगे करके विमानोंके अग्रभागोंमें स्थित हुए ॥
नारदस्तुम्बुरुश्चैव हाहाहूहूश्च गायनाः।
अप्सरोभिः परिवृताः सर्वे तत्रावतस्थिरे ॥ ५१ ॥
नारद, तुम्बुरु, हाहा और हूहू—ये गान करनेवाले गन्धर्व अप्सराओंसे घिरकर सभी उन विमानोंमें स्थित थे ॥ ५१ ॥
देवराजप्रतीहारो गन्धर्वश्चित्रमद्भुतम्।
शशंस देवराजाय वज्रिणे तद्विचेष्टितम् ॥ ५२ ॥
देवराज इन्द्रका प्रतीहार गन्धर्व वज्रधारी इन्द्रको प्रद्युम्नकी विचित्र एवं अद्भुत चेष्टाएँ सुनाने लगा—॥५२॥
शम्बरस्य शतं पुत्रा एकः कृष्णस्य चात्मजः।
बहूनां युध्यतामेष कथं विजयमाप्नुयात् ॥ ५३ ॥
'एक ओर तो शम्बरासुरके सौ पुत्र हैं और दूसरी ओर श्रीकृष्णके एकमात्र पुत्र प्रद्युम्न हैं, बहुत-से योद्धाओंके सामने ये अकेले ही कैसे विजय पा सकते हैं' ॥ ५३ ॥
तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्य प्रहस्य बलसूदनः।
उवाच वचनं चेदं शृणु योऽस्य पराक्रमः ॥ ५४ ॥
उसका वह कथन सुनकर बलसूदन इन्द्र जोर-जोरसे हँस पड़े और बोले—'प्रद्युम्नका जो पराक्रम है, उसका वर्णन सुनो ॥
कामोऽयं पूर्वदेहे तु हरक्रोधाग्निना हतः।
रत्या प्रसादितो देवः कामपत्नया त्रिलोचनः।
परितुष्टेन देवेन वरमस्याः प्रदीयते ॥ ५५ ॥
'ये कामदेव हैं, जो पूर्वशरीरमें रहते समय भगवान् शंकरकी क्रोधाग्निसे भस्म हो गये थे, फिर कामपत्नी रतिने महादेवजीको प्रसन्न किया। प्रसन्न हुए महादेवजीने उसे वर दिया ॥ ५५ ॥
विष्णुर्मानुषदेहस्तु द्वारकायां भविष्यति।
तस्य पुत्रत्वमस्यैव भविष्यति न संशयः ॥ ५६ ॥
'भगवान् विष्णु मानव-शरीर धारण करके जब द्वारकामें निवास करेंगे, उस समय तुम्हारे स्वामी कामदेव उनके पुत्र होंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ५६ ॥
अनङ्ग इति विख्यातस्त्रैलोक्ये तु महायशाः।
तत्रोत्पन्नो महातेजाः शम्बरं घातयिष्यति ॥ ५७ ॥
'इस समय ये महायशस्वी कामदेव तीनों लोकोंमें अनङ्ग नामसे विख्यात होंगे और द्वारकामें उत्पन्न होनेपर महान् तेजसे सम्पन्न हो शम्बरासुरका वध करेंगे ॥ ५७ ॥
सप्ताहे जातमात्रे तु रुक्मिण्याः क्रोडसंस्थितम्।
आस्थाय शम्बरो मायां प्रद्युम्नमपनेष्यति ॥ ५८ ॥
'उनके जन्मसे केवल सात दिनका समय व्यतीत होनेपर रुक्मिणीकी गोदमें स्थित हुए प्रद्युम्नको मायाका आश्रय ले शम्बरासुर हर ले जायगा ॥ ५८ ॥
तद् गच्छ शम्बरगृहं भार्या मायावती भव।
मायारूपप्रतिच्छन्ना शम्बरं मोहयिष्यसि ॥ ५९ ॥
'अतः तू शम्बरासुरके घर जा और उसकी मायामयी भार्या बन जा। मायासे अपने यथार्थ रूपको छिपाकर तू शम्बरासुरको मोहमें डाले रहेगी ॥ ५९ ॥
| विष्णुपर्व ] | पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः | ६३१ |
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तत्र त्वमात्मनः कान्तं बालरूपं विवर्धय ।
प्राप्तयौवनदेहस्तु शम्बरं निहनिष्यति ॥ ६० ॥
‘वहाँ तुम्हें अपने प्रियतम कामदेव बालरूपमें प्राप्त होंगे। धायद्वारा उनका पालन-पोषण करके तुम उन्हें बड़ा बनाना। जब वे तरुण शरीर प्राप्त कर लेंगे, उस समय शम्बरासुरका वध करेंगे’ ॥ ६० ॥
ततस्त्वया सहानुङ्गो द्वारकां वै गमिष्यति ।
रमिष्यति त्वया सार्द्धं शैलपुत्र्या यथा ह्यहम् ॥ ६१ ॥
‘तदनन्तर कामदेव तुम्हारे साथ द्वारकामें जायेंगे और जैसे पार्वतीके साथ मैं रहता हूँ, उसी प्रकार तुम्हारे साथ वे आनन्दपूर्वक रहेंगे’ ॥ ६१ ॥
एवमादिश्य देवेशो जगाम पुरुषोत्तमः ।
कैलासं मेरुसंकाशं सिद्धचारणसेवितम् ॥ ६२ ॥
‘ऐसा आदेश देकर देवेश्वर पुरुषोत्तम शिव सिद्ध-चारण-सेवित कैलासपर्वतको, जो मेरुगिरिके समान है, चले गये ॥
कामपत्नी प्रणम्याथ देवदेवमुमापतिम् ।
जगाम शम्बरगृहं कालस्यान्तं प्रतीक्षती ॥ ६३ ॥
‘इसके बाद कामपत्नी रति देवाधिदेव उमापतिको प्रणाम करके कालके अन्तकी प्रतीक्षा करती हुई शम्बरासुरके घरको चली गयी ॥ ६३ ॥
एवमेष महाबाहुः शम्बरं निहनिष्यति ।
सह पुत्रेण प्रद्युम्नो हन्ता तस्य दुरात्मनः ॥ ६४ ॥
‘इस प्रकार ये महाबाहु प्रद्युम्न पुत्रोंसहित शम्बरासुरका संहार कर डालेंगे; क्योंकि वे ही इस दुरात्माका अन्त करनेवाले हैं’ ॥ ६४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरवधे चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरासुरका वधविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः
प्रद्युम्नद्वारा शम्बरासुरकी सेना और मन्त्रियोंका संहार
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रवृद्धं युद्धं तु तुमुलं लोमहर्षणम् ।
शम्बरस्य तु पुत्राणां रुक्मिण्या नन्दनस्य च ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! तत्पश्चात् शम्बरासुरके पुत्रों तथा रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नका घोर रोमाञ्चकारी युद्ध आरम्भ हुआ ॥ १ ॥
ततः क्रुद्धा महादैत्याः शरशक्तिपरश्वधान् ।
चक्रतोमरकुन्तानि भुशुण्डीर्मुसलानि च ॥ २ ॥
युगपत् पातयन्ति स्म प्रद्युम्नोपरि वेगिताः ।
उस समय क्रोधमें भरे हुए बड़े-बड़े वेगशाली दैत्य एक ही साथ प्रद्युम्नपर बाण, शक्ति, फरसे, चक्र, तोमर, कुन्त, भुशुण्डी और मुसलोंकी वर्षा करने लगे ॥ २॥ ॥
कार्ष्णायनिस्तु संक्रुद्धः सर्वास्त्रधनुषश्च्युतैः ॥ ३ ॥
एकैकं पञ्चभिः क्रुद्धश्चिच्छेद रणमूर्धनि ।
यह देख श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने सर्वास्त्रवर्णी धनुषसे छूटे हुए पाँच-पाँच बाणोंद्वारा उन्होंने युद्धके मुहानेपर शत्रुओंके प्रत्येक अस्त्रको क्रोधपूर्वक काट डाला ॥ ३॥ ॥
पुनरेवासुराः क्रुद्धाः सर्वे ते कृतनिश्चयाः ॥ ४ ॥
ववृषुः शरजालानि प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया ।
तब वे सभी असुर पुनः कुपित हो युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके प्रद्युम्नके वधकी इच्छासे बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ ४॥ ॥
ततः प्रकुपितोऽनङ्गो धनुरादाय सत्वरः ॥ ५ ॥
शम्बरस्य जघानाशु दश पुत्रान् महौजसः ।
इससे अनङ्गस्वरूप प्रद्युम्नका क्रोध बहुत बढ़ गया । उन्होंने तुरंत ही धनुष हाथमें लेकर अपने बाणोंद्वारा शम्बरासुरके दस महाबली पुत्रोंको तत्काल कालके गालमें भेज दिया ॥ ५॥ ॥
ततोऽपरेण भल्लेन कुपितः केशवात्मजः ॥ ६ ॥
चिच्छेदाशु शिरस्तस्य चित्रसेनस्य वीर्यवान् ।
तत्पश्चात् कुपित हुए पराक्रमी केशवकुमारने दूसरे भल्लसे बड़ी शीघ्रताके साथ चित्रसेनका मस्तक काट डाला ॥ ६॥ ॥
ततस्ते हतशेषास्तु समेत्य समयुद्ध्यत ॥ ७ ॥
शरवर्षे विमुञ्चन्तो ह्यभ्यधावञ्जिघांसितुम् ।
सतः संधाय बाणांस्ते विमुञ्चन्तो रणोत्सुकाः ॥ ८ ॥
तदनन्तर जो मरनेसे बच गये, वे सब एक साथ संगठित होकर युद्ध करने लगे । बाणोंकी वर्षा करते हुए उन्होंने प्रद्युम्नको मार डालनेकी इच्छासे उनपर धावा किया । वे बाणोंको धनुषपर रखकर युद्धके लिये उत्सुक हो उन्हें छोड़ने लगे ॥ ७-८ ॥
क्रीडन्निव महातेजाः शिरांस्तेषामपातयत् ।
६३२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
निहत्य समरे सर्वांश्छतमुत्तमधन्विनाम् ॥ ९ ॥
प्रद्युम्नः समराकाङ्क्षी तस्थौ संग्राममूर्धनि ।
महातेजस्वी प्रद्युम्न खेल-सा करते हुए इनके मस्तक काट-काटकर गिराने लगे । समराङ्गणमे जो सौ उत्तम धनुर्धर वीर थे, उन सबका संहार करके वे मनमें और भी युद्धकी अभिलाषा लिये संग्रामके मुहानेपर खड़े हो गये ॥ ९½॥
हतं पुत्रशतं श्रुत्वा शम्बरः क्रोधमादधे ॥ १० ॥
सूतं संचोदयामास रथं मे संप्रयोजय ।
अपने सौ पुत्रोंका वध हुआ सुनकर शम्बरासुरको बड़ा क्रोध हुआ । उसने सारथिको आदेश दिया कि मेरे रथको जोतो ॥ १०½ ॥
राज्ञो वाक्यं निशाम्याथ प्रणम्य शिरसा भुवि ॥ ११ ॥
ससैन्यं नोदयामास रथं स सुसमाहितम् ।
राजाकी यह बात सुनकर सारथिने पृथ्वीपर मस्तक टेककर प्रणाम किया और सेनासहित रथको पूरी सावधानीके साथ युद्धके लिये प्रेरित किया ॥ ११½ ॥
युक्तमृष्यसहस्रेण सर्पयोक्त्रेण योजितम् ॥ १२ ॥
शार्दूलचर्मसंविष्टं किङ्किणीजालमालिनम् ।
ईहामृगगणाकीर्णं पङ्क्तिभिर्विराजितम् ॥ १३ ॥
उस रथमें एक सहस्र मृग जुते हुए थे । वह सर्पोंकी रस्सियोंसे जोता गया था । वह रथ व्याघ्रचर्मसे ढका हुआ था, उसमें घुँघुरुओंकी माला शोभा दे रही थी, वह कृत्रिम पशु-पक्षियोंसे व्याप्त तथा दस चित्रभागोंसे विभूषित था ॥
ताराचित्रपिनद्धाङ्गं स्वर्णकूवरभूषितम् ।
सुपताकमहोच्छ्रायं मृगराजोग्रकेतनम् ॥ १४ ॥
उसके सारे अङ्ग तारिकाओंके चित्रसे व्याप्त थे । सोनेका कूबर उस रथकी शोभा बढ़ा रहा था । उसका बहुत ही ऊँचा भाग सुन्दर पताकाओंसे सुशोभित था। उसमें सिंहके चिह्नवाली उग्र ध्वजा फहरा रही थी ॥ १४ ॥
सुविभक्तवरणं च लोहेषावज्रकूवरम् ।
मन्दरोदग्रशिखरं चारुचामरभूषितम् ॥ १५ ॥
उस रथका आवरण सुन्दर विभागपूर्वक बना हुआ था । उसमें लोहेके हरसे और वज्रमणिजटित कूबर शोभा पाते थे । उसका शिखर मन्दराचलके समान ऊँचा था । वह सुन्दर चँवरसे विभूषित था ॥ १५ ॥
नक्षत्रमालापिहितं हेमदण्डसमाहितम् ।
विराजमानं श्रीमन्तमारोहच्छम्बरो रथम् ॥ १६ ॥
नक्षत्रोंकी मालाओंसे आवृत्त तथा सुवर्णमय दण्डसे सुस्थिर बने हुए उस शोभाशाली कान्तिमान् रथपर शम्बरासुर आरूढ़ हुआ ॥ १६ ॥
काञ्चनं चित्रसंनाहं धनुर्गृह्य शरांस्तथा ।
प्रस्थितः समराकाङ्क्षी मृत्युना परिचोदितः ॥ १७ ॥
सोनेका विचित्र कवच, धनुष और बाण धारण करके कालसे प्रेरित हो युद्धकी इच्छासे वह प्रस्थित हुआ ॥ १७ ॥
चतुर्भिः सचिवैः सार्द्धं सैन्येन महता वृतः ।
दुर्धरः केतुमाली च शत्रुहन्ता प्रमर्दनः ॥ १८ ॥
एतैः परिवृतोऽमात्यैर्युयुत्सुः प्रस्थितो रणे ।
उसके साथ चार मन्त्री थे और वह विशाल सेनासे घिरा हुआ था । दुर्धर, केतुमाली, शत्रुहन्ता और प्रमर्दन—इन मन्त्रियोंमें घिरा हुआ वह युद्धकी इच्छासे रणभूमिकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ १८½ ॥
दशनागसहस्राणि रथानां द्वे शते तथा ॥ १९ ॥
हयानां चाष्टसाहस्रैः प्रयुतश्च पदातिनाम् ।
एतैः परिवृतो योधैः शम्बरः प्रययौ तदा ॥ २० ॥
दस हजार हाथी, दो सौ रथ, आठ हजार घोड़े और दस लाख पैदल इतने योद्धाओंमे घिरे हुए शम्बरासुरने उस समय युद्धके लिये प्रस्थान किया ॥ १९-२० ॥
प्रयातस्य तु संग्रामे उत्पाता बहवोऽभवन् ।
गृध्रचक्राकुलं व्योम संध्याकाराभ्रनादितम् ॥ २१ ॥
युद्धके लिये जाते समय उसके सामने बहुत-से उत्पात प्रकट हुए । आकाशमें गृध्रोंका मण्डल मँडराने लगा । संध्याकालके समान लाल रङ्गके बादल गड़गड़ाने लगे ॥ २१ ॥
गर्जन्ति परुषं मेघा निर्घाताश्चाम्बरात् पतन् ।
शिवा विनेदुरशिवं सैन्यं संकालयन्महत् ॥ २२ ॥
मेघ बड़े कठोर शब्दमें गर्जना करने लगे, आकाशसे बिजली गिरने लगी, गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं, जिससे सेनाके महान् संहारकी सूचना मिलती थी ॥
ध्वजशीर्षेऽपतद्गृध्रः काङ्क्षन् वै दानवासृजम् ।
रथाग्रे पतितश्चास्य कबन्धो भुवि दृश्यते ॥ २३ ॥
गीध दानवोंके रक्तका पान करनेकी इच्छा रखकर उसकी ध्वजाके अग्रभागपर जा बैठा । उसके रथके सामने पृथ्वीपर कबन्ध पड़ा हुआ दिखायी देने लगा ॥ २३ ॥
चीचींकूचीति वाशन्ति शम्बरस्य रथोपरि ।
खर्भानुग्रस्त आदित्यः परिघैः परिवेष्टितः ॥ २४ ॥
शम्बरासुरके रथके ऊपर बहुत-से पक्षी 'चीचीं कूची' ऐसी बोली बोलने लगे । सूर्यको राहुने ग्रस लिया और उनपर अनेक घेरे पड़ गये ॥ २४ ॥
स्फुरते नयनं चास्य सव्यं भयनिवेदनम् ।
बाहुः प्रकम्पते सव्यः प्रास्खलन् रथवाजिनः ॥ २५ ॥
उसका बायाँ नेत्र फड़कने लगा, जो भयकी सूचना दे रहा था । बायीं भुजा काँपने लगी और रथके घोड़े लड़खड़ाकर गिरने लगे ॥ २५ ॥
विष्णुपूर्व ] पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः । ६३३
ध्वाङ्क्षो मूर्ध्नि निपतितः शम्बरस्य सुरारिणः ।
ववर्ष रुधिरं देवः शर्कराङ्गारमिश्रितम् ॥ २६ ॥
देवद्रोही शम्बरासुरके मस्तकपर कौआ जा बैठा, पर्जन्य-देव कंकड़ और अङ्गारोंसे मिश्रित रक्तकी वर्षा करने लगे ॥
उल्कापातसहस्राणि निपेतु रणमूर्धनि ।
प्रतोदो न्यपतद्धस्तात् सारथेर्हययायिनः ॥ २७ ॥
संग्रामके मुहानेपर सहस्रों उल्कापात होने लगे, घोड़े हाँकनेवाले सारथिके हाथसे चाबुक गिर पड़ा ॥ २७ ॥
एतानचिन्तयित्वा तु उत्पातान् समुपस्थितान् ।
प्रययौ शम्बरः क्रुद्धः प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया ॥ २८ ॥
इन उपस्थित हुए उत्पातोंकी कोई परवा न करके क्रोधमें भरा हुआ शम्बरासुर प्रद्युम्नको मार डालनेकी इच्छासे आगे बढ़ा ॥ २८ ॥
भेरीमृदङ्गशङ्खानां पणवानकदुन्दुभेः ।
युगपन्नाद्यमानानां पृथिवी समकम्पत ॥ २९ ॥
उस समय एक ही साथ भेरी, मृदङ्ग, शङ्ख, पणव, आनक और दुन्दुभि आदि बाजे बज उठे। उनकी तुमुल ध्वनिसे यह पृथ्वी काँपने लगी ॥ २९ ॥
तेन शब्देन महता संत्रस्ता मृगपक्षिणः ।
नमन्ताद् दुद्रुवुस्तस्माद् भयविकलवचेतसः ॥ ३० ॥
उस महान् शब्दसे सारे पशु-पक्षी संत्रस्त हो गये और भयसे व्याकुलचित्त होकर सब ओर भागने लगे ॥ ३० ॥
रणमध्ये स्थितः कार्ष्णिश्चिन्तयन् निधनं रिपोः ।
सैन्यैः परिवृतोऽसंख्यैर्युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३१ ॥
उस समय रणभूमिके मध्यभागमें शत्रुके वधका चिन्तन करते हुए श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न असंख्य सेनाओंसे घिरे हुए युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके खड़े हुए थे ॥ ३१ ॥
क्रुद्धः शरसहस्रेण प्रद्युम्नं समताडयत् ।
सम्प्राप्तांश्चैव तान् बाणांश्चिच्छेद कृतहस्तवत् ॥ ३२ ॥
शम्बरासुरने कुपित होकर प्रद्युम्नपर एक हजार बाणोंका प्रहार किया, उन बाणोंको अपने पास आते ही प्रद्युम्नने एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति काट डाला ॥ ३२ ॥
प्रद्युम्नो धनुरानम्य शरवर्षं मुमोच ह ।
तस्मिन् सैन्ये न कोऽप्यस्ति यो न विद्धः शरेण वै ॥ ३३ ॥
अब प्रद्युम्न धनुष लेकर बाणोंकी वर्षा करने लगे। उस समय उस सेनामें ऐसा कोई भी सैनिक नहीं था, जो उनके बाणोंसे विद्ध न हुआ हो ॥ ३३ ॥
प्रद्युम्नशरपातेन तत् सैन्यं विमुखीकृतम् ।
शम्बरस्य तथाभ्याशे स्थितं संहृत्य भीतवत् ॥ ३४ ॥
प्रद्युम्नके बाणोंके प्रहारसे वह सारी सेना युद्धसे विमुख हो गयी तथा भयभीतकी भाँति शम्बरासुरके समीप सिमटकर खड़ी हो गयी ॥ ३४ ॥
स्वबलं विद्रुतं दृष्ट्वा शम्बरः क्रोधमूर्च्छितः ।
आज्ञापयामास तदा सचिबान् दानवेश्वरः ॥ ३५ ॥
अपनी सेनाको भागती देख दानवराज शम्बर क्रोधसे अचेत-सा हो गया। उस समय उसने अपने मन्त्रियोंको आज्ञा दी—॥ ३५ ॥
गच्छध्वं मन्नियोगेन प्रहरध्वं रिपोः सुतम् ।
नोपेक्षणीयः शत्रुर्वै वध्यतां क्षिप्रेमव वै ॥ ३६ ॥
'तुम सब लोग जाओ और मेरे आदेशसे शत्रुके उस पुत्र-पर प्रहार करो। तुम्हें इस शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसे शीघ्र ही मार डालो ॥ ३६ ॥
उपेक्षित इव व्याधिः शरीरं नाशयेद् ध्रुवम् ।
तदेष दुर्मतिः पापो वध्यतां मत्प्रियेप्सया ॥ ३७ ॥
'यदि इसकी उपेक्षा की गयी तो यह उपेक्षित रोगकी भाँति निश्चय ही शरीरका नाश कर डालेगा, अतः मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे इस दुर्बुद्धि पापीका वध कर डालो' ॥ ३७ ॥
ततस्ते सचिवाः क्रुद्धाः शिरसा गृह्य शासनम् ।
शरवर्षं विमुञ्चन्तस्त्वरिता नोदयन् रथान् ॥ ३८ ॥
तब उन मन्त्रियोंने स्वामीकी आज्ञाको शिरोधार्य करके क्रोधपूर्वक बाणवर्षा करते हुए बड़ी उतावलीके साथ रथोंको हाँका ॥ ३८ ॥
तान् दृष्ट्वा धावतः संख्ये क्रुद्धो मकरकेतनः ।
चापमुद्यम्य सम्भ्रान्तस्तस्थौ प्रमुखतो बली ॥ ३९ ॥
युद्धमें उन्हें धावा करते देख बलवान् मकरध्वज प्रद्युम्न भी कुपित हो उठे और बड़े वेगसे धनुष उठाकर शत्रुओंके सामने खड़े हो गये ॥ ३९ ॥
दुर्धरं पञ्चविंशत्या शरैः संनतपर्वभिः ।
विभेद सुमहातेजाः केतुमालिं त्रिषष्टिभिः ॥ ४० ॥
सप्तत्या शत्रुहन्तारं द्व्यशीत्या तु प्रमर्दनम् ।
विभेद परमावर्षी रुक्मिण्या नन्दिवर्धनः ॥ ४१ ॥
रुक्मिणीका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी प्रद्युम्नने अत्यन्त अमर्षमें भरकर झुकी हुई गाँठवाले पचीस बाणोंसे दुर्धरको, तिरसठ बाणोंसे केतुमालीको, सत्तर बाणोंसे शत्रुहन्ताको और बयासी बाणोंसे प्रमर्दनको घायल कर दिया।
ततस्ते सचिवाः क्रुद्धाः प्रद्युम्नं शरवृष्टिभिः ।
एकैकशो विभेदाजौ षष्टिभिः षष्टिभिः शरैः ॥ ४२ ॥
तदनन्तर वे कुपित हुए मन्त्री भी प्रद्युम्नको बाण-वर्षाका निशाना बनाने लगे। उनमेंसे एक-एकने प्रद्युम्नको साठ-साठ बाण मारे ॥ ४२ ॥
तानप्राप्ताञ्छरान् बाणैश्चिच्छेद मकरध्वजः ।
ततोऽर्द्धचन्द्रमादाय दुर्धरस्य स सारथिम् ॥ ४३ ॥
६३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
जघान पश्यतां राज्ञां सर्वेषां सैनिकस्य वै।
उन बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही प्रद्युम्नने तीखे सायकोंसे काट डाला। तत्पश्चात् एक अर्धचन्द्राकार बाण लेकर समस्त राजाओं और उनके सैनिकोंके देखते-देखते दुर्धरके सारथिको मार डाला ॥ ४३ १/२ ॥
चतुर्भीरथ नाराचैः सुपर्वैः कङ्कतेजितैः ॥ ४४ ॥
जघान चतुरः सोऽश्वान् दुर्धरस्य रथं प्रति ।
फिर उत्तम गाँठवाले, कङ्कपत्रयुक्त चार तीखे नाराचोंद्वारा दुर्धरके रथसम्बन्धी चार घोड़ोंको कालके गालमें भेज दिया ॥ ४४ १/२ ॥
एकेन योक्त्रं छत्रं च ध्वजमेकेन वन्धुरम् ॥ ४५ ॥
षष्ट्या च युगचक्राक्षं चिच्छेद मकरध्वजः ।
इसके बाद एक बाणसे रथको जोड़नेवाली रस्सी, छत्र और ध्वज तथा एक बाणसे बन्धुरके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर साठ बाणोंसे प्रद्युम्नने रथके जुए, धुरे और पहियोंको भी काट डाला ॥ ४५ १/२ ॥
अथापरं शरं गृह्य कङ्कपत्रं सुतेजितम् ॥ ४६ ॥
मुमोच हृदये तस्य दुर्द्धरस्यान्त्यजीविनः ।
तदनन्तर प्रद्युम्नने कङ्कपक्षीके पर लगे हुए और अत्यन्त तेज किये हुए एक बाणको लेकर दूसरेके आश्रयपर जीनेवाले दुर्धरके हृदयपर छोड़ा ॥ ४६ १/२ ॥
स गतासुर्गतश्रीको गतसत्त्वो गतप्रभः ॥ ४७ ॥
निपपात रथोपस्थात् क्षीणपुण्य इव ग्रहः ।
तब वह दुर्धर निष्प्राण हो शोभा और सत्त्वसे रहित हो गया। उसकी कान्ति फीकी पड़ गयी। वह रथकी बैठकमेंसे नीचे गिर पड़ा। उस समय वह, जिसका पुण्य क्षीण हो गया हो ऐसे ग्रहके समान दीखने लगा ॥ ४७ १/२ ॥
दुर्धरे निहते शूरे दानवे दानवेश्वरः ॥ ४८ ॥
केतुमाली शरव्रातैरभिदुद्राव कृष्णजम् ।
दुर्धर शूर दानव था, उसके मारे जानेपर दानवेश्वर केतुमाली भी कृष्णकुमार प्रद्युम्नपर बाणोंके समूहोंको छोड़ता हुआ चढ़ आया ॥ ४८ १/२ ॥
प्रद्युम्नमथ संक्रुद्धो भ्रुकुटीभीषणाननः ॥ ४९ ॥
कृत्याभ्यधावत् सहसा तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
तदनन्तर क्रोधमें भरा हुआ केतुमाली भृकुटी चढ़ाकर मुखको भीषण बना प्रद्युम्नपर सहसा दौड़ पड़ा और उनसे कहने लगा 'खड़ा रह ! खड़ा रह !' ॥ ४९ १/२ ॥
संक्रुद्धः कृष्णसूनुस्तु शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ५० ॥
पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव यथा घनः ।
यह सुनकर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नको बड़ा क्रोध हुआ, उन्होंने बाणोंकी वर्षा करके केतुमालीको ढक दिया, ठीक उसी तरह जैसे वर्षा ऋतुमें बादल जलकी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर देता है ॥ ५० १/२ ॥
स विद्धो दानवामात्यः प्रद्युम्नेन धनुष्मता ॥ ५१ ॥
चक्रमादाय चिक्षेप प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया ।
धनुर्धर प्रद्युम्नके द्वारा घायल हुए दानवमन्त्री केतुमालीने प्रद्युम्नका वध करनेकी इच्छासे चक्र लेकर उनके ऊपर चलाया ॥ ५१ १/२ ॥
तं तु प्राप्तं सहस्रारं कृष्णचक्रसमद्युतिम् ॥ ५२ ॥
निपत्योत्पत्य सहसा सर्वेषामेव पश्यताम् ।
तेनैव तस्य चिच्छेद केतुमालेः शिरस्तदा ॥ ५३ ॥
श्रीकृष्णके चक्रके समान तेजस्वी उस सहस्रार चक्रको पास आया देख प्रद्युम्नने सहसा उछलकर उसे पकड़ लिया और सबके देखते-देखते उस समय उसी चक्रसे केतुमालीका सिर काट लिया ॥ ५२-५३ ॥
तद् दृष्ट्वा कर्म विपुलं रौक्मिणेयस्य देवराट् ।
विस्मयं परमं प्राप्तः सर्वैर्देवगणैः सह ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव पुष्पवर्षैरवाकिरन् ॥ ५४ ॥
रुक्मिणीकुमारका वह महान् कर्म देखकर समस्त देवताओंसहित देवराज इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। उस समय गन्धर्वों और अप्सराओंने उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा की ॥ ५४ ॥
केतुमालिं हतं दृष्ट्वा शत्रुहन्ता प्रमर्दनः ।
महाबलसमूहेन प्रद्युम्नमथ दुद्रुवे ॥ ५५ ॥
केतुमालीको मारा गया देख शत्रुहन्ता और प्रमर्दन विशाल सैन्यसमूहके साथ प्रद्युम्नपर टूट पड़े ॥ ५५ ॥
ते गदां मुसलं चक्रं प्रासतोमरसायकान् ।
भिन्दिपालान् कुठारांश्च भास्वरान् कूटमुद्गरान् ॥ ५६ ॥
युगपत् संक्षिपन्ति स्म वधार्थं कृष्णनन्दने ।
वे गदा, मुसल, चक्र, प्रास, तोमर, सायक, भिन्दिपाल, कुठार और चमकीले कूटमुद्गरोंको एक साथ ही श्रीकृष्णकुमारके वधके लिये उनके ऊपर फेंकने लगे ॥ ५६ १/२ ॥
सोऽपि तान्यस्त्रजालानि शस्त्रजालैरनेकधा ॥ ५७ ॥
चिच्छेद बहुधा वीरो दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
वीर प्रद्युम्नने भी अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए शस्त्रसमूहोंद्वारा शत्रुओंके अस्त्र-जालके बारंबार बहुतेरे टुकड़े कर डाले ॥ ५७ १/२ ॥
गजान् सोऽभ्यहनत् क्रुद्धो गजारोहान् सहस्रशः ॥ ५८ ॥
रथान् सारथिभिः सार्धं हयांश्चैव ममर्द् ह ।
पातयंस्ताञ्छरव्रातैर्नाविद्धः कश्चिदीक्ष्यते ॥ ५९ ॥
उन्होंने कुपित होकर सहस्रों हाथियों और हाथीसवारोंको मार डाला। सारथियोंसहित रथों और घोड़ोंको भी रौंद-
विष्णुपर्व ] पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ६३५
कर मिट्टीमें मिला दिया। उन सबको धराशायी करते हुए प्रद्युम्नने अपने बाण-समूहोंद्वारा समस्त सैनिकोंको बींध डाला। कोई भी ऐसा नहीं दिखायी देता था, जो उनके बाणोंसे विद्ध न हुआ हो ॥ ५८-५९ ॥
एवं सर्वाणि सैन्यानि ममन्थ मकरध्वजः ।
नदीं प्रावर्तयद् घोरां शोणिताम्बुतरङ्गिणीम् ॥ ६० ॥
इस प्रकार मकरध्वजने शत्रुको सारी सेनाओंको मथ डाला और एक भयानक नदी बहा दी, जो रक्तमय जलकी तरङ्गोंसे सुशोभित होती थी ॥ ६० ॥
मुक्ताहारोर्मिबहुलां मांसमेदःसपङ्किनीम् ।
छत्रद्वीपां शरावर्तां रथैः पुलिनमण्डिताम् ॥ ६१ ॥
मोतियोंके हार उसमें उठती हुई बहुसंख्यक लहरोंके समान प्रतीत होते थे। वसा और मेदे कीचके समान जान पड़ते थे। छत्र द्वीप और बाण आवर्त (भँवर) के समान थे। रथ ही उस नदीके तट बनकर उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६१ ॥
केयूरकुण्डलाकूर्मीं ध्वजमत्स्यविभूषिताम् ।
नागग्राहवतीं रौद्रामसिनक्रविभूषिताम् ॥ ६२ ॥
केयूर और कुण्डल उसमें कछुएका भ्रम उत्पन्न करते थे। ध्वजरूपी मत्स्य उसकी शोभा बढ़ाते थे। हाथीरूपी ग्राहोंसे युक्त होनेके कारण वह बड़ी भयङ्कर जान पड़ती थी। खड्गरूपी नाकें उसके आभूषण थे ॥ ६२ ॥
केशशैवलसंछन्नां श्रोणिसूत्रमृणालिकाम् ।
वक्त्राननसुपद्मां च हंसचामरवीजिताम् ॥ ६३ ॥
वह केशरुपी सेवारसे ढकी हुई थी, कटिसूत्र कमल-नालके समान प्रतीत होते थे, सुन्दर मुख ही उसमें खिले हुए मनोहर कमल थे, हिलते हुए चँवर हंसोंके पक्ष-सञ्चालन-की भाँति प्रतीत होते थे, मानो उनके द्वारा उस नदीको हवा की जा रही थी ॥ ६३ ॥
शिरस्तिमिसमाकीर्णां शोणितौघप्रवर्तिनीम् ।
नदीं दुस्तरणीं भीमामनङ्गेन प्रवर्तिताम् ॥ ६४ ॥
दुष्प्रेक्षां दुर्गमां रौद्रां हीनतेजःसुदुस्तराम् ।
शस्त्रग्राहवतीं घोरां यमराष्ट्रविवर्द्धनीम् ॥ ६५ ॥
(हाथी आदि पशुओंके कटे हुए) मस्तक उसमें तिमि नामक मत्स्यके समान सब ओर व्याप्त थे। वह शोणितकी वेगयुक्त धारा बहा रही थी। अनङ्गरूप प्रद्युम्नके द्वारा बहायी गयी वह रक्तनदी अत्यन्त दुस्तर, दुर्लक्ष्य, दुर्गम एवं भयंकर थी। तेजोहीन पुरुषोंके लिये उसे पार करना अत्यन्त कठिन था। शस्त्ररूपी ग्राहोंसे युक्त वह घोर नदी यमराजके राज्यकी वृद्धि कर रही थी ॥ ६४-६५ ॥
तत्र रुक्मिसुतः श्रीमान् विलोडयति धन्विनः ।
शत्रुहन्तारमाभित्य शरानभ्यकिरद् बहून् ॥ ६६ ॥
उस युद्धमें श्रीमान् रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नने बहुत-से धनुर्धरोंको मथ डाला और शत्रुहन्तापर अनेक बाणोंकी वर्षा की ॥ ६६ ॥
शत्रुहन्ता पुनः क्रुद्धो मुमोच शरमुत्तमम् ।
प्रद्युम्नस्य समासाद्य हृदये निपपात ह ॥ ६७ ॥
तब पुनः क्रोधमें भरे हुए शत्रुहन्ताने एक उत्तम बाण छोड़ा, जो प्रद्युम्नकी छातीपर जाकर लगा ॥ ६७ ॥
स विद्धस्तेन बाणेन प्रद्युम्नो न व्यकम्पत ।
शक्तिं जग्राह बलवाञ्छत्रुहन्त्रे मुमूर्षवे ॥ ६८ ॥
उस बाणसे घायल होकर बलवान् प्रद्युम्न तनिक भी विचलित नहीं हुए, उन्होंने मरणासन्न शत्रुहन्ताके लिये एक शक्ति उठायी ॥ ६८ ॥
सा क्षिप्ता रौक्मिणेयेन शक्तिर्ज्वालाकुला रणे ।
पपात हृदयं भित्त्वा शक्राशनिसमस्वना ॥ ६९ ॥
रणभूमिमें रुक्मिणीकुमारने वह अग्निकी ज्वालासे युक्त शक्ति चला दी। इन्द्रके वज्रकी भाँति गड़गड़ाहट पैदा करती हुई वह शक्ति शत्रुहन्ताका हृदय विदीर्ण करके पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ६९ ॥
स भिन्नहृच्च त्रस्ताङ्गो मुक्तमर्मास्थिबन्धनः ।
पपात रुधिरोद्गारी शत्रुहन्ता महाबलः ॥ ७० ॥
हृदय विदीर्ण हो जानेसे उसके सारे अङ्ग शिथिल हो गये, मर्मस्थानों और अस्थियोंके बन्धन खुल गये, उस दशामें महाबली शत्रुहन्ता रक्त वमन करता हुआ धरतीपर गिर पड़ा ॥ ७० ॥
पतितं शत्रुहन्तारं दृष्ट्वा तस्थौ प्रमर्दनः ।
जग्राह मुसलं सोऽथ वचनं चेदमाददे ॥ ७१ ॥
शत्रुहन्ताको धराशायी हुआ देख प्रमर्दन युद्धके लिये डट गया। उसने मुसल हाथमें ले लिया और यह बात कही—॥ ७१ ॥
तिष्ठ किं प्राकृतैरेभिः करिष्यसि रणप्रियः ।
मां योधयस्व दुर्बुद्धे ततस्त्वं न भविष्यसि ॥ ७२ ॥
'अरे ! खड़ा रह ! तुझे युद्ध बड़ा प्रिय है न ? इन प्राकृत सैनिकोंके मारनेसे तू क्या लाभ उठायेगा। दुर्बुद्धे ! तू मेरे साथ युद्ध कर, फिर तो तू नहीं हो जायगा ॥ ७२ ॥
वृष्णिवंशकुले जातः शत्रुरस्मत्पिता तव ।
पुत्रं हन्तास्म्यहं तस्य ततोऽसौ निहतो भवेत् ॥ ७३ ॥
'तू वृष्णिकुलमें उत्पन्न हुआ है, तेरा पिता हमलोगोंका शत्रु है, मैं उसके पुत्रको मार डालूँगा, फिर वह स्वयं ही मर जायगा ॥ ७३ ॥
मृतेन तेन दुर्बुद्धे सर्वदेवक्षयो भवेत् ।
दैतेया दानवाः सर्वे मोदन्तां हतशत्रवः ॥ ७४ ॥
६३६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'दुर्बुद्धे ! उसके मरनेसे समस्त देवताओंका क्षय हो जायगा, इस प्रकार अपने शत्रुओंके मर जानेपर समस्त दैत्य और दानव आनन्दके भागी होंगे ॥ ७४ ॥
हते त्वयि ममास्त्रेण त्वत्समुत्थैश्च शोणितैः। शम्बरस्य तु पुत्राणां करोम्युदकसक्रियाम् ॥ ७५ ॥
'मेरे अस्त्रसे तेरा वध हो जानेपर तेरे ही रक्तसे मैं शम्बरासुरके पुत्रोंका तर्पण करूँगा ॥ ७५ ॥
अद्य सा भीष्मकसुता करुणं विलपिष्यति । निहतं त्वां च श्रुत्वैव यौवनस्थं गतायुषम् ॥ ७६ ॥
'आज वह भीष्मककी पुत्री रुक्मिणी तो तुझ-जैसे नौजवान बेटेको मारा गया और गतायु हुआ सुनकर निश्चय ही करुण विलाप करेगी ॥ ७६ ॥
स ते पिता चक्रधरो निष्फलाशो भविष्यति । हतं त्वां संविदित्वाथ प्राणांस्त्यक्ष्यतिमन्दधीः ॥ ७७ ॥
'तेरे उस पिता चक्रधारी कृष्णकी आशा अब निष्फल हो जायगी। तुझे मारा गया जानकर वह मन्दबुद्धि मानव अपने प्राणोंका परित्याग कर देगा' ॥ ७७ ॥
इत्युक्त्वा परिघेणाशु ताडयद् रुक्मिणीसुतम् । ताडितो हि महातेजा रौक्मिणेयः प्रतापवान् ॥ ७८ ॥ दोर्भ्यामुत्क्षिप्य तस्यैव रथं मह्यां व्यचूर्णयत् ।
ऐसा कहकर उसने तुरंत ही रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नपर परिघसे प्रहार किया। उससे ताड़ित हुए महान् तेजस्वी और प्रतापी प्रद्युम्नने अपनी दोनों भुजाओंसे उसके रथको ही ऊपरको उछाल दिया और पृथ्वीपर गिराकर चूर-चूर कर डाला ॥ ७८३ ॥
सोऽवप्लुत्य रथात् तस्मात् पदातिरवतस्थिवान् ॥७९॥ तां गदां गृह्य सहसा रौक्मिणेयमुपाद्रवत् । तयैव गदया कामः प्रमर्दनमपोथयत् ॥ ८० ॥
प्रमर्दन उस रथसे कूदकर पैदल ही युद्धके लिये खड़ा हो गया और अपनी उस प्रसिद्ध गदाको हाथमें लेकर उसने सहसा रुक्मिणीकुमारपर आक्रमण किया, परंतु प्रद्युम्नने उसकी फेंकी हुई उस गदासे ही प्रमर्दनको मार गिराया ॥
हते प्रमर्दने दैत्ये दृष्ट्वा सर्वे प्रदुद्रुवुः । न शक्ताः प्रमुखे स्थातुं सिंहत्रासाद् गजा इव ॥ ८१ ॥
दैत्य प्रमर्दनके मारे जानेपर समस्त असुर सैनिक भाग खड़े हुए। सिंहके भयसे भागे हुए हाथियोंके समान वे प्रद्युम्नके सामने ठहर न सके ॥ ८१ ॥
सारमेयं यथा दृष्ट्वाविगणो वै पलायते । तथा सेना विपद्यन्ती प्रद्युम्नस्य भयार्दिता ॥ ८२ ॥
जैसे शिकारी कुत्तेको देखकर भेड़ोंका समूह पलायन करने लगता है, उसी प्रकार प्रद्युम्नके भयसे पीड़ित हुई दैत्यसेना विषादग्रस्त होकर भागने लगी ॥ ८२ ॥
क्षतजादिग्धवस्त्रा चै मुक्तकेशा विशोभना । रजस्वलेव युवतिः सेना समवगूहते ॥ ८३ ॥
उन सब सैनिकोंके वस्त्र खूनसे रँग गये थे, केश खुले हुए थे। वे शोभाहीन हो गये थे। इस अवस्थामें वह दैत्यसेना रजस्वला युवतीकी भाँति कहीं छिप जानेका प्रयत्न करने लगी ॥ ८३ ॥
मदनशरविभिन्ना सैनिकानभ्ययायाद् युवतिसदृशवेषा साध्वसैः पीड्यमाना । रतिसमरमशक्ता वीक्षितुं सोच्छ्वसन्ती स्वगृहमगनकामा नेच्छते स्थातुमत्र ॥ ८४ ॥
युवतीके समान वेष धारण करनेवाली वह दैत्यसेना कामदेव (प्रद्युम्न) के बाणोंसे घायल हो सैनिकोंकी ओर चली। उस समय वह भय आदिसे पीड़ित हो रही थी। समररूपी सुरतको तो देखनेमें भी असमर्थ थी, केवल उच्छ्वास लेती हुई अपने घरको जाना चाहने लगी, वहाँ ठहरना नहीं ॥ ८४ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरसैन्यभङ्गो नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरासुरकी सेनाका पलायनविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
षडधिकशततमोऽध्यायः
शम्बरासुर और प्रद्युम्नका मायामय युद्ध, शम्बरकी चिन्ता, देवराज इन्द्रकी आज्ञासे नारदजीका प्रद्युम्नको उनके पूर्वस्वरूपका स्मरण दिलाना और आवश्यक कर्तव्य सुझाना
वैशम्पायन उवाच
यावदेनं शरैर्हन्मि मम विप्रियकारकम् ।
शम्बरस्तु ततः क्रुद्धः सूतमाह विशाम्पते ।
शत्रुप्रमुखतो वीर रथं मे वाहय द्रुतम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—प्रजानाथ ! तब शम्बरासुरने कुपित होकर अपने सारथिसे कहा—'वीर ! तुम शीघ्र