विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 644, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६२२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
द्व्यधिकशततमोऽध्यायः
नारदजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णके अद्भुत कर्मोंका वर्णन
नारद उवाच
सादिता मौरवाः पाशा निसुन्दनरकौ हतौ।
कृतः क्षेम्यः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं—यादवो ! भगवान् श्रीकृष्णने मुर दैत्यके पाश काट डाले, निसुन्द और नरकासुरको मार डाला तथा प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सब लोगोंके लिये क्षेममय-निष्कण्टक बना दिया ॥ १ ॥
शौरिणा पृथिवीपालास्त्रासिताः स्पर्द्धिनो रणे।
धनुषश्च निनादेन पाञ्चजन्यस्वनेन च ॥ २ ॥
शूरनन्दन श्रीकृष्णने अपने धनुषकी टंकार और पाञ्चजन्य शङ्खके हुंकारसे उन समस्त भूपालोंको आतङ्कित कर दिया, जो युद्धमें उनके साथ स्पर्धा रखते थे ॥ २ ॥
मेघप्रख्यै रथानीकैर्दाक्षिणात्यैः सुरक्षितम्।
रुक्मिणं युधि निर्जित्य महाबलपराक्रमम् ॥ ३ ॥
रुक्मिणीमाजहाराशु केशवो वृष्णपुङ्गवः॥ ३ ॥
ततः पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा।
उवाह महिषीं भोज्यां शङ्खचक्रगदासिभृत् ॥ ४ ॥
मेघोंकी घटाके समान छायी हुई दक्षिणदेशीय रथ-सेनाओंसे सुरक्षित तथा महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न रुक्मीको युद्धमे पराजित करके इन वृष्णिकुलतिलक केशवने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले एवं सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा रुक्मिणीको शीघ्र हर लिया। इस प्रकार शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले श्रीकृष्णने भोजकुल-नन्दिनी रुक्मिणीके साथ विवाह किया और उन्हें अपनी पटरानी बनाया ॥ ३-४ ॥
जारूध्यामाहृतिः क्राथः शिशुपालश्च निर्जितः।
वक्रश्च सह सैन्येन शतधन्वाथ निर्जितः ॥ ५ ॥
जारूथी नगरीमें आहूति, क्राथ एवं शिशुपालको परास्त किया, सेनासहित दन्तवक्त्र और शतधन्वाको भी हरा दिया ॥ ५ ॥
इन्द्रद्युम्नो हतः कोपाद् यवनश्च कशेरुमान्।
हतः सौभपतिः श्रीमाञ्छाल्वश्च दृढधन्वना ॥ ६ ॥
इन्होंने इन्द्रद्युम्न, कालयवन एवं कशेरुमान्का भी क्रोधपूर्वक वध किया है तथा हाथमें सुदृढ़ धनुष धारण करके सौभविमानके स्वामी श्रीमान् राजा शाल्वको भी मार डाला है ॥ ६ ॥
पर्वतानां सहस्रं च चक्रेण पुरुषोत्तमः।
विकीर्य पुण्डरीकाक्षो द्युमत्सेनं व्यपोथयत् ॥ ७ ॥
इन कमलनयन पुरुषोत्तमने चक्रद्वारा सहस्रों पर्वतोंको टूक-टूक करके बिखेर दिया और द्युमत्सेनको मार गिराया ॥ ७ ॥
महेन्द्रशिखरे चैव निमेषान्तरचारिणौ।
जग्राह पुरुषव्याघ्रो वरुणस्याभितश्चरौ ॥ ८ ॥
इरावत्यां महाभोजावग्निसूर्यसमौ युधि।
गोपतिस्तालकेतुश्च निहतौ शार्ङ्गधन्वना ॥ ९ ॥
जो युद्धमें अग्नि और सूर्यके समान पराक्रमी थे और वरुण देवताके उभय-पार्श्वमे विचरण करते थे, जिनमें पलक मारते-मारते एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँच जानेकी शक्ति थी, वे गोपति और तालकेतु नामक महाभोज महेन्द्र पर्वतके शिखरपर पुरुषसिंह श्रीकृष्णद्वारा पकड़े गये और उन शार्ङ्गधन्वाके हाथसे इरावती नदीके तटपर मारे गये ॥ ८-९ ॥
अक्षप्रपतने चैव डिम्भो हंसश्च दानवौ।
उभौ तावपि कृष्णेन सानुगौ विनिपातितौ ॥ १० ॥
इन्हीं श्रीकृष्णने डिम्भ और हंस नामक दोनों दानवोंको अक्षप्रपतन नामक स्थानमे सेवकोंसहित मार गिराया ॥ १० ॥
दग्धा वाराणसी चैव केशवेन महात्मना।
सराष्ट्रः सानुबन्धश्च काशीनामधिपो हतः ॥ ११ ॥
महात्मा केशवने वाराणसी नगरी जला दी तथा राष्ट्रके लोगों और सगे-सम्बन्धियोंसहित काशिराजको कालके गालमें भेज दिया ॥ ११ ॥
विजित्य च यमं संख्ये शरैः संनतपर्वभिः।
अथैन्द्रसेनिरानीतः कृष्णेनाद्भुतकर्मणा ॥ १२ ॥
इन अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णने युद्धमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा यमराजको जीतकर वहाँसे इन्द्रसेनके पुत्रको वापस लौटाया था ॥ १२ ॥
सहितः सर्वयादोभिः सागरेषु महाबलः।
प्राप्य लोहितकूटं च कृष्णेन वरुणो जितः ॥ १३ ॥
इन्हीं श्रीकृष्णने समुद्रोंमें तथा लोहित शिखरपर जाकर समस्त जलजन्तुओंसहित महाबली वरुणको भी जीता था ॥ १३ ॥
महेन्द्रभवने जातो देवैर्गुप्तो महात्मभिः।
अचिन्तयित्वा देवेन्द्रं पारिजातद्रुमो हृतः ॥ १४ ॥
जो महेन्द्रभवनमें उत्पन्न होकर सदा महामनस्वी देवताओंद्वारा सुरक्षित रखा गया था, उस पारिजात नामक वृक्षको इन श्रीकृष्णने देवराजकी परवा न करके हर लिया ॥ १४ ॥