विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 643, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः ६२१
रङ्गद्वारे गजं मत्तं प्रभूतायुधकल्पितम्।
शूरैरधिष्ठितं कंसः स्थापयामास वीर्यवान् ॥ ५९ ॥
'पराक्रमी कंसने रङ्गशालाके द्वारपर शूरवीर महावतोंसे युक्त एक मतवाले हाथीको खड़ा करा रखा था, जो बहुसंख्यक अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित था ॥ ५९ ॥
यदा हि स महातेजा रामकृष्णौ समागतौ ।
शुश्राव पुरुषव्याघ्रौ सूर्याचन्द्रमसाविव ॥ ६० ॥
तदाप्रभृति यत्नोऽभूद् रक्षां प्रति नराधिप ।
न च शिश्ये सुखं रात्रौ रामकृष्णौ विचिन्तयन् ॥ ६१॥
'नरेश्वर ! महातेजस्वी कंसने जब सुना कि सूर्य और चन्द्रमाके समान दोनों भाई पुरुषसिंह बलराम और श्रीकृष्ण मथुरामें आ गये हैं, तबसे वह अपनी रक्षाके लिये विशेष प्रयत्नशील हो गया। बलराम और श्रीकृष्णका ही चिन्तन करता हुआ वह रातमे सुखकी नींद सो न सका ॥ ६०-६१॥
श्रुत्वा तु रामः कृष्णश्च तं समाजमनुत्तमम् ।
उभौ विविशतुर्वीरौ शार्दूलौ गोव्रजं यथा ॥ ६२ ॥
'बलराम और श्रीकृष्ण दोनों वीर उस परम उत्तम समाज (उत्सव) का समाचार सुनकर उस रङ्गशालामें उसी प्रकार प्रवेश करने लगे, जैसे दो व्याघ्र गौओंके व्रजमें घुस रहे हों ॥ ६२ ॥
ततः प्रवेशे संरुद्धौ रक्षिभिः पुरुषर्षभौ ।
हत्वा कुवलयापीडं ससादिनमरिंदमौ ।
अवमृद्य दुराधर्षौ रङ्गं विविशतुस्तदा ॥ ६३ ॥
'उसमें प्रवेश करते समय रक्षकोंने उन दोनों पुरुषप्रवर बन्धुओंको रोक दिया, तब उन दोनों दुर्जय शत्रुदमन बन्धुओंने सवारोंसहित कुवलयापीड़ हाथीको मारकर मिट्टीमें मिला दिया, फिर वे रङ्गशालामें घुस गये ॥ ६३ ॥
चाणूरान्ध्रौ विनिष्पिष्य केशवेन बलेन च ।
औग्रसेनिः सुदुष्टात्मा सानुजो विनिपातितः ॥ ६४ ॥
'श्रीकृष्ण और बलरामने चाणूर तथा आन्ध्रका कचूमर निकालकर उग्रसेनके दुष्टात्मा पुत्र कंसको भाइयोंसहित मार गिराया ॥ ६४ ॥
यत् कृतं यदुसिंहेन देवैरपि सुदुष्करम् ।
कर्म तत् केशवादन्यः कर्तुमर्हति कः पुमान् ॥ ६५ ॥
'जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुष्कर है, ऐसा जो-जो कर्म यदुकुलसिंह श्रीकृष्णने किया, उसे इनके सिवा दूसरा कौन पुरुष कर सकता है ॥ ६५ ॥
यद्धि नाधिगतं पूर्वैः प्रह्लादबलिशम्बरैः ।
तदिदं प्रापितं वित्तं शौरिणा भवतां कृते ॥ ६६ ॥
'पहलेके प्रह्लाद, बलि और शम्बर आदि नरेशोंने जिसे नहीं पाया था, वही यह अनन्त धन श्रीकृष्णने तुमलोगोंके लिये यहाँ ला दिया है ॥ ६६ ॥
एतेन मुरुमाक्रम्य दैत्यं पञ्चजनं तथा ।
निष्क्रम्य शैलसंघातान्निसुन्दः सगणो हतः ॥ ६७ ॥
'इन्होंने मुरु तथा पञ्चजन नामक दैत्यपर आक्रमण करके शैलसमूहोंको पारकर निसुन्द नामक दैत्यको उसके गणोंसहित मार डाला ॥ ६७ ॥
नरकश्च हतो भौमः कुण्डले चाहृते शुभे ।
प्राप्तं च दिवि देवेषु केशवेन महद्यशः ॥ ६८ ॥
'भूमिपुत्र नरकको भी मौतके घाट उतार दिया । उसके यहाँ अदितिके जो दोनों सुन्दर कुण्डल थे, उनको वापिस ले लिया। इस प्रकार केशवने देवलोक तथा देवताओंमें महान् यश प्राप्त किया ॥ ६८ ॥
वीतशोकभयाबाधाः कृष्णबाहुबलाश्रयाः ।
यजध्वं विविधैर्यज्ञैर्यदावा वीतमत्सराः ॥ ६९ ॥
'यादवो ! अब तुमलोग श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय ले शोक, भय और बाधाओंसे रहित हो ईर्ष्या-द्वेषका त्याग करके नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करो ॥ ६९ ॥
देवानां सुमहत् कार्यं कृतं कृष्णेन धीमता ।
प्रियमावेदयाम्येष भवतां भद्रमस्तु वः ॥ ७० ॥
'बुद्धिमान् श्रीकृष्णने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया है। मैं तुमलोगोंको यह प्रिय निवेदन करता हूँ, तुम सब लोगोंका भला हो ॥ ७० ॥
यदिष्टं वो यदुश्रेष्ठाः कर्तास्मि तदतन्द्रितः ।
भवतामस्मि यूयं च मम युष्मास्वहं स्थितः ॥ ७१ ॥
'यदुवरो ! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह कार्य मैं आलस्य-रहित होकर करूँगा। मैं तुम्हारा हूँ और तुम मेरे। मैं तुममें ही स्थित हूँ ॥ ७१ ॥
इति सम्बोधयन् कृष्णमब्रवीत् पाकशासनः ।
स मां प्रैषीत् सुरश्रेष्ठः प्रीतस्तुष्टास्तथा वयम् ॥ ७२ ॥
'इस प्रकार तुम सबको श्रीकृष्णकी महिमा समझाते हुए पाकशासन इन्द्रने उपर्युक्त बातें कही हैं। उन्हीं सुरश्रेष्ठने प्रसन्न होकर मुझे यहाँ भेजा है। इससे हम भी संतुष्ट हुए हैं ॥७२॥
यत्र धीः श्रीः स्थिता तत्र यत्र श्रीस्तत्र संनतिः ।
संनतिर्धीस्तथा श्रीश्च नित्यं कृष्णे महात्मनि ॥ ७३ ॥
'जहाँ बुद्धि है, वहाँ श्री विद्यमान है। जहाँ श्री है, वहाँ संनति (विनय) है। महात्मा श्रीकृष्णमें विनय, बुद्धि और श्री-ये तीनों नित्य विद्यमान हैं' ॥ ७३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नारदवाक्यं नामैकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नारदजीका वाक्यविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥