विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 642, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६२० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
रौहिणेयेन संगम्य वने विचरता पुनः।
गोपवेषधरेणैव कंसस्य भयमाहितम् ॥ ४२ ॥
'एक समय रोहिणीनन्दन बलरामजीके साथ मिलकर वनमें विचरते हुए गोपवेशधारी श्रीकृष्णने पुनः एक महाबली दैत्यका वध करके कंसको भयभीत कर दिया ॥ ४२ ॥
तथा व्रजगतः शौरिर्दृष्ट्वा युद्धबलं हयम्।
प्रग्रहं भोजराजस्य जघान पुरुषोत्तमः ॥ ४३ ॥
'व्रजमें रहते हुए वसुदेवनन्दन पुरुषोत्तम श्रीहरिने भोजराज कंसके परिचारक अश्वरूपधारी दैत्यको, जिसका युद्ध ही बल था, अपने सामने उपस्थित देख मार डाला ॥ ४३ ॥
प्रलम्बश्च महाकायो रौहिणेयेन धीमता ।
दानवो मुष्टिनैकेन कंसामात्यो निपातितः ॥ ४४ ॥
'बुद्धिमान् रोहिणीनन्दन बलरामने कंसके मन्त्री महाकाय दानव प्रलम्बको एक ही मुक्केसे मार गिराया ॥ ४४ ॥
एतौ हि वसुदेवस्य पुत्रौ सुरसुतोपमौ ।
ववृधाते महावीर्यौ ब्रह्मगार्ग्येण संस्कृतौ ॥ ४५ ॥
'व्रजमें वसुदेवके ये दोनों महापराक्रमी पुत्र जो देवकुमारोंके समान तेजस्वी थे, ब्रह्मगार्ग्यके द्वारा क्षत्रियोचित संस्कारोंसे सम्पन्न हो दिनोंदिन बढ़ते रहे ॥ ४५ ॥
जन्मप्रभृति चाप्येतौ गार्ग्येण परमर्षिणा ।
याथातथ्येन विज्ञाप्य संस्कारं प्रतिपादितौ ॥ ४६ ॥
'महर्षि गार्ग्यने जन्मसे ही लेकर इन दोनोंके सभी संस्कार समय-समयपर स्वयं ही सूचित करके यथार्थरूपसे सम्पन्न किये हैं ॥ ४६ ॥
यदा त्विमौ नरश्रेष्ठौ स्थितौ यौवनसम्मुखे ।
सिंहशावाविवोदीर्णौ मत्तौ हैमवतौ यथा ॥ ४७ ॥
'जब ये नरश्रेष्ठ यौवनके सामने उपस्थित हुए, तब दो उद्धत सिंहशावकों तथा हिमालयके दो मतवाले हाथियोंके समान सुशोभित होने लगे ॥ ४७ ॥
ततो मनांसि गोपीनां हरमाणौ महाबलौ ।
आस्तां गोष्ठवरौ वीरौ देवपुत्रोपमद्युती ॥ ४८ ॥
'फिर तो देवपुत्रोंके समान कान्तिमान् ये दोनों महाबली वीर गोपियोंके चित्त चुराते हुए व्रजके प्रमुख व्यक्ति हो गये ॥ ४८ ॥
एतौ जये वा युद्धे वा क्रीडासु विविधासु च ।
नन्दगोपस्य गोपाला न शेकुः प्रसमीक्षितुम् ॥ ४९ ॥
'विजयमें, युद्धमें अथवा भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाओंमें व्रजके दूसरे-दूसरे ग्वाले नन्दगोपके इन दोनों पुत्रोंकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते थे (समता करना तो दूरकी बात है) ॥ ४९ ॥
व्यूढोरस्कौ महाबाहू शालस्कन्धाविवोद्गतौ।
श्रुत्वासौ व्यथितः कंसो मन्त्रिभिः सहितोऽभवत् ५०
'इनकी छाती चौड़ी है, भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं तथा ये साखूके तनेकी भाँति मोटे और ऊँचे कदके हैं, यह सुनकर कंस अपने मन्त्रियोंसहित व्यथित हो उठा था ॥ ५० ॥
नाशकच्च यदा कंसो ग्रहीतुं बलकेशवौ ।
निजग्राह ततः क्रोधाद् वसुदेवं सबान्धवम् ॥ ५१ ॥
सहोग्रसेनेन तदा चोरवद् गाढबन्धनम् ।
कालं महान्तमनयत् कृच्छ्रमानकदुन्दुभिः ॥ ५२ ॥
'जब बलराम और श्रीकृष्णको कंस किसी तरह पकड़ न सका, तब क्रोधमें आकर उसने उग्रसेन और बन्धु-बान्धवों-सहित वसुदेवको कैद कर लिया और चोरकी भाँति उन्हें सुदृढ़ बन्धनमें डाल दिया। उन दिनों वसुदेवजीने दीर्घकाल-तक बड़े भारी कष्टका सामना किया ॥ ५१-५२ ॥
कंसस्तु पितरं बद्ध्वा शूरसेनाञ्छशास ह।
जरासंधं समाश्रित्य तथैवाहुतिभीमकौ ॥ ५३ ॥
'पिताको कैद करके कंस जरासंध, आहुति और भीष्मकका सहारा ले शूरसेन देशका शासन करने लगा ५३॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य मथुरायां महोत्सवम् ।
पिनाकिनं समुद्दिश्य चक्रे कंसो नराधिपः ॥ ५४ ॥
'किसी समय मथुरामें राजा कंसने पिनाकधारी भगवान् शङ्करकी प्रसन्नताके लिये एक बड़ा भारी उत्सव किया ॥ ५४ ॥
तत्र मल्लाः समाजग्मुर्नानादेश्या विशांपते।
नर्तना गायनाश्चैव कुशला नृत्यकर्मसु ॥ ५५ ॥
'प्रजानाथ उग्रसेन ! उस उत्सवमें अनेक देशोंके मल्ल तथा नृत्यकर्ममें कुशल बहुत-से नर्तक और गायक आये थे ॥ ५५ ॥
ततः कंसो महातेजा रङ्गवाटं महाधनम् ।
कुशलैः कारयामास शिल्पिभिः साधुनिष्ठितैः ॥ ५६ ॥
'उस समय महातेजस्वी कंसने शिल्पकर्ममें कुशल अच्छे-अच्छे शिल्पियोंद्वारा एक रङ्गशाला बनवायी, जिसमें बहुत धन खर्च किया गया था ॥ ५६ ॥
तत्र मञ्चसहस्राणि पौरजानपदैर्जनैः ।
समाकीर्णानि दृश्यन्ते ज्योतींषि गगने यथा ॥ ५७ ॥
'वहाँ हजारों मञ्च रखे गये थे, जो नगर और जनपदके लोगोंसे भरे-पूरे दिखायी देते थे। वे आकाशमें फैले हुए नक्षत्रोंके समान दृष्टिगोचर होते थे ॥ ५७ ॥
भोजराजः श्रिया जुष्टं रङ्गवाटं महर्द्धिमत् ।
आरुरोह ततः कंसो विमानं सुकृती यथा ॥ ५८ ॥
'तदनन्तर भोजराज कंस अनुपम शोभासे युक्त बहुमूल्य रङ्गमञ्चपर आरूढ़ हुआ, मानो कोई पुण्यात्मा पुरुष विमानपर चढ़ा हो ॥ ५८ ॥