विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 641, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकाधिकशततमोऽध्यायः ६१९
समस्त यादवोंको रौंदकर मथुराका राज्य अपने अधिकारमें कर लिया था॥ २६॥
समाश्रित्य जरासंधं श्वशुरं कुलपांसनः।
भोजवृष्ण्यन्धकान् सर्वानवमन्यत दुर्मतिः॥ २७॥
'खोटी बुद्धिवाला वह कुलाङ्गार अपने श्वशुर जरासंधका आश्रय ले भोज, वृष्णि और अन्धक वंशके सब लोगोंका अपमान करता था॥ २७॥
ज्ञातिकार्यं चिकीर्षंस्तु वसुदेवः प्रतापवान्।
उग्रसेनस्य रक्षार्थं स्वपुत्रं पर्य्यरक्षत ॥ २८॥
'उस समय भाई-बन्धुओंका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छासे और उग्रसेनकी रक्षा करनेके लिये प्रतापी वसुदेवने अपने पुत्र श्रीकृष्णकी कंससे रक्षा की॥ २८॥
स गोपैः सह धर्मात्मा मथुरोपवने स्थितः।
अत्यद्भुतानि कर्माणि कृतवान् मधुसूदनः ॥ २९॥
'वसुदेवका वह पुत्र यह धर्मात्मा मधुसूदन ही हैं, जो मथुराके निकटवर्ती वनमे गोपोंके साथ रहे हैं और वहाँ इन्होंने बड़े अद्भुत कर्म किये हैं॥ २९॥
प्रत्यक्षं शूरसेनानां श्रूयते महदद्भुतम्।
उत्त्तानेन शयानेन शकटान्तरचारिणा ॥ ३०॥
राक्षसी निहता रौद्रा शकुनीवेषधारिणी।
पूतना नाम घोरा सा महाकाया महाबला ॥ ३१॥
'वहाँ इनके विषयमें एक बड़ी अद्भुत बात सुनी जाती है, जिसे शूरसेनवासियोंने प्रत्यक्ष देखा है। ये बाल्यावस्थामें छकड़ेके नीचे एक खाटपर उत्तान सोये थे। उस समय वहाँ पक्षीका वेश धारण करके रहनेवाली एक महाबलशालिनी विशालकाया घोर एवं भयानक राक्षसी पूतना इनके द्वारा मारी गयी॥ ३०-३१॥
विषदिग्धं स्तनं रौद्रं प्रयच्छन्ती जनार्दने।
ददृशुर्निहतां तां ते राक्षसीं वनगोचराः ॥ ३२॥
'वह जनार्दन श्रीकृष्णको अपना विषसे लिप्त भयानक स्तन पिलाना चाहती थी। वहाँ इनके द्वारा मारी गयी उस राक्षसीको वनवासी गोपोंने प्रत्यक्ष देखा था ॥ ३२॥
पुनर्जातोऽयमित्याहुरुक्तस्तस्मादधोक्षजः ।
अत्यद्भुतमिदं चासीद् यच्छिशुः पुरुषोत्तमः ॥ ३३॥
पादाङ्गुष्ठेन शकटं क्रीडमानो व्यलोडयत्।
'उस समय वे कहने लगे, इस बालकका पुनर्जन्म हुआ है—इसने अक्ष (गाड़ी) के अधः (नीचे) फिर जन्म पाया है। उनके ऐसा कहनेसे ये बालकृष्ण अधोक्षज नामसे प्रसिद्ध हुए। यह भी बड़ी अद्भुत बात हुई कि शैशवावस्थामे खेलते हुए इन पुरुषोत्तमने पैरके अँगूठेसे धक्का देकर छकड़ेको उलट दिया ॥ ३३$\frac{१}{२}$ ॥
दाम्ना चोलूखले बद्धो विप्रकुर्वन् कुमारकम् ॥ ३४॥
बभञ्जार्जुनवृक्षौ द्वौ ख्यातो दामोदरस्तदा ।
'कुमारावस्थाकी लीला करते हुए इन्हें एक दिन मैयाने रस्सीसे ओखलीमें बाँध दिया। उसी अवस्थामें उस ओखलीको घसीटते हुए इन्होंने दो अर्जुन वृक्षोंको तोड़ डाला, उस समय दाम (रस्सी) से उदरमे बँधनेके कारण यह दामोदर नामसे विख्यात हुए ॥ ३४$\frac{१}{२}$ ॥
कालियश्च महानागो दुराधर्षो महाबलः ॥ ३५॥
क्रीडता वासुदेवेन निर्जितो यमुनाह्रदे।
'यमुनाजीके कुण्डमें निवास करनेवाले दुर्धर्ष एवं महाबली महानाग कालियको इन भगवान् वासुदेवने खेल-खेलमें ही पराजित कर दिया ॥ ३५$\frac{१}{२}$ ॥
अक्रूरस्य समक्षं च यन्नागभवने विभुः ॥ ३६॥
पूज्यमानं तदा नागैर्दिव्यं वपुरधारयत्।
'इन भगवान् श्रीहरिने उस दिन अक्रूरकी आँखोंके सामने नागभवनमें नागोंद्वारा पूजित होनेवाले अपने दिव्य रूपको धारण किया था ॥ ३६$\frac{१}{२}$ ॥
शीतवातादिता गाश्च दृष्ट्वा कृष्णेन धीमता ॥ ३७॥
धृतो गोवर्धनः शैलः सप्तरात्रं महात्मना।
शिशुना वासुदेवेन गवां त्राणार्थमिच्छताम् ॥ ३८॥
'बुद्धिमान् वसुदेवपुत्र महात्मा श्रीकृष्ण सरदी और हवासे गौओंको कष्ट पाते देख अपनी रक्षा चाहनेवाली उन गौओंके प्राण बचानेके लिये बाल्यावस्थामें ही लगातार सात रातोंतक गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठाये रहे ॥ ३७-३८॥
तथोक्षदुष्टोऽतिबलो महाकायो नरान्तकृत्।
गोपतिर्वासुदेवेन हतोऽरिष्टो महासुरः ॥ ३९॥
'उसी प्रकार मनुष्योंका अन्त करनेवाला एक अत्यन्त बलशाली, महाकाय, महान् असुर अरिष्ट, जो साँड़के रूपमें रहता था और साँड़ोंमे सबसे अधिक दुष्ट था, भगवान् वासुदेवके हाथसे मारा गया ॥ ३९॥
धेनुकः स महाकायो दानवः सुमहाबलः।
निहतो वासुदेवेन गवां त्राणाय दुर्मतिः ॥ ४०॥
'वह महाबली और विशालकाय दानव दुर्बुद्धि धेनुक भी गौओंकी रक्षाके लिये ही वसुदेवनन्दन बलरामके हाथसे मारा गया ॥ ४०॥
सुनामानममित्रघ्नः सर्वसैन्यपुरस्कृतम्।
वृकैर्विद्रावयामास ग्रहीतुं समुपस्थितम् ॥ ४१॥
'शत्रुओंका नाश करनेवाले श्रीकृष्णने समस्त सेनाओंके साथ आये हुए सुनामाको, जो इन्हें कैद करनेके लिये उपस्थित हुआ था, भेड़ियोंद्वारा मार भगाया ॥ ४१॥