विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 640, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६१८ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभेऽम्बिका।
अदितिर्देवमातेव मित्रेण वरुणेन च ॥ १०॥
माता देवकी वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले उन दोनों पुत्रोंके साथ उसी प्रकार शोभा पाने लगी, जैसे मित्र और वरुणके साथ देवमाता अदिति सुशोभित होती हैं ॥ १०॥
ततः प्राप्ता नराग्र्यौ तु तस्याः सा दुहिता तदा।
एकानंशेति यामाहुर्नरा वै कामरूपिणीम् ॥ ११॥
उसी समय उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंके पास यशोदाजीकी वह पुत्री आ पहुँची, जिसे लोग इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली एकानंशा कहते हैं ॥ ११॥
तथा क्षणमुहूर्ताभ्यां यथा जज्ञे सुरेश्वरः।
यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तमः ॥ १२॥
जिसके दिये हुए संकेत और मुहूर्तके अनुसार देवेश्वर श्रीहरिका प्रादुर्भाव हुआ था और जिसके ही कारण पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सेवकोंसहित कंसका वध कर डाला था ॥
सा कन्या ववृधे तत्र वृष्णिसद्मनि पूजिता।
पुत्रवत् पाल्यमाना वै वसुदेवाज्ञया तदा ॥ १३॥
वह कन्या वृष्णिवंशियोंके घरमें बड़े आदर-सत्कारके साथ पल रही थी। भगवान् वसुदेवकी आज्ञासे उस समय उसका पुत्रकी भाँति पालन किया जाता था ॥ १३॥
एकानंशेति यामाहुरुत्पन्नां मानवा भुवि।
योगकन्यां दुराधर्षां रक्षार्थं केशवस्य ह ॥ १४॥
श्रीकृष्णकी रक्षाके लिये भूतलपर उत्पन्न हुई उस दुर्धर्ष योगकन्याको मनुष्य एकानंशा कहते हैं ॥ १४॥
यां वै सर्वे सुमनसः पूजयन्ति स्म यादवाः।
देववद् दिव्यपुरुषः कृष्णः संरक्षितो यया ॥ १५॥
समस्त यादव प्रसन्न चित्तसे उस देवीकी पूजा करते हैं, जिसने देवतुल्य दिव्य पुरुष श्रीकृष्णकी रक्षा की थी ॥१५॥
तां च तत्रोपसंगम्य प्रियामिव सखीं स्वसाम्।
दक्षिणेन कराग्रेण परिजग्राह माधवः ॥ १६॥
वहाँ अपनी प्रिय सखीकी भाँति उस बहिनसे मिलकर श्रीकृष्णने दाहिने हाथसे उसका हाथ अपने हाथमें ले लिया ॥
तथैव रामोऽतिबलः सम्परिष्वज्य भामिनीम्।
मूर्द्ध्र्युपाघ्राय सव्येन प्रतिजग्राह पाणिना ॥ १७॥
उसी प्रकार अत्यन्त बलशाली बलरामजीने उस भामिनी बहिनको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघा और बायें हाथसे उसका हाथ पकड़ लिया ॥ १७ ॥
ददृशुस्ताः स्त्रियो मध्ये भगिनीं रामकृष्णयोः।
रुक्मपद्मव्यग्रकरां श्रियं पद्मालयामिव ॥ १८॥
बलराम और श्रीकृष्णके बीचमें खड़ी हुई उनकी उस बहिनको सभी स्त्रियोंने देखा। वह सुवर्णमय कमल हाथमें लिये हुए कमलालया लक्ष्मीकी भाँति सुशोभित होती थी ॥
तथाक्षतमहावृष्ट्या पुष्पैश्च विविधैः शुभैः।
अवकीर्य च लाजैस्ताः स्त्रियो जग्मुर्यथालयम् ॥ १९॥
वे स्त्रियाँ अक्षतोंकी बड़ी भारी वर्षा करके नाना प्रकारके माङ्गलिक पुष्प और खील बिखेर कर अपने अपने घरको चली गयीं ॥ १९ ॥
ततस्ते यादवाः सर्वे पूजयन्तो जनार्दनम्।
उपोपविविशुः प्रीताः प्रशंसन्तोऽद्भुतं कृतम् ॥ २०॥
तदनन्तर वे समस्त यादव श्रीकृष्णकी पूजा तथा उनके अद्भुत कर्मकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक उनके पास बैठ गये ॥ २० ॥
पूज्यमानो महाबाहुः पौराणां रतिवर्धनः।
विरराज महाकीर्तिर्देवैरिव स तैः सह ॥ २१॥
महान् कीर्तिशाली महाबाहु श्रीकृष्ण पुरवासियोंका प्रेम बढ़ाते हुए उनसे पूजित हो देवताओंके साथ इन्द्रकी भाँति उन सबके साथ विशेष शोभा पाने लगे ॥ २१ ॥
समासीनेषु सर्वेषु यादवेषु जनार्दनम्।
नियोगात् त्रिदशेन्द्रस्य नारदोऽभ्यागमत् सभाम् ॥ २२॥
जब समस्त यादव बैठ गये, उस समय इन्द्रकी आज्ञासे देवर्षि नारदजी उस सभामें श्रीकृष्णके पास आये ॥ २२ ॥
सोऽथ सम्पूजितः पूज्यः शूरैस्तैर्यदुपुङ्गवैः।
करं संस्पृश्य स हरेर्निवेश परमासने ॥ २३॥
पूज्य देवर्षि नारद उन यादवशिरोमणि शूर-वीरोंसे भलीभाँति पूजित हो भगवान् श्रीकृष्णका हाथ पकड़कर उत्तम आसनपर विराजमान हुए ॥ २३ ॥
सुखोपविष्टस्तान् वृष्णीनुपविष्टानुवाच ह।
सम्प्राप्तं शक्रवचनाज्जानीध्वं मां नरर्षभाः ॥ २४॥
स्वयं सुखपूर्वक बैठ जानेपर वहाँ बैठे हुए उन वृष्णिवंशियोंसे वे इस प्रकार बोले—'नरश्रेष्ठ यादवो! तुम यह समझ लो, मैं इन्द्रकी आज्ञासे यहाँ आया हूँ ॥ २४ ॥
शृणुध्वं राजशार्दूलाः कृष्णस्यास्य पराक्रमम्।
यानि कर्माणि कृतवान् बाल्यात्प्रभृति केशवः ॥ २५॥
'राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी वीरो ! श्रीकृष्णने बचपनसे लेकर अबतक जो-जो कर्म किये हैं, उनके उस पराक्रमका वर्णन सुनो ॥ २५ ॥
उग्रसेनसुतः कंसः सर्वान् निर्मथ्य यादवान्।
राज्यं जग्राह दुर्बुद्धिर्बद्ध्वा पितरमाहुकम् ॥ २६॥
'उग्रसेनके दुर्बुद्धि पुत्र कंसने अपने पिताको कैद करके