विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 658, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६३६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
'दुर्बुद्धे ! उसके मरनेसे समस्त देवताओंका क्षय हो जायगा, इस प्रकार अपने शत्रुओंके मर जानेपर समस्त दैत्य और दानव आनन्दके भागी होंगे ॥ ७४ ॥
हते त्वयि ममास्त्रेण त्वत्समुत्थैश्च शोणितैः। शम्बरस्य तु पुत्राणां करोम्युदकसक्रियाम् ॥ ७५ ॥
'मेरे अस्त्रसे तेरा वध हो जानेपर तेरे ही रक्तसे मैं शम्बरासुरके पुत्रोंका तर्पण करूँगा ॥ ७५ ॥
अद्य सा भीष्मकसुता करुणं विलपिष्यति । निहतं त्वां च श्रुत्वैव यौवनस्थं गतायुषम् ॥ ७६ ॥
'आज वह भीष्मककी पुत्री रुक्मिणी तो तुझ-जैसे नौजवान बेटेको मारा गया और गतायु हुआ सुनकर निश्चय ही करुण विलाप करेगी ॥ ७६ ॥
स ते पिता चक्रधरो निष्फलाशो भविष्यति । हतं त्वां संविदित्वाथ प्राणांस्त्यक्ष्यतिमन्दधीः ॥ ७७ ॥
'तेरे उस पिता चक्रधारी कृष्णकी आशा अब निष्फल हो जायगी। तुझे मारा गया जानकर वह मन्दबुद्धि मानव अपने प्राणोंका परित्याग कर देगा' ॥ ७७ ॥
इत्युक्त्वा परिघेणाशु ताडयद् रुक्मिणीसुतम् । ताडितो हि महातेजा रौक्मिणेयः प्रतापवान् ॥ ७८ ॥ दोर्भ्यामुत्क्षिप्य तस्यैव रथं मह्यां व्यचूर्णयत् ।
ऐसा कहकर उसने तुरंत ही रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नपर परिघसे प्रहार किया। उससे ताड़ित हुए महान् तेजस्वी और प्रतापी प्रद्युम्नने अपनी दोनों भुजाओंसे उसके रथको ही ऊपरको उछाल दिया और पृथ्वीपर गिराकर चूर-चूर कर डाला ॥ ७८३ ॥
सोऽवप्लुत्य रथात् तस्मात् पदातिरवतस्थिवान् ॥७९॥ तां गदां गृह्य सहसा रौक्मिणेयमुपाद्रवत् । तयैव गदया कामः प्रमर्दनमपोथयत् ॥ ८० ॥
प्रमर्दन उस रथसे कूदकर पैदल ही युद्धके लिये खड़ा हो गया और अपनी उस प्रसिद्ध गदाको हाथमें लेकर उसने सहसा रुक्मिणीकुमारपर आक्रमण किया, परंतु प्रद्युम्नने उसकी फेंकी हुई उस गदासे ही प्रमर्दनको मार गिराया ॥
हते प्रमर्दने दैत्ये दृष्ट्वा सर्वे प्रदुद्रुवुः । न शक्ताः प्रमुखे स्थातुं सिंहत्रासाद् गजा इव ॥ ८१ ॥
दैत्य प्रमर्दनके मारे जानेपर समस्त असुर सैनिक भाग खड़े हुए। सिंहके भयसे भागे हुए हाथियोंके समान वे प्रद्युम्नके सामने ठहर न सके ॥ ८१ ॥
सारमेयं यथा दृष्ट्वाविगणो वै पलायते । तथा सेना विपद्यन्ती प्रद्युम्नस्य भयार्दिता ॥ ८२ ॥
जैसे शिकारी कुत्तेको देखकर भेड़ोंका समूह पलायन करने लगता है, उसी प्रकार प्रद्युम्नके भयसे पीड़ित हुई दैत्यसेना विषादग्रस्त होकर भागने लगी ॥ ८२ ॥
क्षतजादिग्धवस्त्रा चै मुक्तकेशा विशोभना । रजस्वलेव युवतिः सेना समवगूहते ॥ ८३ ॥
उन सब सैनिकोंके वस्त्र खूनसे रँग गये थे, केश खुले हुए थे। वे शोभाहीन हो गये थे। इस अवस्थामें वह दैत्यसेना रजस्वला युवतीकी भाँति कहीं छिप जानेका प्रयत्न करने लगी ॥ ८३ ॥
मदनशरविभिन्ना सैनिकानभ्ययायाद् युवतिसदृशवेषा साध्वसैः पीड्यमाना । रतिसमरमशक्ता वीक्षितुं सोच्छ्वसन्ती स्वगृहमगनकामा नेच्छते स्थातुमत्र ॥ ८४ ॥
युवतीके समान वेष धारण करनेवाली वह दैत्यसेना कामदेव (प्रद्युम्न) के बाणोंसे घायल हो सैनिकोंकी ओर चली। उस समय वह भय आदिसे पीड़ित हो रही थी। समररूपी सुरतको तो देखनेमें भी असमर्थ थी, केवल उच्छ्वास लेती हुई अपने घरको जाना चाहने लगी, वहाँ ठहरना नहीं ॥ ८४ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरसैन्यभङ्गो नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरासुरकी सेनाका पलायनविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
षडधिकशततमोऽध्यायः
शम्बरासुर और प्रद्युम्नका मायामय युद्ध, शम्बरकी चिन्ता, देवराज इन्द्रकी आज्ञासे नारदजीका प्रद्युम्नको उनके पूर्वस्वरूपका स्मरण दिलाना और आवश्यक कर्तव्य सुझाना
वैशम्पायन उवाच
यावदेनं शरैर्हन्मि मम विप्रियकारकम् ।
शम्बरस्तु ततः क्रुद्धः सूतमाह विशाम्पते ।
शत्रुप्रमुखतो वीर रथं मे वाहय द्रुतम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—प्रजानाथ ! तब शम्बरासुरने कुपित होकर अपने सारथिसे कहा—'वीर ! तुम शीघ्र