भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 657

विष्णु‌पर्व ] पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ६३५

कर मिट्टीमें मिला दिया। उन सबको धराशायी करते हुए प्रद्युम्नने अपने बाण-समूहोंद्वारा समस्त सैनिकोंको बींध डाला। कोई भी ऐसा नहीं दिखायी देता था, जो उनके बाणोंसे विद्ध न हुआ हो ॥ ५८-५९ ॥

एवं सर्वाणि सैन्यानि ममन्थ मकरध्वजः ।
नदीं प्रावर्तयद् घोरां शोणिताम्बुतरङ्गिणीम् ॥ ६० ॥

इस प्रकार मकरध्वजने शत्रुको सारी सेनाओंको मथ डाला और एक भयानक नदी बहा दी, जो रक्तमय जलकी तरङ्गोंसे सुशोभित होती थी ॥ ६० ॥

मुक्ताहारोर्मिबहुलां मांसमेदःसपङ्किनीम् ।
छत्रद्वीपां शरावर्तां रथैः पुलिनमण्डिताम् ॥ ६१ ॥

मोतियोंके हार उसमें उठती हुई बहुसंख्यक लहरोंके समान प्रतीत होते थे। वसा और मेदे कीचके समान जान पड़ते थे। छत्र द्वीप और बाण आवर्त (भँवर) के समान थे। रथ ही उस नदीके तट बनकर उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६१ ॥

केयूरकुण्डलाकूर्मीं ध्वजमत्स्यविभूषिताम् ।
नागग्राहवतीं रौद्रामसिनक्रविभूषिताम् ॥ ६२ ॥

केयूर और कुण्डल उसमें कछुएका भ्रम उत्पन्न करते थे। ध्वजरूपी मत्स्य उसकी शोभा बढ़ाते थे। हाथीरूपी ग्राहोंसे युक्त होनेके कारण वह बड़ी भयङ्कर जान पड़ती थी। खड्गरूपी नाकें उसके आभूषण थे ॥ ६२ ॥

केशशैवलसंछन्नां श्रोणिसूत्रमृणालिकाम् ।
वक्त्राननसुपद्मां च हंसचामरवीजिताम् ॥ ६३ ॥

वह केशरुपी सेवारसे ढकी हुई थी, कटिसूत्र कमल-नालके समान प्रतीत होते थे, सुन्दर मुख ही उसमें खिले हुए मनोहर कमल थे, हिलते हुए चँवर हंसोंके पक्ष-सञ्चालन-की भाँति प्रतीत होते थे, मानो उनके द्वारा उस नदीको हवा की जा रही थी ॥ ६३ ॥

शिरस्तिमिसमाकीर्णां शोणितौघप्रवर्तिनीम् ।
नदीं दुस्तरणीं भीमामनङ्गेन प्रवर्तिताम् ॥ ६४ ॥
दुष्प्रेक्षां दुर्गमां रौद्रां हीनतेजःसुदुस्तराम् ।
शस्त्रग्राहवतीं घोरां यमराष्ट्रविवर्द्धनीम् ॥ ६५ ॥

(हाथी आदि पशुओंके कटे हुए) मस्तक उसमें तिमि नामक मत्स्यके समान सब ओर व्याप्त थे। वह शोणितकी वेगयुक्त धारा बहा रही थी। अनङ्गरूप प्रद्युम्नके द्वारा बहायी गयी वह रक्तनदी अत्यन्त दुस्तर, दुर्लक्ष्य, दुर्गम एवं भयंकर थी। तेजोहीन पुरुषोंके लिये उसे पार करना अत्यन्त कठिन था। शस्त्ररूपी ग्राहोंसे युक्त वह घोर नदी यमराजके राज्यकी वृद्धि कर रही थी ॥ ६४-६५ ॥

तत्र रुक्मिसुतः श्रीमान् विलोडयति धन्विनः ।
शत्रुहन्तारमाभित्य शरानभ्यकिरद् बहून् ॥ ६६ ॥

उस युद्धमें श्रीमान् रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नने बहुत-से धनुर्धरोंको मथ डाला और शत्रुहन्तापर अनेक बाणोंकी वर्षा की ॥ ६६ ॥

शत्रुहन्ता पुनः क्रुद्धो मुमोच शरमुत्तमम् ।
प्रद्युम्नस्य समासाद्य हृदये निपपात ह ॥ ६७ ॥

तब पुनः क्रोधमें भरे हुए शत्रुहन्ताने एक उत्तम बाण छोड़ा, जो प्रद्युम्नकी छातीपर जाकर लगा ॥ ६७ ॥

स विद्धस्तेन बाणेन प्रद्युम्नो न व्यकम्पत ।
शक्तिं जग्राह बलवाञ्छत्रुहन्त्रे मुमूर्षवे ॥ ६८ ॥

उस बाणसे घायल होकर बलवान् प्रद्युम्न तनिक भी विचलित नहीं हुए, उन्होंने मरणासन्न शत्रुहन्ताके लिये एक शक्ति उठायी ॥ ६८ ॥

सा क्षिप्ता रौक्मिणेयेन शक्तिर्ज्वालाकुला रणे ।
पपात हृदयं भित्त्वा शक्राशनिसमस्वना ॥ ६९ ॥

रणभूमिमें रुक्मिणीकुमारने वह अग्निकी ज्वालासे युक्त शक्ति चला दी। इन्द्रके वज्रकी भाँति गड़गड़ाहट पैदा करती हुई वह शक्ति शत्रुहन्ताका हृदय विदीर्ण करके पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ६९ ॥

स भिन्नहृच्च त्रस्ताङ्गो मुक्तमर्मास्थिबन्धनः ।
पपात रुधिरोद्गारी शत्रुहन्ता महाबलः ॥ ७० ॥

हृदय विदीर्ण हो जानेसे उसके सारे अङ्ग शिथिल हो गये, मर्मस्थानों और अस्थियोंके बन्धन खुल गये, उस दशामें महाबली शत्रुहन्ता रक्त वमन करता हुआ धरतीपर गिर पड़ा ॥ ७० ॥

पतितं शत्रुहन्तारं दृष्ट्वा तस्थौ प्रमर्दनः ।
जग्राह मुसलं सोऽथ वचनं चेदमाददे ॥ ७१ ॥

शत्रुहन्ताको धराशायी हुआ देख प्रमर्दन युद्धके लिये डट गया। उसने मुसल हाथमें ले लिया और यह बात कही—॥ ७१ ॥

तिष्ठ किं प्राकृतैरेभिः करिष्यसि रणप्रियः ।
मां योधयस्व दुर्बुद्धे ततस्त्वं न भविष्यसि ॥ ७२ ॥

'अरे ! खड़ा रह ! तुझे युद्ध बड़ा प्रिय है न ? इन प्राकृत सैनिकोंके मारनेसे तू क्या लाभ उठायेगा। दुर्बुद्धे ! तू मेरे साथ युद्ध कर, फिर तो तू नहीं हो जायगा ॥ ७२ ॥

वृष्णिवंशकुले जातः शत्रुरस्मत्पिता तव ।
पुत्रं हन्तास्म्यहं तस्य ततोऽसौ निहतो भवेत् ॥ ७३ ॥

'तू वृष्णिकुलमें उत्पन्न हुआ है, तेरा पिता हमलोगोंका शत्रु है, मैं उसके पुत्रको मार डालूँगा, फिर वह स्वयं ही मर जायगा ॥ ७३ ॥

मृतेन तेन दुर्बुद्धे सर्वदेवक्षयो भवेत् ।
दैतेया दानवाः सर्वे मोदन्तां हतशत्रवः ॥ ७४ ॥