भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 656

६३४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


जघान पश्यतां राज्ञां सर्वेषां सैनिकस्य वै।

उन बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही प्रद्युम्नने तीखे सायकोंसे काट डाला। तत्पश्चात् एक अर्धचन्द्राकार बाण लेकर समस्त राजाओं और उनके सैनिकोंके देखते-देखते दुर्धरके सारथिको मार डाला ॥ ४३ १/२ ॥

चतुर्भीरथ नाराचैः सुपर्वैः कङ्कतेजितैः ॥ ४४ ॥
जघान चतुरः सोऽश्वान् दुर्धरस्य रथं प्रति ।

फिर उत्तम गाँठवाले, कङ्कपत्रयुक्त चार तीखे नाराचोंद्वारा दुर्धरके रथसम्बन्धी चार घोड़ोंको कालके गालमें भेज दिया ॥ ४४ १/२ ॥

एकेन योक्त्रं छत्रं च ध्वजमेकेन वन्धुरम् ॥ ४५ ॥
षष्ट्या च युगचक्राक्षं चिच्छेद मकरध्वजः ।

इसके बाद एक बाणसे रथको जोड़नेवाली रस्सी, छत्र और ध्वज तथा एक बाणसे बन्धुरके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। फिर साठ बाणोंसे प्रद्युम्नने रथके जुए, धुरे और पहियोंको भी काट डाला ॥ ४५ १/२ ॥

अथापरं शरं गृह्य कङ्कपत्रं सुतेजितम् ॥ ४६ ॥
मुमोच हृदये तस्य दुर्द्धरस्यान्त्यजीविनः ।

तदनन्तर प्रद्युम्नने कङ्कपक्षीके पर लगे हुए और अत्यन्त तेज किये हुए एक बाणको लेकर दूसरेके आश्रयपर जीनेवाले दुर्धरके हृदयपर छोड़ा ॥ ४६ १/२ ॥

स गतासुर्गतश्रीको गतसत्त्वो गतप्रभः ॥ ४७ ॥
निपपात रथोपस्थात् क्षीणपुण्य इव ग्रहः ।

तब वह दुर्धर निष्प्राण हो शोभा और सत्त्वसे रहित हो गया। उसकी कान्ति फीकी पड़ गयी। वह रथकी बैठकमेंसे नीचे गिर पड़ा। उस समय वह, जिसका पुण्य क्षीण हो गया हो ऐसे ग्रहके समान दीखने लगा ॥ ४७ १/२ ॥

दुर्धरे निहते शूरे दानवे दानवेश्वरः ॥ ४८ ॥
केतुमाली शरव्रातैरभिदुद्राव कृष्णजम् ।

दुर्धर शूर दानव था, उसके मारे जानेपर दानवेश्वर केतुमाली भी कृष्णकुमार प्रद्युम्नपर बाणोंके समूहोंको छोड़ता हुआ चढ़ आया ॥ ४८ १/२ ॥

प्रद्युम्नमथ संक्रुद्धो भ्रुकुटीभीषणाननः ॥ ४९ ॥
कृत्याभ्यधावत् सहसा तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।

तदनन्तर क्रोधमें भरा हुआ केतुमाली भृकुटी चढ़ाकर मुखको भीषण बना प्रद्युम्नपर सहसा दौड़ पड़ा और उनसे कहने लगा 'खड़ा रह ! खड़ा रह !' ॥ ४९ १/२ ॥

संक्रुद्धः कृष्णसूनुस्तु शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ५० ॥
पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव यथा घनः ।

यह सुनकर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नको बड़ा क्रोध हुआ, उन्होंने बाणोंकी वर्षा करके केतुमालीको ढक दिया, ठीक उसी तरह जैसे वर्षा ऋतुमें बादल जलकी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित कर देता है ॥ ५० १/२ ॥

स विद्धो दानवामात्यः प्रद्युम्नेन धनुष्मता ॥ ५१ ॥
चक्रमादाय चिक्षेप प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया ।

धनुर्धर प्रद्युम्नके द्वारा घायल हुए दानवमन्त्री केतुमालीने प्रद्युम्नका वध करनेकी इच्छासे चक्र लेकर उनके ऊपर चलाया ॥ ५१ १/२ ॥

तं तु प्राप्तं सहस्रारं कृष्णचक्रसमद्युतिम् ॥ ५२ ॥
निपत्योत्पत्य सहसा सर्वेषामेव पश्यताम् ।
तेनैव तस्य चिच्छेद केतुमालेः शिरस्तदा ॥ ५३ ॥

श्रीकृष्णके चक्रके समान तेजस्वी उस सहस्रार चक्रको पास आया देख प्रद्युम्नने सहसा उछलकर उसे पकड़ लिया और सबके देखते-देखते उस समय उसी चक्रसे केतुमालीका सिर काट लिया ॥ ५२-५३ ॥

तद् दृष्ट्वा कर्म विपुलं रौक्मिणेयस्य देवराट् ।
विस्मयं परमं प्राप्तः सर्वैर्देवगणैः सह ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव पुष्पवर्षैरवाकिरन् ॥ ५४ ॥

रुक्मिणीकुमारका वह महान् कर्म देखकर समस्त देवताओंसहित देवराज इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। उस समय गन्धर्वों और अप्सराओंने उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा की ॥ ५४ ॥

केतुमालिं हतं दृष्ट्वा शत्रुहन्ता प्रमर्दनः ।
महाबलसमूहेन प्रद्युम्नमथ दुद्रुवे ॥ ५५ ॥

केतुमालीको मारा गया देख शत्रुहन्ता और प्रमर्दन विशाल सैन्यसमूहके साथ प्रद्युम्नपर टूट पड़े ॥ ५५ ॥

ते गदां मुसलं चक्रं प्रासतोमरसायकान् ।
भिन्दिपालान् कुठारांश्च भास्वरान् कूटमुद्गरान् ॥ ५६ ॥
युगपत् संक्षिपन्ति स्म वधार्थं कृष्णनन्दने ।

वे गदा, मुसल, चक्र, प्रास, तोमर, सायक, भिन्दिपाल, कुठार और चमकीले कूटमुद्गरोंको एक साथ ही श्रीकृष्णकुमारके वधके लिये उनके ऊपर फेंकने लगे ॥ ५६ १/२ ॥

सोऽपि तान्यस्त्रजालानि शस्त्रजालैरनेकधा ॥ ५७ ॥
चिच्छेद बहुधा वीरो दर्शयन् पाणिलाघवम् ।

वीर प्रद्युम्नने भी अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए शस्त्रसमूहोंद्वारा शत्रुओंके अस्त्र-जालके बारंबार बहुतेरे टुकड़े कर डाले ॥ ५७ १/२ ॥

गजान् सोऽभ्यहनत् क्रुद्धो गजारोहान् सहस्रशः ॥ ५८ ॥
रथान् सारथिभिः सार्धं हयांश्चैव ममर्द् ह ।
पातयंस्ताञ्छरव्रातैर्नाविद्धः कश्चिदीक्ष्यते ॥ ५९ ॥

उन्होंने कुपित होकर सहस्रों हाथियों और हाथीसवारोंको मार डाला। सारथियोंसहित रथों और घोड़ोंको भी रौंद-