विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 659, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] षडधिकशततमोऽध्यायः [ ६३७
ही मेरे रथको शत्रुके सामने ले चलो, जिससे अपना अप्रिय करनेवाले इस प्रद्युम्नको मैं अपने बाणोंसे मार डालूँ' ॥ १½ ॥
ततो भर्तुर्वचः श्रुत्वा सूतस्तत्प्रियकारकः ॥ २ ॥
रथं संचोदयामास चामीकरविभूषितम् ।
तं दृष्ट्वा रथमायान्तं प्रद्युम्नः फुल्लोचनः ॥ ३ ॥
तब स्वामीका यह वचन सुनकर उनका प्रिय करनेवाले सूतने उस सुवर्णभूषित रथको आगे बढ़ाया। उस रथको आते देख प्रद्युम्नके नेत्र हर्षसे खिल उठे ॥ २-३ ॥
संदधे चापमादाय शरं कनकभूषितम् ।
तेनाहनत् सुसंक्रुद्धः कोपयञ्छम्बरं रणे ॥ ४ ॥
उन्होंने अत्यन्त कुपित हो धनुष लेकर उसपर एक सुवर्णभूषित बाण रखा और उस बाणसे शम्बरासुरका क्रोध बढ़ाते हुए उसे रणभूमिमें घायल कर दिया ॥ ४ ॥
हृदये ताडितस्तेन देवशत्रुः सुविह्वलः ।
रथशक्तिं समाश्रित्य तस्थौ सोऽथ विचेतनः ॥ ५ ॥
उस बाणने उसकी छातीमें चोट पहुँचाई थी, इससे वह देवशत्रु शम्बर अत्यन्त व्याकुल हो अचेत हो गया और रथशक्तिका सहारा लेकर टिका रहा ॥ ५ ॥
स चेतनां पुनः प्राप्य धनुरादाय शम्बरः ।
विव्याध कार्ष्णिं कुपितः सप्तभिर्निशितैः शरैः ॥ ६ ॥
फिर होशमें आनेपर कुपित हुए शम्बरासुरने धनुष हाथमें ले सात पैने बाणोंद्वारा श्रीकृष्णकुमारपर प्रहार किया ॥ ६ ॥
तानप्राप्ताञ्शरान् सोऽथ सप्तभिः सप्तधाच्छिनत् ।
शम्बरं च जघानाथ सप्तत्या निशितैः शरैः ॥ ७ ॥
उन बाणोंको अपने पास पहुँचनेसे पहले ही प्रद्युम्नने सात सायकोंसे मारकर सात बार खण्डित किया, साथ ही सत्तर तीखे बाणोंसे शम्बरासुरको घायल कर दिया ॥ ७ ॥
पुनः शरसहस्रेण कङ्कबर्हिणवाससा ।
अहनच्छम्बरं क्रोधाद् धाराभिरिव पर्वतम् ॥ ८ ॥
इसके बाद गीध और मोरकी पाँख लगे हुए एक हजार बाणोंकी क्रोधपूर्वक वर्षा करके उन्होंने पुनः शम्बरासुरको आहत कर दिया, ठीक उसी तरह जैसे मेघ जलकी धाराओंसे पर्वतको आप्लावित कर देता है ॥ ८ ॥
प्रदिशो विदिशश्चैव शरधारासमावृताः ॥ ९ ॥
अन्धकारीकृतं व्योम दिनकर्ता न दृश्यते ।
समस्त दिशाएँ और विदिशाएँ बाणधारासे आवृत्त हो गयीं। आकाशमें अन्धकार छा गया। दिनकर सूर्यका दीखना बंद हो गया ॥ ९½ ॥
ततोऽन्धकारमुत्सार्य वैद्युतास्त्रेण शम्बरः ॥ १० ॥
प्रद्युम्नस्य रथोपस्थे शरवर्षे मुमोच ह ।
तब शम्बरासुरने वैद्युतास्त्रका प्रयोग करके अन्धकारका निवारण कर दिया और प्रद्युम्नके रथकी बैठकमें बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १०½ ॥
तदस्त्रजालं प्रद्युम्नः शरेणानतपर्वणा ॥ ११ ॥
चिच्छेद बहुधा राजन् दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
राजन् ! प्रद्युम्नने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए झुकी हुई गाँठवाले बाणसे शत्रुके उस अस्त्रजालको अनेक टुकड़ोंमें छिन्न-भिन्न कर दिया ॥ ११½ ॥
हते तस्मिन् महावर्षे शराणां कार्ष्णिना तदा ॥ १२ ॥
द्रुमवर्षे मुमोचाथ मायया कालशम्बरः ।
श्रीकृष्णकुमारद्वारा जब बाणोंकी वह महावृष्टि शान्त कर दी गयी, तब कालशम्बरने मायाद्वारा वृक्षोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ १२½ ॥
द्रुमवर्षोच्छ्रितं दृष्ट्वा प्रद्युम्नः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १३ ॥
आग्नेयास्त्रं मुमोचाथ तेन वृक्षाननाशयत् ।
वृक्षोंकी उस वर्षाको बढ़ती देख प्रद्युम्न क्रोधसे मूर्च्छित-से हो गये, फिर तो उन्होंने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया और उसके द्वारा समस्त वृक्षोंका नाश कर डाला ॥
भस्मीभूते वृक्षवर्षे शिलासंघातमुत्सृजन् ॥ १४ ॥
प्रद्युम्नस्तं तु वायव्यैः प्रोत्सारयत संयुगे ।
वृक्षोंकी वर्षा नष्ट हो जानेपर उसने शिलासमूह बरसाना आरम्भ किया, परंतु प्रद्युम्नने युद्धस्थलमें वायव्यास्त्रका प्रयोग करके उन शिलाओंको दूर हटा दिया ॥ १४½ ॥
ततो मायां परां चक्रे देवशत्रुः प्रतापवान् ॥ १५ ॥
सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च तरक्षून्नृक्षवानरान् ।
वारणान् वारिदप्रख्यान् हयानुष्ट्रान् विशाम्पते ॥ १६ ॥
मुमोच धनुरायम्य प्रद्युम्नस्य रथोपरि ।
प्रजानाथ ! तब प्रतापी देवशत्रु शम्बरने दूसरी माया प्रकट की। उसने धनुष तानकर प्रद्युम्नके रथपर सिंह, व्याघ्र, वराह, तरक्षु (सेई), रीछ, वानर, मेघोंके समान काले-काले हाथी, घोड़े और ऊँटके रूपोंमें बाणोंका प्रहार किया ॥ १५-१६½ ॥
गान्धर्वास्त्रेण चिच्छेद सर्वांस्तान् खण्डशस्तदा ॥१७॥
प्रद्युम्नने गान्धर्वास्त्रका प्रयोग करके उन सबके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १७ ॥
प्रद्युम्नेन तु सा माया हता तां वीक्ष्य शम्बरः ।
अन्यां मायां मुमोचाथ शम्बरः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १८ ॥
प्रद्युम्नने वह माया नष्ट कर दी, यह देखकर क्रोधसे मूर्च्छित हुए शम्बरासुरने दूसरी मायाका प्रयोग किया ॥