विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
विष्णुपर्व ] षडधिकशततमोऽध्यायः [ ६३७
ही मेरे रथको शत्रुके सामने ले चलो, जिससे अपना अप्रिय करनेवाले इस प्रद्युम्नको मैं अपने बाणोंसे मार डालूँ' ॥ १½ ॥
ततो भर्तुर्वचः श्रुत्वा सूतस्तत्प्रियकारकः ॥ २ ॥
रथं संचोदयामास चामीकरविभूषितम् ।
तं दृष्ट्वा रथमायान्तं प्रद्युम्नः फुल्लोचनः ॥ ३ ॥
तब स्वामीका यह वचन सुनकर उनका प्रिय करनेवाले सूतने उस सुवर्णभूषित रथको आगे बढ़ाया। उस रथको आते देख प्रद्युम्नके नेत्र हर्षसे खिल उठे ॥ २-३ ॥
संदधे चापमादाय शरं कनकभूषितम् ।
तेनाहनत् सुसंक्रुद्धः कोपयञ्छम्बरं रणे ॥ ४ ॥
उन्होंने अत्यन्त कुपित हो धनुष लेकर उसपर एक सुवर्णभूषित बाण रखा और उस बाणसे शम्बरासुरका क्रोध बढ़ाते हुए उसे रणभूमिमें घायल कर दिया ॥ ४ ॥
हृदये ताडितस्तेन देवशत्रुः सुविह्वलः ।
रथशक्तिं समाश्रित्य तस्थौ सोऽथ विचेतनः ॥ ५ ॥
उस बाणने उसकी छातीमें चोट पहुँचाई थी, इससे वह देवशत्रु शम्बर अत्यन्त व्याकुल हो अचेत हो गया और रथशक्तिका सहारा लेकर टिका रहा ॥ ५ ॥
स चेतनां पुनः प्राप्य धनुरादाय शम्बरः ।
विव्याध कार्ष्णिं कुपितः सप्तभिर्निशितैः शरैः ॥ ६ ॥
फिर होशमें आनेपर कुपित हुए शम्बरासुरने धनुष हाथमें ले सात पैने बाणोंद्वारा श्रीकृष्णकुमारपर प्रहार किया ॥ ६ ॥
तानप्राप्ताञ्शरान् सोऽथ सप्तभिः सप्तधाच्छिनत् ।
शम्बरं च जघानाथ सप्तत्या निशितैः शरैः ॥ ७ ॥
उन बाणोंको अपने पास पहुँचनेसे पहले ही प्रद्युम्नने सात सायकोंसे मारकर सात बार खण्डित किया, साथ ही सत्तर तीखे बाणोंसे शम्बरासुरको घायल कर दिया ॥ ७ ॥
पुनः शरसहस्रेण कङ्कबर्हिणवाससा ।
अहनच्छम्बरं क्रोधाद् धाराभिरिव पर्वतम् ॥ ८ ॥
इसके बाद गीध और मोरकी पाँख लगे हुए एक हजार बाणोंकी क्रोधपूर्वक वर्षा करके उन्होंने पुनः शम्बरासुरको आहत कर दिया, ठीक उसी तरह जैसे मेघ जलकी धाराओंसे पर्वतको आप्लावित कर देता है ॥ ८ ॥
प्रदिशो विदिशश्चैव शरधारासमावृताः ॥ ९ ॥
अन्धकारीकृतं व्योम दिनकर्ता न दृश्यते ।
समस्त दिशाएँ और विदिशाएँ बाणधारासे आवृत्त हो गयीं। आकाशमें अन्धकार छा गया। दिनकर सूर्यका दीखना बंद हो गया ॥ ९½ ॥
ततोऽन्धकारमुत्सार्य वैद्युतास्त्रेण शम्बरः ॥ १० ॥
प्रद्युम्नस्य रथोपस्थे शरवर्षे मुमोच ह ।
तब शम्बरासुरने वैद्युतास्त्रका प्रयोग करके अन्धकारका निवारण कर दिया और प्रद्युम्नके रथकी बैठकमें बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १०½ ॥
तदस्त्रजालं प्रद्युम्नः शरेणानतपर्वणा ॥ ११ ॥
चिच्छेद बहुधा राजन् दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
राजन् ! प्रद्युम्नने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए झुकी हुई गाँठवाले बाणसे शत्रुके उस अस्त्रजालको अनेक टुकड़ोंमें छिन्न-भिन्न कर दिया ॥ ११½ ॥
हते तस्मिन् महावर्षे शराणां कार्ष्णिना तदा ॥ १२ ॥
द्रुमवर्षे मुमोचाथ मायया कालशम्बरः ।
श्रीकृष्णकुमारद्वारा जब बाणोंकी वह महावृष्टि शान्त कर दी गयी, तब कालशम्बरने मायाद्वारा वृक्षोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ १२½ ॥
द्रुमवर्षोच्छ्रितं दृष्ट्वा प्रद्युम्नः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १३ ॥
आग्नेयास्त्रं मुमोचाथ तेन वृक्षाननाशयत् ।
वृक्षोंकी उस वर्षाको बढ़ती देख प्रद्युम्न क्रोधसे मूर्च्छित-से हो गये, फिर तो उन्होंने आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया और उसके द्वारा समस्त वृक्षोंका नाश कर डाला ॥
भस्मीभूते वृक्षवर्षे शिलासंघातमुत्सृजन् ॥ १४ ॥
प्रद्युम्नस्तं तु वायव्यैः प्रोत्सारयत संयुगे ।
वृक्षोंकी वर्षा नष्ट हो जानेपर उसने शिलासमूह बरसाना आरम्भ किया, परंतु प्रद्युम्नने युद्धस्थलमें वायव्यास्त्रका प्रयोग करके उन शिलाओंको दूर हटा दिया ॥ १४½ ॥
ततो मायां परां चक्रे देवशत्रुः प्रतापवान् ॥ १५ ॥
सिंहान् व्याघ्रान् वराहांश्च तरक्षून्नृक्षवानरान् ।
वारणान् वारिदप्रख्यान् हयानुष्ट्रान् विशाम्पते ॥ १६ ॥
मुमोच धनुरायम्य प्रद्युम्नस्य रथोपरि ।
प्रजानाथ ! तब प्रतापी देवशत्रु शम्बरने दूसरी माया प्रकट की। उसने धनुष तानकर प्रद्युम्नके रथपर सिंह, व्याघ्र, वराह, तरक्षु (सेई), रीछ, वानर, मेघोंके समान काले-काले हाथी, घोड़े और ऊँटके रूपोंमें बाणोंका प्रहार किया ॥ १५-१६½ ॥
गान्धर्वास्त्रेण चिच्छेद सर्वांस्तान् खण्डशस्तदा ॥१७॥
प्रद्युम्नने गान्धर्वास्त्रका प्रयोग करके उन सबके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १७ ॥
प्रद्युम्नेन तु सा माया हता तां वीक्ष्य शम्बरः ।
अन्यां मायां मुमोचाथ शम्बरः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १८ ॥
प्रद्युम्नने वह माया नष्ट कर दी, यह देखकर क्रोधसे मूर्च्छित हुए शम्बरासुरने दूसरी मायाका प्रयोग किया ॥
| ६३८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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गजेन्द्रान् भिन्नवदनान् षष्टिहायनयौवनान् ।
महामात्रोत्तमारूढान् कल्पितान् रणकोविदान् ॥ १९ ॥
उसने साठ वर्षोंकी अवस्थावाले नवयौवनसम्पन्न बहुत-से गजराज प्रकट किये, जिनके मस्तकसे मदकी धारा फूट रही थी । उनके ऊपर अच्छे-अच्छे महावत बैठे थे । उन्हें युद्धकी सजासे सजाया गया था । वे सब-के-सब युद्धकी कलामें चतुर जान पड़ते थे ॥ १९ ॥
तामापतन्तीं मायां तु कार्ष्णिः कमललोचनः ।
सैंहीं मायां समुत्स्रष्टुं चक्रे बुद्धिं महामनाः ॥ २० ॥
उस गजप्रकार मायाको अपनी ओर आती देख कमल-नयन महामना श्रीकृष्णकुमारने सिंहरूपिणी मायाके प्रयोगका विचार किया ॥ २० ॥
सा सृष्टा सिंहमाया तु रौक्मिणेयेन धीमता ।
माया नागवती नष्टा आदित्येनेव शर्वरी ॥ २१ ॥
बुद्धिमान् रुक्मिणीनन्दनके द्वारा जब वह सिंहमयी माया रची गयी, तब जैसे सूर्योदयसे रात्रिका अन्धकार नष्ट होता है, उसी प्रकार वह हाथियोंसे युक्त माया विलीन हो गयी ॥ २१ ॥
निहतां हस्तिमायां तु तां समीक्ष्य महासुरः ।
अन्यां सम्मोहिनीं मायां सोऽसृजद् दानवोत्तमः॥२२॥
उस हस्तिमयी मायाका नाश हुआ देख महान् असुर दानवराज शम्बरने दूसरी सम्मोहिनी नामक मायाका प्रयोग किया ॥ २२ ॥
तां दृष्ट्वा मोहिनीं नाम मायां मयविनिर्मिताम् ।
संज्ञास्त्रेण तु प्रद्युम्नो नाशयामास वीर्यवान् ॥ २३ ॥
मयद्वारा निर्मित उस मोहिनी मायाको देखकर पराक्रमी प्रद्युम्नने संज्ञास्त्रके द्वारा उसका नाश कर डाला ॥ २३ ॥
शम्बरस्तु ततः क्रुद्धो हतया मायया तदा ।
सैंहीं मायां महातेजाः सोऽसृजद् दानवेश्वरः॥ २४ ॥
जब वह माया भी नष्ट हो गयी, तब कुपित हुए महा-तेजस्वी दानवराज शम्बरने सिंहमयी मायाकी सृष्टि की ॥२४॥
सिंहानापततो दृष्ट्वा रौक्मिणेयः प्रतापवान् ।
अस्त्रं गान्धर्वमादाय शरभानसृजत् तदा ॥ २५ ॥
सिंहको अपने ऊपर आते देख प्रतापी रुक्मिणीकुमारने गान्धर्वास्त्र लेकर शरभोंकी सृष्टि की ॥ २५ ॥
तेऽष्टापदा बलोदग्रा नखदंष्ट्रायुधा रणे ।
सिंहान् विद्रावयामासुर्वायुर्जलधरानिव ॥ २६ ॥
वे आठ पैरोंवाले तथा प्रचण्ड बलशाली थे । नख और दाढ़ें ही उनके आयुध थीं । जैसे वायु बादलोंको उड़ा देती है, उसी प्रकार उन शरभोंने शत्रुके उन सिंहोंको मार भगाया ॥ २६ ॥
सिंहान् विद्रवतो दृष्ट्वा माययाष्टापदेन वै ।
शम्बरश्चिन्तयामास कथमेनं निहन्मि वै ।
अहो मूर्खस्वभावोऽहं यन्मया न हतः शिशुः ॥ २७ ॥
शरभमयी मायासे सिंहोंको भागते देख शम्बरासुर इस चिन्तामें पड़ा कि मैं किस प्रकार प्रद्युम्नका वध करूँ । अहो ! मैं बड़े मूर्खस्वभावका हूँ, क्योंकि मैंने बाल्यावस्थामें ही इसका वध नहीं कर डाला ॥ २७ ॥
प्राप्तयौवनदेहस्तु कृतास्त्रश्चापि दुर्मतिः ।
तत् कथं निहनिष्यामि शत्रुं रणशिरःस्थितम् ॥ २८ ॥
अब तो जवानीका शरीर पाकर यह दुर्बुद्धि शत्रु सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञाता भी हो चुका है । अतः युद्धके मुहानेपर खड़े हुए इस शत्रुको मैं किस प्रकार वध करूँगा ॥ २८ ॥
माया सा तिष्ठते तीव्रा पन्नगी नाम भीषणा ।
दत्ता मे देवदेवेन हरेणासुरघातिना ॥ २९ ॥
अच्छा, वह पन्नगी नामक अत्यन्त दुःसह एवं भीषण माया अभी मेरे पास मौजूद है, जिसे असुरघाती देवाधिदेव महादेवजीने मुझे दिया था ॥ २९ ॥
तां सृजामि महामायामाशीविषसमाकुलाम् ।
तया दग्धेत दुष्टात्मा ह्येष मायामयो बली ॥ ३० ॥
विषधर सर्पोंसे युक्त उस महामायाकी मैं सृष्टि करता हूँ, उससे यह बलवान् मायामय दुष्टात्मा शत्रु अवश्य दग्ध हो जायगा ॥ ३० ॥
सा सृष्टा पन्नगी माया विषज्वालासमाकुला ।
तया पन्नगमय्या तु सरथं सहवाजिनम् ॥ ३१ ॥
ससूतं स हि प्रद्युम्नं बबन्ध शरबन्धनैः ।
ऐसा सोचकर उस असुरने पन्नगी मायाकी सृष्टि की, जो विषकी ज्वालाओंसे व्याप्त थी । उस सर्पमयी मायासे शम्बरने रथ, घोड़े और सारथिसहित प्रद्युम्नको सर्पाकार बाणोंके बन्धनोंद्वारा बाँध लिया ॥ ३१½ ॥
बध्यमानं तदा दृष्ट्वा आत्मानं वृष्णिवंशजः ॥ ३२ ॥
मायां संचिन्तयामास सौपर्णीं सर्पनाशिनीम् ।
अपनेको सर्पोंसे बद्ध होते देख वृष्णिवंशी प्रद्युम्नने सर्पोंको नाश करनेवाली सौपर्णी ( गरुड़सम्बन्धिनी ) मायाका चिन्तन किया ॥ ३२½ ॥
सा चिन्तिता महामाया प्रद्युम्नेन महात्मना ॥ ३३ ॥
सुपर्णा विचरन्ति स्म सर्पा नष्टा महाविषाः ।
महात्मा प्रद्युम्नने ज्यों ही उस महामायाका चिन्तन किया, त्यों ही वहाँ बहुत-से गरुड़ पक्षी आकर विचरने लगे और वे महाविषधर सर्प नष्ट हो गये ॥ ३३½ ॥
भग्नायां सर्पमायायां प्रशंसन्ति सुरासुराः ॥ ३४ ॥
विष्णुपर्व ] पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ६३९
साधु वीर महाबाहो रुक्मिण्यानन्दवर्धन ।
यत् त्वया धर्षिता माया तेन स्म परितोषिताः ॥ ३५ ॥
उस सर्पमयी मायाके नष्ट होनेपर देवता और असुर सभी प्रद्युम्नकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे, ‘रुक्मिणीका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु वीर ! तुमने बहुत अच्छा किया। तुम्हारे द्वारा जो इस मायाकी पराजय हुई है, इससे हम बहुत संतुष्ट हैं’ ॥ ३४-३५ ॥
हतायां सर्पमायायां शम्बरोऽचिन्तयत् पुनः ।
अस्ति मे कालदण्डाभो मुद्गरो हेमभूषितः ॥ ३६ ॥
उस सर्पमयी मायाके नष्ट होनेपर शम्बरासुरने पुनः सोचा, ‘अभी मेरे पास सुवर्णभूषित मुद्गर है, जो कालदण्डके समान भयंकर है॥ ३६ ॥
तमप्रतिहतं युद्धे देवदानवमानवैः ।
पुरा यो मम पार्वत्या दत्तः परमतुष्टया ॥ ३७ ॥
‘वह युद्धमे देवता, दानवों और मानवोंके द्वारा भी प्रतिहत होनेवाला नहीं है, मैं उसीका प्रयोग करूँगा। पूर्व-कालमें परम संतुष्ट हुई पार्वती देवीने मुझे वह मुद्गर दिया और इस प्रकार कहा—॥ ३७ ॥
गृहाण शम्बरेमं त्वं मुद्गरं हेमभूषितम् ।
मया सृष्टं स्वदेहे वै तपः परमदुश्वरम् ॥ ३८ ॥
‘शम्बर ! तू यह सुवर्णभूषित मुद्गर ग्रहण कर। मैंने अपने शरीरसे अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके इसकी सृष्टि की है॥ ३८ ॥
मायान्तकरणं नाम सर्वासुरविनाशनम् ।
अनेन दानवौ रौद्रौ बलिनौ कामरूपिणौ ॥ ३९ ॥
शुम्भश्चैव निशुम्भश्च सगणौ सूदतौ मया ।
प्राणसंशयमापन्ने त्वया मोक्ष्यः स शत्रवे ॥ ४० ॥
‘यह मायाओंका अन्त करनेवाला तथा समस्त असुरोंका विनाशक है। इसके द्वारा मैंने इच्छानुसार रूप धारण करने-वाले दो बलवान् एवं भयंकर दानव शुम्भ और निशुम्भका उनके सैनिकगणोंसहित संहार किया है। प्राणसंकटकी स्थिति आनेपर ही तुझे अपने शत्रुपर इस मुद्गरका प्रयोग करना चाहिये’ ॥ ३९-४० ॥
इत्युक्त्वा पार्वती देवी तत्रैवान्तरधीयत ।
तदहं मुद्गरं श्रेष्ठं मोचयिष्यामि शत्रवे ॥ ४१ ॥
‘ऐसा कहकर पार्वती देवी वहीं अन्तर्धान हो गयी थीं, अतः मैं उसी श्रेष्ठ मुद्गरका अपने शत्रुपर प्रहार करूँगा’ ॥
तस्य विज्ञाय चित्तं तु देवराजोऽभ्यभाषत ।
गच्छ नारद शीघ्रं त्वं प्रद्युम्नस्य रथं प्रति ॥ ४२ ॥
सम्बोधय महाबाहुं पूर्वजातिं च मोक्षय ।
वैष्णवास्त्रं प्रयच्छास्मै वधार्थं शम्बरस्य च ॥ ४३ ॥
अभेद्यं कवचं चास्य प्रयच्छासुरसूदने ।
उस समय उसके मनोभावको जानकर देवराज इन्द्रने नारदजीसे कहा—‘नारदजी ! आप शीघ्र ही प्रद्युम्नके रथके पास चले जाइये और उन महाबाहु वीरको समझाइये तथा उन्हें उनके पूर्वजन्मका स्मरण दिलाइये। साथ ही शम्बरासुर-के वधके लिये उन्हें वैष्णवास्त्र प्रदान कीजिये। असुरसंहारके कर्ममें लगे हुए इन्हें अभेद्य कवच भी दीजिये’ ॥४२-४३३/२॥
एवमुक्तो मघवता नारदः प्रययौ त्वरम् ॥ ४४ ॥
आकाशेऽधिष्ठितोऽवोचन्मकरध्वजकेतनम् ।
इन्द्रके ऐसा कहनेपर नारदजी बड़ी उतावलीके साथ वहाँ गये और आकाशमें खड़े होकर मकरध्वज कामसे इस प्रकार बोले—॥ ४४१/२ ॥
कुमार पश्य मां प्राप्तं देवगन्धर्वनारदम् ।
प्रेषितं देवराजेन तव सम्बोधनाय वै ॥ ४५ ॥
‘कुमार ! देखो, मैं देवगन्धर्व नारद यहाँ आया हूँ। देवराज इन्द्रने मुझे तुमको समझानेके लिये यहाँ भेजा है ॥
स्मर त्वं पूर्वकं भावं कामदेवोऽसि मानद ।
हरकोपानलाद् दग्धस्तेनानङ्ग इहोच्यसे ॥ ४६ ॥
‘मानद ! तुम अपने पूर्वजन्मका स्मरण करो। तुम साक्षात् कामदेव हो। भगवान् शङ्करकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये थे, इसलिये इस जगत्में अनङ्ग कहलाते हो ॥४६॥
त्वं वृष्णिवंशजातोऽसि रुक्मिण्या गर्भसम्भवः ।
जातोऽसि केशवेन त्वं प्रद्युम्न इति कीर्त्यसे ॥ ४७ ॥
‘तुम्हारा वर्तमान जन्म वृष्णिवंशमें हुआ है। तुम रुक्मिणीदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए हो। साक्षात् भगवान् केशवने तुम्हें जन्म दिया है। तुम प्रद्युम्न नामसे पुकारे जाते हो ॥ ४७ ॥
आहृत्य शम्बरेण त्वमिहानीतोऽसि मानद ।
सप्तरात्रे त्वसम्पूर्णे सूतिकागारमध्यतः ॥ ४८ ॥
‘मानद ! तुम्हारे जन्मकी सातवीं रात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि शम्बरासुर तुम्हे सूतिकागारसे हरकर यहाँ उठा लाया ॥ ४८ ॥
वधार्थं शम्बरस्य त्वं ह्रियमाणो ह्युपेक्षितः ।
केशवेन महाबाहो देवकार्यार्थसिद्धये ॥ ४९ ॥
‘महाबाहो ! देवताओंका कार्य सिद्ध करने और शम्बरासुरको मारनेके लिये ही भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हारे अपहरणकी उपेक्षा की ॥ ४९ ॥
यैषा मायावती नाम भार्या वै शम्बरस्य तु ।
रतिं तां विद्धि कल्याणीं तव भार्या पुरातनीम् ॥ ५० ॥
‘यह जो मायावती नामसे प्रसिद्ध शम्बरासुरकी भार्या बनी बैठी है, इसे तुम अपनी कल्याणमयी पुरातन पत्नी रति समझो ॥ ५० ॥
६४० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तव संरक्षणार्थाय शम्बरस्य गृहेऽवसत्।
मायां शरीरजां तस्य मोहनार्थं दुरात्मनः ॥ ५१ ॥
रतेः सम्पादनार्थाय प्रेषयत्यनिशं तदा।
'तुम्हारे शरीरकी रक्षा करनेके लिये ही इसने शम्बरासुरके घरमें निवास किया है। उस दुरात्मा दैत्यको मोहनेके लिये यह अपने शरीरसे एक मायामयी स्त्री प्रकट करके उसकी प्रसन्नताके लिये सदा भेजा करती है ॥ ५१॥'
एवं प्रद्युम्न बुद्ध्वा चै तत्र भार्या प्रतिष्ठिता ॥ ५२ ॥
हत्वा तं शम्बरं वीर वैष्णवास्त्रेण संयुगे।
गृह्य मायावतीं भार्या द्वारकां गन्तुमर्हसि ॥ ५३ ॥
'प्रद्युम्न ! यह सब जानकर ही तुम्हारी पत्नी वहाँ स्थिरतापूर्वक रहती है। वीर ! तुम वैष्णवास्त्रके द्वारा युद्धमें शम्बरासुरका वध करके अपनी भार्या मायावतीको साथ ले द्वारकाको जानेयोग्य हो ॥ ५२-५३ ॥'
गृहाण वैष्णवं चास्त्रं कवचं च महाप्रभम्।
शक्रेण तव संगृह्य प्रेषितं शत्रुसूदन ॥ ५४ ॥
'शत्रुसूदन ! यह वैष्णव अस्त्र तथा अत्यन्त कान्तिमान् कवच संग्रह करके इन्द्रने तुम्हारे लिये भेजा है। तुम इन्हें ग्रहण करो ॥'
शृणु मे ह्यपरं वाक्यं क्रियतामविशङ्कया।
अस्य देवरिपोस्तात मुद्गरो नित्यमूर्जितः ॥ ५५ ॥
पार्वत्यां परितुष्टायां दत्तः शत्रुनिबर्हणः।
अमोघश्चैव संग्रामे देवदानवमानवैः ॥ ५६ ॥
'अब तुम मेरी दूसरी बात सुनो और निःशङ्क होकर उसका पालन करो। तात ! इस देवद्रोहीका मुद्गर नित्य शक्तिशाली है। पार्वती देवीने प्रसन्न होकर वह शत्रुनाशक मुद्गर इसे प्रदान किया था। यह संग्राममें देवताओं, दानवों और मानवोंके लिये भी अमोघ है ॥ ५५-५६ ॥'
तदस्त्रप्रतिघातार्थं देवीं त्वं स्मर्तुमर्हसि।
स्तव्या चैव नमस्या च महादेवी रणोत्सुकैः ॥ ५७ ॥
'उस अस्त्रका निवारण करनेके लिये तुम्हें पार्वती देवीका स्मरण करना चाहिये। युद्धके लिये उत्सुक रहनेवाले वीरोंको महादेवी पार्वतीकी स्तुति और वन्दना अवश्य करनी चाहिये॥'
तत्र वै क्रियतां यत्नः संग्रामे रिपुणा सह ।
इत्युक्त्वा नारदो वाक्यं प्रययौ यत्र वासवः ॥ ५८ ॥
'शत्रुके साथ संग्राम करते समय तुम्हें पार्वती देवीकी स्तुतिके लिये भी अवश्य प्रयत्न करना चाहिये।' ऐसा कहकर नारदजी जहाँ इन्द्र थे, वहीं चले गये ॥ ५८ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरवधे नारदवाक्ये षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरवधके प्रसङ्गमें नारदजीका वाक्यविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ १०६ ॥
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः
प्रद्युम्नके द्वारा शम्बरासुरका वध
वैशम्पायन उवाच
शम्बरस्तु ततः क्रुद्धो मुद्गरं तं समाददे ।
मुद्गरे गृह्यमाणे तु द्वादशार्काः समुत्थिताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तब क्रोधमें भरे हुए शम्बरासुरने वह मुद्गर हाथमें ले लिया। उसे लेते समय सहसा बारह सूर्य प्रकट हो गये ॥ १ ॥
पर्वताश्चलिताः सर्वे तथैव वसुधात लम्।
उन्मार्गाः सागरा याताः संक्षुब्धाश्चापि देवताः ॥ २ ॥
समस्त पर्वत हिलने लगे, पृथ्वी काँप उठी, सब समुद्र ऊपरको उछलने लगे, इसी प्रकार समस्त देवताओमे भी क्षोभ फैल गया ॥ २ ॥
गृध्रचक्राकुलं व्योम उल्कापातो बभूव ह।
ववर्ष रुधिरं देवः परुषं पवनो ववौ ॥ ३ ॥
आकाशमे गीधोंके समूह मँडराने लगे, उल्कापात होने लगा, बादल रुधिर बरसाने लगे और अत्यन्त रूखी वायु चलने लगी ॥ ३ ॥
एवं दृष्ट्वा महोत्पातान् प्रद्युम्नः स त्वरान्वितः ।
अवतीर्य रथाद् वीरः कृताञ्जलिपुटः स्थितः ॥ ४ ॥
वीर प्रद्युम्न इस प्रकारके महान् उत्पातोंको देखकर फुर्तीके साथ रथसे नीचे उतर दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ४ ॥
देवीं सस्मार मनसा पार्वतीं शङ्करप्रियाम् ।
प्रणम्य शिरसा देवीं स्तोतुं समुपचक्रमे ॥ ५ ॥
वे मन ही-मन भगवान् शङ्करकी प्रिया देवी पार्वतीका स्मरण करने लगे। उन्होंने सिर झुकाकर देवीको प्रणाम करके उनकी स्तुति आरम्भ की ॥ ५ ॥
प्रद्युम्न उवाच
ॐ नमः कात्यायन्यै गिरीशायै नमो नमः।
नमस्त्रैलोक्यमायायै कात्यायन्यै नमो नमः ॥ ६ ॥
प्रद्युम्नने कहा— सच्चिदानन्दमयी कात्यायनी देवीको प्रणाम है। पर्वतोंकी स्वामिनी पार्वती देवीको वारंवार नमस्कार है। तीनों लोकोंकी मायासस्वरूपा कात्यायनी देवीको मेरा बारंबार अभिवादन है ॥ ६ ॥
विष्णुपर्व ] सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ६४१
नमः शत्रुविनाशिन्यै नमो गौर्यै शिवप्रिये।
नमस्ये शुम्भमथनीं निशुम्भमथनीमपि ॥ ७ ॥
शत्रुओंको नष्ट करनेवाली गौरीदेवीको बारंबार प्रणाम है। शिवप्रिये ! शुम्भ दैत्यको मथ डालनेवाली और निशुम्भ-को भी रौंदनेवाली आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥
कालरात्रि नमस्तुभ्यं कौमार्यै च नमो नमः।
कान्तारवासिनीं देवीं नमस्यामि कृताञ्जलिः ॥ ८ ॥
कालरात्रि ! आपको प्रणाम है। कौमारी शक्तिरूपा आपको बारंबार नमस्कार है। मैं कान्तारवासिनी देवीको हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ॥ ८ ॥
विन्ध्यवासिनीं दुर्गघ्नां रणदुर्गा रणप्रियाम् ।
नमस्यामि महादेवीं जयाँ च विजयां तथा ॥ ९ ॥
मैं विन्ध्याचलमें निवास करनेवाली, विपत्तियोंको नष्ट करनेवाली, रणचण्डी, रणप्रिया, जया और विजया नामवाली महादेवीको प्रणाम करता हूँ ॥ ९ ॥
अपराजितां नमस्येऽहमजितां शत्रुनाशिनीम् ।
घण्टाहस्तां नमस्यामि घण्टामालाकुलां तथा ॥ १० ॥
मैं किसीसे पराजित न होनेवाली, शत्रुओंकी विनाश-कारिणी अपराजिता देवीको प्रणाम करता हूँ। घण्टाओंकी मालाओंसे व्याप्त और हाथमें घण्टा धारण करनेवाली देवीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १० ॥
त्रिशूलिनीं नमस्यामि महिषासुरघातिनीम् ।
सिंहवाहां नमस्यामि सिंहप्रवरकेतनाम् ॥ ११ ॥
मैं महिषासुरका संहार करनेवाली त्रिशूलधारिणी देवीको नमस्कार करता हूँ। सिंहपर सवार होनेवाली और सिंहके चिह्नसे अलंकृत श्रेष्ठ ध्वजावाली देवीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥
एकानंशां नमस्यामि गायत्रीं यज्ञसत्कृताम् ।
सावित्रीं चापि विप्राणां नमस्येऽहं कृताञ्जलिः ॥ १२ ॥
रक्ष मां देवि सततं संग्रामे विजयं कुरु ।
मैं एकानंशा देवीको प्रणाम करता हूँ, यज्ञोंमें पूजित गायत्री देवीको नमस्कार करता हूँ और विप्रोंकी सावित्री (रूपसे उपास्य) देवीको भी मैं हाथ जोड़कर अभिवादन करता हूँ। देवि ! आप सर्वदा मेरी रक्षा कीजिये और संग्राममें मुझे विजय प्रदान कीजिये ॥ १२ १/२ ॥
इति कामवचःश्रुत्वा दुर्गा सम्प्रीतमानसा ॥ १३ ॥
उवाच वचनं देवी सुप्रीतेनान्तरात्मना ।
कामस्वरूप प्रद्युम्नके ऐसे प्रार्थनापूर्ण वचनोंसे दुर्गा देवी संतुष्ट हो गयीं। उनका मन प्रसन्न हो गया। तदनन्तर दुर्गा-देवी हृदयमें अत्यन्त आह्लादित हो यह वचन कहने लगीं—॥
पश्य पश्य महाबाहो रुक्मिण्यानन्दवर्धन ॥ १४ ॥
वरं वरय वत्स त्वममोघं दर्शनं मम।
'रुक्मिणीके आनन्दको बढ़ानेवाले महाबाहु प्रद्युम्न ! (मेरी ओर) देख ! देख !! मेरा दर्शन अमोघ है, अतः वत्स ! तू मनोवाञ्छित वर माँग ले' ॥ १४ १/२ ॥
देव्यास्तु वचनं श्रुत्वा रोमाञ्चोद्गतमानसः ॥ १५ ॥
प्रणम्य शिरसा देवीं विज्ञप्तुमुपचक्रमे ।
यदि त्वं देवि तुष्टासि दीयतां मे यदीप्सितम् ॥ १६ ॥
देवीके इस वचनको सुनकर प्रद्युम्न रोमाञ्चित हो गये, हर्षसे उनका हृदय उछलने लगा। तब उन्होंने सिर झुकाकर देवीको प्रणाम करके उनसे इस प्रकार निवेदन किया—'देवि ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं जो चाहता हूँ, वह मुझे दीजिये ॥ १५-१६ ॥
वरं च वरदे याचे सर्वमित्रेषु मे जयः ।
यस्त्वया मुद्गरो दत्तः शम्बरस्यात्मसम्भवः ॥ १७ ॥
एष मे गात्रमासाद्य माला पद्मवती भवेत् ।
तथास्त्विति च साप्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ १८ ॥
'वरदे ! मैं यह वर माँगता हूँ कि सब शत्रुओंपर मुझे विजय प्राप्त हो और अपने शरीरसे प्रकट किया हुआ जो मुद्गर आपने शम्बरासुरको दिया है, वह मेरे शरीरपर प्राप्त होकर कमलोंकी माला बन जाय।' तब वे देवी 'ऐसा ही होगा' यह कहकर वहीं ही अन्तर्धान हो गयीं ॥ १७-१८ ॥
प्रद्युम्नस्तु महातेजास्तुष्टो रथमथारुहत् ।
मुद्गरं तं गृहीत्वा च शम्बरः क्रोधमूर्च्छितः ॥ १९ ॥
भ्रामयित्वा स चिक्षेप प्रद्युम्नोरसि वीर्यवान् ।
तब महातेजस्वी प्रद्युम्न संतुष्ट होकर रथपर आरूढ़ हुए। उधर क्रोधसे अचेत हुए पराक्रमी शम्बरने उस मुद्गरको हाथमें लेकर घुमाया और प्रद्युम्नकी छातीपर दे मारा ॥
स गत्वा मदनाभ्याशं माला भूत्वा तु पौष्करी ॥ २० ॥
प्रद्युम्नस्य च कण्ठे तु समासक्ता व्यराजत ।
नक्षत्राणां तु मालायां यथा परिवृतो विधुः ॥ २१ ॥
प्रद्युम्नके निकट जाकर वह मुद्गर कमल-पुष्पोंकी माला बन गया। वह माला प्रद्युम्नके कण्ठमे आसक्त होकर अतिशय शोभा पाने लगी। उस समय वे नक्षत्रोंकी मालासे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित हुए ॥ २०-२१ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
साधु साध्विति वाचोचुः पूजयन् केशवात्मजम् ॥ २२ ॥
मुद्गरं पुष्पभूतं तु दृष्ट्वा प्रद्युम्नसन्निधौ ।
वैष्णवं परमास्त्रं तु नारदेन यथाहृतम् ॥ २३ ॥
संदधे चापमानम्य इदं वचनमब्रवीत् ।
तत्पश्चात् देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि 'साधु ! साधु !' कहकर केशवकुमारकी प्रशंसा करने लगे। प्रद्युम्नके निकट जब वह मुद्गर कमलपुष्प बन गया, तब प्रद्युम्नने
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| ६४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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नारदजीके दिये हुए वैष्णव नामक दिव्यास्त्रका संधान किया और अपने धनुषको झुकाकर इस प्रकार कहा—॥ २२-२३½॥
यद्यहं रुक्मिणीपुत्रः केशवस्यात्मजो ह्यहम् ॥ २४ ॥
तेन सत्येन बाणेन जहि त्वं शम्बरं रणे।
'वैष्णवास्त्र ! यदि मैं रुक्मिणीदेवी और भगवान् श्रीकृष्णका पुत्र हूँ, तो इस सत्यके प्रभावसे तुम अपने वाण-द्वारा रणभूमिमें शम्बरासुरको मार डालो' ॥ २४½ ॥
इत्युक्त्वा चापमाकृष्य संधाय च महामनाः ॥ २५ ॥
विक्षेप शम्बरस्याथ दहँल्लोकत्रयं यथा।
ऐसा कहकर महामनस्वी प्रद्युम्नने धनुष खींचकर उसपर वाण रखा और तीनों लोकोंको जलाते हुए उसको शम्बरासुरके ऊपर छोड़ दिया ॥ २५½ ॥
स क्षिप्तो वृष्णिसिंहेन शरः क्रव्यादमोहनः ॥ २६ ॥
हृदयं शम्बरस्याथ भित्त्वा धरणिमागतः।
न चास्य मांसं न स्नायुर्नास्थि न त्वङ् न शोणितम् ॥ २७ ॥
सर्वं तद् भस्मसाद्भूतं वैष्णवास्त्रस्य तेजसा।
वृष्णिवंशके सिंह प्रद्युम्नके द्वारा चलाया गया वह वाण राक्षसोंको मोहमें डालनेवाला था। वह शम्बरासुरके हृदयको विदीर्ण करके पृथ्वीपर आ गया, इससे उस दैत्यका न तो मांस, न स्नायुजाल, न हड्डी, न त्वचा और न रक्त ही शेष बचा। वैष्णवास्त्रके तेजसे वह सब कुछ भस्म हो गया ॥ २६-२७½ ॥
हते दैत्ये महाकाये दानवे शम्बरेऽधमे ॥ २८ ॥
जहृषुर्दैवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः।
उर्वशी मेनका रम्भा विप्रचित्तिस्तिलोत्तमा ॥ २९ ॥
उस महाकाय अधम दानव शम्बर दैत्यके मारे जानेपर देवता और गन्धर्व हर्षसे खिल उठे तथा उर्वशी, मेनका, रम्भा, विप्रचित्ति और तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥
ननृतुहृष्टमनसो जगत् स्थावरजङ्गमम् ।
देवराजस्तु सुप्रीतः सर्वदेवगणैः सह।
प्रद्युम्नं पुष्पवर्षेण तमभ्यर्च्य प्रहृष्टवत् ॥ ३० ॥
उपर्युक्त अप्सराएँ जब प्रसन्नचित्त होकर नाचने लगीं, उस समय यह चराचर जगत् भी हर्षसे झूम उठा। समस्त देवताओंसहित देवराज इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हो फूलोंकी वर्षासे प्रद्युम्नका सत्कार करके हर्ष विभोर हो गये ॥ ३० ॥
अथ समरहते तु दैत्यराजे मधुमथनस्य सुतेन वैष्णवास्त्रैः।
विगतरिपुभयाः सुराश्च जग्मुर्मकरविभूषणकेतनं स्तुवन्तः ॥ ३१ ॥
मधुसूदन श्रीकृष्णके पुत्र प्रद्युम्नद्वारा समरभूमिमें वैष्णवास्त्रसे दैत्यराज शम्बरके मारे जानेपर समस्त देवताओंका शत्रुसम्बन्धी भय दूर हो गया और वे मकरध्वज प्रद्युम्नकी स्तुति करते हुए अपने स्थानको चले गये ॥ ३१ ॥
स च समरपरिश्रमं वहन् वै नगरसुखं प्रविवेश रौक्मिणेयः।
प्रियतम इव कान्तया प्रहृष्टस्त्वरितपदं रतिदर्शनं चकार ॥ ३२ ॥
अपने शरीरद्वारा युद्धजनित थकावटका भार वहन करते हुए रुक्मिणीकुमार प्रद्युम्नने नगरद्वारमें प्रवेश किया। जैसे प्रेयसीसे मिलकर प्रियतमको प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार अत्यन्त हर्षमें भरे हुए प्रद्युम्नने तुरंत ही अपनी पत्नी रतिके साक्षात्कार किया ॥ ३२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरवधे सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरासुरका वधविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥
अष्टाधिकशततमोऽध्यायः
मायावतीसहित प्रद्युम्नका द्वारकामें आगमन और रुक्मिणीके भवनमें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
समाप्तमायो मायाज्ञो विक्रान्तः समरेऽव्ययः।
अष्टम्यां निहतो युद्धे मायावी कालशम्बरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! शम्बरासुर मायाओंका ज्ञाता था, किंतु उसकी सारी माया समाप्त हो गयी। मायावी कालशम्बर रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करनेवाला और अविनाशी था, तो भी अष्टमीको युद्धमे प्रद्युम्नद्वारा मार डाला गया ॥ १ ॥
तमृक्षवन्ते नगरे निहत्यासुरसत्तमम्।
गृह्य मायावतीं देवीमागच्छन्नगरं पितुः ॥ २ ॥
ऋक्षवन्त नामक नगरमें असुरशिरोमणि शम्बरका वध करके देवी मायावतीको साथ ले प्रद्युम्न अपने पिताके नगरमें आये ॥ २ ॥
सोऽन्तरिक्षगतो भूत्वा मायावी शीघ्रविक्रमः।
आजगाम पुरीं रम्यां रक्षितां तेजसा पितुः ॥ ३ ॥
शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले मायावी प्रद्युम्न
[विष्णुपर्व ] अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ६४३
आकाशमें स्थित हो अपने पिताके तेजसे सुरक्षित रमणीय पुरी द्वारकामें आये ॥ ३ ॥
सोऽन्तरिक्षान्निपतितः केशवान्तःपुरे शिशुः ।
मायावत्या सह तया रूपवानिव मन्मथः ॥ ४ ॥
वे आकाशसे भगवान् श्रीकृष्णके अन्तःपुरमें उतर पड़े। उस समय उस मायावती (रति) के साथ मूर्तिमान् कामदेवके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥
तस्मिंस्तत्रावपतिते महिष्यः केशवस्य याः ।
विस्मिताश्चैव हृष्टाश्च भीताश्चैवाभवंस्ततः ॥ ५ ॥
उस समय वहाँ उनके उतरनेपर भगवान् श्रीकृष्णकी जो रानियाँ थीं, उनमेंसे कुछ तो आश्चर्यसे चकित हो उठीं, कितनी स्त्रियोंको महान् हर्ष हुआ और बहुत-सी भयभीत हो गयीं ॥ ५ ॥
ततस्तं कामसंकाशं कान्तया सह सङ्गतम् ।
प्रेक्षन्त्यो हृष्टवदनाः पिवन्त्यो नयनोत्सवम् ॥ ६ ॥
प्रद्युम्न अपनी प्रियतमाके साथ मिलकर कामदेवके समान शोभा पा रहे थे। उनकी ओर निहारती हुई रानियोंके मुखपर हर्ष छा रहा था। वे नेत्रोंसे उनकी रूपमाधुरीका पान कर रही थीं, प्रद्युम्न उनके नयनोंके लिये उत्सवरूप हो गये थे ॥ ६ ॥
तं विनीतमुखं दृष्ट्वा लज्जमानं पदे पदे ।
अभवन् स्निग्धसंकल्पाः सर्वास्ताः कृष्णयोषितः ॥ ७ ॥
उनका मुख विनयसे झुका हुआ था। वे पग-पगपर संकोचका अनुभव कर रहे थे। उन्हें देखकर श्रीकृष्णकी सभी रानियोंके हृदयमे वात्सल्य-स्नेहका संचार हो आया था ॥ ७ ॥
रुक्मिणी चैव तं दृष्ट्वा शोकार्ता पुत्रगर्द्धिनी ।
सपत्नीशतसंकीर्णा सबाष्पा वाक्यमब्रवीत् ॥ ८ ॥
पुत्रकी इच्छा रखनेवाली रुक्मिणी उन्हें देखकर शोकसे कातर हो उठीं। वे सैकड़ो सौतोंसे घिरकर आँसू बहाती हुई इस प्रकार बोलीं—॥ ८ ॥
यादृक् स्वप्नो मया दृष्टो निशायां यौवने गते ।
कंसारिणा ममानिय दत्तं साहारपल्लवम् ॥ ९ ॥
'मैंने रातमें निशाकालकी युवावस्था बीत जानेपर अर्थात् पिछले पहरमे जैसा स्वप्न देखा है, (वह इस प्रकार है—) 'मेरे प्राणनाथ कंसनिषूदनने मेरे हाथमें फलयुक्त आम्रपल्लव लाकर दिया है ॥ ९ ॥
शशिरश्मिप्रतीकाशं मुक्तादाम च शोभनम् ।
केशवेनाङ्कमारोप्य मम कण्ठे न्यबध्यत ॥ १० ॥
'फिर श्रीकेशवने मुझे अपने अङ्कमें बिठाकर मोतियोंकी 'एक बहुत सुन्दर माला मेरे कण्ठमें बाँध दी। वह माल चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशमान थी ॥ १० ॥
श्यामा सुचारुकेशा स्त्री शुक्लाम्बरविभूषिता ।
पद्महस्ता निरीक्षन्ती प्रविष्टा मम वेश्मनि ॥ ११ ॥
'फिर एक श्यामा (सोलह वर्षकी अवस्थावाली अथवा श्यामवर्णा) स्त्री मेरे महलमे प्रविष्ट हुई, जिसके केश बड़े ही मनोहर थे। श्वेत वस्त्र उसके अङ्गोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके हाथमें कमल था। वह मेरी ओर देखती हुई घरके भीतर घुसी थी ॥ ११ ॥
तया पुनरहं गृह्य स्नापिता रुचिराम्बुना ।
कुशेशयमयीं मालां स्त्री संगृह्याथ पाणिना ॥ १२ ॥
मम मूर्ध्न्युपाघ्राय दत्ता स्वच्छा तया मम ।
'वह स्त्री मेरा हाथ पकड़कर मुझे स्नानागारमें ले गयी और स्वच्छ जलसे उसने मुझे नहलाया। तत्पश्चात् मेरा मस्तक सूँघकर उसने अपने हाथसे एक निर्मल कमलपुष्पोंकी माला लेकर मुझे पहना दी' ॥ १२ १/२ ॥
एवं स्वप्नान् कीर्तयन्ती रुक्मिणी हृष्टमानसा ॥ १३ ॥
सखीजनवृता देवी कुमारं वीक्ष्य तं मुहुः ।
इस प्रकार स्वप्नोंका वर्णन करती हुई रुक्मिणीका हृदय हर्षसे खिल उठा। सखियोंसे घिरी हुई उन महारानीने कुमार प्रद्युम्नकी ओर बारंबार देखकर कहा—॥ १३ १/२ ॥
धन्यायाः खल्वयं पुत्रो दीर्घायुः प्रियदर्शनः ॥ १४ ॥
ईदृशः कामसंकाशो यौवने प्रथमे स्थितः ।
'निश्चय ही यह किसी बड़भागिनी माताका दीर्घायु पुत्र है, जो देखनेमें बहुत ही प्रिय है। इस तरह कामदेव जैसा सुन्दर यह बालक अभी पहले-पहल युवावस्थामें प्रविष्ट हुआ है' ॥ १४ १/२ ॥
जीवपुत्रा त्वया पुत्र कासौ भाग्यसमन्विता ॥ १५ ॥
किमर्थं चाम्बुदश्यामः सभार्यस्त्वमिहागतः ।
(फिर वे प्रद्युम्नसे बोलीं—) 'बेटा ! वह कौन-सी सौभाग्यशालिनी माता है, जो तुम जैसे चिरंजीवी पुत्रसे पुत्रवती हुई है ? मेघके समान श्यामसुन्दर शरीरवाले तुम अपनी पत्नीके साथ किसलिये यहाँ पधारे हो ? ॥ १५ १/२ ॥
अस्मिन् वयसि सुव्यक्तं प्रद्युम्नो मम पुत्रकः ॥ १६ ॥
भवेद् यदि न नीतः स्यात् कृतान्तेन बलीयसा ।
'यदि बलवान् काल न उठा ले गया होता तो मेरा बेटा प्रद्युम्न भी अवश्य ही इसी (तरुण) अवस्थामें स्थित होता ॥ १६ १/२ ॥
व्यर्कं कृष्णकुमारस्त्वं न मिथ्या मम तर्कितम् ॥ १७ ॥
विज्ञातोऽसि मया चिह्नैर्विना चक्रं जनार्दनः ।
'अथवा मेरा तर्क करना—सोचना व्यर्थ नहीं है। तुम अवश्य ही श्रीकृष्णके पुत्र हो। मैंने लक्षणोंसे तुम्हें पहचान लिया। तुम बिना चक्रके जनार्दन हो (यदि तुम्हारे हाथमें
६५४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [हरिवंश
चक्र हो तो तुममें और श्रीकृष्णमें कोई अन्तर नहीं रह जायगा-) ॥ १७ १/२ ॥
मुखं नारायणस्येव केशाः केशान्त एव च ॥ १८ ॥ ऊरू वक्षो भुजौ तुल्यौ हलिनः श्वशुरस्य मे ।
'तुम्हारा मुख नारायण (श्रीकृष्ण) के समान है। तुम्हारे केश और केशान्तभाग उन्हींके सदृश हैं। तुम्हारी दोनों जाँघें, वक्षःस्थल और दोनों भुजाएँ मेरे श्वशुर हलधरके सदृश हैं ॥ १८ १/२ ॥
कस्त्वं वृष्णिकुलं सर्वं द्योतयन् वपुषा स्थितः ॥ १९ ॥ अहो नारायणस्येव दिव्या ते परमा तनुः ।
'तुम कौन हो, जो यहाँ अपने शरीरकी कान्तिसे समस्त वृष्णिकुलको प्रकाशित करते हुए खड़े हो? अहो! भगवान् नारायणके समान तुम्हारा शरीर परम दिव्य है' ॥ १९ १/२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णः सहसा प्रविवेश ह । नारदस्य वचः श्रुत्वा शम्बरस्य वधं प्रति ॥ २० ॥
इसी बीचमें शम्बर-वधके विषयमें नारदजीका वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण सहसा अन्तःपुरमें आये ॥ २० ॥
सोऽपश्यत् तं सुतं ज्येष्ठं सिद्धं मन्मथलक्षणैः । स्नुषां मायावतीं चैव हृष्टचेता जनार्दनः ॥ २१ ॥
उन्होंने कामदेवके लक्षणोंसे सम्पन्न अपने ज्येष्ठ पुत्र प्रद्युम्नको तथा पुत्रवधू मायावतीको भी देखा । इससे जनार्दनके चित्तमें बड़ा हर्ष हुआ ॥ २१ ॥
सोऽब्रवीत् सहसा देवीं रुक्मिणीं देवतामिव । अयं स देवि सम्प्राप्तः सुतश्चापधरस्तव ॥ २२ ॥
वे सहसा देवताके समान दीप्तिमती देवी रुक्मिणीसे बोले--'देवि ! यह वही तुम्हारा पुत्र है, जो इस समय धनुष धारण करके तुम्हारे पास आया है ॥ २२ ॥
अनेन शम्बरं हत्वा मायायुद्धविशारदम् । हृता मायाश्च ताः सर्वा याभिर्देवानबाधयत् ॥ २३ ॥
'इसने मायायुद्धविशारद शम्बरासुरका वध करके उसकी ये सारी मायाएँ भी हर ली हैं, जिनके बलपर वह देवताओंको सताया करता था ॥ २३ ॥
सती चेयं शुभा साध्वी भार्या वै तनयस्य ते । मायावतीति विख्याता शम्बरस्य गृहोषिता ॥ २४ ॥
'यह तुम्हारे पुत्रकी सती साध्वी शुभलक्षणा पत्नी है । इसका नाम मायावती है। यह शम्बरासुरके घरमें चिरकाल-तक रही है ॥ २४ ॥
मा च ते शम्बरस्येयं पत्नीति भवतु व्यथा । मन्मथे तु गते नाशं गते चानङ्गतां पुरा ॥ २५ ॥ कामपत्नी न कान्तैषा शम्बरस्य रतिः प्रिया ।
'यह कहीं शम्बरासुरकी स्त्री न हो, ऐसी बात सोचकर तुम मनमें व्यथित न होना । पूर्वकालमें जब कामदेवका शरीर नष्ट हो गया और वे अनङ्ग हो गये, उस समय उनकी प्यारी पत्नी जो रति थी, वही यह मायावती है। यह शम्बरासुरकी वल्लभा कभी नहीं रही है ॥ २५ १/२ ॥
मायारूपेण तं दैत्यं मोहयत्यसकृच्छुभा ॥ २६ ॥ न चैषा तस्य कौमारे वशे तिष्ठति शोभना । आत्ममायामयं कृत्वा रूपं शम्बरमाविशत् ॥ २७ ॥
'यह शुभलक्षणा सुन्दरी सदा मायामयरूपसे ही उस दैत्यको मोहमें डाले रखती थी। यह कुमारावस्थामें कभी उसके वशमें नहीं हुई। अपनी मायासे ही एक मनोहर नारीका रूप रचकर उसीको शम्बरासुरके शयनागारमें प्रविष्ट करती थी ॥ २६-२७ ॥
पत्न्येषा मम पुत्रस्य स्नुषा तव वराङ्गना । लोककान्तस्य साहाय्यं करिष्यति मनोमयम् ॥ २८ ॥
'यह सुन्दरी मेरे पुत्रकी पत्नी तथा तुम्हारी बहू है । यह लोककमनीय रूपवाले प्रद्युम्नकी मनोमय (संकल्पमय) सहायता करेगी ॥ २८ ॥
प्रवेशयैनां भवनं पूज्यां ज्येष्ठां स्नुषां मम । चिरं प्रनष्टं च सुतं भजस्व पुनरागतम् ॥ २९ ॥
'यह मेरी आदरणीया ज्येष्ठ बहू है, इसे घरके भीतर ले चलो । चिरकालसे नष्ट हुआ तुम्हारा पुत्र फिर आ गया। इसे अपनाओ' ॥ २९ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु वचनं देवी कृष्णेनोदाहृतं तदा । प्रहर्षमतुलं लब्ध्वा रुक्मिणी वाक्यमब्रवीत् ॥ ३० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर उस समय देवी रुक्मिणीको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। वे बोलीं—॥ ३० ॥
अहो धन्यतरास्मीति वीरपुत्रसमागमात् । अद्य मे सफलः कामः पूर्णो मेऽद्य मनोरथः ॥ ३१ ॥
'अहो ! आज अपने वीर पुत्रके मिल जानेसे मैं परम धन्य हो गयी। अब मेरी कामना सफल हो गयी । सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण हो गया ॥ ३१ ॥
चिरप्रणष्टपुत्रस्य दर्शनं प्रियया सह । आगच्छ पुत्र भवनं सभार्यः प्रविशोह च ॥ ३२ ॥
'चिरकालसे खोये हुए पुत्रका आज मुझे उसकी पत्नीके साथ दर्शन हुआ। बेटा ! आओ, अपनी पत्नीके साथ इस घरके भीतर प्रवेश करो' ॥ ३२ ॥
ततोऽभिवाद्य चरणौ गोविन्दं मातरं च ताम् । प्रद्युम्नः पूजयामास हलिनं च महाबलम् ॥ ३३ ॥
विष्णुपर्व ] नवाधिकशततमोऽध्यायः ६४५ तदनन्तर प्रद्युम्नने अपने पिता श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणीके चरणोंमें प्रणाम करके अपने ताऊ महाबली हलधरका भी पूजन किया ॥ ३३ ॥ उत्थाप्य तं परिष्वज्य मूर्क्युपाघ्राय वीर्यवान् । प्रद्युम्नं वलिनां श्रेष्ठं केशवः परवीरहा ॥ ३४ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णने बलवानोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नको उठाकर हृदयसे लगाया और मस्तक सूँघकर अपना स्नेह प्रदान किया ॥ ३४ ॥ स्नुषां चोत्थाप्य तां देवी रुक्मिणी रुक्मभूषणा । परिष्वज्योपसंगृह्य स्नेहाद् गद्गदभाषिणी ॥ ३५ ॥ सोनेके आभूषणोंसे विभूषित हुई देवी रुक्मिणीने अपनी उस पुत्रवधूको उठाकर हृदयसे लगा लिया और उसे सर्वतोभावेन अपनाकर स्नेहसे गद्गद वाणीद्वारा उसका स्वागत किया ॥ ३५ ॥ समेत्य भवनं पत्न्या शचीन्द्रमदितिर्यथा । प्रवेशयामास तदा रुक्मिणी सुतमागतम् ॥ ३६ ॥ जैसे देवमाता अदितिने शची और इन्द्रको देवभवनमें प्रविष्ट किया था, उसी प्रकार रुक्मिणीने पत्नीके साथ आये हुए पुत्रसे मिलकर उसका भवनके भीतर प्रवेश कराया ॥ ३६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि प्रद्युम्नागमने अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें प्रद्युम्नका आगमनविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥ नवाधिकशततमोऽध्यायः बलदेवजीके द्वारा प्रद्युम्नको आह्निकस्तोत्रका उपदेश वैशम्पायन उवाच अत्राश्चर्यात्मकं स्तोत्रमाह्निकं जयतां वर । प्रद्युम्ने द्वारकां प्राप्ते हत्वा तं कालशम्बरम् ॥ १ ॥ बलदेवेन रक्षार्थं प्रोक्तमाह्निकमुच्यते । यज्जप्त्वा तु नृपश्रेष्ठ सायं पूतात्मतां व्रजेत् ॥ २ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनमेजय ! जब प्रद्युम्न कालशम्बरका वध करके द्वारकापुरी- में आये, उस समय बलदेवजीने उनकी रक्षाके लिये उन्हें एक स्तोत्रका उपदेश दिया; जिसे आह्निक कहते हैं। नृपश्रेष्ठ ! उसी आश्चर्यमय आह्निक स्तोत्रका यहाँ वर्णन किया जाता है, जिसका सायंकालमें जप करनेसे मनुष्य पूतात्मा ( पवित्र अन्तःकरणवाला) हो जाता है ॥ १-२ ॥ कीर्तितं बलदेवेन विष्णुना चैव कीर्तितम् । धर्मकामैश्च मुनिभिर्ऋषिभिश्चापि कीर्तितम् ॥ ३ ॥ इस स्तोत्रका बलदेवजीने, भगवान् विष्णुने तथा धर्मा- भिलाषी ऋषि-मुनियोंने भी कीर्तन किया है ॥ ३ ॥ कर्हिचिद् रुक्मिणीपुत्रो हलिना संयुतो गृहे । उपविष्टः प्रणम्याथ तमुवाच कृताञ्जलिः ॥ ४ ॥ एक समयकी बात है, रुक्मिणीपुत्र प्रद्युम्न घरमें बलरामजीके साथ बैठे हुए थे। उन्होंने हाथ जोड़कर बलरामजीको प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा ॥ ४ ॥ प्रद्युम्न उवाच कृष्णानुज महाभाग रोहिणीतनय प्रभो । किंचित् स्तोत्रं मम ब्रूहि यज्जप्त्वा निर्भयोऽभवम् ॥ ५ ॥ प्रद्युम्न बोले—भगवान् श्रीकृष्णके बड़े भाई महाभाग रोहिणीनन्दन ! प्रभो ! मुझे किसी ऐसे स्तोत्रका उपदेश दीजिये, जिसका जप करके मैं निर्भय हो जाऊँ ॥ ५ ॥ श्रीबलदेव उवाच सुरासुरगुरुर्ब्रह्मा पातु मां जगतः पतिः। अथोङ्कारवषट्कारौ सावित्री विधयस्त्रयः ॥ ६ ॥ ऋचो यजूंषि सामानि छन्दांस्याथर्वणानि च । चत्वारस्त्वखिला वेदाः सरहस्याः सविस्तराः ॥ ७ ॥ पुराणमितिहासश्चाखिलान्युपखिलानि च। अङ्गान्यङ्गोपाङ्गानि तथा व्याख्यातानि च पान्तु माम् ॥ ८ ॥ श्रीबलदेवजीने कहा--देवताओं और असुरोंके गुरु जगत्पति ब्रह्माजी मेरी रक्षा करें। ओङ्कार, वषट्कार, सावित्री, तीन प्रकारकी¹ विधियाँ, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, रहस्य और विस्तारसहित सम्पूर्णरूपसे चारों वेद, इतिहास, पुराण, खिल, उपखिल, अङ्ग, उपाङ्ग तथा व्याख्याग्रन्थ-इन सबके अभिमानी देवता मेरी रक्षा करें ॥ पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । इन्द्रियाणि मनो बुद्धिस्तथा सत्त्वं रजस्तमः ॥ ९ ॥ व्यानोदानौ समानश्च प्राणोऽपानश्च पञ्चमः । वायवः सप्त चैवान्ये येष्वायत्तमिदं जगत् ॥ १० ॥ मरीचिरङ्गिरात्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः। भृगुर्वसिष्ठो भगवान् पान्तु ते मां महर्षयः ॥ ११ ॥ पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, पाँचवाँ तेज, इन्द्रियाँ, १. अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसंख्याविधि ।
६४६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
मन, बुद्धि, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, व्यान, उदान, समान, प्राण और पाँचवाँ अपान, जिनके अधीन यह सारा जगत् है, वे प्रवह आदि अन्य सात वायु, मरीचि, अङ्गिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु और भगवान् वसिष्ठ—ये महर्षि तथा पूर्वोक्त पृथ्वी आदिके अभिमानी देवता मेरी रक्षा करें ॥ ९-११ ॥
कश्यपाद्याश्च मुनयश्चतुर्दश दिशो दश ।
नरनारायणौ देवौ सगणौ पान्तु मां सदा ॥ १२ ॥
कश्यप-आदि चौदह मुनि, दस दिशाएँ तथा अपने गणोंसहित देव नर और नारायण—ये सदा मेरा संरक्षण करें ॥ १२ ॥
रुद्राश्चैकादश प्रोक्ता आदित्या द्वादशैव तु ।
अष्टौ च वसवो देवा अश्विनौ द्वौ प्रकीर्तितौ ॥ १३ ॥
ग्यारह रुद्र कहे गये हैं और बारह आदित्य, आठ वसुदेवता बताये गये हैं और दो अश्विनीकुमार—ये सब मेरी रक्षा करें ॥ १३ ॥
ह्रीः श्रीर्लक्ष्मीः स्वधा पुष्टिर्मेधा तुष्टिः स्मृतिर्धृतिः ।
अदितिर्दितिर्दनुश्चैव सिंहिका दैत्यमातरः ॥ १४ ॥
ह्री, श्री, लक्ष्मी, स्वधा, पुष्टि, मेधा, तुष्टि, स्मृति, धृति, देवमाता अदिति तथा दैत्योंकी माताएँ दिति, दनु और सिंहिका आदि मेरी रक्षा करें ॥ १४ ॥
हिमवान् हेमकूटश्च निषधः श्वेतपर्वतः ।
ऋषभः पारियात्रश्च विन्ध्यो वैदूर्यपर्वतः ॥ १५ ॥
सह्योदयश्च मलयो मेरुमन्दरदर्दुराः ।
क्रौञ्चकैलासमैनाकाः पान्तु मां धरणीधराः ॥ १६ ॥
हिमवान्, हेमकूट, निषध, श्वेतपर्वत, ऋषभ, पारियात्र, विन्ध्य, वैदूर्यपर्वत, सह्य, उदयगिरि, मलय, मेरु, मन्दर, दर्दुर, क्रौञ्च, कैलास और मैनाक आदि पर्वत मेरी रक्षा करें॥
शेषश्च वासुकिश्चैव विशालाक्षश्च तक्षकः ।
एलापत्रः शुक्लवर्णः कम्बलाश्वतरावुभौ ॥ १७ ॥
हस्तिभद्रः पिटकः कर्कोटकधनंजयौ ।
तथा पूरणकश्चैव नागश्च करवीरकः ॥ १८ ॥
सुमनास्यो दधिमुखस्तथा शृङ्गारपिण्डकः ।
मणिनागश्च भगवान्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ १९ ॥
नागराजधिकर्णश्च तथा हारिद्रकोऽपरः ।
एते चान्ये च बहवो ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥ २० ॥
भूधराः सत्यधर्माणः पान्तु मां भुजगेश्वराः ।
शेष, वासुकि, विशालाक्ष और तक्षक, एलापत्र, शुक्लवर्ण, कम्बल, अश्वतर, हस्तिभद्र, पिटक, कर्कोटक, धनंजय, पूरणक, करवीरक नाग, सुमनास्य, दधिमुख, शृङ्गारपिण्डक, तीनों लोकोंमें विख्यात भगवान् मणिनाग, नागराज अधिकर्ण तथो हारिद्रक-ये तथा दूसरे भी बहुत-से नाग, जिनके नाम यहाँ नहीं लिये गये हैं, वे सभी सत्यधर्मा एवं पृथ्वीका भार धारण करनेवाले नागराज मेरी रक्षा करें ॥ १७-२०½ ॥
समुद्राः पान्तु चत्वारो गङ्गा च सरितां वरा ॥ २१ ॥
सरस्वती चन्द्रभागा शतद्रुर्देविका शिवा ।
द्वारावती विपाशा च सरयूर्यमुना तथा ॥ २२ ॥
कल्माषी च रथोष्मा च बाहुदा च हिरण्यदा ।
प्लक्ष्शा चेक्षुमती चैव स्रवन्ती च बृहद्रथा ॥ २३ ॥
ख्याता चर्मण्वती चैव पुण्या चैव वधूसरा ।
एताश्चान्याश्च सरितो याश्चान्या नानुकीर्तिताः॥ २४ ॥
उत्तरापथगामिन्यः सलिलैः स्नपयन्तु माम् ।
चारों समुद्र मेरी रक्षा करें। सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा, सरस्वती, चन्द्रभागा, शतद्रु, देविका, शिवा, द्वारावती, विपाशा, सरयू, यमुना, कल्माषी, रथोष्मा, बाहुदा, हिरण्यदा, प्लक्षा, इक्षुमती, स्रवन्ती, बृहद्रथा, सुविख्यात चर्मण्वती तथा पुण्यसलिला वधूसरा—ये और दूसरी बहुत-सी नदियाँ जिनके नाम यहाँ नहीं लिये गये हैं तथा जो उत्तरभारतमें बहनेवाली हैं, वे सब-की-सब अपने जलसे मुझे नहलायें ॥ २१-२४½ ॥
वेणी गोदावरी सीता कावेरी कौङ्कणावती ॥ २५ ॥
कृष्णा वेणा शुक्तिमती तमसा पुष्पवाहिनी ।
ताम्रपर्णी ज्योतिरथा उत्फलोदुम्बरावती ॥ २६ ॥
नदी वैतरणी पुण्या विदर्भा नर्मदा शुभा ।
वितस्ता भीमरथ्या च ऐला चैव महानदी ॥ २७ ॥
कालिन्दी गोमती पुण्या नदः शोणश्च विश्रुतः ।
एताश्चान्याश्च वै नद्यो याश्चान्या न तु कीर्तिताः॥ २८ ॥
दक्षिणापथवाहिन्यः सलिलैः स्नपयन्तु माम् ।
वेणी, गोदावरी, सीता, कावेरी, कौङ्कणावती, कृष्णा, वेणा, शुक्तिमती, तमसा, पुष्पवाहिनी, ताम्रपर्णी, ज्योतिरथा, उत्फला, उदुम्बरावती, वैतरणी नदी, पुण्यसलिला विदर्भा, शुभरूपा नर्मदा, वितस्ता, भीमरथ्या, महानदी ऐला, कालिन्दी, पुण्यसलिला गोमती, सुविख्यात नद शोणभद्र—ये तथा दूसरी नदियाँ जिनके नाम यहाँ नहीं लिये गये हैं और जो दक्षिण भारतमें बहनेवाली हैं, वे सब-की-सब अपने जलसे मुझे नहलायें ॥ २५-२८½ ॥
क्षिप्रा चर्मण्वती पुण्या मही शुभ्रवती तथा ॥ २९ ॥
सिन्धुर्वेत्रवती चैव भोजान्ता वनमालिका ।
पूर्वभद्रा परामद्रा ऊर्मिला च परद्रुमा ॥ ३० ॥
ख्याता वेत्रवती चैव चापदासीति विश्रुता ।
प्रस्थावती कुण्डनदी नदी पुण्या सरस्वती ॥ ३१ ॥
चित्रघ्नी चेन्दुमाला च तथा मधुमती नदी ।
उमा गुरुनदी चैव तापी च विमलोदका ॥ ३२ ॥
विमला विमलोदा च मत्तगङ्गा पयस्विनी ।
[विष्णुपर्व ] नवाधिकशततमोऽध्यायः ६४७
एताश्चान्याश्च वै नद्यो याश्चान्या नानुकीर्तिताः ॥ ३३ ॥
ता मां समभिषिञ्चन्तु पश्चिमामाश्रिता दिशम् ।
क्षिप्र्रा, चर्मण्वती, पुण्यसलिला मही, शुभ्रवती, सिन्धु, वेत्रवती, भोजान्ता, वनमालिका, पूर्वभद्रा, पराभद्रा, ऊर्मिला, परद्रुमा, विख्यात वेत्रवती, चापदासी, प्रख्यावती, कुण्डनदी, पुण्यसलिला सरस्वती, चित्रघ्नी, इन्दुमाला, मधुमती नदी, उमा, गुरुनदी, तापी, विमलोदका, विमला, विमलोदा, मत्तगङ्गा, पयस्विनी—ये तथा दूसरी नदियाँ जिनके नाम यहाँ नहीं लिये गये हैं तथा जो पश्चिम दिशाका आश्रय लेकर बहती हैं, वे सब नदियाँ अपने जलसे मेरा अभिषेक करें ॥
भागीरथी पुण्यजला प्राच्यां दिशि समाश्रिता ॥ ३४॥
सा तु दहतु मे पापं कीर्तिता शम्भुना धृता ।
पुण्यसलिला भागीरथी जो पूर्वदिशाका आश्रय लेकर बहती हैं और जिन्हें भगवान् शङ्करने अपने मस्तकपर धारण कर रखा है, वे अपना नाम कीर्तन करनेपर मेरे पापको दग्ध कर दें ॥ ३४ ॥
प्रभासं च प्रयागं च नैमिषं पुष्कराणि च ॥ ३५ ॥
गङ्गातीर्थं कुरुक्षेत्रं श्रीकण्ठं गौतमाश्रमम् ।
रामह्रदं विनशनं रामतीर्थं तथैव च ॥ ३६ ॥
गङ्गाद्वारं कनखलं सोमो वै यत्र चोत्थितः ।
कपालमोचनं तीर्थं जम्बूमार्गं च विश्रुतम् ॥ ३७ ॥
सुवर्णबिन्दुं विख्यातं तथा कनकपिङ्गलम् ।
दशाश्वमेधिकं चैव पुण्याश्रमविभूषितम् ॥ ३८ ॥
बदरी चैव विख्याता नरनारायणाश्रमः ।
विख्यातं फल्गुतीर्थं च तीर्थं चन्द्रवटं तथा ॥ ३९ ॥
कोकामुखं पुण्यतमं गङ्गासागरमेव च ।
मगधेषु तपोदञ्च गङ्गोद्भेदञ्च विश्रुतः ॥ ४० ॥
तीर्थान्येतानि पुण्यानि सेवितानि महर्षिभिः ।
मां प्लावयन्तु सलिलैः यानि मे कीर्तितानि वै ॥ ४१ ॥
प्रभास, प्रयाग, नैमिष, पुष्कर, गङ्गातीर्थ, कुरुक्षेत्र श्रीकण्ठ, गौतमाश्रम, परशुरामकुण्ड, विनशनतीर्थ, रामतीर्थ, गङ्गाद्वार, कनखलतीर्थ, जहाँ सोमका उत्थान हुआ था, वह सोमोत्थानतीर्थ, कपालमोचनतीर्थ, सुविख्यात जम्बूमार्ग, सुवर्णबिन्दु नामसे विख्यात तीर्थ, कनकपिङ्गलतीर्थ, पवित्र आश्रमोंसे विभूषित दशाश्वमेधिक तीर्थ, सुविख्यात बदरीतीर्थ, नर-नारायणका आश्रम, फल्गुतीर्थ, चन्द्रवटतीर्थ, परम पवित्र कोकामुखतीर्थ, गङ्गासागर, मगधदेशीय तपोद तथा गङ्गोद्भेद नामसे विख्यात तीर्थ—ये महर्षियोंद्वारा सेवित सभी पुण्यतीर्थ, जिनका मैने यहाँ कीर्तन किया है, निश्चय ही मुझे अपने जलसे आप्लावित करें ॥ ३५--४१ ॥
सूकरं योगमार्गं च श्वेतद्वीपं तथैव च ।
ब्रह्मतीर्थे रामतीर्थे वाजिमेधशतोपमम् ॥ ४२ ॥
धारासम्पातसंयुक्ता गङ्गा किल्बिषनाशिनी ।
गङ्गा वैकुण्ठकेदारं सूकरोद्भेदकं परम् ।
तच्छापमोचनं तीर्थं पुनन्त्वेतानि किल्बिषात् ॥ ४३ ॥
सूकरतीर्थ, योगमार्ग, श्वेतद्वीप, ब्रह्मतीर्थ, सौ अश्वमेध यज्ञोंके समान फल देनेवाला रामतीर्थ, धाराके रूपमें गिरती हुई गङ्गा, पापनाशिनी गङ्गा, वैकुण्ठकेदार, उत्तम सूकरोद्भेदकतीर्थ तथा सुप्रसिद्ध शापमोचनतीर्थ—ये सारे तीर्थ मुझे पापसे रहित एवं पवित्र करें ॥ ४२-४३ ॥
धर्मार्थकामविषयो यशःप्राप्तिः शमो दमः ।
वरुणेशोऽथ धनदो यमो नियम एव च ॥ ४४ ॥
कालो नयः संततिश्च क्रोधो मोहः क्षमा धृतिः ।
विद्युतोऽभ्राण्यथौषध्यः प्रमादोन्मादविग्रहाः ॥ ४५ ॥
यक्षाः पिशाचा गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धचारणाः ।
नक्तंचराः खेचरिणो दंष्ट्रिणः प्रियविग्रहाः ॥ ४६ ॥
लम्बोदराश्च बलिनः पिङ्गाक्षा विश्वरूपिणः ।
मरुतः सहपर्जन्याः कलात्रुटिलवाः क्षणाः ॥ ४७ ॥
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव ऋतवः शिशिरादयः ।
मासाहोरात्रयश्चैव सूर्याचन्द्रमसौ तथा ॥ ४८ ॥
आमोदश्च प्रमोदश्च प्रहर्षः शोक एव च ।
रजस्तमस्तपः सत्यं शुद्धिर्बुद्धिर्धृतिः श्रुतिः ॥ ४९ ॥
रुद्राणी भद्रकाली च भद्रा ज्येष्ठा तु वारुणी ।
भासी च कालिका चैव शाण्डिली चेति विश्रुताः ॥ ५० ॥
आर्या कुहूः सिनीवाली भीमा चित्ररथी रतिः ।
एकानंशा च कूष्माण्डी देवी कात्यायनी च या ॥ ५१ ॥
लोहित्या जनमाता च देवकन्यास्तु याः स्मृताः ।
गोनन्दा देवपत्नी च मां रक्षन्तु सबान्धवम् ॥ ५२ ॥
धर्म, अर्थ और कामविषयक शास्त्र, यशकी प्राप्ति, शम, दम, वरुण, ईश, धनद, यम, नियम, काल, नय, संतति, क्रोध, मोह, क्षमा, धृति, विद्युत्, मेघ, ओषधियाँ, प्रमाद, उन्माद, विग्रह, यक्ष, पिशाच, गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, चारण, निशाचर, खेचर, बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले हिंसक जीव, जिन्हें विग्रह प्रिय है, बलवान्, लम्बोदर, पीले नेत्रवाले तथा विश्वरूपधारी गण, मरुद्गण, मेघ, कला, त्रुटि, लव, क्षण, नक्षत्र, ग्रह, शिशिर आदि ऋतु, मास, दिन, रात, सूर्य, चन्द्रमा, आमोद, प्रमोद, हर्ष, शोक, रज, तम, तप, सत्य, शुद्धि, बुद्धि, धृति, श्रुति, रुद्राणी, भद्रकाली, भद्रा, ज्येष्ठा, वारुणी, भासी, कालिका, शाण्डिली, आर्या, कुहू, सिनीवाली, भीमा, चित्ररथी, रति, एकानंशा, कूष्माण्डी, कात्यायनी देवी, लोहित्या, जनमाता, देवकन्याएँ, गोनन्दा तथा देवपत्नी—ये बन्धु-बान्धवोंसहित मेरी रक्षा करें ॥
नानाभरणवेशाश्च नानारूपाङ्किताननाः ।
नानादेशविचारिण्यो नानाशस्त्रोपशोभिताः ॥ ५३ ॥
६४८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
मेदॊमज्जाप्रियाश्चैव मद्यमांसवसाप्रियाः ।
मार्जारद्वीपिवक्त्राश्च गजसिंहनिभाननाः ॥ ५४ ॥
कङ्कवायसगृध्राणां क्रौञ्चतुल्याननास्तथा ।
व्यालयज्ञोपवीताश्च चर्मप्रावरणास्तथा ॥ ५५ ॥
क्षतजोक्षितवक्त्राश्च खरभेरीसमस्वनाः ।
मत्सराः क्रोधनाश्चैव प्रासादा रुचिरालयाः ॥ ५६ ॥
मत्तोन्मत्तप्रमत्ताश्च प्रहरन्त्यश्च धिष्ठिताः ।
पिङ्गाक्षाः पिङ्गकेशाश्च ततोऽन्या लूनमूर्धजाः ॥ ५७ ॥
ऊर्ध्वकेश्याः कृष्णकेश्याः श्वेतकेश्यस्तथापराः ।
नागायुतबलाश्चैव वायुवेगास्तथापराः ॥ ५८ ॥
एकहस्ता एकपादा एकाक्षाः पिङ्गला मताः ।
बहुपुत्राल्पपुत्राश्च द्विपुत्राः पुत्रमण्डिकाः ॥ ५९ ॥
मुखमण्डी विडाली च पूतना गन्धपूतना ।
शीतवातोष्णवेताली रेवती ग्रहसंज्ञिताः ॥ ६० ॥
प्रियहास्याः प्रियक्रोधाः प्रियवासाः प्रियंवदाः ।
सुखप्रदाश्चासुखदाः सदा द्विजजनप्रियाः ॥ ६१ ॥
नक्तंचराः सुखोदर्काः सदा पर्वणि दारुणाः ।
मातरो मातृवत्पुत्रं रक्षन्तु मम नित्यशः ॥ ६२ ॥
जो नाना प्रकारके आभूषण और वेष धारण करती हैं, जिनके मुखपर अनेक प्रकारके चित्र अङ्कित होते हैं, जो विभिन्न देशोंमें विचरनेवाली तथा अनेक शस्त्रोंसे सुशोभित हैं, जिन्हें मेदा, मज्जा, मद्य, मांस और वसा प्रिय है, जिनके मुख बिल्ली, बाघ, हाथी, सिंह, कंक, कौआ, गीध अथवा क्रौञ्चके समान हैं, जो सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करनेवाली तथा चर्ममय वस्त्रसे अपने अङ्गोंको ढकनेवाली हैं, जिनके मुख रक्तसे अभिषिक्त हैं तथा जिनकी वाणी नगाड़ोंकी प्रखर ध्वनिकी भाँति गम्भीर है, जो ईर्ष्यालु और क्रोधी हैं, महल जिनके सुन्दर निवास हैं, जो मत्त, उन्मत्त और प्रमत्त रहकर प्रहार करती हुई घरोंमें स्थित रहती हैं, जिनके नेत्र और केश पिङ्गलवर्णके दिखायी देते हैं, इनके अतिरिक्त जिनके केश कटे हुए हैं, जिनके सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हैं, जो काले अथवा सफेद केश धारण करती हैं, जो छोटे कदकी हैं, जिनमें दस हजार हाथियोंके समान बल है तथा जो वायुके तुल्य वेगवाली हैं, जिनके एक पैर, एक हाथ और एक आँख है, जो देखनेमें पिङ्गल वर्णकी प्रतीत होती हैं, जो अधिक या थोड़े पुत्रवाली हैं, जिनके दो ही पुत्र हैं, जो पुत्रोंका शृङ्गार करनेवाली हैं, मुखमण्डी, विडाली, पूतना, गन्धपूतना, शीतवातोष्णवेताली तथा रेवती आदि नामोंसे जिनकी प्रसिद्धि है, जिन्हें बालग्रह कहते हैं, जिन्हें हास्य और क्रोध प्रिय है, जो वस्त्र एवं वासस्थानसे प्रेम करती हैं, सदा प्रिय वचन बोलती हैं, जो सुख और दुःख भी देती हैं तथा जो द्विजातियोंको सदा प्रिय हैं, जो रातमें विचरनेवाली तथा उपासकको भविष्यमें सुख देनेवाली हैं तथा जो पर्वकालमें सदा अपने दारुण स्वभावका परिचय देती हैं, वे मातृकाएँ मेरी प्रतिदिन रक्षा करें, जैसे माता अपने पुत्रकी रक्षा करती है ॥
पितामहमुखोद्भूता रौद्रा रुद्राङ्गसम्भवाः ।
कुमारस्वेदजाश्चैव ज्वरा वै वैष्णवादयः ॥ ६३ ॥
महाभीमा महावीर्या दर्पोद्भूता महाबलाः ।
क्रोधनाक्रोधनाः क्रूराः सुरविग्रहकारिणः ॥ ६४ ॥
नक्तंचराः केसरिणो दंष्ट्रिणः प्रियविग्रहाः ।
लम्बोदरा जघनिनः पिङ्गाक्षा विश्वरूपिणः ॥ ६५ ॥
शक्त्यृष्टिशूलपरिघप्रासचर्मासिपाणयः ।
पिनाकवज्रमुसलग्रहादण्डायुधप्रियाः ॥ ६६ ॥
दण्डिनः कुण्डिनः शूरा जटामुकुटधारिणः ।
वेदवेदाङ्गकुशला नित्ययज्ञोपवीतिनः ॥ ६७ ॥
व्यालापीडाः कुण्डलिनो वीराः केयूरधारिणः ।
नानावसनसंवीताश्चित्रमाल्यानुलेपनाः ॥ ६८ ॥
गजाश्वोष्ट्रर्क्षमार्जारसिंहव्याघ्रनिभाननाः ।
वराहोल्कगोमायुमृगाखुमहिषाननाः ॥ ६९ ॥
वामना चिकटाः कुब्जाः कराला लूनमूर्धजाः ।
सहस्रशतशश्चान्ये सहस्रजटधारिणः ॥ ७० ॥
श्वेताः कैलाससंकाशाः केचिद् दिनकरप्रभाः ।
केचिज्जलदवर्णाभा नीलाञ्जनचयोपमाः ॥ ७१ ॥
एकपादा द्विपादाश्च तथा त्रिशिरसोऽपरे ।
निर्मांसाः स्थूलजंघाश्च व्यादितास्या भयङ्कराः ॥ ७२ ॥
वापीतडागकूपेषु समुद्रेषु सरित्सु च ।
श्मशानशैलवृक्षेषु शून्यागारनिवासिनः ॥ ७३ ॥
एते ग्रहाश्च सततं रक्षन्तु मम सर्वतः ।
जो पितामह ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट हुए हैं, रौद्र हैं, रुद्रदेवके अङ्गोंसे उत्पन्न हुए हैं, कुमार कार्तिकेयके स्वेदसे प्रकट हुए हैं तथा जो वैष्णव आदि ज्वर हैं, जो महाभयंकर, महापराक्रमी, दर्पयुक्त तथा महाबली हैं, क्रोधयुक्त अथवा क्रोधरहित हैं, जिनका स्वभाव क्रूर है, जो देवताओंके समान स्वरूप धारण करनेवाले हैं, जिनके गलेमें अयाल हैं, जो रात्रिमें विचरनेवाले हैं, जिनकी बड़ी-बड़ी दाढ़ें हैं, जिन्हें विग्रह प्रिय है, जिनके पेट लम्बे, कूल्हे मोटे और आँखें पिङ्गलवर्णकी हैं, जो विश्वरूपधारी हैं, जिनके हाथोंमें शक्ति, ऋष्टि, शूल, परिघ, प्रास, ढाल और तलवार आदि अस्त्र-शस्त्र शोभा पाते हैं, पिनाक, वज्र, मुसल और ग्रहदण्डनामक आयुध जिन्हें प्रिय हैं, जो दण्ड और कुण्ड धारण करते हैं, शूरवीर हैं, मस्तकपर जटा और मुकुट धारण किये रहते हैं, वेद और वेदाङ्गमें कुशल हैं, नित्य यज्ञोपवीतधारी हैं, माथेपर सर्पका मुकुट धारण करते हैं, जिनके कानोंमें कुण्डल और भुजाओंमें भुजबन्द शोभा पाते हैं, जो वीर हैं, नाना प्रकारके वस्त्र पहनते हैं, विचित्र माला और अनुलेप धारण करते हैं, जिनके मुख हाथी, घोड़े, ऊँट, रीछ, बिलाव, सिंह, व्याघ्र, सूअर, उल्लू,
[विष्णुपर्व ] नवाधिकशततमोऽध्यायः ६४९
गीदड़, मृग, चूहों और भैंसोंके समान हैं, जो बौने, विकट आकारवाले, कुबड़े, विकराल तथा कटे हुए केशवाले हैं, इनके सिवा जो लाखोंकी संख्यामें सहस्रों जटाएँ धारण करनेवाले हैं, जिनमेंसे कोई कैलास पर्वतके समान श्वेत, कोई दिनकरके समान दीप्तिमान्, कोई मेघोंके समान काले तथा कोई अञ्जनराशिके समान नील हैं, जो एक अथवा दो पैरोंसे युक्त हैं, जिनके दो-दो सिर हैं, जो मांसरहित कङ्काल-से दिखायी देते हैं, जिनकी पिण्डलियों बहुत मोटी हैं, जो मुँह बाये रहनेके कारण बड़े भयङ्कर प्रतीत होते हैं, बावड़ी, पोखरे, कुएँ, समुद्र, नदी, श्मशानभूमि, पर्वत, वृक्ष तथा सूने घरोंमें निवास करनेवाले हैं, ये ग्रह सदा सब ओरसे मेरी रक्षा करें ॥
महागणपतिर्नन्दी महाकालो महाबलः ।
माहेश्वरो वैष्णवश्च ज्वरौ लोकभयावहौ ॥ ७४ ॥
ग्रामणीश्चैव गोपालो भृङ्गीरिटिर्गणेश्वरः ।
देवश्च वामदेवश्च घण्टाकर्णः करंधमः ॥ ७५ ॥
श्वेतमोदः कपाली च जम्भकः शत्रुतापनः ।
मज्जनोन्मज्जनौ चोभौ संतापनविलापनौ ॥ ७६ ॥
निजघासोऽघसश्चैव स्थूणाकर्णः प्रशोषणः ।
उल्कामाली धमधमो ज्वालामाली प्रमर्दनः ॥ ७७ ॥
संघट्टनः संकुटनः काष्ठभूतः शिवंकरः ।
कूष्माण्डः कुम्भमूर्धा च रोचनो वैकृतो ग्रहः ॥ ७८ ॥
अनिकेतः सुरारिघ्नः शिवश्चाशिव एव च ।
क्षेमकः पिशिताशी च सुरारिर्हरिलोचनः ॥ ७९ ॥
भीमको ग्राहकश्चैव तथैवाग्रमयो ग्रहः ।
उपग्रहोऽर्यकश्चैव तथा स्कन्दग्रहोऽपरः ॥ ८० ॥
चपलोऽसमवेतालस्तामसः सुमहाकपिः ।
हृदयोद्वर्तनश्चैडः कुण्डाशी कङ्कणप्रियः ॥ ८१ ॥
हरिश्मश्रुर्गरुत्मन्तो मनोमारुतरंहसः ।
पार्वत्या रोषसम्भूताः सहस्राणि शतानि च ॥ ८२ ॥
शक्तिमन्तो धृतिमन्तो ब्रह्मण्याः सत्यसङ्गराः ।
सर्वकामापहन्तारो द्विषतां च मृधेमृधे ॥ ८३ ॥
रात्रावहनि दुर्गेषु कीर्तिताः सकलैर्गुणैः ।
तेषां गणानां पतयः सगणाः पान्तु मां सदा ॥ ८४ ॥
कङ्कणप्रिय, हरिश्मश्रु तथा मन और वायुके समान वेगशाली गरुत्मान्, पार्वतीके रोषसे उत्पन्न हुए सैकड़ों और हजारों गण, जो शक्तिमान्, धैर्यवान्, ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ हैं तथा प्रत्येक युद्धमें शत्रुओंकी सम्पूर्ण कामनाओंका विनाश करनेवाले हैं; इन सबका रात और दिनमें दुर्गम संकटके अवसरोंपर जब-जब कीर्तन किया जाय, तब-तब वे समस्त गणपति अपने सारे गुणों और सम्पूर्ण गणोंके साथ सदा मेरी रक्षा करें ॥ ७४-८४ ॥
नारदः पर्वतश्चैव गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।
पितरः कारणं कार्यमाधयो व्याधयस्तथा ॥ ८५ ॥
अगस्त्यो गालवो गार्ग्यः शक्तिर्धौम्यः पराशरः ।
कृष्णात्रेयश्च भगवानसितो देवलो बलः ॥ ८६ ॥
बृहस्पतिरुतथ्यश्च मार्कण्डेयः श्रुतश्रवाः ।
द्वैपायनो विदर्भश्च जैमिनिर्माठरः कठः ॥ ८७ ॥
विश्वामित्रो वसिष्ठश्च लोमशश्च महामुनिः ।
उत्तङ्कश्चैव रैभ्यश्च पौलोमश्च द्वितस्त्रितः ॥ ८८ ॥
ऋषिर्वै कालवृक्षीयो मुनिर्मेधातिथिस्तथा ।
सारस्वतॊ यवक्रीतिः कुशिको गौतमस्तथा ॥ ८९ ॥
संवर्त ऋष्यशृङ्गश्च स्वस्त्यात्रेयो विभाण्डकः ।
ऋचीको जमदग्निश्च तथौर्वस्तपसां निधिः ॥ ९० ॥
भरद्वाजः स्थूलशिराः कश्यपः पुलहः क्रतुः ।
बृहदग्निर्हरिश्मश्रुर्विजयः कण्व एव च ॥ ९१ ॥
वैतण्डी दीर्घतपाश्च वेदगाथोंऽशुमांञ्छिवः ।
अष्टावक्रो दधीचिश्च श्वेतकेतुस्तथैव च ॥ ९२ ॥
उद्दालकः क्षीरपाणिः शृङ्गी गौरमुखस्तथा ।
अग्निवेश्यः शमीकश्च प्रमुचुर्मुमुचुस्तथा ॥ ९३ ॥
एते चान्ये च ऋषयो बहवः शंसितव्रताः ।
मुनयः शंसितात्मानो ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥ ९४ ॥
क्रतवः श्लाघिनः शान्ताः शान्तिं कुर्वन्तु मे सदा ।
महागणपति, नन्दी, महाबली महाकाल, लोकभयङ्कर माहेश्वर तथा वैष्णव ज्वर, ग्रामणी, गोपाल, भृङ्गीरिटि, गणेश्वर, देव, वामदेव, घण्टाकर्ण, करंधम, श्वेतमोद, कपाली, जम्भक, शत्रुतापन, मज्जन, उन्मज्जन, संतापन, विलापन, निजघास, अघस, स्थूणाकर्ण, प्रशोषण, उल्कामाली, धमधम, ज्वालामाली, प्रमर्दन, संघट्टन, संकुटन, काष्ठभूत, शिवङ्कर, कूष्माण्ड, कुम्भमूर्धा, रोचन, वैकृत ग्रह, अनिकेत, सुरारिघ्न, शिव, अशिव, क्षेमक, पिशिताशी, सुरारि, हरिलोचन, भीमक, ग्राहक, अग्रमय ग्रह, उपग्रह, अर्यक, स्कन्द-ग्रह, चपल, असमवेताल, तामस, सुमहाकपि, हृदयोद्वर्तन, ऐड, कुण्डाशी, नारद, पर्वत, गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय, पितर, कारण, कार्य, आधि-व्याधि, अगस्त्य, गालव, गार्ग्य, शक्ति, धौम्य, पराशर, कृष्णात्रेय, ऐश्वर्यशाली असित-देवल, बल, बृहस्पति, उतथ्य, मार्कण्डेय, श्रुतश्रवा, द्वैपायन, विदर्भ, जैमिनि, माठर, कठ, विश्वामित्र, वसिष्ठ, महामुनि लोमश, उत्तङ्क, रैभ्य, पौलोम, द्वित, त्रित, कालकवृक्षीय ऋषि, मुनि मेधातिथि, सारस्वत, यवक्रीति, कुशिक, गौतम, संवर्त, ऋष्यशृङ्ग, स्वस्त्यात्रेय, विभाण्डक, ऋचीक, जमदग्नि, तपोनिधि और्व, भरद्वाज, स्थूलशिरा, कश्यप, पुलह, क्रतु, बृहदग्नि, हरिश्मश्रु, विजय, कण्व, वैतण्डी, दीर्घतपा, वेदगाथ, अंशुमान्, शिव, अष्टावक्र, दधीचि, श्वेतकेतु, उद्दालक, क्षीरपाणि, शृङ्गी, गौरमुख, अग्निवेश्य, शमीक, प्रमुचु तथा मुमुचु और दूसरे बहुत-से उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि
| ६५० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
एवं शुद्धात्मा मुनि तथा दूसरे यज्ञपरायण स्पृहणीय तथा शान्त महर्षि जिनका यहाँ कीर्तन नहीं किया गया है, सदा मेरे लिये शान्ति प्रदान करें ॥ ८५-९४ १/२ ॥
त्रयोऽग्नयस्त्रयो वेदास्त्रैविद्याः कौस्तुभो मणिः ॥ ९५॥
उच्चैःश्रवा हयः श्रीमान् वैद्यो धन्वन्तरिर्हरिः ।
अमृतं गौः सुपर्णश्च दधि गौराश्च सर्षपाः ॥ ९६ ॥
शुक्लाः सुमनसः कन्याः श्वेतच्छत्रं यवाक्षताः ।
दूर्वा हिरण्यं गन्धाश्च वालव्यजनमेव च ॥ ९७ ॥
तथाप्रतिहतं चक्रं महोक्षश्चन्दनं विषम् ।
श्वेतो वृषः करी मत्तः सिंहो व्याघ्रो हयो गिरिः ॥ ९८ ॥
पृथिवी चोद्धृता लाजा ब्राह्मणा मधु पायसम् ।
स्वस्तिको वर्धमानश्च नन्द्यावर्तः प्रियङ्गवः ॥ ९९ ॥
श्रीफलं गोमयं मत्स्यो दुन्दुभिः पटहस्वनः ।
ऋषिपत्न्यश्च कन्याश्च श्रीमद् भद्रासनं धनुः ।
रोचना रुचकश्चैव नदीनां संगमोदकम् ॥ १००॥
सुपर्णाः शतपत्राश्च चकोरा जीवजीवकाः ।
नन्दीमुखो मयूरश्च बद्धमुक्तामणिध्वजाः ॥ १०१॥
आयुधानि प्रशस्तानि कार्यसिद्धिकराणि च ।
तीन अग्नि, तीन वेद, तीनों विद्याओंके ज्ञाता, कौस्तुभमणि, उच्चैःश्रवा अश्व, श्रीमान् धन्वन्तरि वैद्य, हरि, अमृत, गौ, सुपर्ण (गरुड़), दही, श्वेत सरसों, सफेद फूल, कुमारी कन्या, श्वेत छत्र, जौ, अक्षत, दूर्वादल, सुवर्ण, गन्ध, वालव्यजन (चँवर); कहीं भी प्रतिहत न होनेवाला सुदर्शनचक्र, साँड, चन्दन, विष, श्वेत वृषभ, मदमत्त हाथी, सिंह, व्याघ्र, घोड़ा, पर्वत खोदकर निकाली हुई मिट्टी, लाजा, ब्राह्मण, मधु, खीर, स्वस्तिक, वर्धमान, नन्द्यावर्त, प्रियङ्गु, श्रीफल, गोमय, मत्स्य, दुन्दुभि और पटहकी ध्वनि, ऋषिपत्नियों, कन्याएँ, शोभाशाली भद्रासन, धनुष, गोरोचन, रुचक, नदियोंके सङ्गमका जल, सुपर्ण, शतपत्र, चकोर, जीवजीवक, नन्दीमुख, मयूर, जिनमें मोती और मणि बँधे हुए हों ऐसे ध्वज, कार्यसिद्धि करनेवाले उत्तम आयुध—ये सब सदा ही मेरी रक्षा करें ॥ ९५-१०१ १/२ ॥
पुण्यं वै विगतक्लेशं श्रीमद् वै मङ्गलान्वितम् ॥ १०२॥
रामेणोदाहृतं पूर्वमायुःश्रीजयकाङ्क्षिणा ।
पूर्वकालमें आयु, लक्ष्मी तथा विजयकी अभिलाषा रखनेवाले बलरामजीने इस पवित्र क्लेशहारी और उनकी प्राप्ति करानेवाले मङ्गलयुक्त स्तोत्रका वर्णन किया था ॥ १०२ १/२ ॥
य इदं श्रावयेद् विद्वांस्तथैव शृणुयान्नरः ॥ १०३॥
मङ्गलाष्टशतं स्नातो जपन् पर्वणि पर्वणि ।
वधबन्धपरिक्लेशं व्याधिशोकपराभवम् ॥ १०४॥
न च प्राप्नोति वैकल्यं परत्रेह च शर्मदम् ।
जो विद्वान् मनुष्य प्रत्येक पर्वमें स्नान करके जपपरायण हो, इस आठ सौ माङ्गलिक नामोंसे युक्त स्तोत्रका श्रवण करता अथवा कराता है, वह वध और बन्धनके क्लेश, व्याधि एवं शोकसे प्राप्त होनेवाले पराभव और व्याकुलताको नहीं पाता है। यह स्तोत्र इहलोक और परलोकमें भी कल्याण प्रदान करनेवाला है ॥ १०३-१०४ १/२ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पवित्रं वेदसम्मितम् ॥ १०५॥
श्रीमत्स्वर्ग्यं सदा पुण्यमपत्यजननं शिवम् ।
शुभं क्षेमकरं नृणां मेधाजननमुत्तमम् ।
सर्वरोगप्रशमनं स्वकीर्तिकुलवर्धनम् ॥ १०६॥
इससे धन, यश और आयुकी प्राप्ति होती है। यह पवित्र तथा वेदके तुल्य आदरणीय है। यह श्रीसम्पन्न, स्वर्गदायक, सदा पुण्यकारक, कल्याणमय तथा संतानकी प्राप्ति करानेवाला है; इस शुभ, उत्तम एवं बुद्धिवर्धक स्तोत्रके सेवनसे मनुष्योंको क्षेमकी प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं, यह समस्त रोगोंको शान्त करनेवाला तथा अपनी कीर्ति और कुलको बढ़ानेवाला है ॥ १०५-१०६ ॥
श्रद्दधानो दयोपेतो यः पठेदात्मसंयतः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा लभते च शुभां गतिम् ॥ १०७॥
जो श्रद्धालु, दयालु और आत्मसंयमी मनुष्य इसका पाठ करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो शुभ गतिको भागी होता है ॥ १०७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बलदेवाह्निकं नाम नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलदेवाह्निक नामक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०९ ॥
दशाधिकशततमोऽध्यायः
साम्बकी उत्पत्ति और अस्त्रशिक्षा तथा द्वारकामें पधारे हुए राजाओंके बीच नारदजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी परम धन्यताका प्रतिपादन
| वैशम्पायन उवाच | वैशम्पायनजी कहते हैं— |
|---|---|
| हतो यदैव प्रद्युम्नः शम्बरेणात्मघातिना ।<br>मासेऽस्मिन्नेव साम्बस्तु जाम्बवत्यामजायत ॥ १ ॥ | जनमेजय ! आत्मघाती शम्बरासुरने जब प्रद्युम्नका अपहरण किया था, उसी महीनेमें जाम्बवतीके गर्भसे साम्बका जन्म हुआ ॥ १ ॥ |
[विष्णुपर्व ] दशाधिकशततमोऽध्यायः ६५१
बाल्यात्प्रभृति रामेण शस्त्रेषु विनियोजितः ।
रामादनन्तरश्चैव मानितः सर्ववृष्णिभिः ॥ २ ॥
बलरामजीने साम्बको बचपनसे ही अस्त्र-शस्त्रोंके अभ्यासमें लगा रखा था। बलरामजीके बाद साम्ब ही उनके-जैसे अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता थे, इसलिये समस्त वृष्णिवंशी वीर उनका बड़ा सम्मान करते थे ॥ २ ॥
जातमात्रे ततः कृष्णः शुभां तामवसत् पुरीम् ।
निहतामित्रसामन्तः शक्रोद्यानं यथामरः ॥ ३ ॥
साम्बके जन्म लेनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण अपने शत्रुभूत सामन्तोंका संहार करके शुभस्वरूपा द्वारकापुरीमें रहने लगे; जैसे कोई देवता इन्द्रके उद्यान नन्दनवनमें निवास करता हो ॥ ३ ॥
यादर्वी च श्रियं दृष्ट्वा स्वां श्रियं द्वेष्टि वासवः ।
जनार्दनभयाच्चैव न शान्तिं लेभिरे नृपाः ॥ ४ ॥
यदुवंशियोंकी सम्पत्ति देखकर देवराज इन्द्र अपनी राज्यलक्ष्मीसे द्वेष करने लगे थे । भगवान् श्रीकृष्णके भयसे राजाओंको कभी शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ४ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य पुरे वारणसाह्वये ।
दुर्योधनस्य यज्ञे वै समीयुः सर्वपार्थिवाः ॥ ५ ॥
किसी समय हस्तिनापुरमें दुर्योधनके यज्ञमें भूमण्डलके समस्त राजा एकत्र हुए ॥ ५ ॥
तां श्रुत्वा माधवीं लक्ष्मीं सपुत्रं च जनार्दनम् ।
पुरीं द्वारावतीं चैव निविष्टां सागरान्तरे ॥ ६ ॥
दूतैस्तैः कृतसंघानाः पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ।
श्रियं द्रष्टुं हृषीकेशमाजग्मुः कृष्णमन्दिरम् ॥ ७ ॥
वहाँ यदुवंशियोंकी राज्यलक्ष्मी, पुत्रसहित भगवान् श्रीकृष्ण तथा समुद्रके भीतर बसी हुई द्वारकापुरीकी विशेष चर्चा सुनकर अपने दूतोंद्वारा भगवान् श्रीकृष्णके साथ संधि स्थापित करके, पृथ्वीके समस्त भूपाल यादवोंकी राजलक्ष्मीका दर्शन करनेके लिये द्वारकामें भगवान् हृषीकेशके पास उनके निवास-मन्दिरमें आये ॥ ६-७ ॥
दुर्योधनमुखाः सर्वे धृतराष्ट्रवशानुगाः ।
पाण्डवप्रमुखाश्चैव धृष्टद्युम्नादयो नृपाः ॥ ८ ॥
पाण्ड्याश्चोलकलिङ्गाश्च बाह्लीका द्राविडाः खशाः।
अक्षौहिणीः प्रकर्षन्तो दश चाष्टौ च भूमिपाः ॥ ९ ॥
आजग्मुर्यादवपुरीं गोविन्दभुजपालिताम् ।
धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अधीन रहनेवाले दुर्योधन आदि सब भाई, पाण्डवोंको अगुआ बनाकर चलनेवाले धृष्टद्युम्न आदि नरेश, पाण्ड्य, चोल और कलिङ्ग देशके भूपाल, बाह्लीक, द्राविड़ और खश देशोंके राजा अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ साथ लिये श्रीकृष्णकी भुजाओंसे सुरक्षित यादव-पुरीमें आये ॥ ८-९ १/२ ॥
ते पर्वतं रैवतकं परिवार्थ्यावनीश्वराः ॥ १० ॥
विविशुर्योजनाख्यासु स्वासु स्वासु च भूमिषु ।
वे भूमिपाल रैवतक पर्वतको चारों ओरसे घेरकर अपने-अपने लिये निश्चित की हुई एक-एक योजनकी भूमिमें डेरा डालकर बस गये ॥ १० १/२ ॥
ततः श्रीमान् हृषीकेशः सह यादवपुङ्गवैः ॥ ११ ॥
समीपं मानवेन्द्राणां निर्ययौ कमलेक्षणः ।
तदनन्तर कमलनयन श्रीमान् हृषीकेश यादव-शिरोमणियों-के साथ पुरीसे निकलकर उन नरेन्द्रोंके समीप गये ॥११ १/२॥
स तेषां नरदेवानां मध्यस्थो मधुसूदनः ॥ १२ ॥
व्यराजत यदुश्रेष्ठः शरदीव दिवाकरः ।
उन नरदेवोंके बीचमें बैठे हुए यदुश्रेष्ठ मधुसूदन शरत्कालके सूर्यकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ १२ १/२ ॥
स तत्र समुदाचारं यथास्थानं यथावयः ॥ १३ ॥
कृत्वा सिंहासने कृष्णः काञ्चने निषसाद ह ।
वहाँ स्थान और अवस्थाके अनुसार शिष्टाचारका निर्वाह करके भगवान् श्रीकृष्ण सोनेके सिंहासनपर विराजमान हुए ॥
राजानोऽपि यथास्थानं निषेदुर्विविधेष्वथ ॥ १४ ॥
सिंहासनेषु चित्रेषु पीठेषु च नराधिपाः ।
फिर वे नरेश भी नाना प्रकारके सिंहासनों और विचित्र पीठोंपर यथास्थान बैठे ॥ १४ १/२ ॥
स यादवनरेन्द्राणां समाजः शुशुभे तदा ॥ १५ ॥
सुराणामसुराणां च सदसि ब्रह्मणो यथा ।
वहाँ उस समय यादव नरेशोंका समाज ब्रह्माजीकी सभामें एकत्र हुए देवताओं और असुरोंके समाजकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ १५ १/२ ॥
तेषां चित्राः कथास्तत्र प्रवृत्तास्तत्समागमे ।
यदूंनां पार्थिवानां च केशवस्योपशृण्वतः ॥ १६ ॥
उस राजसमाजमें वहाँ भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए उन यादवों और भूपालोंमें विचित्र बातें होने लगीं ॥ १६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वायुर्ववौ मेघरवोपमः ।
तुमुलं दुर्दिनं चासीत् सविद्युत्स्तनयित्नुमत् ॥ १७ ॥
इसी बीचमें मेघोंकी गर्जनाके समान सनसनाहट पैदा करती हुई प्रचण्ड वायु चलने लगी । घोर दुर्दिन छा गया । बिजली चमकने और गड़गड़ाहट पैदा करने लगी ॥ १७ ॥
तद् दुर्दिनतलं भित्त्वा नारदः प्रत्यदृश्यत ।
संवेष्टितजटाभारो वीणासक्तेन बाहुना ॥ १८ ॥
उस दुर्दिनतल अर्थात् मेघोंके आवरणको भेदकर नारदजी दिखायी दिये, उन्होंने अपने सिरपर बढ़े हुए जटा-भारको लपेट रखा था, उनकी एक भुजामें वीणा थी ॥ १८ ॥
६५२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
स पपात नरेन्द्राणां मध्ये सागरसंनिभः।
नारदोऽग्निशिखाकारः श्रीमाञ्छक्रसखो मुनिः॥ १९॥
वे समुद्रके समान गम्भीर और अग्नि-शिखाके समान तेजस्वी नारद मुनि जो देवराज इन्द्रके मित्र हैं, उन नरेशोंके बीचमें उतरे॥ १९॥
तस्मिन् निपतिते भूमौ नारदे मुनिपुङ्गवे।
तदद्भुतं महामेघं व्यपाकृष्यत दुर्दिनम्॥ २०॥
मुनिवर नारदजीके भूमिपर उतर आनेपर महान् मेघोंकी घटासे छाया हुआ वह अद्भुत दुर्दिन तत्काल दूर हो गया॥ २०॥
सोऽवगाह्य नरेन्द्राणां मध्ये सागरसंनिभः।
आसनस्थं यदुश्रेष्ठमुवाच मुनिरव्ययम्॥ २१॥
सागरसदृश गम्भीर स्वभाववाले नारद मुनिने उन नरेशोंके मध्यभागमें प्रवेश करके सिंहासनपर बैठे हुए अविनाशी यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—॥ २१॥
आश्चर्यं खलु देवानामेकस्त्वं पुरुषोत्तमः।
धन्योऽस्यासि महाबाहो लोकेनान्योऽस्ति कश्चन॥ २२॥
'महाबाहो ! बड़े आश्चर्यकी बात है, अवश्य ही देवताओंमें एकमात्र आप ही पुरुषोत्तम हैं और आप ही धन्य हैं, संसारमें दूसरा कोई ऐसा नहीं है'॥ २२॥
एवमुक्तः स्मितं कृत्वा प्रत्युवाच मुनिं प्रभुः।
आश्चर्यश्चैव धन्यश्च दक्षिणाभिः सहेत्यहम्॥ २३॥
उनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर नारद मुनिसे बोले—'मैं दक्षिणाओंके साथ आश्चर्य एवं धन्य हूँ'॥
एवमुक्तो मुनिश्रेष्ठः प्राह मध्ये महीभृताम्।
कृष्ण पर्याप्तवाक्योऽस्मि गमिष्यामि यथागतम्॥ २४॥
भगवान्के ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ नारद उन राजाओंके बीचमें इस प्रकार बोले—'श्रीकृष्ण ! मुझे अपनी बातका पूरा उत्तर मिल गया, अब मैं जैसे आया था वैसे ही लौट जाऊँगा' ॥ २४ ॥
तं प्रस्थितमभिप्रेक्ष्य पार्थिवाः प्राहिरीश्वरम्।
गुह्यं मन्त्रमजानन्तो वचनं नारदेरितम्॥ २५॥
उन्हें जाते देख उन नारदजीके कहे हुए गूढ़ मन्त्ररूपी वाक्यका तात्पर्य न जाननेवाले भूपालोंने भगवान्से कहा—॥
आश्चर्यमित्यभिहितं धन्योऽसीति च माधव।
दक्षिणाभिः सहेत्येवं प्रत्युक्तेऽपि च नारदे॥ २६॥
किमेतन्नाभिजानीमो दिव्यं मन्त्रपदं महत्।
यदि श्राव्यमिदं कृष्ण श्रोतुमिच्छाम तत्त्वतः॥ २७॥
'माधव ! नारदजीने आपके विषयमें आश्चर्य और धन्य कहा है और आपने 'दक्षिणाओंके साथ' ऐसा कहकर नारदजीको उनकी बातका उत्तर दे दिया है; यह सब हो जानेपर भी हम यह नहीं समझ सके कि 'यह क्या है ?' इस दिव्य एवं महान् मन्त्रपदका तात्पर्य क्या है ? श्रीकृष्ण ! यदि वह सुनानेयोग्य हो तो हमलोग यथार्थरूपसे इसका रहस्य सुनना चाहते हैं' ॥ २६-२७ ॥
तानुवाच ततः कृष्णः सर्वान् पार्थिवपुङ्गवान्।
श्रोतव्यं नारदस्तेव द्विजो वः कथयिष्यति॥ २८॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने उन समस्त भूपाल-शिरोमणियोंसे कहा—'राजाओ ! यदि तुम्हें इसका तात्पर्य सुनना है तो ये विप्रवर नारदजी ही आपके समक्ष पूर्वोक्त वचनोंकी व्याख्या करेंगे' ॥ २८ ॥
ब्रूहि नारद तत्त्वार्थं श्रोतुकामा महीभुजः।
यत् त्वयाभिहितं वाक्यं मया नु प्रतिभाषितम्॥ २९॥
ऐसा कहकर वे नारदजीसे बोले—'नारदजी ! तुमने जो बात कही और मैंने जो उसका उत्तर दिया, उसका यथार्थ रहस्य ये राजालोग सुनना चाहते हैं; अतः आप इन्हें बताइये' ॥
स पीठे काञ्चने शुभ्रे सूपविष्टः स्वलंकृतः।
प्रभावं तस्य वन्द्यस्य प्रवक्तुमुपचक्रमे॥ ३०॥
तब वे सुन्दर सुवर्णमय पीठपर जमकर बैठ गये। वे सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत भी थे, उन्होंने उन वन्दनीय प्रभुके प्रभावका वर्णन इस प्रकार आरम्भ किया ॥ ३० ॥
नारद उवाच
श्रूयतां भो नृपश्रेष्ठा यावन्तः स्थ समागताः।
अस्य कृष्णस्य महतो यथा पारमहं गतः॥ ३१॥
नारदजी बोले—नृपवरो ! आपलोग जितनी संख्यामें यहाँ पधारे हैं, वे सुनें, मैं इन परम महान् श्रीकृष्णकी महिमाके पार कैसे पहुँचा, यह बता रहा हूँ ॥ ३१ ॥
अहं कदाचिद् गङ्गायास्तीरे त्रिशवणातिथिः।
चराम्येकः क्षपापाये दृश्यमाने दिवाकरे॥ ३२॥
अपश्यं गिरिकूटाभं कपालद्वयदेहिनम्।
क्रोशमण्डलविस्तारं तावद् द्विगुणमायतम्॥ ३३॥
चतुश्चरणसुश्लिष्टं क्लिन्नं चैव सपङ्किलम्।
मम वीणाकृतिं कूर्मं गजचर्मचयोपमम्॥ ३४॥
किसी समय मैं गङ्गाजीके तटपर तीनों समय स्नान करनेवाले अतिथिके रूपमें अकेला ही विचरता था। एक दिन जब रात बीत चुकी थी और सूर्यदेव दिखायी देने लगे थे, मैंने एक कछुआ देखा, जो पर्वतके शिखरके समान प्रतीत होता था। उसका शरीर दो कपालोंके संयोगसे बना था। उसका मण्डलाकार विस्तार एक कोसका था, लंबाई इससे दूनी थी। उसके चार पैर थे। वह पानीसे भीगा और कीचड़में सना हुआ था। उसकी आकृति मेरी वीणाके समान थी। उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो हाथीके चमड़ेका ढेर लगा हो ॥ ३२-३४ ॥
[ विष्णुपर्व ] दशाधिकशततमोऽध्यायः ६५३
(प्रथम स्तम्भ)
सोऽहं तं पाणिना स्पृष्ट्वा प्रोक्तवाञ्जलचारिणम्।
त्वमाश्चर्यशरीरोऽसि कूर्म धन्योऽसि मे मतः ॥ ३५ ॥
मैंने उस जलचर जन्तुको हाथसे छूकर उससे कहा—'कूर्म ! तुम्हारा शरीर आश्चर्यजनक है। मेरे मतमें तुम धन्य हो ॥ ३५ ॥
यस्त्वमेवमभेद्याभ्यां कपालाभ्यां समावृतः।
तोये चरसि निःशङ्कः कंचिदन्यमचिन्तयन् ॥ ३६ ॥
'क्योंकि तुम दो अभेद्य कपालोंसे आवृत रहकर दूसरे किसीकी परवा न रखते हुए पानीमें निःशङ्क विचरते हो'॥ ३६ ॥
स मामुवाचाम्बुचरः कूर्मो मानुषवत्स्वयम्।
किमाश्चर्यं मयि मुने धन्यश्चाहं कथं विभो ॥ ३७ ॥
तब उस जलचर कछुएने स्वयं ही मनुष्यकी-सी बोलीमें मुझसे कहा—'मुने! मुझमें क्या आश्चर्य है? प्रभो! मैं कैसे धन्य हूँ ? ॥ ३७ ॥
गङ्गेयं निम्नगा धन्या किमाश्चर्यमतः परम्।
यत्राहमिव सत्त्वानि चरन्त्ययुतशो द्विज ॥ ३८ ॥
ब्रह्मन्! धन्य तो ये गङ्गा नदी हैं। इनसे बढ़कर आश्चर्यकी वस्तु और क्या है? जिनके भीतर मुझ-जैसे हजारों जलजन्तु विचरते हैं' ॥ ३८ ॥
सोऽहं कुतूहलाविष्टो नदीं गङ्गामुपस्थितः।
धन्यासि त्वं सरिच्छ्रेष्ठे नित्यमाश्चर्यभूषिता ॥ ३९ ॥
या त्वमेवं महादेहः श्वापदैरुपशोभिता।
ह्रदिनी सागरं यासि रक्षन्ती तापसाश्रमान् ॥ ४० ॥
तब मैं कौतूहलवश गङ्गा नदीके निकट गया और बोला—'सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गे! तुम धन्य हो और सदा आश्चर्यसे विभूषित रहती हो, क्योंकि ऐसे-ऐसे विशालकाय हिंसक जन्तु तुम्हारी शोभा बढ़ाते हैं; तुम अनेकानेक कुण्डोंसे युक्त हो और कितने ही तापसोंके आश्रमोंकी रक्षा करती हुई समुद्रतक जाती हो' ॥ ३९-४० ॥
एवमुक्ता ततो गङ्गा रूपिणी प्रत्यभाषत।
नारदं देवगन्धर्वं शक्रस्य दयितं द्विजम् ॥ ४१ ॥
मेरे इस तरह कहनेपर गङ्गाजी अपने दिव्य रूपसे प्रकट होकर मुझ देवगन्धर्वजातीय तथा इन्द्रके प्रिय मित्र नारद नामक ब्राह्मणसे यों बोलीं—॥ ४१ ॥
मा मैवं देवगन्धर्व संग्रामकलहप्रिय।
नाहं धन्या द्विजश्रेष्ठ नैवाश्चर्योपशोभिता ॥ ४२ ॥
'देवगन्धर्व! ऐसा न कहो, न कहो। युद्ध और कलहके प्रेमी द्विजश्रेष्ठ! मै न तो धन्य हूँ और न आश्चर्यजनक जन्तुओंसे सुशोभित ही ॥ ४२ ॥
तव सत्ये निविष्टस्य वाक्यं मां प्रतिबाधते।
सर्वाश्चर्यकरो लोके धन्यश्चैवार्णवो द्विज ॥ ४३ ॥
यत्राहमिव विस्तीर्णाः शतशो यान्ति निम्नगाः।
(द्वितीय स्तम्भ)
'आप सत्यपरायण महर्षिका यह वचन मेरे प्रति बाधित हो रहा है। ब्रह्मन् ! संसारमें पूर्णतः आश्चर्यकारक और धन्य तो एकमात्र समुद्र ही है, जिसमे मुझ-जैसी सैकड़ो विस्तृत नदियाँ जाकर मिलती हैं' ॥ ४३ ½ ॥
सोऽहं त्रिपथगावाक्यं श्रुत्वार्णवमुपस्थितः ॥ ४४ ॥
आश्चर्यं खलु लोकानां धन्यश्चासि महार्णव।
येन खल्वसि योनस्त्वमम्भसां सलिलेश्वरः ॥ ४५ ॥
गङ्गाजीका उक्त वचन सुनकर मैं महासागरके तटपर गया और बोला—'महार्णव! तुम समस्त लोकोंमें आश्चर्यमय और धन्य हो, क्योंकि तुम जलकी योनि और स्वामी हो। ४४-४५।
स्थाने त्वां वारिवाहिन्यः सरितो लोकपावनाः।
इमाः समभिगच्छन्ति पत्न्यो लोकनमस्कृताः ॥ ४६ ॥
'जल बहानेवाली जो ये लोकपावन और विश्ववन्दित नदियाँ पत्नीभावसे तुम्हारे समीप जाती हैं, यह सब उचित ही है' ॥ ४६ ॥
समुद्रस्त्वेवमुक्तस्तु ततो मामवदद्-वचः।
स्वं जलौघतलं भित्त्वा व्युत्थितः पवनेरितः ॥ ४७ ॥
मेरे ऐसा कहनेपर पवनप्रेरित समुद्र अपनी अगाध जलराशिका भेदन करके उठ खड़ा हुआ और मुझसे इस प्रकार बोला—॥ ४७ ॥
मा मैवं देवगन्धर्व नास्म्याश्चर्यो द्विजर्षभ।
वसुधेयं मुने धन्या यत्राहमुपरि स्थितः ॥ ४८ ॥
ऋते तु पृथिवीं लोके किमाश्चर्यमतः परम्।
'देवगन्धर्व! आप ऐसा न कहें ! न कहे !! द्विजश्रेष्ठ! मैं ऐसा आश्चर्यरूप नहीं हूँ। मुने! धन्य तो यह वसुधा है, जिसके ऊपर मैं स्थित हूँ। संसारमे पृथ्वीके सिवा उससे बढ़कर आश्चर्यकी वस्तु दूसरी कौन है ?' ॥ ४८ ½ ॥
सोऽहं सागरवाक्येन क्षितिं क्षितितले स्थितः ॥ ४९ ॥
कौतूहलसमाविष्टो ह्यध्रुवं जगतो गतिम्।
समुद्रके कहनेसे मैं पृथ्वीपर खड़ा हुआ और कौतूहल-युक्त होकर जगत्की आधारस्वरूपा पृथ्वीसे बोला—॥४९ ½॥
धरित्रि देहिनां योने धन्या खल्वसि शोभने ॥ ५० ॥
आश्चर्यं चापि भूतेषु महत्या क्षमया युते।
'धरित्रि! तू समस्त देहधारियोंकी योनि है, अतः शोभने! तू निश्चय ही धन्य है। महती क्षमासे संयुक्त होनेके कारण तू सम्पूर्ण भूतोंमें आश्चर्यरूप है ॥ ५० ½ ॥
तेन खल्वसि भूतानां धरणी मनुजारणिः ॥ ५१ ॥
क्षमा त्वत्तः प्रभूता च कर्म चाम्बरगामिनाम्।
'अतः निश्चय ही तू समस्त प्राणियोंको धारण करनेवाली और मनुष्योंका उत्पत्ति-स्थान है। तुझसे ही क्षमाभाव प्रकट हुआ है। आकाशचारियोंका कर्म भी तुझसे ही सिद्ध होता है' ॥ ५१ ½ ॥
| ६५४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
ततो भूः स्तुतिवाक्येन सा मयोक्तेन तेजिता ॥ ५२ ॥
विहाय सहजं धैर्यं प्रत्यक्षा मामभाषत ।
मेरे द्वारा कहे गये प्रशंसासूचक वचनसे पृथ्वी उत्तेजित-सी हो उठी। उसने अपनी सहज धीरता छोड़ दी और प्रत्यक्ष होकर मुझसे कहा—॥ ५२॥
देवगन्धर्व मा मैवं संग्रामकलहप्रिय ॥ ५३ ॥
नास्मि धन्या न चाश्चर्यं पारक्येयं धृतिर्मम ।
‘युद्ध और कलहसे प्रेम रखनेवाले देवगन्धर्व ! ऐसी बात न कहो ! न कहो !! न तो मैं धन्य हूँ और न आश्चर्यंरूप ही हूँ। मुझमें जो धीरता दिखायी देती है, यह मेरी नहीं दूसरोंकी है ॥ ५३॥
एते धन्या द्विजश्रेष्ठ पर्वता धारयन्ति माम् ॥ ५४ ॥
आश्चर्याणि च दृश्यन्ते एते लोकस्य हेतवः ।
‘द्विजश्रेष्ठ ! ये पर्वत धन्य हैं, जो मुझे धारण करते हैं। ये ही आश्चर्यंरूप देखे जाते हैं तथा ये ही इस जगत्की स्थितिके हेतु हैं’ ॥ ५४॥
सोऽहं धरणिवाक्येन पर्वतान् समुपस्थितः ॥ ५५ ॥
धन्या भवन्तो दृश्यन्ते बह्वाश्चर्याश्च भूधराः ।
पृथ्वीके इस कथनसे प्रभावित होकर मैं पर्वतोंके यहाँ उपस्थित हुआ और बोला—‘भूधरो ! तुम धन्य हो। तुममें बहुत-सी आश्चर्यकी बातें दिखायी देती हैं ॥ ५५॥
काञ्चनस्याग्ररत्नस्य धातूनां च विशेषतः ॥ ५६ ॥
तेन खल्वाकराः सर्वे भवन्तो भुवि शाश्वताः ।
‘सुवर्ण, श्रेष्ठ रत्न और विशेषतः धातुओंके उत्पत्तिस्थान होनेके कारण तुम सब लोग आकर कहलाते हो। इस भूतलपर तुम सब ही सदा बने रहते हो’ ॥ ५६॥
ते ममैतद् वचः श्रुत्वा पर्वतास्तस्थुषां वराः ॥ ५७ ॥
ऊचुर्मां सान्त्वयुक्तानि वचांसि वनशोभिताः ।
मेरी यह बात सुनकर स्थावर पदार्थोंमें श्रेष्ठ पर्वत, जो वनोंसे सुशोभित होते हैं, मुझसे सान्त्वनायुक्त वचन बोले—॥५७॥
ब्रह्मर्षे न वयं धन्या नाप्याश्चर्याणि सन्ति नः ।
ब्रह्मा प्रजापतिर्धन्यः सर्वाश्चर्यः सुरेष्वपि ॥ ५८ ॥
‘ब्रह्मर्षे ! न तो हम धन्य हैं और न हमारे पास आश्चर्यजनक वस्तुएँ ही हैं। प्रजापति ब्रह्माजी धन्य हैं, देवताओंमें भी वे ही सम्पूर्ण आश्चयोंसे युक्त हैं’ ॥ ५८ ॥
सोऽहं प्रजापतिं गत्वा सर्वप्रभवमव्ययम् ।
तस्य वाक्यस्य पर्यायपर्याप्तमिव लक्षये ॥ ५९ ॥
तब मैंने सबके उत्पत्तिस्थान अविनाशी प्रजापतिके पास जाकर उनमें पर्वतोंके कहे हुए वचनोंकी पर्याप्त सार्थकता देखी ॥ ५९ ॥
सोऽहं पितामहं देवं लोकयोनिं चतुर्मुखम् ।
स्तोतुं पश्चादुपगतः प्रणतोऽवनताननः ॥ ६० ॥
इसके बाद मैंने सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके स्थानभूत, चार मुखवाले पितामह देवको नतमस्तक होकर प्रणाम किया और फिर स्तवन करनेके लिये मैं उनके पास खड़ा हुआ ॥ ६० ॥
सोऽहं वाक्यसमाप्त्यर्थं श्रावये पद्मयोनिजम् ।
आश्चर्यं भगवानेको धन्योऽसि जगतो गुरुः ॥ ६१ ॥
स्तुतिके बाद अपनी बात समाप्त करनेके लिये मैंने पद्मयोनि ब्रह्माजीको सुनाते हुए कहा—‘भगवन् ! एकमात्र आप ही आश्चर्यमय हैं, आप ही सम्पूर्ण जगत्के गुरु एवं धन्य हैं ॥ ६१ ॥
न किंचिदन्यत् पश्यामि भूतं यद् भवता समम् ।
त्वत्तः सर्वमिदं जातं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ६२ ॥
‘मैं दूसरे किसी भूतको ऐसा नहीं देखता, जो आपके समान हो। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है ॥ ६२ ॥
सदेवदानवा मर्त्या लोके भूतेन्द्रियात्मकाः ।
भवन्ति सर्वदेवेश दृष्ट्वा सर्वमिदं जगत् ॥ ६३ ॥
‘सर्वदेवेश्वर ! संसारमें भूत और इन्द्रियमय जो देवता, दानव और मनुष्य आदि प्राणी देखे जाते हैं, वे सब आपसे ही उत्पन्न होते हैं, इस सम्पूर्ण जगत्को देखकर यही निश्चय होता है ॥ ६३ ॥
तेन खल्वसि देवानां देवदेवः सनातनः ।
तेषामेवासि यत्स्रष्टा लोकानामादिसम्भवः ॥ ६४ ॥
‘इसलिये आप अवश्य ही देवताओंके सनातन देवाधिदेव हैं; क्योंकि आप ही उनके स्रष्टा हैं और आप ही समस्त लोकोंके आदिकारण हैं’ ॥ ६४ ॥
ततो मां प्राह भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।
धन्याश्चर्याश्रितैर्वाक्यैः किं मां नारद भाषसे ॥ ६५ ॥
तब लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने मुझसे कहा—‘नारद ! धन्य और आश्चर्यके विवेचनसे सम्बन्ध रखनेवाले वचनोंद्वारा मेरे विषयमें क्या कहते हो ? ॥ ६५ ॥
आश्चर्यं परमं वेदा धन्या वेदाश्च नारद ।
ये लोकान् धारयन्ति स्म वेदास्तत्त्वार्थदर्शिनः ॥ ६६ ॥
‘नारद ! सबसे महान् आश्चर्य तो वेद हैं, वे ही धन्य भी हैं; क्योंकि वे तत्त्वार्थदर्शी वेद सम्पूर्ण लोकोंको धारण करते हैं ॥ ६६ ॥
ऋक्सामयजुषां सत्यमथर्वणि च यन्मतम् ।
तन्मयं विद्धि मां विप्र धृतोऽहं तैर्मया च ते ॥ ६७ ॥
विष्णुपर्व ] दशाधिकशततमोऽध्यायः ६५५
'विप्रवर ! ऋक्, साम और यजुर्वेदका जो सत्य है तथा अथर्ववेदमे जो सत्य माना गया है, उसीको मेरा स्वरूप समझो। वेदोंने मुझे धारण कर रखा है और मैंने वेदोंको' ॥
पारमेष्ठ्येन वाक्येन नोदितोऽहं स्वयम्भुवा । वेदोपस्थानिकां चक्रे मतिं संस्थानविस्तरात् ॥ ६८ ॥
तब स्वयम्भू ब्रह्माजीके कहे हुए उनके स्वरूपके अनुरूप वचनसे प्रेरित हो मैंने लक्षणविस्तारके अनुसार वेदोंके उपस्थानका विचार किया ॥ ६८ ॥
सोऽहं स्वयम्भूवचनाद् वेदान् वै समुपस्थितः । अवोचं तांश्च चतुरो मन्त्रप्रवचनान्वितान् ॥ ६९ ॥
स्वयम्भू ब्रह्माजीके वचनसे मैंने मन्त्र और व्याख्यासे युक्त पूर्वोक्त चारों वेदोंकी सेवामें उपस्थित हो उनसे कहा—॥
धन्या भवन्तः पुण्याश्च नित्यमाश्चर्यभूषिताः । आधाराश्चैव विप्राणामेवमाह प्रजापतिः ॥ ७० ॥
'आपलोग धन्य हैं, पवित्र हैं और सदा आश्चर्यसे विभूषित रहते हैं। ब्राह्मणोंके आधार भी आप ही हैं, ऐसा प्रजापतिका कथन है ॥ ७० ॥
स्वयम्भुवोऽपीह परं भवत्सु प्रश्नमागतम् । युष्मत्परतरं नास्ति श्रुत्या वा तपसापि वा ॥ ७१ ॥
'आपलोगोंके विषयमे स्वयम्भू ब्रह्माजीका भी यही निर्णय है कि आपलोग सबसे श्रेष्ठ हैं। श्रुति अथवा तपस्याके द्वारा भी आपलोगोंसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है' ॥ ७१ ॥
प्रत्यूचुस्ते ततो वाक्यं वेदा मामभितः स्थिताः । आश्चर्याश्चैव धन्याश्च यज्ञाश्चात्मपरायणाः ॥ ७२ ॥
तब चारों वेदोंने मेरे सब ओर खड़े होकर इस प्रकार उत्तर दिया—'नारद ! परमात्माके उद्देश्यसे किये जानेवाले यज्ञ ही आश्चर्य और धन्य हैं ॥ ७२ ॥
यज्ञार्थे च वयं सृष्टा धात्रा येन स्म नारद । तदस्माकं परो यज्ञो न वयं स्ववशे स्थिताः ॥ ७३ ॥ स्वयम्भुवः परा वेदा वेदानां क्रतवः पराः ।
'नारद ! परमात्माने यज्ञके लिये ही हमें प्रकट किया है, अतः यज्ञ ही हमसे उत्कृष्ट है। हम अपने वशमें नहीं हैं, स्वयम्भू ब्रह्मासे उत्कृष्ट वेद हैं और वेदोंसे उत्कृष्ट यज्ञ हैं।'
ततोऽहमब्रुवं यज्ञान् बृहद्वाग्भिः पुरस्कृतान् ॥ ७४॥ भो यज्ञाः परमं तेजो युष्मासु खलु लक्ष्यते ।
तब मैंने वेदोंकी वाणीसे पुरस्कृत हुए यज्ञोंसे कहा—'यज्ञो ! तुमलोगोंमें सबसे उत्कृष्ट तेज दिखायी देता है॥७४१/२॥
ब्रह्मणाभिहितं वाक्यं यच्च वेदैरुदीरितम् ॥ ७५ ॥ आश्चर्यमन्यल्लोकेऽस्मिन् भवद्भ्यो नाभिगम्यते ।
'ब्रह्माजीने जो बात कही है और वेदोंनें जिस प्रकार प्रतिपादन किया है, उसके अनुसार इस जगत्में आपलोगोंके सिवा दूसरी कोई आश्चर्यकी वस्तु नहीं ज्ञात होती है ॥ ७५१/२ ॥
धन्याः खलु भवन्तो ये द्विजातीनां स्ववंशजाः ॥ ७६ ॥ तेऽपि खल्वग्नयस्तृप्तिं युष्माभियान्ति तर्पिताः । भागैश्च त्रिदशाः सर्वे मन्त्रैश्चैव महर्षयः ॥ ७७ ॥
'आपलोग धन्य हैं, जो द्विजातियोंके वंशज हैं। आपलोगोंसे तर्पित होनेपर त्रिविध अग्नियोंको तृप्ति प्राप्त होती है। यज्ञोंमें ही सब देवता अपने भागोंसे और महर्षिगण मन्त्रोंसे तृप्त होते हैं' ॥ ७६-७७ ॥
अग्निष्टोमादयो यज्ञा मम वाक्यादनन्तरम् । प्रत्यूचुर्मां ततो वाक्यं सर्वे यूपध्वजाः स्थिताः ॥ ७८ ॥
मेरे ऐसा कहनेके बाद यूपरूपी ध्वजसे सुशोभित समस्त अग्निष्टोम आदि यज्ञ खड़े होकर मुझसे बोले—॥ ७८ ॥
आश्चर्यशब्दो नास्मासु धन्यशब्दोऽपि वा मुने । आश्चर्यं परमं विष्णुः स ह्यस्माकं परा गतिः ॥ ७९ ॥
'मुने ! यह आश्चर्य अथवा धन्य शब्द हमलोगोंके लिये उपयुक्त नहीं है। भगवान् विष्णु ही परम आश्चर्यरूप हैं; क्योंकि वे ही हमारी परम गति हैं ॥ ७९ ॥
यदाज्यं वयमश्नीमो हुतमग्निषु पावनम् । तत् सर्वं पुण्डरीकाक्षो लोकमूर्तिः प्रयच्छति ॥ ८० ॥
'अग्निमें होमे गये जिस पावन आज्य-भागका हमलोग आस्वादन करते हैं, वह सब विश्वरूप कमलनयन भगवान् विष्णु हमें प्रदान करते हैं' ॥ ८० ॥
सोऽहं विष्णोर्गतिं प्रेप्सुरिह सम्पतितो भुवि । दृष्टश्चायं मया कृष्णो भवद्भिरिह संवृतः ॥ ८१ ॥
वेदोंके इस कथनके अनुसार मै भगवान् विष्णुकी गति प्राप्त करनेके लिये यहाँ इस पृथ्वीपर आया हूँ। यहाँ आप राजाओंसे घिरे हुए भगवान् श्रीकृष्णका मैंने दर्शन किया है ॥
यन्मयाभिहितो ह्येष त्वमाश्चर्यं जनार्दन । धन्यश्चासीति भवतां मध्यस्थो ह्यत्र पार्थिवाः ॥ ८२ ॥
राजाओ ! मैंने जो श्रीकृष्णके विषयमें यह कहा है कि 'जनार्दन ! तुम आश्चर्यरूप और धन्य हो,' वे ही यहाँ आपलोगोंके बीचमें विराजमान हैं ॥ ८२ ॥
प्रत्युक्तोऽहमनेनाद्य वाक्यस्यास्य यदुत्तरम् । दक्षिणाभिः सहेत्येवं पर्याप्तं वचनं मम ॥ ८३ ॥
इन्होंने आज मेरी इस बातका जो उत्तर दिया है कि 'दक्षिणाओंके सहित (मैं धन्य हूँ),' यह मेरे प्रश्नका पर्याप्त उत्तर प्राप्त हो गया ॥ ८३ ॥
यज्ञानां हि गतिर्विष्णुः सर्वेषां सहदक्षिणः । दक्षिणाभिः सहेत्येवं प्रश्नो मम समाप्तवान् ॥ ८४ ॥
| ६५६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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क्योंकि दक्षिणाओंसहित विष्णु ही सब यज्ञोंके आश्रय हैं, इसलिये 'दक्षिणाओंसहित' इतना कह देनेपर मेरा प्रश्न समाप्त हो गया ॥ ८४ ॥
कूर्मेणाभिहितं पूर्वं पारम्पर्यादिहागतम् ।
सदक्षिणेऽस्मिन् पुरुषे तद्वाक्यं प्रतिपादितम् ॥ ८५ ॥
पहले कच्छपने धन्यताका प्रतिपादन आरम्भ किया था; फिर परम्परासे यहाँ इन दक्षिणासहित परमपुरुष श्रीकृष्णमें उसका उपसंहार हुआ है; अतः कौन धन्य है इस बातका उत्तर प्राप्त हो गया ॥ ८५ ॥
यन्मां भवन्तः पृच्छन्ति वाक्यस्यास्य विनिर्णयम्।
तदेतत् सर्वमाख्यातं साधयाम्यथागतम् ॥ ८६ ॥
आपलोग जो मेरे पूर्वोक्त कथनका निश्चित तात्पर्य पूछ रहे थे, उसके विषयमें यह सब कुछ मैंने बता दिया । अब मैं जैसे आया था, वैसे जा रहा हूँ ॥ ८६ ॥
नारदे तु गते स्वर्गं सर्वे ते पृथिवीभुजः।
विस्मिताः स्वानि राष्ट्राणि जग्मुः सबलवाहनाः ॥ ८७ ॥
नारदजीके स्वर्गलोकको चले जानेपर वे समस्त भूपाल विस्मित होकर सेना और सवारियोंसहित अपने राष्ट्रोंको चले गये ॥ ८७ ॥
जनार्दनोऽपि सहितो यदुभिः पावकोपमैः ।
स्वमेव भवनं वीरो विवेश यदुनन्दनः ॥ ८८ ॥
तत्पश्चात् यदुकुलको आनन्दित करनेवाले वीर जनार्दन भी अग्निके समान तेजस्वी यदुवंशी वीरोंके साथ अपने ही भवनमें पधारे ॥ ८८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि धन्योपाख्यानं नाम दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें धन्योपाख्यानविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥११०॥
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी महिमा—अर्जुनका श्रीकृष्णसे आज्ञा लेकर ब्राह्मण-बालककी रक्षाके लिये जाना
जनमेजय उवाच
भूय एव महाबाहो कृष्णस्य जगतां पतेः।
माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि परं द्विजसत्तम ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा—महाबाहो ! द्विजश्रेष्ठ ! मैं पुनः जगदीश्वर श्रीकृष्णका उत्तम माहात्म्य सुनना चाहता हूँ॥१॥
न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतस्तस्य धीमतः ।
कर्मणामनुसंतानं पुराणस्य महात्मनः ॥ २ ॥
उन परम बुद्धिमान् महात्मा पुराणपुरुष श्रीकृष्णके कर्मोंकी परम्पराका श्रवण करनेसे मुझे यहाँ तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
नान्तः शक्यः प्रभावस्य वक्तुं वर्षशतैरपि ।
गोविन्दस्य महाराज श्रूयतामिदमद्भुतम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी बोले—महाराज जनमेजय ! भगवान् गोविन्दके प्रभावका पूरा-पूरा वर्णन करना—उसका अन्त बता देना तो सैकड़ों वर्षोंमें भी सम्भव नहीं है । अतः उनके इस अद्भुत माहात्म्यका वर्णन सुनो ॥ ३ ॥
शरतल्पे शयानेन भीष्मेण परिचोदितः ।
गाण्डीवधन्वा वीभत्सुर्माहात्म्यं केशवस्य यत् ॥ ४ ॥
राज्ञां मध्ये महाराज ज्येष्ठं भ्रातरमब्रवीत् ।
युधिष्ठिरं जितामित्रमिति तच्छृणु कौरव ॥ ५ ॥
महाराज कुरुनन्दन ! बाणशय्यापर सोये हुए पितामह भीष्मकी आज्ञा पाकर गाण्डीवधन्वा अर्जुनने समस्त राजाओंके बीच अपने शत्रुविजयी ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरसे भगवान् केशवका जो माहात्म्य बताया था, उसीका वर्णन करता हूँ; सुनो ॥ ४-५ ॥
अर्जुन उवाच
पुराहं द्वारकां यातः सम्बन्धीनवलोककः ।
न्यवसं पूजितस्तत्र भोजवृष्ण्यन्धकोत्तमैः ॥ ६ ॥
अर्जुन बोले—पहलेकी बात है, मैं अपने सगे-सम्बन्धियोंसे मिलने-जुलनेके लिये द्वारकापुरीमें गया था। वहाँ उत्तम भोज, वृष्णि और अन्धक वीरोंसे सम्मानित हो कई दिनोंतक रहा ॥ ६ ॥
ततः कदाचिद् धर्मात्मा दीक्षितो मधुसूदनः ।
एकाहेन महाबाहुः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ७ ॥
एक दिन धर्मात्मा महाबाहु मधुसूदनने शास्त्रोक्त-विधिसे एकाह सोमयागकी दीक्षा ली ॥ ७ ॥
ततो दीक्षितमासीनमभिगम्य द्विजोत्तमः ।
कृष्णं विज्ञापयामास त्राहि त्राहीति चाब्रवीत् ॥ ८ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण ज्यों ही दीक्षा लेकर बैठे त्यों ही एक श्रेष्ठ ब्राह्मणने उनके पास पहुँचकर अपना संकट निवेदन किया और कहा—'प्रभो ! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये'॥८॥
ब्राह्मण उवाच
रक्षाधिकारो भवतः परित्रायस्व मां विभो ।
चतुर्थांशं हि धर्मस्य रक्षिता लभते फलम् ॥ ९ ॥