भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 678
६५६श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

क्योंकि दक्षिणाओंसहित विष्णु ही सब यज्ञोंके आश्रय हैं, इसलिये 'दक्षिणाओंसहित' इतना कह देनेपर मेरा प्रश्न समाप्त हो गया ॥ ८४ ॥
कूर्मेणाभिहितं पूर्वं पारम्पर्यादिहागतम् ।
सदक्षिणेऽस्मिन् पुरुषे तद्वाक्यं प्रतिपादितम् ॥ ८५ ॥
पहले कच्छपने धन्यताका प्रतिपादन आरम्भ किया था; फिर परम्परासे यहाँ इन दक्षिणासहित परमपुरुष श्रीकृष्णमें उसका उपसंहार हुआ है; अतः कौन धन्य है इस बातका उत्तर प्राप्त हो गया ॥ ८५ ॥
यन्मां भवन्तः पृच्छन्ति वाक्यस्यास्य विनिर्णयम्।
तदेतत् सर्वमाख्यातं साधयाम्यथागतम् ॥ ८६ ॥
आपलोग जो मेरे पूर्वोक्त कथनका निश्चित तात्पर्य पूछ रहे थे, उसके विषयमें यह सब कुछ मैंने बता दिया । अब मैं जैसे आया था, वैसे जा रहा हूँ ॥ ८६ ॥
नारदे तु गते स्वर्गं सर्वे ते पृथिवीभुजः।
विस्मिताः स्वानि राष्ट्राणि जग्मुः सबलवाहनाः ॥ ८७ ॥
नारदजीके स्वर्गलोकको चले जानेपर वे समस्त भूपाल विस्मित होकर सेना और सवारियोंसहित अपने राष्ट्रोंको चले गये ॥ ८७ ॥
जनार्दनोऽपि सहितो यदुभिः पावकोपमैः ।
स्वमेव भवनं वीरो विवेश यदुनन्दनः ॥ ८८ ॥
तत्पश्चात् यदुकुलको आनन्दित करनेवाले वीर जनार्दन भी अग्निके समान तेजस्वी यदुवंशी वीरोंके साथ अपने ही भवनमें पधारे ॥ ८८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि धन्योपाख्यानं नाम दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें धन्योपाख्यानविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥११०॥


एकादशाधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णकी महिमा—अर्जुनका श्रीकृष्णसे आज्ञा लेकर ब्राह्मण-बालककी रक्षाके लिये जाना

जनमेजय उवाच
भूय एव महाबाहो कृष्णस्य जगतां पतेः।
माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि परं द्विजसत्तम ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा—महाबाहो ! द्विजश्रेष्ठ ! मैं पुनः जगदीश्वर श्रीकृष्णका उत्तम माहात्म्य सुनना चाहता हूँ॥१॥
न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतस्तस्य धीमतः ।
कर्मणामनुसंतानं पुराणस्य महात्मनः ॥ २ ॥
उन परम बुद्धिमान् महात्मा पुराणपुरुष श्रीकृष्णके कर्मोंकी परम्पराका श्रवण करनेसे मुझे यहाँ तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच
नान्तः शक्यः प्रभावस्य वक्तुं वर्षशतैरपि ।
गोविन्दस्य महाराज श्रूयतामिदमद्भुतम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी बोले—महाराज जनमेजय ! भगवान् गोविन्दके प्रभावका पूरा-पूरा वर्णन करना—उसका अन्त बता देना तो सैकड़ों वर्षोंमें भी सम्भव नहीं है । अतः उनके इस अद्भुत माहात्म्यका वर्णन सुनो ॥ ३ ॥
शरतल्पे शयानेन भीष्मेण परिचोदितः ।
गाण्डीवधन्वा वीभत्सुर्माहात्म्यं केशवस्य यत् ॥ ४ ॥
राज्ञां मध्ये महाराज ज्येष्ठं भ्रातरमब्रवीत् ।
युधिष्ठिरं जितामित्रमिति तच्छृणु कौरव ॥ ५ ॥
महाराज कुरुनन्दन ! बाणशय्यापर सोये हुए पितामह भीष्मकी आज्ञा पाकर गाण्डीवधन्वा अर्जुनने समस्त राजाओंके बीच अपने शत्रुविजयी ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरसे भगवान् केशवका जो माहात्म्य बताया था, उसीका वर्णन करता हूँ; सुनो ॥ ४-५ ॥

अर्जुन उवाच
पुराहं द्वारकां यातः सम्बन्धीनवलोककः ।
न्यवसं पूजितस्तत्र भोजवृष्ण्यन्धकोत्तमैः ॥ ६ ॥
अर्जुन बोले—पहलेकी बात है, मैं अपने सगे-सम्बन्धियोंसे मिलने-जुलनेके लिये द्वारकापुरीमें गया था। वहाँ उत्तम भोज, वृष्णि और अन्धक वीरोंसे सम्मानित हो कई दिनोंतक रहा ॥ ६ ॥
ततः कदाचिद् धर्मात्मा दीक्षितो मधुसूदनः ।
एकाहेन महाबाहुः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ७ ॥
एक दिन धर्मात्मा महाबाहु मधुसूदनने शास्त्रोक्त-विधिसे एकाह सोमयागकी दीक्षा ली ॥ ७ ॥
ततो दीक्षितमासीनमभिगम्य द्विजोत्तमः ।
कृष्णं विज्ञापयामास त्राहि त्राहीति चाब्रवीत् ॥ ८ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण ज्यों ही दीक्षा लेकर बैठे त्यों ही एक श्रेष्ठ ब्राह्मणने उनके पास पहुँचकर अपना संकट निवेदन किया और कहा—'प्रभो ! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये'॥८॥

ब्राह्मण उवाच
रक्षाधिकारो भवतः परित्रायस्व मां विभो ।
चतुर्थांशं हि धर्मस्य रक्षिता लभते फलम् ॥ ९ ॥