विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 679, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः [ ६५७
ब्राह्मणने फिर कहा—प्रभो ! रक्षा करना आपके अधिकारकी बात है, आप मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि जो रक्षा करता है, वह रक्षित पुरुषके धर्मका चतुर्थांश फल प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
वासुदेव उवाच
न भेतव्यं द्विजश्रेष्ठ रक्षामि त्वां कुतो भयम्।
ब्रूहि तत्त्वेन भद्रं ते यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ १० ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**द्विजश्रेष्ठ ! तुम्हे डरना नहीं चाहिये। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा। तुम्हारा भला हो, ठीक-ठीक बताओ तुम्हे किससे भय है ? यदि अत्यन्त दुष्कर कार्य हो तो भी उसे कहनेमें संकोच न करो ॥ १० ॥
ब्राह्मण उवाच
जातो जातो महाबाहो पुत्रो मे ह्रियतेऽनघ।
त्रयो हृताश्चतुर्थं त्वं कृष्ण रक्षितुमर्हसि ॥ ११ ॥
ब्राह्मणने कहा— महाबाहो ! निष्पाप श्रीकृष्ण ! जब मेरे पुत्र पैदा होता है, तब-तब काल उसे हर ले जाता है। इस प्रकार मेरे तीन पुत्र हर लिये गये। अब चौथा पुत्र होनेवाला है, अतः आप ही उसकी रक्षा करनेयोग्य हैं ॥ ११ ॥
ब्राह्मण्याः सूतिकालेऽद्य तत्र रक्षा विधीयताम्।
यथा म्रियेदपत्यं मे तथा कुरु जनार्दन ॥ १२ ॥
जनार्दन ! आज ब्राह्मणी (मेरी पत्नी) के प्रसवका समय है, अतः वहाँ रक्षा कीजिये। यह मेरी संतान जिस तरह भी जीवित बच जाय, वह उपाय कीजिये ॥ १२ ॥
अर्जुन उवाच
ततो मामाह गोविन्दो दीक्षितोऽहं क्रताविति ।
रक्षा च ब्राह्मणे कार्या सर्वावस्थागतैरपि ॥ १३ ॥
**अर्जुन कहते हैं—**तब भगवान् गोविन्दने मुझसे कहा—'पार्थ ! मैं तो यज्ञकी दीक्षा ले चुका, परंतु सभी अवस्थाओंमें भी ब्राह्मणकी रक्षा तो करनी ही चाहिये' ॥ १३ ॥
श्रुत्वाहमेवं कृष्णस्य वचोऽवोचं नराधिप ।
मां नियोजय गोविन्द रक्षिष्येऽहं द्विजं भयात् ॥ १४ ॥
नरेश्वर ! श्रीकृष्णका ऐसा वचन सुनकर मैंने उनसे कहा—'गोविन्द ! आप मुझे इस कार्यमें नियुक्त कीजिये। मैं इस ब्राह्मणकी भयसे रक्षा करूँगा' ॥ १४ ॥
इत्युक्तः स स्मितं कृत्वा मामुवाच जनार्दनः ।
रक्षसीत्येवमुक्तस्तु व्रीडितोऽस्मि नराधिप ॥ १५ ॥
नरेश्वर ! मेरे ऐसा कहनेपर जनार्दन मुसकराकर मुझसे बोले—'क्या तुम रक्षा कर लोगे ?' उनकी यह बात सुनकर मैं लज्जित हो गया ॥ १५ ॥
ततो मां व्रीडितं मत्वा पुनराह जनार्दनः ।
गम्यतां कौरवश्रेष्ठ शक्यते यदि रक्षितुम् ॥ १६ ॥
तब मुझे लज्जित जानकर जनार्दनने फिर कहा—'कौरवश्रेष्ठ ! यदि तुम रक्षा कर सको तो जाओ ॥ १६ ॥
त्वत्पुरोगाश्च रक्षन्तु वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।
ऋते रामं महाबाहुं प्रद्युम्नं च महाबलम् ॥ १७ ॥
'महाबाहु बलराम तथा महाबली प्रद्युम्नको छोड़कर अन्य वृष्णि और अन्धकवंशी महारथी तुम्हे अगुआ बनाकर जायें और इस ब्राह्मणकी रक्षा करें' ॥ १७ ॥
ततोऽहं वृष्णिसैन्येन महता परिवारितः ।
तमग्रतो द्विजं कृत्वा प्रयातः सह सेनया ॥ १८ ॥
तब मैं वृष्णिवीरोंकी विशाल सेनासे घिरकर उस ब्राह्मणको आगे करके सेनाके साथ आगे बढ़ा ॥ १८ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वासुदेवमाहात्म्ये एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वासुदेवका माहात्म्यविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मणबालककी रक्षा न होनेपर ब्राह्मणद्वारा अर्जुनका तिरस्कार और श्रीकृष्णके साथ उनका उत्तर दिशाको गमन
अर्जुन उवाच
| मुहूर्तेन वयं ग्रामं तं प्राप्य भरतर्षभ।<br>विश्रान्तवाहनाः सर्वे निवासायोपसंस्थिताः ॥ १ ॥ | ततो ग्रामस्य मध्येऽहं निविष्टः कुरुनन्दन ।<br>समन्ताद् वृष्णिसैन्येन महता परिवारितः ॥ २ ॥ |
| अर्जुन कहते हैं—भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर दो ही घड़ीमें हम सब लोग उस ब्राह्मणके गाँवमें पहुँचकर वहाँ ठहरनेकी व्यवस्थामें लग गये और हमारे वाहन विश्राम करने लगे ॥ १ ॥ | कुरुनन्दन ! इसके बाद चारों ओरसे विशाल वृष्णिसैनासे घिरा हुआ मैं उस गाँवके भीतर प्रविष्ट हुआ ॥ २ ॥ |
| ततः शकुनयो दीप्ता मृगाश्च क्रूरभाषिणः।<br>दीप्तायां दिशि वाशन्तो भयमावेदयन्ति मे ॥ ३ ॥ |