विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 680, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६५८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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उस समय मुखसे आग उगलनेवाले बहुत-से पक्षी तथा क्रूरतापूर्ण बोली बोलनेवाले मृग सामने आ गये और दाहयुक्त दिशामें अव्यक्त शब्द करते हुए मुझे भयकी सूचना देने लगे ॥
संध्यारागो जपावर्णो भानुमांश्चैव निष्प्रभः ।
पपात महती चोल्का पृथिवी चाप्यकम्पत ॥ ४ ॥
संध्याका रंग जपा-कुसुमके समान दिखायी दिया। सूर्यदेव प्रभाहीन प्रतीत हुए। आकाशसे उल्कापात हुआ और पृथ्वी काँपने लगी ॥ ४ ॥
तान् समीक्ष्य महोत्पातान् दारुणाँल्लोमहर्षणान् ।
योगमाज्ञापयंस्तत्र जनस्योत्सुकचेतसः ॥ ५ ॥
युयुधानपुरोगाश्च वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।
सर्वे युक्तरथाः सज्जाः स्वयं चाहं तथाभवम् ॥ ६ ॥
उन भयंकर एवं रोमाञ्चकारी बड़े-बड़े दारुण उत्पातोंको देखकर सात्यकि आदि वृष्णि और अन्धकवंशके महारथियोंने उत्सुक चित्तवाले लोगोंको तैयार हो जानेकी आज्ञा दे दी। सबके रथ जोत दिये गये; सभी सुसज्जित हो गये। स्वयं मैं भी सब प्रकारसे तैयार हो गया ॥ ५-६ ॥
गतेऽर्धरात्रसमये ब्राह्मणो भयविह्वलः ।
उपागम्य भयादस्मानिदं वचनमब्रवीत् ॥ ७ ॥
जब आधी रातका समय बीत गया, तब ब्राह्मण भयसे व्याकुल होकर हमलोगोंके पास आया और भयभीत होकर इस प्रकार बोला—॥ ७ ॥
कालोऽयं समुदुप्राप्तो ब्राह्मण्याः प्रसवस्य मे ।
तथा भवन्तस्तिष्ठन्तु न भवेद् वञ्चनं यथा ॥ ८ ॥
'मेरी ब्राह्मणीके प्रसवका यह समय आ पहुँचा है, अब आपलोग इस तरह तैयार रहें, जिससे फिर धोखा न हो' ॥ ८ ॥
मुहूर्तादेव चाश्रौषं कृपणं रुदितस्वनम् ।
तस्य विप्रस्य भवने ह्रियतेऽह्रियतेति च ॥ ९ ॥
फिर तो दो ही घड़ीमें ब्राह्मणके घरके भीतर दीनतापूर्वक रोदनकी ध्वनि मुझे सुनायी दी। लोग कह रहे थे—'हाय ! बालकको हर ले जाता है, हर ले गया' ॥ ९ ॥
अथाकाशे पुनर्वाचमश्रौषं बालकस्य वै ।
ऊँहेति ह्रियमाणस्य न च पश्यामि राक्षसम् ॥ १० ॥
फिर आकाशमें मैंने अपहृत बालकका 'ऊँह' यह शब्द सुना; परंतु उसका अपहरण करनेवाले राक्षसको मैं नहीं देख पाता था ॥ १० ॥
ततोऽस्माभिस्तदा तात शरवर्षैः समन्ततः ।
विष्टम्भिता दिशः सर्वा हृत एव स बालकः ॥ ११ ॥
तात ! तब हमलोगोंने बाण-वर्षा करके चारों ओरसे सम्पूर्ण दिशाओंको रूँध डाला, तो भी उस बालकका अपहरण तो हो ही गया ॥ ११ ॥
ब्राह्मणोऽऽर्तस्वरं कृत्वा हृते तस्मिन् कुमारके ।
वाचः स परुषास्तीव्राः श्रावयामास मां तदा ॥ १२ ॥
उस कुमारका अपहरण हो जानेपर ब्राह्मणने आर्तनाद करके उस समय मुझे अत्यन्त कड़वी खरी-खोटी बातें सुनानी आरम्भ कीं ॥ १२ ॥
वृष्णयो हतसंकल्पास्तथाहं नष्टचेतनः ।
मामेवं हि विशेषेण ब्राह्मणः प्रत्यभाषत ॥ १३ ॥
वृष्णिवंशी वीरोंका सारा मनसूबा चौपट हो गया, मेरी तो चेतना ही नष्ट-सी हो गयी। वह ब्राह्मण विशेषतः मुझसे इस प्रकार कहने लगा—॥ १३ ॥
रक्षिष्यामीति चोक्तं ते न च रक्षितवानसि ।
शृणु वाक्यमिदं शेषं यत् त्वमर्हसि दुर्मते ॥ १४ ॥
'दुर्मते ! तूने कहा था कि रक्षा करूँगा, किंतु रक्षा नहीं की। अतः अन्तमें मेरी यह बात सुन, तू इसीका पात्र है ! ॥ १४ ॥
वृथा त्वं स्पर्धसे नित्यं कृष्णेनामितबुद्धिना ।
यदि स्यादिह गोविन्दो नैतदत्याहितं भवेत् ॥ १५ ॥
'तू अमित बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णके साथ सदा व्यर्थ ही स्पर्धा रखता है। यदि वे भगवान् गोविन्द स्वयं यहाँ होते तो यह दुर्घटना नहीं होने पाती ॥ १५ ॥
यथा चतुर्थं धर्मस्य रक्षिता लभते फलम् ।
पापस्यापि तथा मूढ भागं प्राप्नोत्यरक्षिता ॥ १६ ॥
'मूढ ! जैसे रक्षा करनेवाला क्षत्रिय रक्षित पुरुषके धर्मका चतुर्थांश फल पाता है, उसी प्रकार रक्षा न करनेवाला पुरुष उस अरक्षितके पापका भी भागी होता है ॥ १६ ॥
रक्षिष्यामीति चोक्तं ते न च शक्तोऽसिरक्षितुम् ।
मोघं गाण्डीवमेतत्ते मोघं वीर्यं यशश्च ते ॥ १७ ॥
'तूने घोषणा तो की थी कि 'मैं रक्षा करूँगा,' परंतु तू रक्षा करनेमे समर्थ नहीं है। तेरा यह गाण्डीव धनुष व्यर्थ है ! तेरा पराक्रम और यश भी व्यर्थ ही है' ॥ १७ ॥
अकिञ्चिदुक्त्वा तं विप्रं ततोऽहं प्रस्थितस्तथा ।
सह वृष्ण्यन्धकसुतैर्यत्र कृष्णो महाद्युतिः ॥ १८ ॥
उस ब्राह्मणसे कुछ न कहकर मैं वृष्णि और अन्धकवंशके उन राजकुमारोंके साथ प्रस्थित हो उस स्थानपर आया, जहाँ महातेजस्वी श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ १८ ॥
ततो द्वारवतीं गत्वा दृष्ट्वा मधुनिघातिनम् ।
व्रीडितः शोकंसंतप्तो गोविन्देनोपलक्षितः ॥ १९ ॥
द्वारकामें पहुँचकर मधुसूदनका दर्शन करके मैं लज्जित एवं शोकसे संतप्त हो उठा। गोविन्दने मेरी इस अवस्थाको लक्ष्य किया ॥ १९ ॥