भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 681

[विष्णुपर्व ] त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ६५९

स तु मां व्रीडितं दृष्ट्वा विनिन्दन् कृष्णसंनिधौ। मौढ्यं पश्यत मे योऽहं श्रद्दधे क्लीवकत्थनम् ॥ २०॥

इसी बीचमें उस ब्राह्मणने आकर मुझे लज्जित देख भगवान् श्रीकृष्णके समीप ही इस तरह निन्दित वचन कहना आरम्भ किया—'अहो ! मेरी मूर्खता तो देखो । मैंने इस कायर या नपुंसककी बातपर विश्वास कर लिया ॥ २० ॥

न प्रद्युम्नो नानिरुद्धो न रामो न च केशवः। यत्र शक्ताः परित्रातुं कोऽन्यस्तदवनेश्वरः ॥ २१ ॥

'जहाँ प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, बलराम और श्रीकृष्ण भी रक्षा करनेमें असमर्थ हों, वहाँ दूसरा कौन रक्षा कर सकता है ? ॥ २१ ॥

धिगर्जुनं वृथावादं धिगात्मश्लाघिनो धनुः। दैवोपसृष्टो यो मौर्ख्यादागच्छति च दुर्मतिः ॥ २२ ॥

'व्यर्थ बातें बनानेवाले इस अर्जुनको धिक्कार है ! झूठी आत्मप्रशंसा करनेवाले इस अर्जुनके धनुषको भी धिक्कार है ! क्योंकि यह खोटी बुद्धिवाला पुरुष स्वयं ही दैवका मारा हुआ है तो भी मूर्खतावश मेरी रक्षा करने आया था' ॥ २२ ॥

एवं शपति विप्रर्षौ विद्यामास्थाय वैष्णवीम् । ययौ याम्यीं वीरो यत्रास्ते भगवान् यमः ॥ २३ ॥

( वैशम्पायनजी कहते हैं—) वे ब्रह्मर्षि जब इस प्रकार आक्षेप करने लगे, तब वीर अर्जुन वैष्णवी विद्याका आश्रय ले संयमनी पुरीमें गये, जहाँ भगवान् यम विराजमान हैं ॥ २३ ॥

विप्रापत्यमचक्षाणस्तत ऐन्द्रीमगात् पुरीम् । आग्नेयीं नैर्ऋतीं सौम्यामुदीचीं वारुणीं तथा ॥ २४ ॥

वहाँ ब्राह्मणके बालकको न देखकर ये क्रमशः इन्द्र, अग्नि, निर्ऋति, सोमकी उदीची तथा वरुण—इन सबकी पुरीमें गये ॥ २४ ॥

रसातलं नाकपृष्ठं धिष्ण्यान्यन्यान्युदायुधः। ततोऽलब्ध्वा द्विजसुतमनिस्तीर्णप्रतिश्रवः ॥ २५ ॥ अग्निं विविक्षुः कृष्णेन प्रद्युम्नेन निषेधितः। दर्शये द्विजसूनूं ते मावज्ञात्मानमात्मना ॥ २६ ॥ कीर्तिं त एते विपुलां स्थापयिष्यन्ति मानवाः।

फिर वे अपना अस्त्र-शस्त्र लिये रसातल तथा स्वर्गमें भी गये । इतनेपर भी ब्राह्मण-बालकको न पाकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण न कर सके; अतः उन्होंने जलती आगमें प्रवेश करनेका विचार किया। उस समय श्रीकृष्ण और प्रद्युम्नने आकर उन्हें ऐसा करनेसे रोका और कहा—'मैं उन ब्राह्मण-बालकोंको तुम्हें दिखा दूंगा, तुम स्वयं ही अपनी अवज्ञा न करो । ये संसारके मनुष्य तुम्हारी सुविस्तृत कीर्तिकी स्थापना करेंगे' ॥ २५-२६॥

इति सम्भाष्य मां स्नेहात् समाश्वास्य च माधवः॥ २७॥ सान्त्वयित्वा तु तं विप्रमिदं वचनमब्रवीत् ।

( अर्जुन कहते हैं—) इस प्रकार स्नेहपूर्वक बात करके माधवने मुझे आश्वासन दिया और उन ब्राह्मणको सान्त्वना देकर सारथिसे यह बात कही—॥ २७॥

सुग्रीवं चैव शैव्यं च मेघपुष्पबलाहकौ ॥ २८॥ योजयाश्वानिति तदा दारुकं प्रत्यभाषत ।

'दारुक ! तुम सुग्रीव, शैव्य, मेघपुष्प और बलाहक नामक घोड़ोंको रथमें जोतो।' इस प्रकार उस समय उन्होंने दारुकसे कहा ॥ २८॥

आरोप्य ब्राह्मणं कृष्णो ह्यवरोप्य च दारुकम् ॥ २९॥ मामुवाच ततः शौरिः सारथ्यं क्रियतामिति ।

तदनन्तर रथ जुत जानेपर शूरनन्दन श्रीकृष्णने ब्राह्मण-को रथपर चढ़ा लिया और दारुकको उतारकर मुझसे कहा—'तुम सारथिका काम करो' ॥ २९॥

ततः समास्थाय रथं कृष्णोऽहं ब्राह्मणः स च । प्रायाताः स्म दिशं सौम्यामुदीचीं कौरवर्षभ ॥ ३० ॥

कौरवश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् श्रीकृष्ण, मैं और वह ब्राह्मण तीनों उस रथपर बैठकर सोमपालित उत्तर दिशाकी ओर चल दिये ॥ ३० ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वासुदेवमाहात्म्ये श्रीकृष्णस्योदीचीगमने द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वासुदेव-माहात्म्यके प्रसंगमें श्रीकृष्णका उत्तर दिशाको गमनविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११२ ॥


त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा ब्राह्मणपुत्रोंका आनयन

अर्जुन उवाच

ततः पर्वतजालानि सरितश्च वनानि च। अपश्यं समतिक्रम्य सागरं वरुणालयम् ॥ १॥

अर्जुन कहते हैं—तदनन्तर बहुत-से पर्वत-समूहों, सरिताओं और वनोंको लाँघकर मैंने वरुणालय समुद्रको देखा ॥ १॥