विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 677, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] दशाधिकशततमोऽध्यायः ६५५
'विप्रवर ! ऋक्, साम और यजुर्वेदका जो सत्य है तथा अथर्ववेदमे जो सत्य माना गया है, उसीको मेरा स्वरूप समझो। वेदोंने मुझे धारण कर रखा है और मैंने वेदोंको' ॥
पारमेष्ठ्येन वाक्येन नोदितोऽहं स्वयम्भुवा । वेदोपस्थानिकां चक्रे मतिं संस्थानविस्तरात् ॥ ६८ ॥
तब स्वयम्भू ब्रह्माजीके कहे हुए उनके स्वरूपके अनुरूप वचनसे प्रेरित हो मैंने लक्षणविस्तारके अनुसार वेदोंके उपस्थानका विचार किया ॥ ६८ ॥
सोऽहं स्वयम्भूवचनाद् वेदान् वै समुपस्थितः । अवोचं तांश्च चतुरो मन्त्रप्रवचनान्वितान् ॥ ६९ ॥
स्वयम्भू ब्रह्माजीके वचनसे मैंने मन्त्र और व्याख्यासे युक्त पूर्वोक्त चारों वेदोंकी सेवामें उपस्थित हो उनसे कहा—॥
धन्या भवन्तः पुण्याश्च नित्यमाश्चर्यभूषिताः । आधाराश्चैव विप्राणामेवमाह प्रजापतिः ॥ ७० ॥
'आपलोग धन्य हैं, पवित्र हैं और सदा आश्चर्यसे विभूषित रहते हैं। ब्राह्मणोंके आधार भी आप ही हैं, ऐसा प्रजापतिका कथन है ॥ ७० ॥
स्वयम्भुवोऽपीह परं भवत्सु प्रश्नमागतम् । युष्मत्परतरं नास्ति श्रुत्या वा तपसापि वा ॥ ७१ ॥
'आपलोगोंके विषयमे स्वयम्भू ब्रह्माजीका भी यही निर्णय है कि आपलोग सबसे श्रेष्ठ हैं। श्रुति अथवा तपस्याके द्वारा भी आपलोगोंसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है' ॥ ७१ ॥
प्रत्यूचुस्ते ततो वाक्यं वेदा मामभितः स्थिताः । आश्चर्याश्चैव धन्याश्च यज्ञाश्चात्मपरायणाः ॥ ७२ ॥
तब चारों वेदोंने मेरे सब ओर खड़े होकर इस प्रकार उत्तर दिया—'नारद ! परमात्माके उद्देश्यसे किये जानेवाले यज्ञ ही आश्चर्य और धन्य हैं ॥ ७२ ॥
यज्ञार्थे च वयं सृष्टा धात्रा येन स्म नारद । तदस्माकं परो यज्ञो न वयं स्ववशे स्थिताः ॥ ७३ ॥ स्वयम्भुवः परा वेदा वेदानां क्रतवः पराः ।
'नारद ! परमात्माने यज्ञके लिये ही हमें प्रकट किया है, अतः यज्ञ ही हमसे उत्कृष्ट है। हम अपने वशमें नहीं हैं, स्वयम्भू ब्रह्मासे उत्कृष्ट वेद हैं और वेदोंसे उत्कृष्ट यज्ञ हैं।'
ततोऽहमब्रुवं यज्ञान् बृहद्वाग्भिः पुरस्कृतान् ॥ ७४॥ भो यज्ञाः परमं तेजो युष्मासु खलु लक्ष्यते ।
तब मैंने वेदोंकी वाणीसे पुरस्कृत हुए यज्ञोंसे कहा—'यज्ञो ! तुमलोगोंमें सबसे उत्कृष्ट तेज दिखायी देता है॥७४१/२॥
ब्रह्मणाभिहितं वाक्यं यच्च वेदैरुदीरितम् ॥ ७५ ॥ आश्चर्यमन्यल्लोकेऽस्मिन् भवद्भ्यो नाभिगम्यते ।
'ब्रह्माजीने जो बात कही है और वेदोंनें जिस प्रकार प्रतिपादन किया है, उसके अनुसार इस जगत्में आपलोगोंके सिवा दूसरी कोई आश्चर्यकी वस्तु नहीं ज्ञात होती है ॥ ७५१/२ ॥
धन्याः खलु भवन्तो ये द्विजातीनां स्ववंशजाः ॥ ७६ ॥ तेऽपि खल्वग्नयस्तृप्तिं युष्माभियान्ति तर्पिताः । भागैश्च त्रिदशाः सर्वे मन्त्रैश्चैव महर्षयः ॥ ७७ ॥
'आपलोग धन्य हैं, जो द्विजातियोंके वंशज हैं। आपलोगोंसे तर्पित होनेपर त्रिविध अग्नियोंको तृप्ति प्राप्त होती है। यज्ञोंमें ही सब देवता अपने भागोंसे और महर्षिगण मन्त्रोंसे तृप्त होते हैं' ॥ ७६-७७ ॥
अग्निष्टोमादयो यज्ञा मम वाक्यादनन्तरम् । प्रत्यूचुर्मां ततो वाक्यं सर्वे यूपध्वजाः स्थिताः ॥ ७८ ॥
मेरे ऐसा कहनेके बाद यूपरूपी ध्वजसे सुशोभित समस्त अग्निष्टोम आदि यज्ञ खड़े होकर मुझसे बोले—॥ ७८ ॥
आश्चर्यशब्दो नास्मासु धन्यशब्दोऽपि वा मुने । आश्चर्यं परमं विष्णुः स ह्यस्माकं परा गतिः ॥ ७९ ॥
'मुने ! यह आश्चर्य अथवा धन्य शब्द हमलोगोंके लिये उपयुक्त नहीं है। भगवान् विष्णु ही परम आश्चर्यरूप हैं; क्योंकि वे ही हमारी परम गति हैं ॥ ७९ ॥
यदाज्यं वयमश्नीमो हुतमग्निषु पावनम् । तत् सर्वं पुण्डरीकाक्षो लोकमूर्तिः प्रयच्छति ॥ ८० ॥
'अग्निमें होमे गये जिस पावन आज्य-भागका हमलोग आस्वादन करते हैं, वह सब विश्वरूप कमलनयन भगवान् विष्णु हमें प्रदान करते हैं' ॥ ८० ॥
सोऽहं विष्णोर्गतिं प्रेप्सुरिह सम्पतितो भुवि । दृष्टश्चायं मया कृष्णो भवद्भिरिह संवृतः ॥ ८१ ॥
वेदोंके इस कथनके अनुसार मै भगवान् विष्णुकी गति प्राप्त करनेके लिये यहाँ इस पृथ्वीपर आया हूँ। यहाँ आप राजाओंसे घिरे हुए भगवान् श्रीकृष्णका मैंने दर्शन किया है ॥
यन्मयाभिहितो ह्येष त्वमाश्चर्यं जनार्दन । धन्यश्चासीति भवतां मध्यस्थो ह्यत्र पार्थिवाः ॥ ८२ ॥
राजाओ ! मैंने जो श्रीकृष्णके विषयमें यह कहा है कि 'जनार्दन ! तुम आश्चर्यरूप और धन्य हो,' वे ही यहाँ आपलोगोंके बीचमें विराजमान हैं ॥ ८२ ॥
प्रत्युक्तोऽहमनेनाद्य वाक्यस्यास्य यदुत्तरम् । दक्षिणाभिः सहेत्येवं पर्याप्तं वचनं मम ॥ ८३ ॥
इन्होंने आज मेरी इस बातका जो उत्तर दिया है कि 'दक्षिणाओंके सहित (मैं धन्य हूँ),' यह मेरे प्रश्नका पर्याप्त उत्तर प्राप्त हो गया ॥ ८३ ॥
यज्ञानां हि गतिर्विष्णुः सर्वेषां सहदक्षिणः । दक्षिणाभिः सहेत्येवं प्रश्नो मम समाप्तवान् ॥ ८४ ॥