विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 676, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६५४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ततो भूः स्तुतिवाक्येन सा मयोक्तेन तेजिता ॥ ५२ ॥
विहाय सहजं धैर्यं प्रत्यक्षा मामभाषत ।
मेरे द्वारा कहे गये प्रशंसासूचक वचनसे पृथ्वी उत्तेजित-सी हो उठी। उसने अपनी सहज धीरता छोड़ दी और प्रत्यक्ष होकर मुझसे कहा—॥ ५२॥
देवगन्धर्व मा मैवं संग्रामकलहप्रिय ॥ ५३ ॥
नास्मि धन्या न चाश्चर्यं पारक्येयं धृतिर्मम ।
‘युद्ध और कलहसे प्रेम रखनेवाले देवगन्धर्व ! ऐसी बात न कहो ! न कहो !! न तो मैं धन्य हूँ और न आश्चर्यंरूप ही हूँ। मुझमें जो धीरता दिखायी देती है, यह मेरी नहीं दूसरोंकी है ॥ ५३॥
एते धन्या द्विजश्रेष्ठ पर्वता धारयन्ति माम् ॥ ५४ ॥
आश्चर्याणि च दृश्यन्ते एते लोकस्य हेतवः ।
‘द्विजश्रेष्ठ ! ये पर्वत धन्य हैं, जो मुझे धारण करते हैं। ये ही आश्चर्यंरूप देखे जाते हैं तथा ये ही इस जगत्की स्थितिके हेतु हैं’ ॥ ५४॥
सोऽहं धरणिवाक्येन पर्वतान् समुपस्थितः ॥ ५५ ॥
धन्या भवन्तो दृश्यन्ते बह्वाश्चर्याश्च भूधराः ।
पृथ्वीके इस कथनसे प्रभावित होकर मैं पर्वतोंके यहाँ उपस्थित हुआ और बोला—‘भूधरो ! तुम धन्य हो। तुममें बहुत-सी आश्चर्यकी बातें दिखायी देती हैं ॥ ५५॥
काञ्चनस्याग्ररत्नस्य धातूनां च विशेषतः ॥ ५६ ॥
तेन खल्वाकराः सर्वे भवन्तो भुवि शाश्वताः ।
‘सुवर्ण, श्रेष्ठ रत्न और विशेषतः धातुओंके उत्पत्तिस्थान होनेके कारण तुम सब लोग आकर कहलाते हो। इस भूतलपर तुम सब ही सदा बने रहते हो’ ॥ ५६॥
ते ममैतद् वचः श्रुत्वा पर्वतास्तस्थुषां वराः ॥ ५७ ॥
ऊचुर्मां सान्त्वयुक्तानि वचांसि वनशोभिताः ।
मेरी यह बात सुनकर स्थावर पदार्थोंमें श्रेष्ठ पर्वत, जो वनोंसे सुशोभित होते हैं, मुझसे सान्त्वनायुक्त वचन बोले—॥५७॥
ब्रह्मर्षे न वयं धन्या नाप्याश्चर्याणि सन्ति नः ।
ब्रह्मा प्रजापतिर्धन्यः सर्वाश्चर्यः सुरेष्वपि ॥ ५८ ॥
‘ब्रह्मर्षे ! न तो हम धन्य हैं और न हमारे पास आश्चर्यजनक वस्तुएँ ही हैं। प्रजापति ब्रह्माजी धन्य हैं, देवताओंमें भी वे ही सम्पूर्ण आश्चयोंसे युक्त हैं’ ॥ ५८ ॥
सोऽहं प्रजापतिं गत्वा सर्वप्रभवमव्ययम् ।
तस्य वाक्यस्य पर्यायपर्याप्तमिव लक्षये ॥ ५९ ॥
तब मैंने सबके उत्पत्तिस्थान अविनाशी प्रजापतिके पास जाकर उनमें पर्वतोंके कहे हुए वचनोंकी पर्याप्त सार्थकता देखी ॥ ५९ ॥
सोऽहं पितामहं देवं लोकयोनिं चतुर्मुखम् ।
स्तोतुं पश्चादुपगतः प्रणतोऽवनताननः ॥ ६० ॥
इसके बाद मैंने सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके स्थानभूत, चार मुखवाले पितामह देवको नतमस्तक होकर प्रणाम किया और फिर स्तवन करनेके लिये मैं उनके पास खड़ा हुआ ॥ ६० ॥
सोऽहं वाक्यसमाप्त्यर्थं श्रावये पद्मयोनिजम् ।
आश्चर्यं भगवानेको धन्योऽसि जगतो गुरुः ॥ ६१ ॥
स्तुतिके बाद अपनी बात समाप्त करनेके लिये मैंने पद्मयोनि ब्रह्माजीको सुनाते हुए कहा—‘भगवन् ! एकमात्र आप ही आश्चर्यमय हैं, आप ही सम्पूर्ण जगत्के गुरु एवं धन्य हैं ॥ ६१ ॥
न किंचिदन्यत् पश्यामि भूतं यद् भवता समम् ।
त्वत्तः सर्वमिदं जातं जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ६२ ॥
‘मैं दूसरे किसी भूतको ऐसा नहीं देखता, जो आपके समान हो। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपसे ही उत्पन्न हुआ है ॥ ६२ ॥
सदेवदानवा मर्त्या लोके भूतेन्द्रियात्मकाः ।
भवन्ति सर्वदेवेश दृष्ट्वा सर्वमिदं जगत् ॥ ६३ ॥
‘सर्वदेवेश्वर ! संसारमें भूत और इन्द्रियमय जो देवता, दानव और मनुष्य आदि प्राणी देखे जाते हैं, वे सब आपसे ही उत्पन्न होते हैं, इस सम्पूर्ण जगत्को देखकर यही निश्चय होता है ॥ ६३ ॥
तेन खल्वसि देवानां देवदेवः सनातनः ।
तेषामेवासि यत्स्रष्टा लोकानामादिसम्भवः ॥ ६४ ॥
‘इसलिये आप अवश्य ही देवताओंके सनातन देवाधिदेव हैं; क्योंकि आप ही उनके स्रष्टा हैं और आप ही समस्त लोकोंके आदिकारण हैं’ ॥ ६४ ॥
ततो मां प्राह भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।
धन्याश्चर्याश्रितैर्वाक्यैः किं मां नारद भाषसे ॥ ६५ ॥
तब लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने मुझसे कहा—‘नारद ! धन्य और आश्चर्यके विवेचनसे सम्बन्ध रखनेवाले वचनोंद्वारा मेरे विषयमें क्या कहते हो ? ॥ ६५ ॥
आश्चर्यं परमं वेदा धन्या वेदाश्च नारद ।
ये लोकान् धारयन्ति स्म वेदास्तत्त्वार्थदर्शिनः ॥ ६६ ॥
‘नारद ! सबसे महान् आश्चर्य तो वेद हैं, वे ही धन्य भी हैं; क्योंकि वे तत्त्वार्थदर्शी वेद सम्पूर्ण लोकोंको धारण करते हैं ॥ ६६ ॥
ऋक्सामयजुषां सत्यमथर्वणि च यन्मतम् ।
तन्मयं विद्धि मां विप्र धृतोऽहं तैर्मया च ते ॥ ६७ ॥