विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 675, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[ विष्णुपर्व ] दशाधिकशततमोऽध्यायः ६५३
(प्रथम स्तम्भ)
सोऽहं तं पाणिना स्पृष्ट्वा प्रोक्तवाञ्जलचारिणम्।
त्वमाश्चर्यशरीरोऽसि कूर्म धन्योऽसि मे मतः ॥ ३५ ॥
मैंने उस जलचर जन्तुको हाथसे छूकर उससे कहा—'कूर्म ! तुम्हारा शरीर आश्चर्यजनक है। मेरे मतमें तुम धन्य हो ॥ ३५ ॥
यस्त्वमेवमभेद्याभ्यां कपालाभ्यां समावृतः।
तोये चरसि निःशङ्कः कंचिदन्यमचिन्तयन् ॥ ३६ ॥
'क्योंकि तुम दो अभेद्य कपालोंसे आवृत रहकर दूसरे किसीकी परवा न रखते हुए पानीमें निःशङ्क विचरते हो'॥ ३६ ॥
स मामुवाचाम्बुचरः कूर्मो मानुषवत्स्वयम्।
किमाश्चर्यं मयि मुने धन्यश्चाहं कथं विभो ॥ ३७ ॥
तब उस जलचर कछुएने स्वयं ही मनुष्यकी-सी बोलीमें मुझसे कहा—'मुने! मुझमें क्या आश्चर्य है? प्रभो! मैं कैसे धन्य हूँ ? ॥ ३७ ॥
गङ्गेयं निम्नगा धन्या किमाश्चर्यमतः परम्।
यत्राहमिव सत्त्वानि चरन्त्ययुतशो द्विज ॥ ३८ ॥
ब्रह्मन्! धन्य तो ये गङ्गा नदी हैं। इनसे बढ़कर आश्चर्यकी वस्तु और क्या है? जिनके भीतर मुझ-जैसे हजारों जलजन्तु विचरते हैं' ॥ ३८ ॥
सोऽहं कुतूहलाविष्टो नदीं गङ्गामुपस्थितः।
धन्यासि त्वं सरिच्छ्रेष्ठे नित्यमाश्चर्यभूषिता ॥ ३९ ॥
या त्वमेवं महादेहः श्वापदैरुपशोभिता।
ह्रदिनी सागरं यासि रक्षन्ती तापसाश्रमान् ॥ ४० ॥
तब मैं कौतूहलवश गङ्गा नदीके निकट गया और बोला—'सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गे! तुम धन्य हो और सदा आश्चर्यसे विभूषित रहती हो, क्योंकि ऐसे-ऐसे विशालकाय हिंसक जन्तु तुम्हारी शोभा बढ़ाते हैं; तुम अनेकानेक कुण्डोंसे युक्त हो और कितने ही तापसोंके आश्रमोंकी रक्षा करती हुई समुद्रतक जाती हो' ॥ ३९-४० ॥
एवमुक्ता ततो गङ्गा रूपिणी प्रत्यभाषत।
नारदं देवगन्धर्वं शक्रस्य दयितं द्विजम् ॥ ४१ ॥
मेरे इस तरह कहनेपर गङ्गाजी अपने दिव्य रूपसे प्रकट होकर मुझ देवगन्धर्वजातीय तथा इन्द्रके प्रिय मित्र नारद नामक ब्राह्मणसे यों बोलीं—॥ ४१ ॥
मा मैवं देवगन्धर्व संग्रामकलहप्रिय।
नाहं धन्या द्विजश्रेष्ठ नैवाश्चर्योपशोभिता ॥ ४२ ॥
'देवगन्धर्व! ऐसा न कहो, न कहो। युद्ध और कलहके प्रेमी द्विजश्रेष्ठ! मै न तो धन्य हूँ और न आश्चर्यजनक जन्तुओंसे सुशोभित ही ॥ ४२ ॥
तव सत्ये निविष्टस्य वाक्यं मां प्रतिबाधते।
सर्वाश्चर्यकरो लोके धन्यश्चैवार्णवो द्विज ॥ ४३ ॥
यत्राहमिव विस्तीर्णाः शतशो यान्ति निम्नगाः।
(द्वितीय स्तम्भ)
'आप सत्यपरायण महर्षिका यह वचन मेरे प्रति बाधित हो रहा है। ब्रह्मन् ! संसारमें पूर्णतः आश्चर्यकारक और धन्य तो एकमात्र समुद्र ही है, जिसमे मुझ-जैसी सैकड़ो विस्तृत नदियाँ जाकर मिलती हैं' ॥ ४३ ½ ॥
सोऽहं त्रिपथगावाक्यं श्रुत्वार्णवमुपस्थितः ॥ ४४ ॥
आश्चर्यं खलु लोकानां धन्यश्चासि महार्णव।
येन खल्वसि योनस्त्वमम्भसां सलिलेश्वरः ॥ ४५ ॥
गङ्गाजीका उक्त वचन सुनकर मैं महासागरके तटपर गया और बोला—'महार्णव! तुम समस्त लोकोंमें आश्चर्यमय और धन्य हो, क्योंकि तुम जलकी योनि और स्वामी हो। ४४-४५।
स्थाने त्वां वारिवाहिन्यः सरितो लोकपावनाः।
इमाः समभिगच्छन्ति पत्न्यो लोकनमस्कृताः ॥ ४६ ॥
'जल बहानेवाली जो ये लोकपावन और विश्ववन्दित नदियाँ पत्नीभावसे तुम्हारे समीप जाती हैं, यह सब उचित ही है' ॥ ४६ ॥
समुद्रस्त्वेवमुक्तस्तु ततो मामवदद्-वचः।
स्वं जलौघतलं भित्त्वा व्युत्थितः पवनेरितः ॥ ४७ ॥
मेरे ऐसा कहनेपर पवनप्रेरित समुद्र अपनी अगाध जलराशिका भेदन करके उठ खड़ा हुआ और मुझसे इस प्रकार बोला—॥ ४७ ॥
मा मैवं देवगन्धर्व नास्म्याश्चर्यो द्विजर्षभ।
वसुधेयं मुने धन्या यत्राहमुपरि स्थितः ॥ ४८ ॥
ऋते तु पृथिवीं लोके किमाश्चर्यमतः परम्।
'देवगन्धर्व! आप ऐसा न कहें ! न कहे !! द्विजश्रेष्ठ! मैं ऐसा आश्चर्यरूप नहीं हूँ। मुने! धन्य तो यह वसुधा है, जिसके ऊपर मैं स्थित हूँ। संसारमे पृथ्वीके सिवा उससे बढ़कर आश्चर्यकी वस्तु दूसरी कौन है ?' ॥ ४८ ½ ॥
सोऽहं सागरवाक्येन क्षितिं क्षितितले स्थितः ॥ ४९ ॥
कौतूहलसमाविष्टो ह्यध्रुवं जगतो गतिम्।
समुद्रके कहनेसे मैं पृथ्वीपर खड़ा हुआ और कौतूहल-युक्त होकर जगत्की आधारस्वरूपा पृथ्वीसे बोला—॥४९ ½॥
धरित्रि देहिनां योने धन्या खल्वसि शोभने ॥ ५० ॥
आश्चर्यं चापि भूतेषु महत्या क्षमया युते।
'धरित्रि! तू समस्त देहधारियोंकी योनि है, अतः शोभने! तू निश्चय ही धन्य है। महती क्षमासे संयुक्त होनेके कारण तू सम्पूर्ण भूतोंमें आश्चर्यरूप है ॥ ५० ½ ॥
तेन खल्वसि भूतानां धरणी मनुजारणिः ॥ ५१ ॥
क्षमा त्वत्तः प्रभूता च कर्म चाम्बरगामिनाम्।
'अतः निश्चय ही तू समस्त प्राणियोंको धारण करनेवाली और मनुष्योंका उत्पत्ति-स्थान है। तुझसे ही क्षमाभाव प्रकट हुआ है। आकाशचारियोंका कर्म भी तुझसे ही सिद्ध होता है' ॥ ५१ ½ ॥