भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 661

विष्णुपर्व ] पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ६३९

साधु वीर महाबाहो रुक्मिण्यानन्दवर्धन ।
यत् त्वया धर्षिता माया तेन स्म परितोषिताः ॥ ३५ ॥

उस सर्पमयी मायाके नष्ट होनेपर देवता और असुर सभी प्रद्युम्नकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे, ‘रुक्मिणीका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु वीर ! तुमने बहुत अच्छा किया। तुम्हारे द्वारा जो इस मायाकी पराजय हुई है, इससे हम बहुत संतुष्ट हैं’ ॥ ३४-३५ ॥

हतायां सर्पमायायां शम्बरोऽचिन्तयत् पुनः ।
अस्ति मे कालदण्डाभो मुद्गरो हेमभूषितः ॥ ३६ ॥

उस सर्पमयी मायाके नष्ट होनेपर शम्बरासुरने पुनः सोचा, ‘अभी मेरे पास सुवर्णभूषित मुद्गर है, जो कालदण्डके समान भयंकर है॥ ३६ ॥

तमप्रतिहतं युद्धे देवदानवमानवैः ।
पुरा यो मम पार्वत्या दत्तः परमतुष्टया ॥ ३७ ॥

‘वह युद्धमे देवता, दानवों और मानवोंके द्वारा भी प्रतिहत होनेवाला नहीं है, मैं उसीका प्रयोग करूँगा। पूर्व-कालमें परम संतुष्ट हुई पार्वती देवीने मुझे वह मुद्गर दिया और इस प्रकार कहा—॥ ३७ ॥

गृहाण शम्बरेमं त्वं मुद्गरं हेमभूषितम् ।
मया सृष्टं स्वदेहे वै तपः परमदुश्वरम् ॥ ३८ ॥

‘शम्बर ! तू यह सुवर्णभूषित मुद्गर ग्रहण कर। मैंने अपने शरीरसे अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके इसकी सृष्टि की है॥ ३८ ॥

मायान्तकरणं नाम सर्वासुरविनाशनम् ।
अनेन दानवौ रौद्रौ बलिनौ कामरूपिणौ ॥ ३९ ॥
शुम्भश्चैव निशुम्भश्च सगणौ सूदतौ मया ।
प्राणसंशयमापन्ने त्वया मोक्ष्यः स शत्रवे ॥ ४० ॥

‘यह मायाओंका अन्त करनेवाला तथा समस्त असुरोंका विनाशक है। इसके द्वारा मैंने इच्छानुसार रूप धारण करने-वाले दो बलवान् एवं भयंकर दानव शुम्भ और निशुम्भका उनके सैनिकगणोंसहित संहार किया है। प्राणसंकटकी स्थिति आनेपर ही तुझे अपने शत्रुपर इस मुद्गरका प्रयोग करना चाहिये’ ॥ ३९-४० ॥

इत्युक्त्वा पार्वती देवी तत्रैवान्तरधीयत ।
तदहं मुद्गरं श्रेष्ठं मोचयिष्यामि शत्रवे ॥ ४१ ॥

‘ऐसा कहकर पार्वती देवी वहीं अन्तर्धान हो गयी थीं, अतः मैं उसी श्रेष्ठ मुद्गरका अपने शत्रुपर प्रहार करूँगा’ ॥

तस्य विज्ञाय चित्तं तु देवराजोऽभ्यभाषत ।
गच्छ नारद शीघ्रं त्वं प्रद्युम्नस्य रथं प्रति ॥ ४२ ॥
सम्बोधय महाबाहुं पूर्वजातिं च मोक्षय ।
वैष्णवास्त्रं प्रयच्छास्मै वधार्थं शम्बरस्य च ॥ ४३ ॥
अभेद्यं कवचं चास्य प्रयच्छासुरसूदने ।

उस समय उसके मनोभावको जानकर देवराज इन्द्रने नारदजीसे कहा—‘नारदजी ! आप शीघ्र ही प्रद्युम्नके रथके पास चले जाइये और उन महाबाहु वीरको समझाइये तथा उन्हें उनके पूर्वजन्मका स्मरण दिलाइये। साथ ही शम्बरासुर-के वधके लिये उन्हें वैष्णवास्त्र प्रदान कीजिये। असुरसंहारके कर्ममें लगे हुए इन्हें अभेद्य कवच भी दीजिये’ ॥४२-४३३/२॥

एवमुक्तो मघवता नारदः प्रययौ त्वरम् ॥ ४४ ॥
आकाशेऽधिष्ठितोऽवोचन्मकरध्वजकेतनम् ।

इन्द्रके ऐसा कहनेपर नारदजी बड़ी उतावलीके साथ वहाँ गये और आकाशमें खड़े होकर मकरध्वज कामसे इस प्रकार बोले—॥ ४४१/२ ॥

कुमार पश्य मां प्राप्तं देवगन्धर्वनारदम् ।
प्रेषितं देवराजेन तव सम्बोधनाय वै ॥ ४५ ॥

‘कुमार ! देखो, मैं देवगन्धर्व नारद यहाँ आया हूँ। देवराज इन्द्रने मुझे तुमको समझानेके लिये यहाँ भेजा है ॥

स्मर त्वं पूर्वकं भावं कामदेवोऽसि मानद ।
हरकोपानलाद् दग्धस्तेनानङ्ग इहोच्यसे ॥ ४६ ॥

‘मानद ! तुम अपने पूर्वजन्मका स्मरण करो। तुम साक्षात् कामदेव हो। भगवान् शङ्करकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये थे, इसलिये इस जगत्में अनङ्ग कहलाते हो ॥४६॥

त्वं वृष्णिवंशजातोऽसि रुक्मिण्या गर्भसम्भवः ।
जातोऽसि केशवेन त्वं प्रद्युम्न इति कीर्त्यसे ॥ ४७ ॥

‘तुम्हारा वर्तमान जन्म वृष्णिवंशमें हुआ है। तुम रुक्मिणीदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए हो। साक्षात् भगवान् केशवने तुम्हें जन्म दिया है। तुम प्रद्युम्न नामसे पुकारे जाते हो ॥ ४७ ॥

आहृत्य शम्बरेण त्वमिहानीतोऽसि मानद ।
सप्तरात्रे त्वसम्पूर्णे सूतिकागारमध्यतः ॥ ४८ ॥

‘मानद ! तुम्हारे जन्मकी सातवीं रात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि शम्बरासुर तुम्हे सूतिकागारसे हरकर यहाँ उठा लाया ॥ ४८ ॥

वधार्थं शम्बरस्य त्वं ह्रियमाणो ह्युपेक्षितः ।
केशवेन महाबाहो देवकार्यार्थसिद्धये ॥ ४९ ॥

‘महाबाहो ! देवताओंका कार्य सिद्ध करने और शम्बरासुरको मारनेके लिये ही भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हारे अपहरणकी उपेक्षा की ॥ ४९ ॥

यैषा मायावती नाम भार्या वै शम्बरस्य तु ।
रतिं तां विद्धि कल्याणीं तव भार्या पुरातनीम् ॥ ५० ॥

‘यह जो मायावती नामसे प्रसिद्ध शम्बरासुरकी भार्या बनी बैठी है, इसे तुम अपनी कल्याणमयी पुरातन पत्नी रति समझो ॥ ५० ॥