विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 662, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें६४० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तव संरक्षणार्थाय शम्बरस्य गृहेऽवसत्।
मायां शरीरजां तस्य मोहनार्थं दुरात्मनः ॥ ५१ ॥
रतेः सम्पादनार्थाय प्रेषयत्यनिशं तदा।
'तुम्हारे शरीरकी रक्षा करनेके लिये ही इसने शम्बरासुरके घरमें निवास किया है। उस दुरात्मा दैत्यको मोहनेके लिये यह अपने शरीरसे एक मायामयी स्त्री प्रकट करके उसकी प्रसन्नताके लिये सदा भेजा करती है ॥ ५१॥'
एवं प्रद्युम्न बुद्ध्वा चै तत्र भार्या प्रतिष्ठिता ॥ ५२ ॥
हत्वा तं शम्बरं वीर वैष्णवास्त्रेण संयुगे।
गृह्य मायावतीं भार्या द्वारकां गन्तुमर्हसि ॥ ५३ ॥
'प्रद्युम्न ! यह सब जानकर ही तुम्हारी पत्नी वहाँ स्थिरतापूर्वक रहती है। वीर ! तुम वैष्णवास्त्रके द्वारा युद्धमें शम्बरासुरका वध करके अपनी भार्या मायावतीको साथ ले द्वारकाको जानेयोग्य हो ॥ ५२-५३ ॥'
गृहाण वैष्णवं चास्त्रं कवचं च महाप्रभम्।
शक्रेण तव संगृह्य प्रेषितं शत्रुसूदन ॥ ५४ ॥
'शत्रुसूदन ! यह वैष्णव अस्त्र तथा अत्यन्त कान्तिमान् कवच संग्रह करके इन्द्रने तुम्हारे लिये भेजा है। तुम इन्हें ग्रहण करो ॥'
शृणु मे ह्यपरं वाक्यं क्रियतामविशङ्कया।
अस्य देवरिपोस्तात मुद्गरो नित्यमूर्जितः ॥ ५५ ॥
पार्वत्यां परितुष्टायां दत्तः शत्रुनिबर्हणः।
अमोघश्चैव संग्रामे देवदानवमानवैः ॥ ५६ ॥
'अब तुम मेरी दूसरी बात सुनो और निःशङ्क होकर उसका पालन करो। तात ! इस देवद्रोहीका मुद्गर नित्य शक्तिशाली है। पार्वती देवीने प्रसन्न होकर वह शत्रुनाशक मुद्गर इसे प्रदान किया था। यह संग्राममें देवताओं, दानवों और मानवोंके लिये भी अमोघ है ॥ ५५-५६ ॥'
तदस्त्रप्रतिघातार्थं देवीं त्वं स्मर्तुमर्हसि।
स्तव्या चैव नमस्या च महादेवी रणोत्सुकैः ॥ ५७ ॥
'उस अस्त्रका निवारण करनेके लिये तुम्हें पार्वती देवीका स्मरण करना चाहिये। युद्धके लिये उत्सुक रहनेवाले वीरोंको महादेवी पार्वतीकी स्तुति और वन्दना अवश्य करनी चाहिये॥'
तत्र वै क्रियतां यत्नः संग्रामे रिपुणा सह ।
इत्युक्त्वा नारदो वाक्यं प्रययौ यत्र वासवः ॥ ५८ ॥
'शत्रुके साथ संग्राम करते समय तुम्हें पार्वती देवीकी स्तुतिके लिये भी अवश्य प्रयत्न करना चाहिये।' ऐसा कहकर नारदजी जहाँ इन्द्र थे, वहीं चले गये ॥ ५८ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शम्बरवधे नारदवाक्ये षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शम्बरवधके प्रसङ्गमें नारदजीका वाक्यविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ १०६ ॥
सप्ताधिकशततमोऽध्यायः
प्रद्युम्नके द्वारा शम्बरासुरका वध
वैशम्पायन उवाच
शम्बरस्तु ततः क्रुद्धो मुद्गरं तं समाददे ।
मुद्गरे गृह्यमाणे तु द्वादशार्काः समुत्थिताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तब क्रोधमें भरे हुए शम्बरासुरने वह मुद्गर हाथमें ले लिया। उसे लेते समय सहसा बारह सूर्य प्रकट हो गये ॥ १ ॥
पर्वताश्चलिताः सर्वे तथैव वसुधात लम्।
उन्मार्गाः सागरा याताः संक्षुब्धाश्चापि देवताः ॥ २ ॥
समस्त पर्वत हिलने लगे, पृथ्वी काँप उठी, सब समुद्र ऊपरको उछलने लगे, इसी प्रकार समस्त देवताओमे भी क्षोभ फैल गया ॥ २ ॥
गृध्रचक्राकुलं व्योम उल्कापातो बभूव ह।
ववर्ष रुधिरं देवः परुषं पवनो ववौ ॥ ३ ॥
आकाशमे गीधोंके समूह मँडराने लगे, उल्कापात होने लगा, बादल रुधिर बरसाने लगे और अत्यन्त रूखी वायु चलने लगी ॥ ३ ॥
एवं दृष्ट्वा महोत्पातान् प्रद्युम्नः स त्वरान्वितः ।
अवतीर्य रथाद् वीरः कृताञ्जलिपुटः स्थितः ॥ ४ ॥
वीर प्रद्युम्न इस प्रकारके महान् उत्पातोंको देखकर फुर्तीके साथ रथसे नीचे उतर दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ४ ॥
देवीं सस्मार मनसा पार्वतीं शङ्करप्रियाम् ।
प्रणम्य शिरसा देवीं स्तोतुं समुपचक्रमे ॥ ५ ॥
वे मन ही-मन भगवान् शङ्करकी प्रिया देवी पार्वतीका स्मरण करने लगे। उन्होंने सिर झुकाकर देवीको प्रणाम करके उनकी स्तुति आरम्भ की ॥ ५ ॥
प्रद्युम्न उवाच
ॐ नमः कात्यायन्यै गिरीशायै नमो नमः।
नमस्त्रैलोक्यमायायै कात्यायन्यै नमो नमः ॥ ६ ॥
प्रद्युम्नने कहा— सच्चिदानन्दमयी कात्यायनी देवीको प्रणाम है। पर्वतोंकी स्वामिनी पार्वती देवीको वारंवार नमस्कार है। तीनों लोकोंकी मायासस्वरूपा कात्यायनी देवीको मेरा बारंबार अभिवादन है ॥ ६ ॥